कोलकाता: शुभेंदु अधिकारी ने शनिवार को पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ले ली। इसी के साथ वे राज्य में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बन गए हैं। शुभेंदु अधिकारी के बाद दिलीप घोष ने मंत्री पद की शपथ ली। इसके अलावा अग्निमित्रा पॉल, अशोक कीर्तनिया ने भी मंत्री पद की शपथ ली। इसके अलावा खुदीराम टुडू, निसिथ प्रमाणिक ने भी शपथ ली।>
शपथ ग्रहण समारोह का आयोजन कोलकाता स्थित ब्रिगेड परेड ग्राउंड में किया गया था। इस समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हुए। साथ ही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता समेत कई दिग्गत नेता भी इस शपथ ग्रहण समारोह का हिस्सा बने हैं।
शुभेंदु अधिकारी…कभी ममता बनर्जी के थे करीबी
शुभेंदु अधिकारी की राजनीतिक यात्रा का सबसे दिलचस्प हिस्सा यही है कि वे कभी ममता बनर्जी के बेहद करीबी और एक तरह से परिवार के सदस्य माने जाते थे। तृणमूल कांग्रेस को खड़ा करने और 2011 में सत्ता तक पहुंचाने में उनकी भी बड़ी भूमिका रही। हालांकि, अब करीब 15 साल बाद तृणमूल और ममता को सत्ता से दूर करने में भी वे ही सबसे आगे नजर आए। आज वे ममता बनर्जी के सबसे कड़े प्रतिद्वंद्वी और राज्य में भाजपा के सबसे मजबूत चेहरों में से एक बनकर उभरे हैं।
2021 के विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले 2020 के दिसंबर में तृणमूल से अलग होने वाले अधिकारी ने ममता को एक नहीं दो-दो बार चुनाव लड़ाया। इसमें 2021 का चुनाव भी शामिल है, जब ममता की लहर विधानसभा चुनाव में नजर आई थी और पार्टी ने 200 से ज्यादा सीटें जीती थी।
शुभेंदु अधिकारी का राजनीतिक सफर
अधिकारी एक प्रभावशाली राजनीतिक परिवार से आते हैं। उनके पिता शिशिर अधिकारी तीन बार सांसद रहे हैं। यूपीए-2 के कार्यकाल में ग्रामीण विकास मंत्रालय में राज्य मंत्री भी रहे। अधिकारी ने अपनी राजनीतिक यात्रा छात्र जीवन में कांग्रेस के स्टूडेंट यूनियन से की। तब राज्य में लेफ्ट का दबदबा हुआ करता था।
ममता द्वारा 1998 में टीएमसी की स्थापना के दो साल बाद वे (शुभेंदु अधिकारी) अपने पिता और भाइयों के साथ पार्टी में शामिल हो गए। इससे टीएमसी को पूर्वी मेदिनीपुर जिले में सीपीआई (एम) पार्टी तंत्र को चुनौती देने के लिए बड़ी मजबूती मिली। इस क्षेत्र में दरअसल अधिकारी परिवार दशकों से राजनीति में सक्रिय है।
साल 2007 के नंदीग्राम भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन ने शुभेंदु अधिकारी को एक प्रमुख राजनीतिक हस्ती बना दिया। उन्होंने तत्कालीन सीपीआई (एम) के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इससे ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस को पूरे बंगाल में गति प्राप्त करने में मदद मिली।
नंदीग्राम में उनकी भूमिका ने उन्हें नंदीग्राम के नायक की छवि दिलाई। साथ ही इससे कई जिलों में टीएमसी के आधार को मजबूत करने में मदद मिली। उनके प्रदर्शन से प्रभावित होकर, ममता बनर्जी ने उन्हें पार्टी के भीतर प्रमुख जिम्मेदारियां सौंपीं और बाद में 2011 में टीएमसी के सत्ता में आने के बाद उन्हें महत्वपूर्ण मंत्री पद भी मिले।
अगले कुछ वर्षों में, ममता बनर्जी के बाद अधिकारी तृणमूल कांग्रेस के सबसे शक्तिशाली नेताओं में से एक बन गए। उन्होंने तामलुक और नंदीग्राम से चुनाव जीता और राज्य के प्रमुख क्षेत्रों में पार्टी के प्रभाव को बढ़ाने का श्रेय उन्हें जाता है। हालांकि, ममता बनर्जी और अधिकारी परिवार के बीच संबंधों में दरार 2019 के आसपास दिखाई देने लगी।
क्यों और कैसे आई ममता बनर्जी और अधिकारी में दूरी?
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इसके प्रमुख कारणों में से एक ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी का पार्टी में तेजी से उदय रहा। बताया जाता है कि टीएमसी के भीतर सत्ता संरचना में बदलाव आने के साथ ही शुभेंदु अधिकारी खुद को हाशिए पर महसूस करने लगे थे। दिसंबर 2020 में, अधिकारी ने टीएमसी छोड़ दी और भाजपा में शामिल हो गए। यह बंगाल की राजनीति में एक नाटकीय बदलाव था।
भाजपा में शामिल होने से कई महीनों पहले से उन्होंने पार्टी से दूरी बनानी शुरू कर दी थी। वे पार्टी के आधिकारिक कार्यक्रमों और ममता बनर्जी कैबिनेट की बैठकों में भी अनुपस्थित रहने लगे। कुछ कार्यक्रमों में अपने भाषणों में उन्होंने पार्टी के कुछ नेताओं के प्रति अपनी असंतोष की झलक भी दिखाई।
यह दरार 10 नवंबर, 2020 को सबसे स्पष्ट रूप से तब दिखी जब अधिकारी और टीएमसी ने नंदीग्राम दिवस पर अलग-अलग रैलियां आयोजित कीं। टीएमसी नेताओं ने शुभेंदु को सीधे तौर पर निशाना बनाया और उन्हें ‘गद्दार’ तक कहा गया। बताया जाता है कि उसी तनातनी के बीच में कुछ मान-मनौव्वल की भी कोशिशें की गई। तब प्रशांत किशोर भी तृणमूल के साथ काम कर रहे थे। उन्होंने भी अधिकारी को मनाने की कोशिश की लेकिन बात नहीं बनी।
भाजपा में अधिकारी को बड़ा ‘प्रोमोशन’
शुभेंदु अधिकारी के पास बंगाल की राजनीति की गहरी समझ मानी जाती है। भाजपा ने अधिकारी के अनुभव को खूब भुनाया। भाजपा में शामिल होते ही अधिकारी ने तेजी से अपने कदम आगे बढ़ाए। 2021 के चुनाव के बाद वे नेता प्रतिपक्ष बने। अधिकारी को जो बात अलग बनाती है, वह है उनका जमीनी स्तर का जुझारू व्यक्तित्व।
बंगाल में भाजपा के अन्य नेताओं के विपरीत, वे रणनीति बनाने वाले कमरों तक सीमित नहीं रहे। वे जमीनी स्तर पर विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व करते, कार्यकर्ताओं को संगठित करते और हिंसा सहित प्रतिकूल राजनीतिक माहौल में उनके खिलाफ दर्ज कई मामलों में भी सक्रिय रूप से साथ नजर आए। और इसी का इनाम है कि 2026 के विधानसभा चुनाव ने उनके राजनीतिक करियर में सबसे बड़ी सफलता दिलाई है।
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