ज्ञानजी के बारे में सोचता हूँ, तो टुकड़े-टुकड़े बहुत सारी बातें याद आ रही हैं।
संभवतः सन 1980 की बात है, प्रगतिशील लेखक संघ का राष्ट्रीय अधिवेशन जबलपुर में हुआ था। तब ज्ञानरंजन को ही नहीं देश की तमाम बड़े लेखकों को पहली बार देखा। ज्ञानरंजनजी की हल्की खिचड़ी दाढ़ी, जो उस समय काली हुआ करती थी और धारी वाले बाल, जो हल्के से बिखरे हुए थे। वे लगातार इधर-उधर पूरी व्यस्तता के साथ व्यवस्थाएं देख रहे थे। उस समय उनकी उम्र 40-45 के करीब रही होगी। युवा लेखकों वाली सारी चपलता उनमें थी। हम लोग उनकी कहानियां पढ़ चुके थे। पाठ के दौरान जो सकते की हालत में थे वह प्रभाव अभी बना हुआ था।
वह समय ज्ञानरंजन के हीरो बनने की शुरुआत का था। मैंने उन्हें जूते पहने हुए बहुत कम देखा। हमेशा पैरों में चप्पलें। चेहरे पर एक अजीब-सी उत्तेजना और उनकी बोलचाल, लेखन को गंभीरता से खारिज करती थी।
उनके लेखन में जो सावधानी है, वह बातचीत में नहीं रहती थी। वे खुलकर और लगभग एक अजीब से अधैर्य से बात करते थे। कभी-कभी असहमति को एक हल्की सी खीझ के साथ सुन लेते थे।
उस अधिवेशन के बाद उनसे मुलाकातों और पत्राचार का लंबा सिलसिला शुरू हुआ। एक बार इंदौर में इंडियन कॉफी हाउस में कृष्णकांत निलोसे, राजकुमार कुंभज और दूसरे तमाम लेखकों के साथ हम लोग बैठे थे। तब मैंने महसूस किया कि वे जितनी गंभीरता से साहित्य और वैचारिक विषयों पर बात कर लेते हैं, उतनी ही गंभीरता से निजी रिश्तों और उन घरेलू विषयों पर भी बात करते थे। उनसे जो संभव होता, मदद करने की कोशिश भी करते थे। लेकिन अपने स्वभाव के अधैर्य और अजीब-सी उत्तेजना के चलते वे कुछ-कुछ ‘आशु क्रोधी’ भी थे।
साहित्य की राजनीति को उन्होंने बहुत करीब से, लगभग धँस कर देखा था। यही कारण था कि वे प्रायः बहुत सशंकित रहते थे। किसी की कही हुई बात पर बहुत जल्दी भरोसा कर लेते थे और रूठ जाते थे। बाद में सच मालूम होने पर फिर से उनके स्वभाव की सरलता लौट आती थी।
राजेंद्र यादव और नामवर सिंह को उन्होंने अपना घोषित शत्रु माना था लेकिन मुझे लगता है कि यह आकस्मिक उत्तेजना से निकली हुई घोषणा थी। जीवन में उनका कोई स्थायी शत्रु नहीं था। अपनी सरकारी नौकरी के दरमियान मैं जबलपुर में एक बार किसी प्रशिक्षण के लिए गया था तो कहने लगे कि- ‘कहाँ गेस्ट हाउस में रुकोगे? तुम घर पर आ जाओ।’ मैं उनके घर ठहरा तो नहीं लेकिन प्रशिक्षण के बाद का पूरा समय उनके साथ ही गुजारता था। खाना हम लोग साथ ही खाते थे। तब तक वे भारी खाना छोड़कर दलिया पर निर्भरता बढ़ा रहे थे। अलबत्ता कभी कभार शाम की दावतों में शामिल हो जाते थे।
1990 के बाद मैंने शराब पीना छोड़ दिया था। मुझे कहने लगे – ‘हाँ, मैं भी लगभग छोड़ चुका हूँ। दरअसल हम लोगों ने बहुत अराजक जीवन जिया तो उसके फल तो भुगतने पड़ेंगे! पर एक बात है भालचंद्र ! शराब दुनिया का सबसे खूबसूरत और उम्दा ईजाद है।’ और अपनी ही बात पर खूब हँसे थे।
धीरे-धीरे उनके स्वभाव को मैं काफी हद तक समझने लगा था। वे आयोजनों में शामिल होने की स्थिति को टालने की कोशिश करते थे। जब भी किसी शहर में किसी कार्यक्रम में आ नहीं पाते थे तो मैं उन्हें फोन करके बताता था कि मैं अच्छी तरह से जानता था कि आप नहीं आएँगे। हँस कर पूछते थे -‘तुम कैसे समझ गए कि मैं नहीं आऊँगा?’ मैं कहता – ‘जब आयोजक ने मुझे कहा कि ज्ञानजी ने टिकट भी करा लिया है तो मुझे पूरा भरोसा हो गया था कि अब आप नहीं आएँगे।: वे हँसने लगते और कहते कि दरअसल हमलोग एक दूसरे को इसलिए अच्छी तरह से समझते हैं कि हम दोनों एक-दूसरे की बदमाशियों को जानते हैं।
प्रगतिशील लेखक संघ से जब उन्होंने इस्तीफा दिया था तो सबसे पहले मुझे फोन करके बताया था। हम लोगों की काफी लंबी बातें हुईं। उन्होंने प्रलेस छोड़ दिया था लेकिन प्रलेस के लोगों में उनका मन बना रहा। वे लगातार संपर्क में रहते थे।
‘पहल’ उन्होंने बंद की और फिर कुछ समय बाद फिर शुरू करने की घोषणा की। मैंने उन्हें फोन करके कहा था कि एक बार जो घोषणा कर दी है, उस पर कायम रहें। क्योंकि मुझे नहीं लगता कि आपके पास ‘पहल’ दोबारा शुरू करने का कोई बड़ा और मजबूत कारण है। मेरी बात से वे सहमत तो हुए लेकिन बात को माना नहीं और ‘पहल’ दोबारा शुरू की। और जिसकी उम्मीद थी, उसकी वही आलोचना हुई कि दोबारा शुरू करने में ऐसा कोई बड़ा और महत्वपूर्ण बदलाव इसमें नजर नहीं आ रहा है। अंततः कुछ समय बाद फिर बंद किया। यह उनके भीतर का द्वंद्व था। असमंजस की एक निरंतर स्थिति, जो उनके भीतर चलती रहती थी, यह सब उसी के परिणाम थे। जिससे वे लगातार संघर्ष कर रहे थे। वे एक समय के बाद इन चीजों से बाहर आने की कोशिश कर रहे थे।
बड़े लेखक थे। बड़े संपादक थे। लेकिन कहानी माँगने के मामले में बहुत विनम्र और आग्रही थे। और यह बात उन्हें और बड़ा बनाती थी। हम जैसे युवा लेखकों से भी फोन करके आग्रह करते थे- ‘भालचंद्र ! कहानी जल्दी भेजो। अंक प्रेस में रोक के रखा है।’ मैं जानता था कि यह सच नहीं है, लेकिन एक अजीब-सा मानसिक और भावुक दबाव बन जाता था। कहानी जल्दी पूरी करनी पड़ती थी। मुझसे इस तरह अनेक कहानियाँ लिखवाने का श्रेय उन्हें ही जाता है।
उनमें एक बड़े लेखक और संपादक होने के सारे गुण और विशेषताएँ थीं। और एक सामान्य व्यक्ति होने का स्वाभाविक स्वभाव भी था। उन्हें लेकर इतनी यादें हैं कि एक बार में सारा लिखना कठिन है। संभवतः समय के साथ सब कुछ याद आएगा। और मैं ही क्यों? उनका परिचय-संसार इतना ज्यादा बड़ा था कि देश के अनेक लोग जिनमें गैर साहित्यिक लोग भी हैं, उनको उतने ही प्रेम और आत्ममीयता से याद करते हैं। यही व्यक्ति के जाने के बाद उसका बचा रह जाना है । इस बचे रह जाने में वे हमेशा रहेंगे।
हिंदी कहानी का सातवाँ दशक ज्ञानरंजन की उपस्थिति से भी महत्वपूर्ण हो गया है। वह ऐसा समय था, जब ‘नई कहानी’ की आत्मानुभूति-प्रधान संरचना अपनी आंतरिक थकान और वैचारिक सीमाओं के भीतर विघटित हो रही थी। यथार्थ को देखने की दृष्टि में निर्णायक बदलाव घटित हो रहा था। ज्ञानरंजन इस संक्रमणकालीन कथा-चेतना के सबसे महत्त्वपूर्ण और जटिल रचनाकारों में हैं। उनकी कहानियाँ ‘नई कहानी’ की सहज निरंतरता की अपेक्षा उससे विच्छेदाभिलाषी हैं। बल्कि वे उसके भीतर से उत्पन्न मोहभंग, असंतोष और वैचारिक बेचैनी की परिणति भी हैं।
हालाँकि सातवें दशक में परिस्थितियाँ किसी क्रांतिकारी रूपांतरण के सामने नहीं थीं, लेकिन सामाजिक संरचनाओं के भीतर तनाव, विस्थापन और मूल्य-संकट कहीं अधिक तीव्र और बहुआयामी हो चुके थे। बेरोज़गारी, राजनीतिक अनिश्चय, मध्यवर्गीय आकांक्षाओं का बिखराव और पारिवारिक संबंधों का विघटन, ये सब मिलकर एक ऐसे यथार्थ का निर्मिति कर रहे थे जिसमें कहानी के लिए ‘नई कहानी’ से आगे नएपन की माँग थी। ज्ञानरंजन की कथा-दृष्टि इसी नएपन की माँग पर ठहरती है लेकिन वे उसे गीली और गैर-जरूरी करुणा में गिरने से बचाने की कोशिश करते हैं।
‘नई कहानी’ के दौर में जो हताशा, कुंठा और अस्तित्वगत संकट अपेक्षाकृत निजी और आत्मकेंद्रित थे, सातवें दशक में वो फैलकर सामाजिक और संरचनात्मक हो जाता है। ज्ञानरंजन की कहानियों में यह फैलाव है। उनके यहाँ अधिकांश कहानियों में एक ही नायक बार-बार लौटता है। एक ही सामाजिक पृष्ठभूमि, एक ही मानसिक गठन, किंतु हर बार बदली हुई परिस्थितियों और नए दबावों के साथ। ज्ञानरंजन इसी संकट को व्यक्ति से वर्ग तक ले जाने की कोशिश करते हैं।
ज्ञानरंजन का नायक आत्मकेंद्रित मनोभाव से मुक्ति की आकांक्षा में अपनी निजी सीमाओं का अतिक्रमण करता है, लेकिन बदलते समाज की जटिल और अमानवीय संरचनाओं से टकराकर और अधिक विखंडित हो जाता है। हालाँकि इन कहानियों का नायक किसी क्रांति या विद्रोह की इच्छा शक्ति से भरा हुआ नहीं है, लेकिन उसकी पराजित पीड़ा में संक्रमणकाल की चेतना के सांकेतिक सवाल हैं। असमंजस, असंतुष्ट और अंततः अकेला। इसी अकेलेपन में वे मध्यवर्गीय अस्तित्व का यथार्थ धरते हैं।
भाषा के स्तर पर ज्ञानरंजन की कहानियाँ एक विशिष्ट निर्ममता से संपृक्त हैं। उनके यहाँ एक किस्म की निर्मम भाषा का कुशल निर्वाह है, जिसमें परिस्थितियों के लिए ज़िम्मेदार व्यक्तियों, संस्थाओं और मूल्यों के प्रति किसी प्रकार के क्षमाभाव की कोई गुंजाइश नहीं है। उनकी अकरूण-सी लगती भाषा कुछ पाठकों या आलोचकों को कभी-कभी असहज या असह्य लगती है।
‘नई कहानी’ के परवर्ती चरण में रमेश बक्षी जिस अराजक, उद्दंड और आत्मपरक भाषा को लेकर आए, वह हिंदी कहानी में एक नई उग्रता का दाखिल था। यह उग्रता राजकमल चौधरी और महेंद्र भल्ला के यहाँ भी नजर आती है। ज्ञानरंजन ने इसी भाषा के सावधान संतुलन में अपनी कहानियों की राह बनाई। महत्वपूर्ण बात यह रही कि रमेश बक्षी की आत्मकेंद्रित या निजता के आग्रह में लिथड़ी अनुभूतियों को ज्ञानरंजन ने मध्यवर्ग के अभाव और संघर्ष में प्रकट किया। लेकिन यह भाषा किसी समाधान तक नहीं पहुँचती है। समाधान से मेरा आशय कहानी के किसी निर्णय पर पहुँचने या कोई समाधान सुझाने से नहीं है। मेरा आशय यह है कि भाषा अपने अराजक होने के किसी समाधान पर नहीं पहुँचती है। लेकिन उनकी कहानियों में मध्य वर्ग की हताशा, अभाव, भय, प्रेम और घृणा को लेकर एक रोमांचक और उत्तेजक दुनिया बनती है। जिसे कभी नेमीचंद जैन ने ‘डरावना अनुभव संसार’ कहा था लेकिन इस भाषिक उग्रता का जोखिम यह था कि वह आत्मकेंद्रित अनुभूतियों के बंद दरवाजे खोलना चाहती थी।
ज्ञानरंजन मध्य वर्ग के संघर्ष को किसी वैचारिक समाधान में नहीं बदलते, बल्कि उसे अनुभव की जटिलता के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ कथ्य से अधिक अनुभव-संरचना के रूप में सामने आती हैं।
दिलचस्प यह है कि ज्ञानरंजन ने प्रकट रूप में कभी वामपंथी वैचारिक आग्रहों से युक्त कहानियाँ नहीं लिखीं। उनके यहाँ न वर्ग-संघर्ष की घोषणात्मक भाषा है और न ही किसी वैकल्पिक सामाजिक व्यवस्था की प्रतिज्ञा। फिर भी वामपंथी आलोचना में उन्हें विशिष्ट सम्मान प्राप्त हुआ। ऐसा नसीब दूसरे लेखकों के हिस्से में नहीं आया।
लगभग पाँच दशकों तक हिंदी कहानी से सक्रिय दूरी बनाए रखने के बावजूद ज्ञानरंजन हिंदी आलोचना में एक अनिवार्य संदर्भ बने रहे। वे अनुपस्थित रहते हुए भी विमर्श में उपस्थित थे। हालाँकि इस अनुपस्थिति को उन्होंने नैतिक असहमति के संदर्भ में प्रचारित भी नहीं किया ।
साहित्य में उनका एक महत्त्वपूर्ण योगदान ‘पहल’ पत्रिका भी है। ‘पहल’ ने हिंदी साहित्य को आत्ममुग्धता और संकीर्ण सौंदर्यबोध से बाहर निकालकर वैचारिक बहसों के बड़े भू-भाग पर खड़ा किया। तमाम सहमतियों-असहमतियों, विवादों और वैचारिक संघर्षों के बावजूद ज्ञानरंजन ने ‘पहल’ को एक ऐसी पत्रिका के रूप में स्थापित किया, जो हिंदी के बौद्धिक परिदृश्य को लगातार चुनौती देती रही। वे इसे संपादन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक हस्तक्षेप मानते थे।
‘संगत’ के चर्चित इंटरव्यू को यदि पृथक कर दें, तो पिछले एक लंबे समय से वे बहुत शांत और तनावहीन जीवन जी रहे थे। संगत का इंटरव्यू एक क्षण का गुस्सा था, उसे जीवन के सच की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। क्रोध की आकस्मिकता हर व्यक्ति के साथ जुड़ी होती है।
आकस्मिक क्रोध का ज्ञानजी के साथ कुछ ज्यादा गहरा नाता था लेकिन फिर भी वे साहित्य की दुनिया में बहुत लंबा-चौड़ा, आत्मीय और भरा-पूरा परिवार छोड़कर गए हैं।

