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ट्रंप के 50% टैरिफ के कारण व्यापार वार्ता से पीछे हट गया भारत: पूर्व वित्त सचिव सुभाष गर्ग

पूर्व वित्त सचिव सुभाष गर्ग ने ट्रंप के उन दावों को भी खारिज कर दिया कि भारत सस्ते रूसी तेल से भारी मुनाफा कमा रहा है। ट्रंप के इन आरोपों पर उन्होंने कहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति का यह दावा राजनीतिक दिखावा है न कि आर्थिक सच्चाई।

नई दिल्ली: अमेरिका और भारत के बीच तनावपूर्ण व्यापार संबंधों पर भारत के पूर्व वित्त सचिव सुभाष गर्ग ने कहा कि भारत ने ट्रंप द्वारा लगाए गए 50% तक के एकतरफा टैरिफ के बाद असल में बातचीत से दूरी बना ली है।

एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, गर्ग ने कहा कि कोई भी देश इतने ऊँचे टैरिफ पर व्यापार नहीं कर सकता। लेकिन भारत को आधिकारिक तौर पर बातचीत का दरवाजा कभी बंद नहीं करना चाहिए। गर्ग ने कहा कि हमें हमेशा उम्मीद रखनी चाहिए कि किसी समय सही समझदारी वापस आएगी।

पूर्व वित्त सचिव ने ट्रंप के उन दावों को भी खारिज कर दिया कि भारत सस्ते रूसी तेल से भारी मुनाफा कमा रहा है। ट्रंप के इन आरोपों पर उन्होंने कहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति का यह दावा राजनीतिक दिखावा है न कि आर्थिक सच्चाई।

एनडीटीवी से बात करते हुए गर्ग ने बताया कि एक नई सीएलएसए (CLSA) रिपोर्ट पहले ही इस ‘मुनाफे’ के दावे को झूठा साबित कर चुकी है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत को रूसी कच्चे तेल से सालाना बचत 25 अरब डॉलर नहीं, बल्कि 2.5 अरब डॉलर के करीब होती है। गर्ग ने साफ कहा कि आप कोई भी आंकड़ा दे सकते हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। ट्रंप इसे भारत को दंडित करने के लिए एक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।

‘मुनाफे का दावा सिर्फ दंडित करने का एक तरीका’

सुभाष गर्ग के मुताबिक, अगर शिपिंग, बीमा और मिश्रण (blending) जैसी लागतों को जोड़ दिया जाए, तो भारत को रूसी तेल पर मिलने वाली असल छूट अब प्रति बैरल सिर्फ 3-4 डॉलर है।

उन्होंने जोर देकर कहा, “अगर ट्रंप इसे एक राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहते हैं, तो वह कोई भी मनचाहा आंकड़ा चुन सकते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि भारत रूसी तेल वैश्विक मूल्य-सीमा ढांचे के भीतर ही खरीद रहा है। इसमें किसी भी अंतरराष्ट्रीय समझौते का कोई उल्लंघन नहीं है।”

गर्ग ने यह भी चेतावनी दी कि रूसी कच्चे तेल की खरीद बंद करना भारत के लिए नुकसानदायक होगा। उन्होंने कहा, “कच्चे तेल की लागत में कोई भी कमी भारत के लिए फायदेमंद है। अगर हम खरीद बंद कर देते हैं, तो इससे सिर्फ अमेरिका का हौसला बढ़ेगा, भारत का हित पूरा नहीं होगा।”

अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट ने भी कहा था कि भारत पर ऊँचे टैरिफ सिर्फ रूसी तेल खरीदने की वजह से नहीं लगाए गए हैं, बल्कि इसका एक कारण दोनों देशों के बीच व्यापारिक समझौतों की बातचीत का लंबे समय तक खिंचना भी है।

गर्ग ने भारत को भी अपनी खुद की कठोर बातचीत की नीतियों पर फिर से विचार करने को कहा है। खासकर कृषि और उपभोक्ता वस्तुओं के क्षेत्र में। उन्होंने कहा कि हम जीएम तेल या डेयरी जैसे मुद्दों पर बहुत अडिग रहे हैं। इन आयातों से किसानों के हितों को वास्तव में कोई नुकसान नहीं होगा। यह बात उपभोक्ता की पसंद की है और यह पसंद प्रतिबंधों के साथ नहीं, बल्कि विकल्पों के साथ आनी चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पहले ही कहा है कि वह देश के किसानों के हितों से कभी समझौता नहीं करेंगे।

चीन और अमेरिकी बहिष्कार पर भी गर्ग की राय

पीएम मोदी की चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ आगामी बैठक से पहले, गर्ग ने एनडीटीवी से कहा कि भारत की महत्वपूर्ण क्षेत्रों में चीनी निवेश को रोकने की नीति उल्टी पड़ गई है। उन्होंने कहा कि हम चीन से सेमीकंडक्टर, सोलर सेल और ईवी बैटरी का आयात किए बिना नहीं रह सकते। भारत में चीनी निवेश को अनुमति देने से लंबे समय में हमारी निर्भरता कम हो सकती है। हमारी मौजूदा नीति ने हमें ही नुकसान पहुँचाया है।

ट्रंप के टैरिफ के जवाब में अमेरिकी सामानों के बहिष्कार की बढ़ती माँग पर गर्ग ने साफ कहा, यह एक पागलपन है। अमेरिका भारतीय उपभोग और सेवा क्षेत्र में गहराई से जुड़ा हुआ है। इसलिए, बहिष्कार न तो संभव है और न ही फायदेमंद।

50% टैरिफ के पीछे ट्रंप की निजी नाराजगी

गौरतलब है कि हाल ही में अमेरिकी निवेश बैंक जेफरीज की एक रिपोर्ट में दाया किया गया था कि अमेरिका द्वारा भारतीय सामानों पर लगाया गया 50 प्रतिशत का भारी टैरिफ सिर्फ व्यापार से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ‘निजी नाराजगी’ है। रिपोर्ट में कहा गया कि भारत ने जब ट्रंप को भारत-पाकिस्तान संघर्ष में मध्यस्थता करने का मौका नहीं दिया, तो ट्रंप उनसे नाराज हो गए।

ये टैरिफ 27 अगस्त से लागू हो गए हैं और अनुमान है कि इससे भारत की अर्थव्यवस्था को 55–60 अरब डॉलर का झटका लगेगा। खासकर टेक्सटाइल, फुटवियर, ज्वेलरी और रत्न-आभूषण जैसे सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे, जिनमें लाखों लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी है।।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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