Homeभारतअगर माता-पिता IAS तो बच्चों को आरक्षण क्यों: सुप्रीम कोर्ट

अगर माता-पिता IAS तो बच्चों को आरक्षण क्यों: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शिक्षा और आर्थिक सशक्तीकरण के साथ-साथ सामाजिक गतिशीलता भी आती है। ऐसे में अगर संपन्न बच्चों के लिए फिर से आरक्षण मांगा जाए, तो इस चक्र से हम बाहर ही नहीं निकल सकेंगे।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए शुक्रवार को सवाल उठाया कि क्या आरक्षण के जरिए शिक्षा और आर्थिक उन्नति हासिल कर चुके परिवारों के बच्चों को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण का लाभ मिलता रहना चाहिए।

जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने कहा, ‘अगर माता-पिता आईएएस अधिकारी हैं, तो उन्हें आरक्षण क्यों मिलना चाहिए? शिक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण से सामाजिक गतिशीलता आती है। इसलिए बच्चों के लिए फिर से आरक्षण की मांग करना… ऐसे तो इससे छुटकारा नहीं मिलेगा।’

जस्टिस नागरत्ना ने कहा, ‘यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर हमें ध्यान देना होगा। और फिर इसका क्या फायदा है? आप आरक्षण दे रहे हैं। माता-पिता पढ़े-लिखे हैं, अच्छी नौकरी कर रहे हैं, अच्छी आमदनी कमा रहे हैं, और बच्चे फिर से आरक्षण चाहते हैं। देखिए, उन्हें आरक्षण से बाहर निकलना चाहिए।’

किस मामले पर सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने की ये टिप्पणी

जस्टिस नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की पीठ ने ये टिप्पणियां कर्नाटक हाई कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई के दौरान कीं, जिसमें याचिकाकर्ता को क्रीमी लेयर के आधार पर आरक्षण नहीं देने के फैसले को बरकरार रखा गया था। याचिकाकर्ता के माता-पिता दोनों राज्य सरकार के कर्मचारी हैं।

यह मामला कुरुबा समुदाय के एक उम्मीदवार से संबंधित है, जिसे कर्नाटक के पिछड़े वर्गों में श्रेणी II(A) के अंतर्गत वर्गीकृत किया गया है। इस उम्मीदवार का चयन कर्नाटक पावर ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड में आरक्षित श्रेणी के तहत सहायक अभियंता (विद्युत) के पद पर हुआ था।

हालांकि, जिला जाति एवं आय सत्यापन समिति ने पाया कि उम्मीदवार क्रीमी लेयर में आता है। इस निष्कर्ष के आधार पर उसे जाति वैधता प्रमाण पत्र देने से इनकार कर दिया गया। उम्मीदवार के परिवार की सालाना आय लगभग 19.48 लाख रुपये आंकी गई थी।

अधिकारियों ने पाया कि दोनों माता-पिता सरकारी कर्मचारी थे और उनकी संयुक्त आय निर्धारित क्रीमी लेयर सीमा से अधिक थी। सुनवाई के दौरान, जस्टिस नागरत्ना ने बार-बार चिंता व्यक्त की कि परिवारों की सामाजिक और आर्थिक प्रगति के बावजूद आरक्षण का लाभ जारी रखा जा रहा है।

उन्होंने कहा कि आर्थिक और शैक्षिक सशक्तिकरण के साथ सामाजिक स्थिति में सुधार होता है। उन्होंने उन बच्चों को आरक्षण का लाभ देने के औचित्य पर सवाल उठाया जिनके माता-पिता शिक्षित हैं, अच्छी नौकरी करते हैं और पर्याप्त आय अर्जित करते हैं।

जस्टिस नागरत्ना ने कहा, ‘कुछ संतुलन होना चाहिए। सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े होना ठीक है, लेकिन एक बार जब माता-पिता आरक्षण का लाभ उठाकर एक स्तर प्राप्त कर लेते हैं, यदि वे दोनों आईएएस अधिकारी हैं, दोनों सरकारी सेवा में हैं, तो उनकी स्थिति बहुत अच्छी होती है। अब वे इससे बाहर किए जाने पर सवाल उठा रहे हैं। इसे भी ध्यान में रखना होगा।’

याचिकाकर्ता के वकील की क्या है दलील?

कोर्ट की ये टिप्पणियां उस समय आई जब वकील शशांक रत्नू ने कहा कि सरकारी कर्मचारियों में क्रीमी लेयर की पहचान के लिए वेतन निर्णायक मापदंड नहीं है। उन्होंने कहा कि क्रीमी लेयर के तौर पर बाहर रखा जाना माता-पिता की स्थिति पर निर्भर करता है, जैसे कि वे ग्रुप ए या ग्रुप बी सेवाओं से संबंधित हैं या नहीं, न कि केवल उनकी वेतन से होने वाली आय पर।

उन्होंने कहा कि यदि वेतन को एकमात्र मापदंड माना जाए, तो ड्राइवर, चपरासी, क्लर्क और अन्य निम्न श्रेणी के सरकारी कर्मचारी भी आरक्षण के लाभ से वंचित हो सकते हैं। उन्होंने आगे कहा कि सरकारी कर्मचारियों के लिए, क्रीमी लेयर का निर्धारण वेतन से होने वाली आय से नहीं होता है।

उन्होंने कहा कि वेतन और कृषि से होने वाली आय को नहीं देखा जाना चाहिए है, और केवल व्यवसाय या अन्य स्रोतों से अर्जित आय को ही विचार में लिया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि इस मुद्दे पर न्यायिक मत भिन्न-भिन्न हैं और इस पर विस्तृत विचार-विमर्श की आवश्यकता है।

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि इस मामले में याचिकाकर्ता के पिता को 53,900 रुपये प्रति माह का मूल वेतन मिल रहा था, जबकि मां को 52,650 रुपये प्रति माह का मूल वेतन मिल रहा था।

रत्नू ने कहा कि ये आंकड़े क्रीमी लेयर का निर्धारण करने के लिए प्रासंगिक नहीं हैं, क्योंकि कर्नाटक सरकार ने स्पष्टीकरण दिया है कि जहां माता-पिता राज्य सरकार के कर्मचारी हैं, वहां पात्रता का आकलन करते समय वेतन और भत्तों पर विचार नहीं किया जाना चाहिए।

उन्होंने तर्क दिया कि यदि क्रीमी लेयर का निर्धारण करते समय आय के सभी रूपों को ध्यान में रखा जाए, तो ओबीसी आरक्षण और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) आरक्षण के बीच कोई अंतर नहीं रह जाएगा।

यह याचिका कर्नाटक हाई कोर्ट की एक खंडपीठ के फैसले को चुनौती देने के लिए दायर की गई है, जिसने उम्मीदवार के पक्ष में सिंगल जज वाले बेंच के फैसले को पलट दिया था। खंडपीठ ने कहा था कि क्रीमी लेयर के निर्धारण के लिए वेतन से होने वाली आय को बाहर रखने का नियम केवल केंद्र सरकार के आरक्षण पर लागू होता है, न कि कर्नाटक के आरक्षण पर।

कर्नाटक की क्रीमी लेयर नीति का हवाला देते हुए, हाई कोर्ट ने माना कि उम्मीदवार की पारिवारिक आय लागू सीमा से अधिक है और वह क्रीमी लेयर के अंतर्गत आता है।

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विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...
विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...
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