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कहानीः तटबंध के उस पार

‘तटबंध के उस पार’ उस मनुष्य की कथा है, जो अपनी देह, अपनी इच्छाओं और अपनी पहचान के बीच फँसा हुआ है। ऑपरेशन थिएटर की दहलीज़ पर खड़ा नायक जब अपने अतीत, प्रेम और अपमान की परतों से होकर गुजरता है, उसके सामने तब केवल चिकित्सकीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि अपने वास्तविक अस्तित्व को जन्म देने की जिद और आकांक्षा होती है। देह के परिवर्तन से अधिक मन के पुनर्जन्म की कहानी है यह, जो प्रेम, अस्वीकार और आत्मस्वीकृति के कठिन और मनोवैज्ञानिक सवालों से पाठकों को रूबरू कराती है।

हॉस्पिटल के गलियारे में, जहाँ से मुझे स्ट्रेचर पर ले जाया जा रहा था, वहां गहरा सन्नाटा था लेकिन मेरे भीतर जोरदार शोर… विचारों के टकरा कर चूर-चूर हो जाने का शोर था, शोर लोगों की आवाज़ों का… इस शोर से मैं निजात पाने जा रहा था, पर क्या सचमुच इन आवाज़ों के शोर से मैं मुक्त हो पाऊंगा… मन ख़ुद से जद्दोजहद कर रहा था… मुक्ति मिले या न मिले लेकिन मेरे मन की मुराद पूरी हो जायेगी।

ऑपरेशन कैसा भी हो, कोई भी हो डर का पहाड़ सिर के ऊपर आ टकराता है। एक तरफ डर का साया दूसरी तरफ ऑपरेशन के बाद मिलने वाली ख़ुशी….मन भी बड़ा अजीब छलिया होता है।

स्ट्रेचर के पहिये के साथ-साथ मन का पहिया भी गोल-गोल घूम रहा था। स्ट्रेचर सीधे एक तयशुदा कमरे की तरफ जा रहा था जबकि मेरा मन घुमावदार रास्तों, पहाड़ों और नदियों की और बेसाख्ता चलता जा रहा था।

मेरा मन चलते-चलते यादों की उन कंदराओं में जा पहुंचा जहाँ इंसान वर्तमान की तकलीफ़देह गतिविधियों से थोड़ी देर के लिए निजात पा लेता है। पतझड़ के बाद के मौसम को बसंत का आगमन कहते हैं, बसंत का मौसम ऋतुओं का श्रृंगार और रूमानी मौसम माना जाता है, पर मुझे इस मौसम की बजाय सर्दी का मौसम ज्यादा आकृष्ट करता है। यहाँ बात मौसम की नहीं बल्कि, उन हालात की है जिसने मुझे यहाँ तक पहुंचाया है।

कॉलेज की ओर से हम सब पिकनिक पर गए थे। जंगल के बीच से होती हुई टेढ़ी-मेढ़ी पगडण्डी को पार करते हुए हम एक पहाड़ी पर पहुँच गए। वहां चिड़ियों की महीन आवाजें आ रही थीं, ये आवाजें संसार की सबसे मधुर आवाजें थीं, जिसमें सुरीले समूह-गान का एहसास हो रहा था, जिसे सुनते हुए पूरा दिन बिताया जा सकता था। पहाड़ी से टूटता झरना किसी दूसरी दिशा में अपना सफ़र पूरा कर रहा था।

-इतनी सुन्दर जगह पर बैठ कर खाने का स्वाद दोगुना हो जाएगा, कहते हुए पिकनिक इंचार्ज ने छात्रों के ग्रुप पर प्रश्न-वाचक निगाह डाली। सभी छात्र इस बात के लिए तैयार हो गए।

-सामने नदी में हाथ मुंह भी धोया जा सकता है। कहते हुए नदी की और मेरे क़दम बढ़ गए। नदी के पानी को छू कर आती ठंडी हवा ने जैसे सारी थकान मिटा दी हो। ढलान की ओर जाना थोड़ा कठिन लग रहा था लेकिन नदी में हाथ डालने की इच्छा ने मुश्किल रास्ता भी आसान बना दिया था।

नदी के करीब पहुँचने ही वाला था कि पैर एक बड़े पत्थर से टकराया और मैं खुद को लाख सँभालने के बावजूद गिर पड़ा। नदी की दिशा में लुढ़कने ही वाला था कि एक जोड़ी बलिष्ठ हाथों ने मुझे सहारा दिया और मैं जल्दी से संभल कर मिट्टी झाड़ते हुए खड़ा हो गया। नदी की तरफ गिरने से बच गया।

-‘धन्यवाद आपका।’ कहते हुए मैंने हाथ जोड़ दिए। वो कॉलेज का सीनियर छात्र था। उसने मेरा हाथ अपने हाथों में लिया, इसमें धन्यवाद की क्या बात है…ये कहते हुए उसने मेरा हाथ छोड़ा नहीं…मैंने अपना हाथ अपनी ओर खींचा लेकिन मेरा हाथ मुझ तक वापस नहीं पहुंचा उसके हाथ में बंधा रहा। मेरी आँखें अचरज से उसके चेहरे को देखती रहीं। उसके ठंडे स्पर्श में मुझे आंच-सी महसूस हो रही थी।

-नदी में नहाना है? उसने मेरा हाथ अपने हाथ में लिए हुए ही बोला।

-नहीं। सिर्फ पानी में हाथ पाँव डुबो कर बैठना है और सेल्फ़ी लेनी है।

-ओह तो सिर्फ सेल्फ़ी के लिए इतनी मशक्कत कर रहे थे? उसकी आँखें मेरी आँखों में कुछ खोज रही थीं। कुछ सवाल थे, जो सिर्फ आँखों में थे, जिसे वो ज़बान पर नहीं लाना चाहता था। जिसे सिर्फ मैं देख पा रहा था। वो कॉलेज में सेशन शुरू होने के काफी बाद आया था, इसलिए उसके बारे में मुझे कोई खास जानकारी भी नहीं थी।


नदी के किनारे पहुँच कर उसने उसी खास अंदाज़ में मेरा हाथ फिर पकड़ा और कहने लगा चलो नहाते हैं नदी में। मैंने अपना हाथ अपनी और खींच लिया ये कहते हुए कि ‘कपड़े नहीं लाया हूँ, पानी में पैर डाल कर बैठूँगा और सेल्फ़ी लूँगा।’ इस बार भी वाक्य पूरा होने के बाद भी मेरी हथेली उसकी मुट्ठी में थी, मेरी हथेली में कुछ फुरफुरी सी हुई, ठण्ड के मौसम में अचानक कम्पन सा हो जाता है, कुछ यूँ। इस बार उसका हाथ तरल था। हवा के साथ उड़े हुए पानी के कणों ने उसकी हथेली नम कर दी थी। इस बार उसकी आँखें मेरे पूरे बदन की स्कैनिंग कर रही थीं। हड़बड़ा कर मैंने अपनी मुंडी नवाँ ली और मन ही मन सोचने लगा कि आख़िर ये शख्‍स अजीब निगाहों से मुझे क्यों देख रहा है?

उसने अपने कपड़े पेड़ की एक डाली पर टाँगे और नदी में छलांग लगा दी। कुछ पल तक वो पानी के भीतर ही गायब रहा फिर अपना सिर बाहर निकाल कर तैरने लगा, मैं उसे दूर तक तैरते हुए देखता रहा। जब वो पानी के ऊपर तैर रहा था तो मैंने उसकी कुछ तस्वीरें भी खींची थीं। अचानक धूप तेज़ होने लगी थी और वो खूब तैर लेने के बाद पानी से बहार निकला| किनारे की सीढ़ियों पर चढ़ता हुआ वो हांफ रहा था, मेरी तरफ आकर वो अपने कपड़े पहनने की बजाय मुझे देख रहा था, उसकी निगाहों में कुछ ऐसा था कि मेरा दिल और उसकी निगाहें आपस में उलझ गई थीं। गोरा बदन, हाथों में बाइसेप्स…घुंघराले-घने बालों से पानी टपक रहा था, मैंने उसके कपड़ों की और इशारा किया तो  वो तपाक से मेरे करीब आया।

–बसंत ऋतु का यहाँ कोई नामो निशाँ नहीं…पौधे बिना फूल के, पेड़ ठूंठ हुए हैं। सब पर्यावरण के असंतुलन का खेल है। देश दुनिया, राजनीति कुछ भी संतुलित नहीं है। इतनी गर्मी में क्यों झुलस रहे हो, आओ थोड़ी ठंडक ले लो…कहते हुए उसने घने बालों वाला सीना मेरे चेहरे से सटा दिया। अपने बाल झबरे कुत्ते की तरह गोल-गोल झटक दिए। उसके बालों से टपकती बूँदें मेरे बालों में और चेहरे पर अटक गईं। मैंने अपना चेहरा उसके सीने से हटाया नहीं। मुझे सचमुच ठंडक महसूस हुई।

-एक बार मेरे साथ नदी में नहा कर देखो, ज़िन्दगी का असली आनंद दिला दूंगा…इस बार वो बैंच पर बैठते हुए अपने हाथों का गोला बना कर जैसे हार पहना दिया, अपना हाथ मेरे कंधे पर रखते हुए मेरी और झुक गया, मैंने उसका हाथ अपने कंधे पर रखा रहने दिया।

-मुझे तैरना नहीं आता इसलिए नदी में जाने से डरता हूँ। कहते हुए मैंने खुद को उससे अलग कर लिया।

‘एक बार तटबंध के उस पार चलो… डूबना भी सीखोगे, तैरना भी, और शायद ख़ुद को भी पा लोगे।’ कहते हुए उसने मेरा गाल छुआ। विचित्र-सी मुस्कान बिखेरता हुआ वो कुछ और भी कहना चाह रहा हो जैसे पर बोला नहीं…ज़िन्दगी में बहुत कुछ अनकहा रह जाता है।

ठीक उसी वक़्त हवा गुनगुनाती हुई कानों में हौले से कुछ कह गई, और कोई गीत गुनगुना गई। मैं समझ नहीं पा रहा था कि ये सब मुझे सुखद क्यों लग रहा था। उस रोज़ घर जा कर मैंने अकेले कमरे में आईने के सामने तरह-तरह से अपने अंगों की स्क्रीनिंग की।

‘इसके पास कुछ सामान नहीं है, ये लोग सामान्य नहीं होते…’ इस तरह की लोगों की आपस में कानाफूसी कानों में गूंजती रही। शायद ये लोग ठीक बोलते हैं। मुझे अपना सच स्वीकार कर लेना चाहिए।

-अनुज जी हारमोंस की दवा और इंजेक्शंस का आपकी बॉडी पर तो असर हो रहा है पर आपको मन से कैसा महसूस हो रहा है? नर्स ने धीरे से पूछा तो मैं स्मृतियों के गझिन जंगल से वापस अस्पताल में आ गया। ऑपरेशन थियेटर तैयार हो गया था और मैं गलियारे से एसी वाले ठंडे कमरे में लाया जा चुका था, ठण्ड के कारण वहां मुझे झुरझुरी सी हुई। पहले एक संकरे-से स्ट्रेचर जैसे ही एक बेड पर मुझे लिटाया गया, जहाँ उंगली में यू-पिन जैसा फंसा कर मेरे ह्रदय की गति नापी जा जा रही थी। एक मशीन थी जिस पर मेरा पूरा शरीर रखा जाना था, कोई जांच थी उस जांच के बाद एक इंजेक्शन दिया जाना था जिससे मैं बेहोशी की दुनिया में चला जाता, मगर मन तो पहले ही बेहोशी की दुनिया में जा चुका था, एक ऐसे ख्वाबगाह में, जहाँ बेहोशी भी ख़ास थी… रंगबिरंगी पोशाकें, लम्बे बाल, सुन्दर सुडौल चेहरे की निखरी सुन्दरता….जिसमें मेरी काया समा गई है, मैं मैं न हो कर एक सुंदरी में तब्दील हो गया हूँ..। नीले ख़्वाबों वाली नीलम परी बन उड़ चला हूँ आसमान में। अच्छा है मेरा क़द ज्यादा ऊँचा नहीं है…। खुद को परिवर्तित पा कर मुझे कैसा लगेगा..। हवा में लहराता एक रंगीन दुपट्टा मेरे चेहरे से अठखेलियाँ करने लगा। मैं अपनी थिंकिंग पर खुद ही मुस्कुरा पड़ा। अपना शरमाया चेहरा मैंने मोबाइल के कैमरे की सेल्फी-मोड पर देखा और एक क्लिक ले ली।  मुझे उस तस्वीर में नीले दुपट्टे वाली लड़की ही नज़र अ रही थी।

पहली बार बेहोश किया जाऊँगा, कैसा होगा ये अनुभव। पता नहीं ऑपरेशन के बाद होश आएगा भी या नहीं… कई लोग बेहोश होने के बाद दुबारा होश में ही नहीं आते। क्या लोग इसके बाद भी फब्तियां कसेंगे? ऑपरेशन की घडी जैसे-जैसे करीब आ रही थी, मन का घोड़ा वैसे-वैसे सरपट इधर-उधर दौड़ रहा था।

-अपनी थिंकिंग कैसे बदलोगे? औरत की सोच अलग होती है मर्द की अलग…नर्स के इस बेतुके सवाल से मुझे बड़ी खीझ हुई। वैसे हारमोंस के जो इंजेक्शन दिये गए हैं उसका थोडा बहुत असर तो हो ही रहा होगा। नर्स को क्या पता बदलाव बहुत ज़रूरी है समाज, राजनीति, संस्कृति, पहनावा-पोशाक सब में बदलाव आना चाहिये। तकनीक ने इंसान को कृत्रिम अक्ल से चलाना शुरू कर दिया है, ऐसे में मेरे ऑपरेशन के निर्णय पर नर्स प्रश्न चिन्ह उठा रही है। बदलाव नहीं आता तो औरतें आज भी घर की चारदीवारी में क़ैद दासी बन घर का संचालन कर रही होतीं। मैंने अपनी मम्मा को कितना बदलते देखा।

मैं जब छोटा था डॉक्टर से विमर्श के बाद उन्होंने कहा था- विल चेंज…बच्चे में एक सामान्य लड़के की शारीरिक संरचना अगर औरों से थोड़ी भिन्न है तो इसमें लड़के का क्या दोष…तब मैं इसके माने समझ नहीं पाया था। किसी के उलाहने पर वो करारा जवाब देती थीं। माँ का वही गुण मुझ में ट्रांसफर हुआ है।

एक रोज मैं सो कर उठा और वाल साइज़ विंडो से सटी बालकनी में अलसाया सा जा बैठा। अधजगी आँखों से देखा गुलाब की एक छोटी-सी कली, जिसकी पंखुडियां आपस में गुंथी हुई थीं। हरी पत्तियों से घिरी वो कली जैसे आपस में प्रेम-रत हो…धीरे-धीरे सूरज की रश्मियाँ पा कर आपस में गुथी हुई पंखुरियाँ एक दूसरे का दामन छुडा कर बाहर की और खुलने लगीं। देखते-देखते सुन्दर गुलाब के अधखिले फूल में तब्दील हो गईं, जिस पर कवि की कलम से सुन्दर प्रेम कविता रची जाती…पर पता नहीं क्यों मुझे आकृष्ट नहीं कर पाई। मुझे आकर्षण हुआ उस फूल से जिसकी खूबसूरती को लोग नज़रअंदाज़ कर आगे बढ़ जाते हैं। वो फूल सड़कों के किनारे, नालियों और नदी के किनारे की झाड़ियों में उगता है, बिना किसी देखभाल के। वो है बेहया यानि बेशर्म का पौधा। ज़रूरी है क्या, हर खूबसूरत दिखने वाले वस्तु या व्यक्ति से प्रेम किया जाए। झुग्गी झोपड़ियों के बीचोबीच बहते नाले के किनारे-किनारे ढेर सारे बेहया के गुलाबी फूल उगते हैं, मुझे वो बड़े प्रिय है। मैं औचक उठा और उन फूलों की तलाश में निकल पड़ा। धूप चढ़ रही थी, सड़क पर यातायात का चिल्लपों झुंझलाहट पैदा कर रहा था, फुटपाथ की दुकानें सज गई थीं, मैं सड़क पार कर रेलवे ट्रैक के किनारे-किनारे चला जा रहा था। एक तरफ बड़ा-सा नाला बह रहा था, नाले के किनारे-किनारे अंतहीन झोपड़पट्टी थी, जिसके अंदर मोबाइल से बजते हुए गानों की आवाजें आ रही थीं। मैले कुचैले कपडे पहने बच्चे नाले के किनारे खेल रहे थे। कुछ औरतें वहीं टू्टी फूटी बाल्टी में पानी रख कर बर्तन मांज रही थीं। शहर के सजावट पर इस तरह के पैबंद अपने देश की सच्ची तस्वीर है। देश नाले के किनारे मैले-कुचैले कपड़ों में, भुखमरी और अभाव में जी रहा है। उस इलाके का कोई नेता अपने नाम के प्रचार के लिए कुछ पैम्फलेट्स बाँट गया था, जिसे बच्चे इकट्ठे करके उसका हवाई जहाज़ बना कर हवा में उड़ा रहे थे। एक बच्चा उन्हीं कागजों के पीछे कुछ लिख रहा था। शायद अपना भविष्य लिख रहा होगा। नाले की चढ़ाई पर, बेहया के पौधों का जंगल था। इस पूरी झोपड़पट्टी की क्रूर सच्चाई को बेहया के इन पौधों ने ढँक रखा था। उन पौधों की आड़ में प्रेमी युगल एक दूसरे से सट कर प्यार मुहब्बत की बातें कर रहे थे।

–इसे मुंह में मत लगाना, ये ज़हरीला पौधा है। कूड़े के ढेर की बगल में बनी एक झोपडी से निकला एक किशोर बोलता हुआ जोर से छलांग लगा कर नाली के पार भाग गया। तमाम व्यावसायिक चीजों के अकाल में भी यहाँ संवेदना की गहराई थी।

वो सरपट भागता जा रहा था। तभी सीटी बजाती हुई रेलवे ट्रैक को कंपाती हुई ट्रेन धड़धडाती हुई चली आ रही लोकल गाड़ी ने अपनी गति धीमी की और रुक गई। शायद आगे सिग्नल नहीं होगा।

रेल पटरी के पास एक लड़की गुलाबी रंग की सलवार कमीज़ पहने, जिसका रंग एकदम उद्धत हुआ था, खड़ी थी, उसके बाल जटा जैसे बिखरे हुए थे। उसके हाथ में बाली बुंदे, हेयर क्लिप रुमाल और तमाम छोटी-छोटी चीजों की लम्बी माला सी थी जो हैंगर में बंधी थी। लोकल गाड़ी में इसे वो बेच कर पैसे अपनी माँ को देगी और वो इन्हीं पैसों से दाल-आटा खरीद कर रोटी पकाएगी जिससे इसका और घर वालों का पेट भरेगा। लड़की उस लड़के का इंतज़ार कर रही थी, वो उसके नजदीक आया और वे दोनों एक काया में तब्दील हो गए।

वे दोनों बड़ी फुर्ती से एक दूसरे से अलग हो कर झटपट ट्रेन में सवार हो गए। उन दोनों को शायद पता रहा होगा ट्रेन के आने और रुक जाने का समय। मैं मुस्कुराया-‘ट्रेन के इंतज़ार के बीच के स्पेस में भी प्रेम किया जा सकता है।’ 

तो क्या सीनियर छात्र भी उस पिकनिक के बीच के समय में मुझसे प्रेम करना चाहता था? लेकिन क्यों? क्या मुझमें उसे कोई ऐसी बात नज़र आई जिसकी उसे ज़रूरत थी? ‘एक बार तटबंध तोड़ कर मेरे साथ चलो मैं तैरना, डूबना सब सिखा दूंगा…’ मानीखेज था उसका ये वाक्य।  

 इन तमाम सवालों से गुफ्तगू करता हुआ, मैं दहिसर के प्लेटफॉर्म तक पहुँच गया, दफ्तरों और अपने व्यवसाय की और जा रहे लोगों का रेला था वहां। विरार से आने वाली एक फास्ट लोकल के जेंट्स कम्पार्टमेंट में चढ़ तो गया, लेकिन अंदर घुसने के बाद पता चला ये रविवार को भी दफ्तर वाले दिनों से ज्यादा भीड़ वाली लोकल है। भीड़ इतनी ज्यादा थी कि मेरा क्रॉस बैग किसी दूसरे व्यक्ति के पेट से सटा था, मेरा दाहिना हाथ ऊपर छड को पकडे थे, अपने बाएं हाथ को बड़ी मशक्कत से सामने की ओर ला सका।

अचानक मुझे अपने शरीर के निचले हिस्से पर कोई कीड़ा रेंगता हुआ महसूस हुआ, धीरे-धीरे पेट तक आ कर वापस नीचे की और जाने लगा। मुझे झुरझुरी सी होने लगी। मैंने इधर उधर निगाहें फिराईं… सिर्फ सिर ही सिर ही नज़र आ रहे थे। कहीं कोई कॉक्रोच तो नहीं चढ़ गया है…,उस कीड़े का दबाव मेरे कमर से होते हुए पैंट के ज़िप तक पहुँच गया था। मुझे बेचैनी सी होने लगी, मेरा हाथ वहां तक पहुँच नहीं पा रहा था कि मैं जान सकूँ कि ये कॉक्रोच है कौन..। लोकल ट्रेन की भीड़ में इस तरह कीड़े की तरह किसी के बदन पर रेंगना आम बात है। मुझे घिन-सी आई, गुस्सा भी। जब तक मैं खोजबीन करूं, दादर स्टेशन आ गया। भीड़ का रेला धप-धप करता हुआ उतरा और भीड़ के साथ धकियाया जाता हुआ मैं भी उतार दिया गया। एस्केलेटर के लिए लम्बी लाइन में मैं भी शामिल हो गया।

-कैसे हो दोस्त!  अचानक मुझे अपने कंधे पर दो हाथों का मज़बूत पकड़ महसूस हुआ, मैंने घूम कर देखा, कंधे पर क्रॉस बैग टाँगे  वही सीनियर छात्र था। आँखों में वही तिलिस्मी भाव।

-कहाँ जा रहे हैं? मैंने यूँ ही पूछ लिया।

-जहाँ तुम।

-मैं तो यूँ ही मटरगश्ती करने निकला हूँ खुली सड़क पे।

-इरशाद कामिल के ‘तमाशा’ फिल्म के गीत की तरह? कहते हुए वो मुस्कुराया। उसकी मुस्कराहट गुलाब की खिली नवोदित कली की तरह लगी।

-आपका नाम मुझे अब तक नहीं पता चल पाया है। मैंने कहा।

-मैंने बताया ही नहीं। तुम्हारा नाम तो अनुज है न?

-जी, आपको कैसे पता चला?

-तकनीक के इस ज़माने में किसी का नाम पता करना कौन-सी बड़ी बात है। चलो स्टेशन से बाहर चलें। स्टार-बक्स में चल कर कॉफ़ी पियें।

-आपका नाम?

-मिहिर

कॉफ़ी हाउस में सन्नाटा पसरा था। कोने वाली टेबल के साथ ऊंची-ऊंची दो कुर्सियों पर हम दोनों बैठ गए।

अनुज महोदय! ट्रेन में आप परेशान से नज़र आये थे। जिसे आप शायद कोई कीड़ा समझ बैठे थे, वो मैं था। क्या करें हम ऐसा करने को अभिशप्त हैं। समाज हमें एक ख़ास ज़ोन में धकेल देता है, जैसे हमारे भीतर दिल नहीं धड़कता। क्या हम जैसे लोगों को प्रेम करने का हक नहीं है..?

कहते हुए उसने मेरा हाथ अपने हाथ में लिया। अपनी कॉफ़ी का मग हाथ में लेते हुए  उसने एक सिप लिया और मेरी तरफ बढ़ा दिया। ‘ये वाली कॉफ़ी पियो, प्यार बढ़ता है’ किसी फ़िल्मी हीरो की तरह वो मुस्कुराया। मैं भी मुस्कुरा दिया। इत्ती-सी मुस्कान के ज़रिये पल भर के लिए हम जैसे किसी दूसरी दुनिया में पहुँच गए। मिहिर अपनी कुर्सी से उठा और मेरे गले में गोलाई से हाथ डालते हुए मेरे माथे पर अपने होंठ धर दिए, मुझे अपने गालों में ताप महसूस हुआ। मेरी और उसकी उँगलियाँ आपस में गुंथ गई थी। उसके हाथों के स्पर्श से मुझे अपनी आँखों में आंच सी महसूस हुई। मेरी पलकें झुकी हुई थीं पर उसके प्रेम की लहरों को देख पा रही थीं।

-तुम लाज के कवच से बाहर नहीं निकलते हो। वो मेरे कान में फुसफुसाया।

 स्टारबक्स की छत से झरती मद्धम रौशनी में चाँद सितारों का शामियाना सज गया।  बिलिंग-काउन्टर पर यू-ट्यूब पर गाना बज रहा था…आ नील गगन तले प्यार हम करें..।

-‘मेरे मन पर एक दीवार है जिसके पार मैं नहीं आ पाता, उस पर ज़माने का पहरा होता है’ मैं बुदबुदाया।  ये कौन-सा रिश्ता बन रहा है मेरे और मिहिर के बीच… क्या मैं ये मान लूं कि मैं ट्रांसजेंडर हूँ…  निगाहें गोल-गोल घुमाई तो देखा लड़के-लड़की का एक जोड़ा अजीब निगाहों से  हमेन देख रहा था।

हम दोनों कॉफ़ी पी कर वहां से निकले तो धूप काफी चटख हो गई थी। सड़क के दूसरी  तरफ ढेर सारे कबूतर फड़फड़ाते हुए दाने चुन रहे थे… वहां स्थाई रूप से  ढेर सारे ज्वार और बाजरे के दाने पड़े होते हैं, शायद नाम ही इसीलिए पड़ा कबूतरख़ाना। वहीं पास की चाय और वड़ा-पाव की दुकान पर नीले रंग का सूट पहने एक लड़की बैठी थी, उसने कान में लम्बी-लम्बी कंधे को छूती बालियाँ पहन रखी थीं। ये उसके सौन्दर्य में और इजाफा कर रही थीं। साथ में एक लड़का…जी चाहा मैं उस लड़की को देखता रहूँ…   तभी साड़ी पहने लम्बे चौड़े डील-डौल वाले तीन-चार ट्रांसजेंडर का झुण्ड आ कर मेरे और मिहिर की माथे से बलइयाँ लेता हुआ हमें आशीष देने लगा.. मैं सोचने लगा, क्या ये मन पढते हैं?  इनके मन के खोह में दर्द का परनाला ही क्यों न बहता हो पर ये ऊपर से कितने आज़ाद और बेफिक्र दिखाई देते हैं। और लोग हैं कि इनकी आज़ादी से भी खौफ़जदा रहते हैं।

दरअसल हम पढ़े लिखे लोग पहले तो खुद ही सच्चाई से मुंह मोड़ते हैं, उसके बाद समाज के ठेकेदार हमें नैतिकता का और सही ग़लत का पाठ पढ़ाने लगते हैं।

जब डॉक्टर ने पहली काउंसलिंग में कहा था कि “मेरा सेक्सुअल ऑर्गन नॉर्मल नहीं है यानि जेंडर डिस्फोरिया है। मैं कैसा विचलित हो गया था। मैं मन से स्वीकार ही नहीं कर पा रहा था। कमरा बंद करके खुद को आईने के सामने तरह-तरह से आजमाता, खुद ही जांच करता। कॉलेज में क्लास कर रहा होता, अचानक मेरी आवाज़ बदल कर महीन हो जाती, आँखों के सामने कोई स्त्री आ खड़ी होती, मैं वेसे ही बोलने और चलने लगता। अपने ख्वाबगाह से बाहर आता तो छात्र्रों की हूटिंग और उनके ठहाके मेरे कानों में देर तक चोट पहुंचाते रहते। कॉलेज में  इस बात की चर्चा  होती… ‘ये  छात्र हैं इसके पास असली सामान नहीं है।’

कुछ लोग जिनके दिमाग की खिड़कियाँ थोड़ी खुली थीं, वे मुझे और मिहिर दोनों को ट्रास्जेंडर कहने लगे थे। लड़कियां कुछ अजीब निगाहों से देखतीं जैसे हम लोग कोई अजूबा हों। ट्रांस्जेंडर, जेंडर डिसफ़ोरिया पर न जाने कितनी फिल्में बनीं, न जाने कितनी किताबें लिखी गईं लेकिन समाज के सोच में कोई बदलाव नहीं आया। आपस में दो ट्रांसजेंडर एक साथ रहें, एक साथ लिव-इन रिलेशन में हों, इसके लिए बाकायदा कानून बन गया है, धारा 377 हटा कर नया कानून लागू हो गया और कहा गया- ‘ लव इज जेंडरलेस’…

 प्यार की नदी तो सीमाओं के पार बहती है, आखिर प्यार पर इतने पहरे क्यों होते हैं? हम ट्रांसजेंडर प्रेमी युगल हमेशा अपने साथ खौफ़ का साया लिए फिरते हैं कि कब-कौन पूछ लेगा इस रिश्ते का भविष्य क्या है..और हमें ज़लील करने लगेगा।

उस रोज़ मैं अपने घर की बालकनी में अकेला बैठा समन्दर से उठती गिरती लहरों का खेल देख रहा था…  किनारे रेत पर लोग नंगे पाँव टहल रहे थे, बच्चे रेत में अपना एक पैर फंसा कर घरौंदा बना रहे थे। मैं मिहिर को याद कर रहा था। कई दिनों से उससे मुलाक़ात नहीं हुई थी। एक बेचैनी दिल पर तारी थी… क्या उसे फोन करूँ..। दो तीन लड़कों से उसकी झड़प हुई और मारपीट तक हो गई थी उसे चोट लग गई थी, मैं उसे घर तक छोड़ने गया था। फोन करके उससे मिलने का सोच ही रहा था की डोर-बेल बज गई।

सामने मिहिर खड़ा था….मेरे दिल की रफ़्तार तेज़ हुई, मैंने लम्बी सांस खींची और मैं हुमक के उसके गले लग गया। मेरे भीतर का तूफ़ान थोडा शांत हुआ।

-क्या कर रहे थे? उसका स्वर उदास था।

-शहर की रौशनी निहार रहा था। रोशनियों के शहर में इंसान तलाश रहा था।

-और एक इंसान बिन बुलाये आ धमका। मैं मुस्कुरा दिया। मैंने उसके लिए हॉट कॉफ़ी बनाई। 

वो अपने साथ एक तूफ़ान भी लाया था, उस तूफ़ान के साथ ही वो मेरे बेडरूम तक आ गया।

 -आज अधूरा नहीं, सब कुछ पूरा होगा। धीमी आवाज़ में कहते हुए मिहिर के हाथ मेरे शर्ट की बटन तक आ गए थे।


इंसान उच्छ्वास और सबसे सुखद पलों में खुद को सबसे ज्यादा असुरक्षित महसूस करता है। सुख के चरम में डर ज़रूरी तौर पर शुमार हो जाता है। मिहिर के साथ बिस्तर पर मेरी अधमुंदी आँखों के सामने नीला रंग बिखर गया। नीली लॉन्ग फ्रॉक वाली एक लड़की, लम्बे बालों की चोटी गूंथे हुए, हवा में उड़ी जा रही है। वो लड़की मेरी देह में घुल मिल गई है। उसकी चोटी मेरे बालों में आकर गुंथ गई है। 

तभी एक शोर सुनाई देता है।…मारो सालों को.. हिजड़े हमारी बिल्डिंग में नहीं रहेंगे। ये अपने हिजड़ों के समुदाय में चले जाएँ। घर के दरवाज़े के बाहर जमा भीड़ की आवाज़ थी ये।

-ये गैर कानूनी शादी है। दो समलैंगिक इंसान शादी कर लेंगे लेकिन बच्चा कैसे पैदा करेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दे दिया है कि इस तरह की शादी ग़ैर कानूनी है और इन्हें बच्चा गोद लेने का भी अधिकार नहीं प्राप्त है..। तो फिर इनका रिश्ता कैसा रिश्ता है..। ऐसे लोग सामाजिक परम्परा को तोड़ कर अनैतिकता को बढ़ावा दे रहे हैं। कहते हुए भीड़ चिल्ला रही है।

मैं कुछ  बोलना चाह रहा हूँ लेकिन गले से घुट कर उं उं की आवाज़ निकल रही हो, जबड़े जैसे लॉक हो गए हों। मैं उन्हें बताना चाह रहा हूँ हम हिजड़े नहीं हैं। सेक्सुअल डिसफ़ोरिया है हमें। ये कोई अपराध नहीं, हिजड़ा होना भी कोई अपराध नहीं है। लेकिन कोई सुनता नहीं …। लोग पत्थर फेंक रहे हैं।

 वे अब दरवाज़े की हैंडल तोड रहे हैं। अचानक मेरी आवाज़ भी फूट पड़ती है- ‘दो समलैंगिक इंसान के भीतर दिल नहीं होता..? क्या वो प्रेम न करने के लिए अभिशप्त हैं..क्यों भला…? 

मैं फूलों की एक माला ले आता हूँ मिहिर के गले में डालने चलता हूँ तभी डोर बेल बज उठती है। मैं सपनों की प्रेम नगरी से हडधबड़ाकर उठता हूँ अपने कपडे पहनते हुए दरवाज़े की तरफ भागता हूँ। दरवाज़ा खोला तो पेपर वाला बिल लिए खड़ा था, वो पैसे मांगने आया था।

ख़्वाबों की इस दुनिया के बाद, मेरी आँखों का दरवाज़ा भी खुल गया था, लेकिन मेरे दिमाग के दरवाज़े बंद कर दिए गए ताकि मैं कुछ सोचने विचारने में असमर्थ हो जाऊं।

 एनेस्थीसिया के इंजेक्शन के बाद कई घंटों के लिए मैं दूसरी दुनिया में चला गया था। तन-मन, विचार सबसे बेदखल…शून्य में था। तकरीबन 7 से 8 घंटे तक मुझे अपने बारे में कोई खबर नहीं थी। होश में आया तो मैंने खुद को अस्पताल के कमरा नंबर 15 के बेड पर पाया। ऑपरेशन-थियेटर के खौफ़ से मैं बाहर आ चुका था लेकिन अब दर्द के साए ने अपनी जकड़न में जकड़ लिया था। मेरे हाथ में सुई लगी हुई हैं। मेरे सिर के ऊपर उलटी बोतल लटकी हुई जिसमें से बूँदें रिसती हुई सुई के रास्ते मेरे शरीर में प्रवेश कर रही हैं।

-कैसा लग रहा है आपको? डॉक्टर मोटवानी ने मेरे सिर पर हाथ रखते हुए पूछा और साइड टेबल पर रखी प्रिस्क्रिप्शन पर कुछ दवाइयां लिखीं और अपने जूनियर डॉक्टर को समझाते हुए अगले मरीज़ को देखने जाने लगे।

-डॉक्टर साहेब.. क्या मैं अब पूरी तरह बदल गया हूँ या अभी भी..?

-मेडिकल साइंस ने आपको लड़की बना दिया है। छ घंटे तक चला आपका ऑपरेशन। पर आपको बहुत सारी फीलिंग चंद रोज़ बाद होगी, हारमोंस की गोलियां फिलहाल चालू रखनी है। कुछ मरीज़ को ऑपरेशन के कुछ घंटे बाद एहसास हो जाता है और वे जेंडर के अनुकूल बर्ताव करने लगते हैं। ये आप पर निर्भर करता है कि आप कैसा व्यवहार करेंगे..।

सामने मम्मी पापा खड़े थे, मम्‍मी की आँखों में आंसू थे पापा की नाराजगी कायम ही थी। शायद उनके मन में चल रहा होगा, ये कैसी विडंबना है…जन्म लड़के रूप में दिया पर…। मम्मी की आँखों में ख़ुशी के आंसू थे। मेरे बेटे के नाम से ट्रांसजेंडर का तमगा हट जाएगा।

 मम्मी पापा के कमरे से जाते ही मिहिर आया। अस्पताल के नियम के तहत एक बार में दो से ज्यादा लोग कमरे में नहीं आ सकते।

मिहिर ने हौले से मेरे सिर पर हाथ रखा, मेरे आँखों और गालों की नमी को अपने हाथों से पोंछते हुए जैसे ही वो मेरी और झुका, मैंने उसका चेहरा परे सरका दिया। 

उसने अचरज से मेरी और देखा… 

उसने मेरे सीने की और देखा धीरे से हाथ बढ़ा कर हलके हाथ से छूने की कोशिश की, कहीं मुझे दर्द न हो जाए, अभी ताज़ा-ताज़ा ऑपरेशन हुआ है। इस बार मैंने उसका हाथ जोर से परे झटक दिया।

-अनुज क्या हुआ तुम्हें? ऐसे क्यों कर रहे हो? मैं तुमसे प्यार करता हूँ… कहते-कहते उसकी आवाज़ डर और दुःख से कांपी थी।

जैसे उसने मेरे मन की बात भांप ली हो।

उसने अपना होंठ मेरे होठों पर रखना चाहा, नजदीक आ कर मेरे गले में गोल घेरा बनाया, जैसे वो मुझे अपने आगोश में ले कर बेइन्तिहा  प्यार करना चाहता था।

-नहीं….मुझे उसकी इस हरकत से खीझ हुई। मिहिर तुम जाओ, मुझे अकेला छोड़ दो…। 

मानो उसे कई बिच्छुओं ने एक साथ डंक मार दिया हो। हमेशा जोश और ऊष्मा से भरा उसका मिज़ाज एकदम बेजान होने लगा था। हैरान था वो मेरे इस वर्ताव पर। उसकी आँखों के सागर में अनगिनत सवाल उफान ले रहे थे। 

दो जिस्म और एक जान थे हम लेकिन आज रूस और यूक्रेन बन गए थे।

लचकती हुई कमर वाली दुबली पतली मिहिर की काया, अपमानित हो कर, धीमी चाल से जाती हुई एक बार फिर मुड़ी, उसकी आँखों में बिछोह का पानी भरा था। 

लेकिन मुझ पर  उसके दुःख का तनिक भी असर नहीं हुआ। मैं निर्लिप्त भाव से उसे जाता हुआ देखता रहा। मेरी आँखों के सामने एक लम्बा, हट्टा कट्टा, फौजी कट बालों वाले नौजवान का चेहरा चित्रित हो रहा था। माइकल एंजलो के डेविड की तरह पुरुष यौवन और सौन्दर्य का चरम।

मैं मम्मी का लाया हुआ गुलाबी कुर्ता और पैन्ट पहनने की कोशिश करता हूँ, सोचता हूँ अपना नाम क्या रखूँगा। ‘आरुषी’ या ‘काव्या’ या नीलिमा… आरुषी सही रहेगा..। 

मैं अपने मोबाइल के सेल्फी कैमरे से अपने चेहरे और सीने के उभार को देख रहा हूँ,,,ये मेरे ही बदन के मांस होंगे न..। मैं मुस्कुरा पड़ता हूँ, मेरी इस मुस्कुराहट ने मेरे भीतर के दर्द को सोख लिया था।

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ममता सिंह
ममता सिंह आकाशवाणी के लोकप्रिय राष्ट्रीय रेडियो चैनल विविध भारती की वरिष्ठ उद्घोषिका हैं। श्रोताओं के बीच वह 'रेडियो सखि' के नाम से जानी जाती हैं। साहित्य, संगीत और प्रसारण के क्षेत्र में उनकी विशिष्ट पहचान है। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए. किया और संस्कृत में पीएचडी के लिए शोधकार्य भी शुरू किया, हालांकि वह पूरा नहीं हो सका। इसके अलावा उन्होंने रूसी भाषा में डिप्लोमा तथा प्रयाग संगीत समिति से शास्त्रीय संगीत में 'प्रभाकर' की उपाधि प्राप्त की। ममता सिंह की पहली पुस्तक 'राग मारवा' (कहानी संग्रह) राजपाल एंड संस से प्रकाशित हुई। इस पुस्तक को महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के सम्मान के साथ-साथ मध्य प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन के 'वागीश्वरी सम्मान' से भी नवाजा गया। उनका पहला उपन्यास 'अलाव पर कोख' प्रतिबिंब प्रकाशन से प्रकाशित हुआ, जिसे भी महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ने सम्मानित किया। इसके बाद उनका कहानी संग्रह 'किरकिरी' राजकमल प्रकाशन समूह के राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित हुआ, जिसे मुंबई के आशीर्वाद पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनका उपन्यास 'बीज और आकाश' शिवना प्रकाशन से प्रकाशित है। उत्कृष्ट प्रसारण के लिए ममता सिंह को आकाशवाणी का राष्ट्रीय स्तर का सर्वश्रेष्ठ उद्घोषिका (बेस्ट एनाउंसर) पुरस्कार भी मिल चुका है। वह देशभर में आयोजित साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का नियमित मंच संचालन करती हैं। विविध भारती से उनकी अनेक कहानियों का प्रसारण हुआ है और उन्होंने कई रेडियो नाटकों में भी अपनी आवाज दी है। इसके अलावा वह 'कॉफी हाउस' ऑडियो ब्लॉग के माध्यम से अपनी तथा देश के अनेक प्रतिष्ठित लेखकों की रचनाओं का वाचन करती हैं। वह 'बतकही' नाम से एक साहित्यिक ब्लॉग भी संचालित करती हैं।
Woman in a green patterned saree sits with hands folded in her lap, looking at the camera with a calm expression.
ममता सिंह
ममता सिंह आकाशवाणी के लोकप्रिय राष्ट्रीय रेडियो चैनल विविध भारती की वरिष्ठ उद्घोषिका हैं। श्रोताओं के बीच वह 'रेडियो सखि' के नाम से जानी जाती हैं। साहित्य, संगीत और प्रसारण के क्षेत्र में उनकी विशिष्ट पहचान है। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए. किया और संस्कृत में पीएचडी के लिए शोधकार्य भी शुरू किया, हालांकि वह पूरा नहीं हो सका। इसके अलावा उन्होंने रूसी भाषा में डिप्लोमा तथा प्रयाग संगीत समिति से शास्त्रीय संगीत में 'प्रभाकर' की उपाधि प्राप्त की। ममता सिंह की पहली पुस्तक 'राग मारवा' (कहानी संग्रह) राजपाल एंड संस से प्रकाशित हुई। इस पुस्तक को महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के सम्मान के साथ-साथ मध्य प्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन के 'वागीश्वरी सम्मान' से भी नवाजा गया। उनका पहला उपन्यास 'अलाव पर कोख' प्रतिबिंब प्रकाशन से प्रकाशित हुआ, जिसे भी महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ने सम्मानित किया। इसके बाद उनका कहानी संग्रह 'किरकिरी' राजकमल प्रकाशन समूह के राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित हुआ, जिसे मुंबई के आशीर्वाद पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनका उपन्यास 'बीज और आकाश' शिवना प्रकाशन से प्रकाशित है। उत्कृष्ट प्रसारण के लिए ममता सिंह को आकाशवाणी का राष्ट्रीय स्तर का सर्वश्रेष्ठ उद्घोषिका (बेस्ट एनाउंसर) पुरस्कार भी मिल चुका है। वह देशभर में आयोजित साहित्यिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का नियमित मंच संचालन करती हैं। विविध भारती से उनकी अनेक कहानियों का प्रसारण हुआ है और उन्होंने कई रेडियो नाटकों में भी अपनी आवाज दी है। इसके अलावा वह 'कॉफी हाउस' ऑडियो ब्लॉग के माध्यम से अपनी तथा देश के अनेक प्रतिष्ठित लेखकों की रचनाओं का वाचन करती हैं। वह 'बतकही' नाम से एक साहित्यिक ब्लॉग भी संचालित करती हैं।
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3 COMMENTS

  1. जिन और अबछुए दर्दो पर यह दुनिया बात नहीं करती उसको विषय बनाकर रेडियो सखी ममता सिंह ने बहुत सुंदर कहानी लिखी, संवेदना से भरी हुई।बहुत बधाई।

  2. बहुत बहुत धन्यवाद कविता जी, कहानी को यहां स्थान देने के लिए।

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