पश्चिम एशिया में जारी युद्ध और पेट्रोल-डीजल की लगातार बढ़ती कीमतों, प्रदूषण और विदेशी तेल पर भारी निर्भरता के बीच भारत अब एथेनॉल आधारित ईंधन की ओर तेजी से बढ़ रहा है। सरकार ने पहले E10 और फिर E20 यानी 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को बढ़ावा दिया। अब चर्चा E85 और E100 जैसे हाई-एथेनॉल फ्यूल की है, जिन पर चलने वाले फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को भविष्य की बड़ी रणनीति माना जा रहा है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत इसके लिए तैयार है? क्या देश की गाड़ियां, पेट्रोल पंप, ग्राहक और ऑटो उद्योग इस बदलाव के साथ कदम मिला पाएंगे? और सबसे बड़ा सवाल, क्या एथेनॉल सच में पेट्रोल का सस्ता और टिकाऊ विकल्प बन पाएगा?
क्यों बढ़ रहा है एथेनॉल पर जोर?
एथेनॉल एक बायोफ्यूल है, जो मुख्य रूप से गन्ने, मक्का, टूटे चावल और अन्य कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। इसे पेट्रोल में मिलाकर ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
भारत सरकार का मानना है कि इससे तीन बड़े फायदे होंगे।
- कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम होगी
- प्रदूषण घटेगा
- किसानों की आय बढ़ेगी
गौरतलब है कि भारत अपनी जरूरत का करीब 85 से 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। हर साल इस पर 22 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च होता है। पश्चिम एशिया में युद्ध और भू-राजनीतिक तनाव के बीच ऊर्जा सुरक्षा अब भारत के लिए बड़ी चिंता बन चुकी है। यही वजह है कि सरकार पेट्रोलियम आधारित ईंधन के विकल्प तेजी से तलाश रही है।
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने इसी साल अप्रैल में कहा था कि भारत को भविष्य में 100 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण यानी E100 की दिशा में बढ़ना चाहिए, ताकि देश आयातित तेल पर निर्भरता कम कर सके। उन्होंने ब्राजील का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां 100 प्रतिशत एथेनॉल आधारित ईंधन का उपयोग हो रहा है।
E10, E20, E85 और E100 क्या हैं?
E10 का मतलब है पेट्रोल में 10 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण। E20 में यह मात्रा 20 प्रतिशत हो जाती है।
फिलहाल भारत में E20 कार्यक्रम लागू किया जा रहा है और सरकार ने 2025-26 तक पूरे देश में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य रखा है। यह लक्ष्य पहले 2030 तक हासिल किया जाना था, लेकिन बाद में इसे आगे बढ़ा दिया गया।
अब सरकार E85 और E100 जैसे हाई-एथेनॉल फ्यूल की दिशा में भी काम कर रही है। E85 में 85 प्रतिशत और E100 में लगभग पूरी तरह एथेनॉल का उपयोग होता है। हालांकि इसके लिए विशेष फ्लेक्स-फ्यूल इंजन की जरूरत होती है।
| ईंधन का प्रकार | एथेनॉल की मात्रा | इंजन पर प्रभाव / जरूरतें |
| E10 | 10% एथेनॉल + 90% पेट्रोल | सामान्य इंजन के लिए पूरी तरह अनुकूल। |
| E20 | 20% एथेनॉल + 80% पेट्रोल | इंजन ट्यूनिंग, रबर पार्ट्स और पाइप्स में मामूली बदलाव जरूरी। |
| E85/E100 | 85% से 100% एथेनॉल | इसके लिए विशेष फ्लेक्स-फ्यूल इंजन (Flex-Fuel Engine) की आवश्यकता होती है। |
क्या मौजूदा गाड़ियां इसके लिए तैयार हैं?
यही सबसे बड़ा सवाल है। सरकार ने वाहन कंपनियों को E20 अनुकूल इंजन तैयार करने के निर्देश दिए हैं। कई कंपनियों ने 2023 के बाद लॉन्च हुए मॉडलों को E20 अनुकूल बताना शुरू कर दिया है। लेकिन देश की सड़कों पर चल रही करोड़ों पुरानी गाड़ियां अब भी पूरी तरह E20 के लिए तैयार नहीं मानी जातीं।
विशेषज्ञों के अनुसार ज्यादा एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन से पुराने वाहनों के पाइप, रबर पार्ट्स और इंजन पर असर पड़ सकता है। ऐसे में इंजन ट्यूनिंग और कुछ तकनीकी बदलाव जरूरी हो जाते हैं।
हालांकि ऑटो उद्योग का दावा है कि नई पीढ़ी के इंजन हाई-एथेनॉल ब्लेंड के लिए बेहतर तरीके से तैयार किए जा रहे हैं। उद्योग का यह भी कहना है कि ग्राहकों में जागरूकता की कमी बड़ी चुनौती है। कई वाहन मालिकों को यह तक नहीं पता कि उनकी गाड़ी किस प्रकार के ईंधन के लिए उपयुक्त है।
माइलेज घटेगा या बढ़ेगी परफॉर्मेंस?
एथेनॉल को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा माइलेज पर होती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल से कम होती है, इसलिए E20 या उससे ज्यादा मिश्रण पर माइलेज में कुछ कमी आ सकती है। कई रिपोर्टों में 5 से 7 प्रतिशत तक माइलेज घटने की बात कही गई है। लेकिन उद्योग इससे पूरी तरह सहमत नहीं है।
ऑटो कंपनियों का तर्क है कि माइलेज पर असर बहुत सीमित होता है और यह ड्राइविंग स्टाइल तथा वाहन के रखरखाव पर ज्यादा निर्भर करता है।
इसके उलट एथेनॉल का ऑक्टेन नंबर पेट्रोल से ज्यादा होता है। एथेनॉल का ऑक्टेन नंबर करीब 108.5 है, जबकि पेट्रोल का करीब 84.4 माना जाता है। इसका फायदा यह है कि आधुनिक इंजन ज्यादा एफिशिएंट तरीके से काम कर सकते हैं। E20 के बाद ईंधन का ऑक्टेन स्तर बढ़ने से इंजन में ‘नॉकिंग’ कम होती है और गाड़ियों की परफॉर्मेंस बेहतर हो सकती है।
फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों पर क्यों अटका मामला?
भारत में अब अगला बड़ा फोकस फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों पर है। ये ऐसे वाहन होते हैं जो पेट्रोल और हाई-एथेनॉल ब्लेंड दोनों पर चल सकते हैं।
लेकिन ऑटो उद्योग का कहना है कि केवल तकनीक विकसित कर देना काफी नहीं होगा। अगर E85 और E100 जैसे ईंधन पेट्रोल से सस्ते नहीं होंगे तो ग्राहक फ्लेक्स-फ्यूल वाहन खरीदने में दिलचस्पी नहीं दिखाएंगे।
ऑटोमोबाइल कंपनियों और सोसायटी ऑफ़ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) ने सरकार से मांग की है कि हाई-एथेनॉल फ्यूल की कीमतें पेट्रोल से काफी कम रखी जाएं। कंपनियों का कहना है कि ग्राहक तभी नई तकनीक अपनाएंगे जब उन्हें सीधे जेब में फायदा दिखाई देगा।
ब्राजील का उदाहरण देते हुए उद्योग का कहना है कि वहां E85 और E100 सामान्य पेट्रोल से सस्ते हैं, इसलिए फ्लेक्स-फ्यूल वाहन बड़े पैमाने पर लोकप्रिय हो पाए।
जीएसटी में राहत की मांग कर रहा ऑटो उद्योग
गौरतलब बात है कि फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए विशेष इंजन तकनीक की जरूरत होती है, जिससे वाहन महंगे हो सकते हैं। यही वजह है कि ऑटो उद्योग इन वाहनों पर जीएसटी में राहत चाहता है।
फिलहाल फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों पर वही टैक्स लागू होगा जो सामान्य पेट्रोल या डीजल वाहनों पर लगता है। छोटे वाहनों पर यह 18 प्रतिशत से शुरू होकर बड़े वाहनों पर 40 प्रतिशत तक पहुंचता है।
उद्योग का मानना है कि खासकर भारत जैसे कीमत-संवेदनशील टू-व्हीलर बाजार में शुरुआती दौर में सरकारी प्रोत्साहन जरूरी होंगे। हीरो मोटोकॉर्प समेत कई कंपनियां फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक पर काम कर रही हैं और सरकार से टैक्स राहत की मांग कर चुकी हैं।
किसानों के लिए कितना बड़ा अवसर?
एथेनॉल नीति का एक बड़ा राजनीतिक और आर्थिक पहलू किसानों से भी जुड़ा है। सरकार का कहना है कि इससे गन्ना किसानों और कृषि क्षेत्र को बड़ा बाजार मिलेगा। चीनी मिलों और डिस्टिलरी उद्योग को भी इससे नई मांग मिली है। एथेनॉल उत्पादन बढ़ाने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं।
मक्का उत्पादन क्लस्टर विकसित किए जा रहे हैं, अतिरिक्त चावल को एथेनॉल उत्पादन में उपयोग की मंजूरी दी गई है और चीनी को भी एथेनॉल उत्पादन की ओर डायवर्ट किया जा रहा है।
सरकार ने 2024-25 के लिए 40 लाख मीट्रिक टन चीनी और एफसीआई के अतिरिक्त 52 लाख मीट्रिक टन चावल को एथेनॉल उत्पादन के लिए उपयोग करने की अनुमति दी गई है। इसके साथ ही एथेनॉल खरीद के लिए तय कीमत लागू की गई है और एथेनॉल पर जीएसटी घटाकर 5 प्रतिशत किया गया है।
हालांकि एथेनॉल को लेकर विशेषज्ञों ने गंभीर सवाल भी उठाए हैं। सबसे बड़ी चिंता पानी की खपत को लेकर है। गन्ना जैसी फसलें पहले से ही भारी मात्रा में पानी लेती हैं। ऐसे में बड़े पैमाने पर एथेनॉल उत्पादन भूजल संकट वाले राज्यों में नई चुनौती पैदा कर सकता है।
इसके अलावा फूड बनाम फ्यूल बहस भी तेज हो रही है। आलोचकों का कहना है कि खाद्यान्न का उपयोग ईंधन उत्पादन में बढ़ने से भविष्य में खाद्य सुरक्षा और कीमतों पर असर पड़ सकता है।
सरकार अब तकनीकी स्तर पर भी तैयारी तेज कर रही है। भारतीय मानक ब्यूरो यानी BIS ने E22, E25, E27 और E30 जैसे हाई-एथेनॉल मिश्रण वाले पेट्रोल के लिए नई तकनीकी स्पेसिफिकेशन जारी की हैं।
इनमें ऑक्टेन स्तर, सल्फर सीमा, वेपर प्रेशर, जंग-रोधी क्षमता और ईंधन स्थिरता जैसे मानकों को शामिल किया गया है ताकि इंजन और फ्यूल सिस्टम के साथ बेहतर संगतता सुनिश्चित की जा सके।
एथेनॉल के लिए कितने तैयार?
भारत फिलहाल एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसे ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण और आर्थिक जरूरतों के बीच संतुलन बनाना है। एथेनॉल ब्लेंडिंग सरकार के लिए सिर्फ एक ईंधन नीति नहीं, बल्कि ऊर्जा आत्मनिर्भरता की रणनीति बन चुकी है। लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि ग्राहक, वाहन कंपनियां, पेट्रोल पंप और पूरा सप्लाई सिस्टम कितनी तेजी से खुद को बदल पाते हैं।
अगर हाई-एथेनॉल ईंधन सस्ता हुआ, वाहन तकनीक भरोसेमंद बनी और सप्लाई नेटवर्क मजबूत हुआ तो आने वाले सालों में भारत की सड़कें पेट्रोल से ज्यादा एथेनॉल पर दौड़ती दिखाई दे सकती हैं। लेकिन अगर लागत, माइलेज और तकनीकी भरोसे को लेकर आशंकाएं दूर नहीं हुईं, तो यह बदलाव उम्मीद से धीमा भी पड़ सकता है।

