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भोजशाला से लंदन तक…कैसे अंग्रेज अपने साथ ले गए माँ वाग्देवी की प्रतिमा, अब तेज हुई वापसी की मांग

करीब चार फीट ऊंची और लगभग 250 किलोग्राम वजनी यह प्रतिमा म्यूजियम के ‘एशिया विभाग’ के गैलरी नंबर-33 में रखा गया है जहां भारत और दक्षिण एशिया की अन्य प्राचीन ऐतिहासिक कलाकृतियों को भी प्रदर्शित किया गया है।

धार की ऐतिहासिक भोजशाला इस वक्त सुर्खियों में है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा धार के भोजशाला परिसर को वाग्देवी मंदिर घोषित किए जाने के बाद माँ वाग्देवी (सरस्वती) की प्रतिमा को ब्रिटेन से वापस लाने की मांग तेज हो गई है। हिंदू संगठनों, साधु-संतों और कई सामाजिक समूहों का कहना है कि जिस तरह कोहिनूर हीरे की वापसी की मांग वर्षों से उठती रही है, उसी तरह भोजशाला की मूल वाग्देवी प्रतिमा को भी उसके मूल स्थान पर वापस लाया जाना चाहिए। गौरतलब है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तहत संरक्षित इस परिसर में फिलहाल वाग्देवी की प्रतिमा की प्रतिकृति स्थापित कर पूजा अर्चना की जा रही है।

हाल ही में अदालत ने भी इस मांग को पूरी तरह खारिज नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता पहले ही भारत सरकार को कई रिप्रेजेंटेशन दे चुके हैं और केंद्र सरकार चाहे तो लंदन म्यूजियम से देवी सरस्वती की प्रतिमा वापस लाने तथा उसे भोजशाला परिसर में पुनः स्थापित करने की मांग पर विचार कर सकती है। अदालत की इस टिप्पणी के बाद यह मुद्दा कानूनी बहस से निकलकर सांस्कृतिक और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया है।

राजा भोज की विद्या नगरी और माँ वाग्देवी की प्रतिष्ठा

भोजशाला का इतिहास परमार वंश के महान शासक राजा भोज से जुड़ा माना जाता है। इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के अनुसार राजा भोज केवल योद्धा ही नहीं, बल्कि महान विद्वान, कवि और कला संरक्षक भी थे। कहा जाता है कि उन्होंने 60 से अधिक उच्च कोटि के ग्रंथों की रचना की थी, जबकि कुछ विद्वान यह संख्या 84 तक बताते हैं। उनकी विद्वानों की सभा में 500 से अधिक रचनात्मक और विद्वान लोग शामिल थे।

इंदौर पुरातत्व संग्रहालय की लाइब्रेरी में सुरक्षित भगवतीलाल राजपुरोहित के 417 पृष्ठों के शोधग्रंथ ‘भोजराज’ में उल्लेख मिलता है कि धार में सरस्वती कंठाभरण, शारदासदम या भारती भवन नामक एक विशाल विद्यामंदिर था। यही स्थान आगे चलकर भोजशाला के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसी परिसर में 1034-35 ईस्वी में माँ वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित कराई गई थी।

कई विद्वानों का मानना है कि देवी सरस्वती वसंत पंचमी के दिन इसी स्थल पर प्रकट हुई थीं। किंवदंती यह है कि राजा भोज की तपस्या और विद्या साधना से प्रसन्न होकर मां सरस्वती ने उन्हें दर्शन दिए थे। उसी स्वरूप को मूर्त रूप देकर भोजशाला में स्थापित किया गया। यही कारण है कि भोजशाला को केवल एक ऐतिहासिक ढांचा नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक स्मृति का प्रतीक माना जाता है।

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मोहम्मद खिलजी के आक्रमण से लेकर अंग्रेजों की खुदाई तक

इतिहासकारों के अनुसार 1464 ईस्वी में मालवा के शासक मोहम्मद खिलजी ने धार पर आक्रमण किया। दावा किया जाता है कि इसी दौरान भोजशाला को क्षतिग्रस्त किया गया और मां वाग्देवी की प्रतिमा को खंडित कर परिसर से बाहर कर दिया गया। सदियों तक यह प्रतिमा मलबे और खंडहरों के बीच दबी रही।

फिर 19वीं सदी में ब्रिटिश शासन के दौरान भोजशाला और धार के पुराने राजवाड़ा महल क्षेत्र में पुनरुद्धार और खुदाई का काम शुरू हुआ। साल 1875 में धार के राजवाड़ा महल और भोजशाला परिसर की खुदाई के दौरान यह प्रतिमा मलबे से बाहर आई। माना जाता है कि इस प्रतिमा का निर्माण परमार राजवंश के राजा राजा भोज के काल में 1034 ईस्वी में शिल्पी मणथल ने किया था। प्रतिमा पर अंकित संस्कृत का ऐतिहासिक शिलालेख आज भी इसकी प्राचीनता और ऐतिहासिक महत्व का प्रमाण माना जाता है।

242 पन्नों के अदालत के फैसले के अनुसार, हिंदू पक्ष के याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि 1875 में ब्रिटिश शासन के दौरान औपनिवेशिक सरकार के राजनीतिक एजेंट मेजर जनरल विलियम किनकैड ने भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर में खुदाई कराई थी। प्रतिमा मिलने के बाद इसे तत्कालीन ब्रिटिश भारत के ‘पॉलिटिकल एजेंट’ विलियम किनकैड को सौंप दिया गया, जो उस समय मालवा क्षेत्र में तैनात थे।

रिपोर्टों के अनुसार, मेजर जनरल विलियम किनकैड 1886 में सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हुए। भारत छोड़ते समय वह इस प्रतिमा को अपने निजी औपनिवेशिक संग्रह के हिस्से के रूप में लंदन ले गए। बाद में 1891 में उन्होंने इसे सुरक्षित रखने के लिए ब्रिटिश म्यूजियम के तत्कालीन अधिकारी ऑगस्टस वोलास्टन फ्रैंक्स के पास जमा कराया।

1909 में किनकैड की मृत्यु के बाद उनकी वसीयत और कानूनी हस्तांतरण प्रक्रिया के तहत यह प्रतिमा स्थायी रूप से ब्रिटिश म्यूजियम की आधिकारिक संपत्ति और संग्रह का हिस्सा बन गई। तब से यह प्रतिमा ब्रिटेन में सुरक्षित रखी गई है और उसकी वापसी को लेकर समय-समय पर भारत में मांग उठती रही है।

ब्रिटिश म्यूजियम में रखी है प्रतिमा

दिलचस्प बात यह है कि जिस प्रतिमा को भारत में माँ वाग्देवी या देवी सरस्वती की प्रतिमा कहा जाता है, उसे ब्रिटिश म्यूजियम जैन यक्षिणी अंबिका के रूप में सूचीबद्ध करता है। म्यूजियम के रिकॉर्ड में इसका विवरण इस प्रकार दर्ज है- ‘मोटे सफेद संगमरमर से तराशी गई जैन यक्षिणी अंबिका की खड़ी प्रतिमा।’

करीब चार फीट ऊंची और लगभग 250 किलोग्राम वजनी यह प्रतिमा म्यूजियम के ‘एशिया विभाग’ के गैलरी नंबर-33 में रखा गया है जहां भारत और दक्षिण एशिया की अन्य प्राचीन ऐतिहासिक कलाकृतियों को भी प्रदर्शित किया गया है। प्रतिमा मूल रूप से चार भुजाओं वाली बताई जाती है, लेकिन अब उसकी दो भुजाएं टूटी हुई हैं। बची हुई भुजाओं में देवी अंकुश और संभवतः किसी पौधे की डंडी जैसी वस्तु पकड़े दिखाई देती हैं।

Stone statue of a standing Hindu goddess with multiple arms and intricate jewelry, flanked by small figures at the base, mounted on a pedestal.
ब्रिटिश म्यूजियम में रखी माँ वाग्देवी की प्रतिमा

प्रतिमा की कलात्मक शैली, मुकुट, आभूषण और वस्त्र 11वीं सदी की मध्यकालीन भारतीय मूर्तिकला की उत्कृष्टता को दर्शाते हैं। प्रतिमा को लेकर कई दावे भी किए जाते रहे हैं। सालों से इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और धार्मिक विद्वानों के बीच इस प्रतिमा की पहचान को लेकर मतभेद रहे हैं।

हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार प्रसिद्ध कला इतिहासकार ओसी गांगुली और एएसआई के पूर्व महानिदेशक केएन दीक्षित ने इसे ‘धार की राजा भोज की सरस्वती’ बताया था। वहीं संस्कृत और प्राकृत विद्वान एचसी भायाणी ने 1981 के अपने अध्ययन में निष्कर्ष निकाला कि यह प्रतिमा जैन देवी अंबिका की है। ब्रिटिश म्यूजियम के क्यूरेटर माइकल विलिस ने भी 2011 में इसी व्याख्या का समर्थन किया था।

हालांकि अदालत ने अपने फैसले में कहा कि ‘अंबा, ‘अंबिका’ और ‘वाग्देवी’ भारतीय परंपरा में सरस्वती के विभिन्न रूप माने जाते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि भारत में हिंदू और जैन परंपराएं सदियों तक साथ-साथ विकसित हुईं और कई बार दोनों परंपराओं की मूर्तियां एक ही परिसर में स्थापित मिलती हैं।

इस प्रतिमा के आधार पर विक्रम संवत 1091 यानी 1034-35 ईस्वी का संस्कृत शिलालेख अंकित है। अदालत के फैसले में इसका उल्लेख भी किया गया है।

शिलालेख के अनुसार राजा भोज के धार्मिक अधीक्षक वररुचि ने पहले वाग्देवी की प्रतिमा बनवाई और बाद में अन्य प्रतिमाओं का निर्माण कराया। इसमें अंबा प्रतिमा का भी उल्लेख मिलता है। प्रतिमा का निर्माण सूत्रधार साहिरा के पुत्र मानथल ने किया था, जबकि शिलालेख शिवदेव द्वारा अंकित कराया गया था।

अदालत ने माना कि शिलालेख से संकेत मिलता है कि वाग्देवी और अंबा की अलग-अलग प्रतिमाएं बनाई गई थीं। हालांकि अदालत ने अपने निष्कर्ष में कहा कि दोनों ही ज्ञान और सरस्वती की दिव्य अभिव्यक्तियां मानी जा सकती हैं।

भारत वापसी की संभावना?

अदालत के फैसले का स्वागत करते हुए मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने भी इस मुद्दे पर खुलकर समर्थन जताया था। उन्होंने कहा कि माँ वाग्देवी की मूल प्रतिमा को यूनाइटेड किंगडम से वापस लाने के लिए केंद्र सरकार को दिए गए निर्देश स्वागत योग्य हैं और राज्य सरकार भी इस दिशा में हरसंभव प्रयास करेगी।

उन्होंने लिखा कि हम न्यायालय के निर्णय का पूर्ण सम्मान करते हैं और प्रदेश में सौहार्द, सांस्कृतिक गौरव एवं सामाजिक सद्भाव को और अधिक सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। माननीय न्यायालय का यह निर्णय स्वागतयोग्य है। राज्य सरकार इसके प्रभावी क्रियान्वयन हेतु आवश्यक व्यवस्थाएँ सुनिश्चित करने में पूर्ण सहयोग प्रदान करेगी।

सीएम मोहन यादव ने यह संकेत भी दिए हैं कि भोजशाला को अयोध्या की तर्ज पर एक बड़े धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित किया जा सकता है। वाग्देवी प्रतिमा को भारत लाने की बात पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान भी अपने कार्यकाल में कर चुके हैं। साल 2022 में उन्होंने एक कार्यक्रम में घोषणा की थी कि हम मां वाग्देवी की प्रतिमा को भारत लाने के लिए पूरे प्रयास करेंगे। 

अब सवाल यह है कि ब्रिटिश म्यूजियम में रखी वाग्देवी जैसी ऐतिहासिक भारतीय प्रतिमा को वापस भारत कैसे लाया जा सकता है। दरअसल, यह एक जटिल कानूनी और कूटनीतिक प्रक्रिया होती है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिपैट्रिएशन कहा जाता है। इसे वापस लाने के लिए भारत को मजबूत सबूतों के साथ साबित करना होगा कि यह मूर्ति उसकी सांस्कृतिक विरासत का एक बेहद जरूरी हिस्सा है, जिसे अंग्रेज गुलामी के दिनों में गलत या संदिग्ध तरीके से अपने साथ ब्रिटेन ले गए थे। इस दावे को मजबूत करने के लिए भारत सरकार पुराने इतिहास, मूर्ति पर खुदे शिलालेखों, एएसआई (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) के दस्तावेजों और ऐतिहासिक प्रमाणों को सबूत के तौर पर इस्तेमाल कर सकती है।

इस पूरी प्रक्रिया में सांस्कृतिक धरोहरों के अवैध आयात-निर्यात और मालिकाना हक के ट्रांसफर को रोकने वाला यूनेस्को का 1970 कन्वेंशन सबसे महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय ढांचा माना जाता है। इसके साथ ही, भारत का अपना ‘एंटिक्स एंड आर्ट ट्रेजर्स एक्ट 1972’ भी प्राचीन मूर्तियों की सुरक्षा करने और उनके अवैध निर्यात को रोकने का कानूनी अधिकार देता है। हालांकि, वाग्देवी प्रतिमा का मामला इसलिए थोड़ा कठिन है क्योंकि इसे 19वीं सदी (साल 1886) में ब्रिटेन ले जाया गया था, जबकि ये आधुनिक अंतरराष्ट्रीय कानून बहुत बाद के मामलों में ज्यादा प्रभावी माने जाते हैं।

धरोहरों की वापसी की राह में सबसे बड़ी कानूनी रुकावट ब्रिटेन का अपना ‘ब्रिटिश म्यूजियम एक्ट 1963’ है। इस कानून के तहत ब्रिटिश म्यूजियम अपने संग्रह की ऐतिहासिक चीजों को इतनी आसानी से किसी दूसरे देश को वापस नहीं सौंप सकता, और यही वजह है कि कोहिनूर हीरे सहित भारत की कई अन्य अनमोल धरोहरों की वापसी भी लंबे समय से विवादों में फंसी हुई है।

हालांकि उम्मीद फिर भी बनी हुई है। क्योंकि पिछले कुछ सालों में भारत ने कूटनीतिक बातचीत और कानूनी प्रक्रियाओं के जरिए दुनिया के अलग-अलग देशों से अपनी कई प्राचीन मूर्तियाँ और सांस्कृतिक धरोहरें सफलतापूर्वक वापस हासिल की हैं। मौजूदा सरकार के नेतृत्व में कई देशों से औपनिवेशिक काल की मूर्तियाँ और सांस्कृतिक धरोहरें वापस लाई जा चुकी हैं।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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