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विरासतनामा: दास्तान-ए-रांझा: पहचान के पैरहन को बदलता हुआ किरदार

जरूरी है कि किस्सा-ए-हीर-रांझा को सिर्फ एक रूमानी कहानी के रूप में नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक दस्तावेज के रूप में पढ़ा जाना चाहिए है जो दक्षिण एशियाई इतिहास में जाति, वर्ग और धार्मिक परंपराओं के पेचीदा तानेबाने पर रोशनी डालता है।

15वीं सदी का पंजाब – लोधी रियासत का सामंती समय और इस पृष्ठभूमि पर जन्म लेता है हीर-रांझा का ऐसा अमर किस्सा-ए-मुहब्बत, जो दुनियावी रिवायतों और मज़हबी इबारतों को पलट देता है। हीर के बारे में तो कई कहानियां, कई गीत, कई कलाम गाए गए, क्योंकि अपने समय के हिसाब से हीर ने मुहब्बत में जो जुर्रत दिखाई, वो बेमिसाल थी मगर रांझा भी उतना ही दिलचस्प किरदार रहा, जिसने इश्क़ के लिए ज़ात, तबके और मज़हब की सारी दीवारें लांघीं। हीर-रांझे के अफ़साने को दामोदर दास गुलाटी से लेकर सूफी शायर बाबा वारिस शाह और बाबा बुल्ले शाह तक ने अपने सुखन में उतारा और मशहूरी ऐसी कि आज तक इन दोनों के नाम से दक्षिण एशिया का हर आदमी-औरत वाक़िफ है। 

रांझा कबीले के एक मुस्लिम जट्ट के तौर पर पहचाना जाने वाला दीदो रांझा, पंजाब के तख्त हज़ारा से आता है और एक ताकतवर सामंती जमींदार मोजू चौधरी का बेटा है। उसकी शुरुआती ज़िंदगी ऐश-ओ-आराम से भरी है। रांझा खेती-बाड़ी की बजाए बांसुरी बजाने के अपने शौक में डूबा रहता; एक ऐसा कलात्मक शौक जो सामंती व्यवस्था और पिता के लाड-प्यार की वजह से मुमकिन था। समय के साथ रांझे के भाई उसके हिस्से की ज़मीन हथिया लेते हैं और दरवेशों की तरह दर-दर भटकता रांझा जा पहुँचता है झंग के एक मुस्लिम जट्ट ज़मींदार चूचक सियाल के यहाँ, जिसकी बेटी हीर सलेटी और रांझे को एक सूत्र में बांध लेती है इश्क की नाज़ुक डोर। हालांकि, हीर के लिए राँझे का प्यार उसकी समाजी हालत में एक गहरा बदलाव लाता है। हीर के घर में चरवाहे (चाक) के रूप में रांझा बारह साल गुजारता है, ताकि हीर के करीब रह सके। यह बदलाव एक प्रतीकात्मक और समाजी गिरावट को दिखाता है, जो उसकी पहचान को एक जमींदार के बेटे से बदलकर एक नौकर की कर देती है। चरवाहे (चाक) के रूप में उसकी बारह साल लम्बी सेवा न सिर्फ़ प्यार के लिए एक कुर्बानी है बल्कि सामंती उम्मीदों और ऊंच-नीच की व्यवस्था को भी तोड़ती है। 

एक ही मुस्लिम जट्ट पहचान होने के बावजूद, अमीरी-गरीबी का अंतर हीर और रांझा के मिलन में एक बड़ी दीवार बन जाता है। हीर के पिता चूचक सियाल, एक मुखिया और कई गांवों के नेता के रूप में, अपनी बिरादरी में शादी और अपने रुतबे को बचाए रखने को प्राथमिकता देता है। इसके उलट, रांझे की कमजोर आर्थिक स्थिति, जो जमीन और रुतबे के खोने से और खराब हो गई थी, उसे इस शादी के काबिल नहीं छोड़ती। हीर के विरोध के बावजूद, चूचक सियाल हीर की शादी खेड़ों (कबीला) से तय करता है। हालांकि, बाद में हीर, साैदा खेड़ा से हुए अपने निकाह को खारिज कर देती है और रांझे के साथ ‘लावां’ (फेरे) की मांग करके इस निकाह को तोड़ देती है।

रांझन ढूँढन मैं चली,
मैनु रांझन मिल्या नाहीं।
रब मिल्या ते रांझन नहीं मिल्या,
रब रांझन वरगा नाहीं..”

(शाह हुसैन के इस काफी में ‘रांझा’ उस आशिक़ का रूप है जिसके वियोग में साधक (हीर) सब कुछ त्याग कर उसे खोजने निकलती है।)

रांझा के सफर के केंद्र में ‘इश्क’ है, जो एक जज्बाती ताकत और बदलाव के सिद्धांत दोनों के रूप में काम करता है। हीर के लिए उसका लंबा समर्पण उसकी पहचान को नए मायने देता है, जिससे वह एक सामंती इंसान से ऊपर उठकर एक रूहानी “आशिक” बन जाता है। यह बदलाव सूफी आदर्शों (अहंकार के मिट जाने या फना होने) से मेल खाता है, जहाँ दुनिया के मोह-माया के रिश्ते आध्यात्मिक ज्ञान का रास्ता बन जाते हैं। इस बगावत की वजह से उसे समाज से बाहर कर दिया जाता है। 

आशिक़ होयों रब दा, 
होई मलामत लाख
ओह् तेनु काफ़िर-काफ़िर आखदे, 
तू आहो-आहो आख..”

(बाबा बुल्ले शाह के लिखे इस कलाम का अर्थ है कि अगर आप ईश्वर के सच्चे प्रेमी बन गए हैं, तो दुनिया की परवाह न करें। यह रूहानी इश्क में दुनियावी आलोचना को नज़रंदाज़ करने का संदेश देता है।)

दिल टूटने के बाद, टिल्ला जोगियां में नाथ संप्रदाय में रांझे का शामिल होना उसका धार्मिक सीमाओं को पार करने में एक बहुत बड़ा मोड़ है। इसी तरह बालनाथ की देखरेख में, वह सिर मुंडवाने, कान छिदवाने और आत्म-साक्षात्कार के लिए योग जैसे कड़े वैराग्य के दौर से गुजरता है। नाथ संप्रदाय में शामिल होने के बाद भी हीर को न छोड़ना, परंपराओं के एक ऐसे अनोखे मिलन को दिखाता है जहाँ वैराग्य और मोहब्बत एक दूसरे के खिलाफ खड़े होने के बजाय साथ-साथ चलते हैं। वारिस शाह के सूफी किस्से में यह मिलन अपने दार्शनिक चरम पर पहुंच जाता है। रांझा का ‘इश्क मिजाजी’ (दुनियावी प्यार) ‘इश्क हकीकी’ (ईश्वरीय प्यार) में बदल जाता है, जहाँ जोगी बालनाथ द्वारा उसके प्यार को स्वीकार करना खुद प्यार को ईश्वर तक पहुंचने का एक जायज रास्ता बना देता है। 

न झंग छुट्टया, ना कान्न पाटे..
झुंड लंघ गया इंज हीरां दा..”

(शिव कुमार बटालवी के कलाम की ये पंक्तियाँ रांझे का बिना जोगी बने ही भीतर से संसार के छूट जाने का बहुत मार्मिक चित्रण है।)

तख्त हजारा के एक अमीर मुस्लिम जट्ट वारिस से लेकर सियाल परिवार के एक चरवाहे और आखिर में एक नाथ जोगी बनने तक का रांझे का सफर 15वीं-16वीं सदी के पंजाबी जमींदारी समाज के बहुलतावादी लोकाचार पर भी रोशनी डालता है। यह एक ऐसी दुनिया थी जिसमें मुस्लिम शादियों में ब्राह्मणों द्वारा की जाने वाली मिली-जुली रस्में और नाथ जोगियों के प्रति सांझा सम्मान मौजूद था, तो दूसरी तरफ वर्ग और सामाजिक ऊंच-नीच को लागू करने वाला सख्त जातीय और पितृसत्तात्मक ढांचा भी काम कर रहा था।

इस माहौल के बीच, रांझा एक ऐसे दिलचस्प किरदार के रूप में उभरता है जिसके जरिए अलग-अलग पहचान के पैरहन को ओढ़ने-उतारने को और गहराई से समझा जा सकता है। इस तरह रांझा एक ऐसी सीमा-लांघने वाली शख्सियत के रूप में सामने आता है जिसका सफर कई परंपराओं, जैसे सामंतशाही, सूफीवाद और नाथपंथ, के मिलन को दिखाता है। इसीलिए ज़रूरी है कि किस्सा-ए-हीर-रांझा को सिर्फ एक रूमानी कहानी के रूप में नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक दस्तावेज के रूप में पढ़ा जाना चाहिए है जो दक्षिण एशियाई इतिहास में जाति, वर्ग और धार्मिक परंपराओं के पेचीदा तानेबाने पर रोशनी डालता है।

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ऐश्वर्या ठाकुर
आर्किटेक्ट और लेखक; वास्तुकला, धरोहर और संस्कृति के विषय पर लिखना-बोलना।
ऐश्वर्या ठाकुर
आर्किटेक्ट और लेखक; वास्तुकला, धरोहर और संस्कृति के विषय पर लिखना-बोलना।
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