“अयोध्या जी नहीं- यह है जिरानिया। रामचरितमानस में इसका उल्लेख है- जीर्णारण्य। खुद नहीं पढ़ सकते तो मिसिर जी से पढ़वा लीजिये। यह अतीत में जैसा था, आज भी वैसा ही है। बलुआही जमीन पर छितराया हुआ झरबेरियों का जंगल। रेलगाड़ी के स्टेशन पहुंचने के पहले ही औंघाते हुए यात्री को बगलगीर कोहनी मारकर जगाते हुए कहता है- जंगल आ गया, जिरानिया आ गया।
ततमाटोली के लोग इसी को कहते हैं-टौन। जैसा-तैसा हेंच-पेंच सहर नहीं, भा….आ….री सहर… अ…। पीरगंज से भी बड़ा। बिसारिया में धरमशाला है? पादरी साहब का गिरजा है? भा…आ री सहर जिरानिया। क्षण-क्षण सड़क होकर टमटम गुजरती है- पक्की सड़क होकर। दो तल्ला… पक्का, दोतल्ला मकान! चेपमैन साहेब का।
शहर के बाबू भैया बंगाली, वकील, मोख्तार, डॉक्टर, अमला-सब। उनके बाल-गोपालों को भी इस शहर पर ततमाटोली के लोगों की तरह ही नाज। उन्हीं दिनों, एक बार, विराटवपु राय साहेब ने काली-पूजा समिति की रिपोर्ट पढ़ते समय, मुंह सिकोरते हुए जिरानिया को एक अदना सा गांव कह दिया, तो लड़को का दल चीत्कार कर उठा और रिपोर्ट से गांव की संज्ञा निकाल देने के लिए आग्रह किया था। उनलोगों के नागरिक गर्व को आघात लगा था।“
अगर आप हिंदी साहित्य के गभीर पाठक हैं तो इन पंक्तियों से गुजरते हुए आपको जरूर कुछ याद आ रहा होगा। इसकी भाषा, लेखन शैली आपको जरूर हिंदी के महान कथाकार फणीश्वरनाथ रेणु के लेखन की याद दिला रही होगी। मगर ये पंक्तियां उनकी नहीं है। ये पंक्तियां बांग्ला के महान कथाकार सतीनाथ भादुरी की है। उनके उपन्यास ढोढ़ाई चरितमानस की।
ढोढ़ाई चरितमानस का पहला खंड 1949 में प्रकाशित हुआ और दूसरा खंड 1951 में। जबकि फणीश्वरनाथ रेणु का पहला और सबसे चर्चित उपन्यास मैला आंचल पहली दफा 1954 में छपा था। हालांकि उससे पहले वे लगातार रिपोर्ताज लिखा करते थे। 1945 में उनका पहला रिपोर्ताज बिदापत नाच छपा था। हालांकि उस रिपोर्ताज में रेणु की उस ट्रेडमार्क भाषा के दर्शन नहीं होते, जो मैला आंचल के बाद होते हैं। इसलिए यह माना जाता है कि रेणु ने कथा और उपन्यास के लिए जो भाषा-शैली विकसित की, उस पर सतीनाथ भादुरी के उपन्यास ढोढ़ाई चरितमानस की भाषा की छाप रही है।
यह बात इस तथ्य से भी प्रमाणित होती है कि रेणु और सतीनाथ भादुरी के संपर्क 1942-43 में हो गया था, जब भारत छोड़ो आंदोलन में भागीदारी की वजह से दोनों भागलपुर जेल में थे। वहां भादुरी ने उन्हें गद्य लिखने के लिए कहा था, रेणु पहले कविताएं लिखते थे। भादुरी रेणु से 15 साल बड़े थे। वे उनके गृह जिला पूर्णिया कांग्रेस के अध्यक्ष रहे थे। बाद में वे भी समाजवादी आंदोलन की तरफ मुड़ गये। जेल से रिहा होने के बाद रेणु अक्सर भादुरी से मिलने उनके घर जाते थे और उन्होंने भादुरी को अपना साहित्यिक गुरू भी कहा है।
ऐसे में रेणु की कथा शैली में अगर ढोढ़ाई चरितमानस की छाप आई तो हैरत की बात नहीं थी। मगर यह बात उनके लिए तब परेशानी का सबब बन गई जब उनका पहला नावेल मैला आंचल चर्चित होने लगा। पूर्णिया के ही एक बड़े कथाकार मधुकर गंगाधर ने तब कह दिया कि मैला आंचल तो ढोढ़ाई चरितमानस का हिंदी अनुवाद है। इस अफवाह से राजकमल प्रकाशन के तत्कालीन मालिक ओमप्रकाश जी परेशान हो गये। उन्होंने सीधे सतीनाथ भादुरी जी से संपर्क किया। भादुरी जी ने तब इस अफवाह का खंडन करते हुए कहा कि दोनों कहानियां बिल्कुल अलग है और यह सच भी है।
बहरहाल जिस मधुकर गंगाधर ने यह अफवाह उड़ाई थी, उन्होंने ही ढोढ़ाई चरितमानस का हिंदी अनुवाद किया जो अभी लोकभारती प्रकाशन ने छापा है। यह अनुवाद सतीनाथ भादुरी के निधन 1965 के बाद प्रकाशित हुआ। मधुकर गंगाधर इस किताब की भूमिका में इस बात का अफसोस भी जताते हैं।
इस किताब के हिंदी में आने के बाद उस अफवाह का शमन तो हो गया कि यह मैला आंचल का अनुवाद है मगर कहीं ठीक से इस बात को रेखांकित नहीं किया गया कि ढोढ़ाई चरितमानस दरअसल वह किताब है, जिसने फणीश्वरनाथ रेणु और बाद की पीढ़ी के उन आंचलिक कथाकारों के लिए एक सिलेबस जैसा कुछ तैयार किया। इस किताब की विडंबना यह रही कि इसे वह सम्मान नहीं मिला जिसका यह हकदार थी।
ढोढ़ाई चरितमानस के लेखक सतीनाथ भादुरी बांग्ला में अपने पहले उपन्यास जागरी से छा गये थे, उस उपन्यास के पहले ही साल 12 संस्करण छपे थे। किताब को बांग्ला का महत्वपूर्ण रवींद्र पुरस्कार मिला था। मगर उनके दूसरे उपन्यास को बांग्ला के आम पाठक समझ नहीं पाये, क्योंकि ढोढ़ाई चरितमानस पूर्णिया के आंचलिक शब्दों से सजी थी। इस उपन्यास में जिस जिरानिया शहर का जिक्र है, वह दरअसल पूर्णिया ही है। पूर्णिया और बिहार के पाठकों को यह उपन्यास तब मिला जब सतीनाथ भादुरी का निधन हो चुका था और हिंदी के पाठकों को इसी शैली में लिखे फणीश्वरनाथ रेणु जैसे लेखक के विपुल साहित्य का स्वाद मिल चुका था।
सोचता हूं कि अगर सतीनाथ भादुरी ने यही उपन्यास हिंदी में लिखा होता तो क्या होता? क्या हिंदी के साहित्य जगत में मैला आंचल की जो चर्चा हुई थी, जैसा उत्साहजनक स्वागत रेणु के पहले उपन्यास का हुआ था, वह इस किताब का होता? क्योंकि आज जब दुबारा इस किताब को पढ़कर उठा हूं तो यही समझ आता है कि यह किताब मैला आंचल से बेहतर न कहें तो बराबर की जरूर है। मेरा व्यक्तिगत अनुभव इसे ज्यादा बेहतर किताब मानता है, क्योंकि मैला आंचल आखिर में तहसीलदार के पक्ष में थोड़ी भावुक होने लगती है। मगर ढोढ़ाई चरितमानस अपने मकसद से कहीं भटकती नजर नहीं आती।
हालांकि मेरा उद्देश्य इस किताब के जरिये रेणु और भादुरी के साहित्य की तुलना नहीं करना। उचित तो यह होगा कि इस किताब को बिल्कुल स्वतंत्र नजरिये से देखा जाये।
ढोढ़ाई चरितमानस दरअसल ढोढ़ाई नाम के अत्यंत पिछड़ी ततमा जाति के एक युवक की कहानी है। क्राफ्ट के उस्ताद भादुरी ने इसे रामचरित मानस के तर्ज पर लिखा है। बचपन से अनाथ, अपनी मां के द्वारा परित्यक्त और एक गूंगे मंदिर के पुजारी के पास पलने और बचपन से भीख मांगने वाले इस युवक की कहानी भादुरी ने राम की कथा की तरह लिखी है और यह कथा ढोढ़ाई को भी इतनी प्रिय है कि आखिर में वह सिर्फ रामचरित मानस की एक प्रति के लिए क्रांति दस्ते में भर्ती हो जाता है और वहां उसका नाम रामायण जी रख दिया जाता है। हालांकि उसके पूरे जीवन पर महात्मा गांधी की छाया दिखती है।

मगर इस किताब की जो सबसे बड़ी खूबी है, वह यह है कि भादुरी जी जो पूर्णिया शहर में एक बंगाली प्रवासी थे, ने उस इलाके की एक अत्यंत पिछड़ी जाति के एक युवक के मनोविज्ञान, उसके सोचने के तरीके, उसकी भाषा औऱ आजादी के आंदोलन के दौरान बदल रही उसके आसपास की दुनिया को देखने के उसके अपने तरीके को गजब पकड़ा है और उसे अभिव्यक्ति दी है। यह उपन्यास उसी भाषा में बात करती है, उस दौर में ततमा जाति अंग्रेज अधिकारी, उसके कर्मचारी, स्थानीय भू-स्वामी, जमींदार और उस कारिंदे, स्थानीय मठ-मंदिर, गांव के महतो और छड़ीदार, पास में बसे संथाल टोले और उस टोले में इसाई बने लोगों आदि को किस निगाह से देखती है और उस निगाह में हैरत, भय और पारंपरिक श्रद्धा जैसे तत्व कैसे उसके जीवन को संचालित करते हैं। यह उस उपन्यास का मूल क्राफ्ट है।
फिर दो चीजें उनकी दुनिया में आती हैं। एक तो असम तक जाने के लिए बन रही पक्की सड़क, जिसे आज हम एनएच 31 कहते हैं और महात्मा गांधी का आजादी का आंदोलन। ये दो चीजें जैसे ढोढ़ाई के जीवन को उलट-पुलट कर रख देती हैं। दरअसल इस उपन्यास के जरिये भादुरी जी ने अपने आसपास उस दौर में घट रही दुनिया को अपने समाज के सबसे कमजोर वर्ग की निगाह से देखा है। यह वही समाज है, जिसकी बात गांधी अपने जंतर में कहते हैं कि अगर तुम्हें किसी बात का संशय हो तो अपने आसपास के सबसे गरीब और कमजोर आदमी को देखो और सोचो कि तुम्हारे किसी कदम का उसके जीवन पर क्या असर पड़ेगा। उस दौर में पूर्णिया जिला कांग्रेस के अध्यक्ष रहे सतीनाथ भादुरी ने संभवतः इसी वजह से इस किताब की रचना की होगी।
मगर इस कोशिश में एक अद्भुत क्राफ्ट रचा चला जाता है। हर नई और बदल रही चीज को लेकर ततमा समाज का विस्मय, उससे जुड़ने और उसे अभिव्यक्त करने के लिए उस समाज की कोशिशें साहित्य की दुनिया में एक नई भाषा को लेकर आती है, जिसमें ग्रामर टूटते हैं और शब्दों के उच्चारण भी। मगर यह सब पाठकों को उसी तरह गुदगुदाता है, जैसे बच्चों की तोतली जुबान और उनका विस्मय। यह एक शैली के रूप में उभरता है, जिसे हम बाद में रेणु के पूरे साहित्य में पाते हैं। भाषाई प्रयोग के इस आविष्कार को रेणु अपना लेते हैं और एक लेखक के तौर पर उनकी यह सबसे बड़ी पहचान बन जाती है।
इसी तरह इस किताब में मठों की दुनिया और डिस्ट्रिक्ट बोर्ड की राजनीति है, जमींदारी सिस्टम की परतें और उसके शोषण की श्रृंखलाएं हैं, जिसे भादुरी जी ने समाजवादी निगाह से देखा और लिखा है. वह हम रेणु की किताबों में भी पाते हैं। भादुरी लिखते हैं कि कैसे पुराने जमींदार आजादी के वक्त कांग्रेस के नये सिपाही बनने लगते हैं, जिससे सामने दिख रही सत्ता में उनकी हिस्सेदारी सुनिश्चित हो। सत्ता के पुराने गढ़ कैसे दरकते हैं और नये गढ़ तैयार होते हैं। मगर आने वाली आजादी में सत्ता गांधी के उस कमजोर वर्ग को नहीं मिलती, जो साधन संपन्न वर्ग है, वही भेस बदलकर सत्ता पर काबिज हो रहा है, जिसकी फिक्र मैला आंचल में बावनदास कर रहे होते हैं।
इस उपन्यास की स्त्रियां भी कमाल की हैं। पहली स्त्री ढोढ़ाई की मां जो विधवा होने पर फिर से शादी करने के लिए अपने बच्चे को मंदिर में बौका बाबा के पास छोड़ जाती है। वह पास में ही रहती है, रोज अपने पहले बच्चे को देखती है, मगर कभी-कभार ही उसकी ममता उमड़ती है। दूसरी आजाद स्त्री उसकी पहली प्रेमिका है, जो शादी के बाद भी दूसरे पुरुषों से मिलना, हंसना-बतियाना नहीं छोड़ती, ढोढ़ाई नाराज होता है, मारपीट करता है, वह पंचायत बिठा लेती है. फिर दोनों अलग हो जाते हैं। तीसरी विधवा स्त्री जिसके घर ढोढ़ाई गांव से काफी दूर काम करने जाता है, वह उसके प्रेम के लिए सबकुछ करने को तैयार है। जब समाज के दबाव में उसकी मां ढोढ़ाई को गांव छोड़ने कहती है, तो उसके बदले वह स्त्री खुद गांव छोड़ कर एक नाच पार्टी के साथ चली जाती हैं। अपने एक्शन से असहज करने वाली ये आजाद स्त्रियां हैं। आम तौर पर ततमा जाति में औरतों की आजादी काफी हद तक है, मगर ये औरतें एक कदम आगे बढ़कर अपने समाज की मान्यताओं, उसके महतो और छड़ीदारों को भी चुनौती देती हैं।
उपन्यासों में संथाल आदिवासियों की अलग दुनिया है। उसका भी भादुरी जी ने गजब वर्णन किया है. उनके रीति-रिवाज, उनके आजाद ख्याल, प्रकृति के प्रति उनके प्रेम. ढोढ़ाई अपनी जाति की सीमा को लांघकर संथालों के साथ इस तरह घुलता मिलता है कि वह समाज भी उसे अपना हिस्सा मानने लगता है। उसी तरह जब ढोढ़ाई कुशवाहा जाति के गांव में जाकर रहने लगता है तो उसी जाति का हिस्सा बन जाता है। वहां की जटिल राजनीति में भादुरी त्रिवेणी संघ का भी जिक्र लेकर आते हैं, यह समय के प्रति उनकी सजगता का प्रमाण है। यह कहानी नमक सत्याग्रह या उससे कुछ पहले शुरू होती है और भारत छोड़ो आंदोलन के दौर से होते हुए आजादी के ठीक पहले खत्म होती है।
राम चरित मानस, आजादी का आंदोलन और अपने समाज के सबसे पिछड़े समुदाय के पात्र, उऩकी दुनिया और उसके मनोविज्ञान को लेकर भादुरी जी ने एक अनूठा गद्य रचा, जो आने वाले दिनों में अलग-अलग लेखकों के जरिये हिंदी साहित्य को संपन्न करता रहा। भादुरी तो इस किताब को रच कर इस विधा से मुक्त हो गये, उन्होंने फिर कोई दूसरी किताब इस विधा के सहारे नहीं लिखी। मगर उन्होंने जो कौतुक भरी भाषा रची, जिसमें ग्रामर टूटते हैं और रस बहता है, वह आज तक अनेक रचनाकारों की कलम से बहती रही है. इसे मेरा मन “भादुरी स्कूल” का नाम देने का होता है।
इस किताब को लेकर कम से कम हिंदी के आलोचकों को और गंभीरता से काम करना चाहिए। ताकि दुनिया इसके महत्व को समझे। क्योंकि जैसा मैंने पहले लिखा है, जब यह लिखी गई तो बांग्ला के पाठक इसे समझ नहीं पाये, हिंदी वाले इसे पढ़ नहीं पाये। यह फूल उस बीहड़ जंगल में खिला, जहां लोग तब पहुंचे जब वह मुरझा रहा था। मगर इसका महत्व उस दौर में देखा जाना चाहिए, जब इसे लिखा गया था।
इसके पुनर्प्रकाशन का जोखिम लेने के लिए लोकभारती प्रकाशन का आभार. मगर साथ ही दो बातें कहनी है। पहली कि सही शब्द ढोढ़ाई होगा, हमारे इलाके में अक्सर कुपोषित बच्चे को ढोढ़ाई कहा जाता है, जिसका शरीर दुर्बल मगर पेट फूला होता है। इससे मिलता जुलता एक शब्द ढोढ़िया सांप भी है, जो आकार में बड़ा होता है, फुफकारता भी है, मगर जहरीला बिल्कुल नहीं होता।
भादुरी जी ने ढोढ़ाई की जीवनकथा को इसी उपमा के साथ खत्म किया है। वह खुद कहता है कि उसका जीवन एक ढोढ़िया सांप की तरह रहा, उसने फुफकारा खूब मगर उसके विष दंत कभी नहीं उग पाये।
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