Homeमनोरंजनहबीब तनवीर: जिसने थिएटर को महानगरों से निकालकर गांवों तक पहुंचाया

हबीब तनवीर: जिसने थिएटर को महानगरों से निकालकर गांवों तक पहुंचाया

हबीब तनवीर (1 सितंबर 1923-8जून 2009) एक प्रसिद्ध नाटककार, गीतकार, अभिनेता, पटकथा लेखक एंव नाट्य निर्देशक थे। उन्हें हिंदुस्तानी रंगमंच का श्लाका पुरुष भी कहा जाता है। ‘आगरा बाजार’ उनकी चर्चित नाट्य कृतियों में से एक है। इस नाटक का पहली बार मंचन 14 मार्च 1954 को जामिया मिलिया इस्लामिया के कला विभाग के खुले मंच पर किया गया था।

भारतीय रंगमंच की दुनिया में कुछ लोग संस्थान बन जाते हैं। उनके जाने के बाद भी उनकी उपस्थिति बनी रहती है। हबीब तनवीर ऐसे ही विरल रंगकर्मी थे। वे मंच पर सिर्फ नाटक नहीं रचते थे, बल्कि समाज, संस्कृति और मनुष्य की स्मृतियों को जीवित करते थे। उन्होंने उस भारत को रंगमंच पर जगह दी, जो महानगरों की चमक-दमक से दूर गांवों, चौपालों, लोकगीतों और जनजीवन की धूल भरी पगडंडियों में सांस लेता है।

आज, 8 जून को उनकी पुण्यतिथि है। 2009 में इसी दिन उन्होंने भोपाल में अंतिम सांस ली थी। लेकिन हबीब तनवीर का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं था, बल्कि भारतीय रंगमंच के एक ऐसे युग का अवसान था जिसने कला को जनता की आवाज बनाया। उन्होंने भारतीय रंगमंच को यह भरोसा दिया कि लोक कलाकार केवल परंपरा के वाहक नहीं होते, वे अपने समय के सबसे सशक्त कथाकार भी हो सकते हैं।

पिता चाहते थे, हबीब बनें अधिकारी

हबीब तनवीर का जन्म 1 सितंबर 1923 को छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में हुआ था। उनका वास्तविक नाम हबीब अहमद खान था। उनके पिता हाफिज अहमद खान (मूल रूप से पेशावर के रहने वाले) चाहते थे कि वे पढ़-लिखकर एक बड़े सरकारी अधिकारी बनें, लेकिन हबीब का मन बचपन से ही कला, कविता और साहित्य की दुनिया में रमता था।। वे छात्र जीवन से ही शायरी लिखते थे और अपना तखल्लुस ‘तनवीर’ रखते थे। बाद में यही नाम उनकी स्थायी पहचान बन गया।

युवावस्था में उन्होंने पत्रकारिता की, रेडियो में काम किया और साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े रहे। मुंबई पहुंचने के बाद उनका संपर्क इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन (आईपीटीए) से हुआ। यह वह दौर था जब थिएटर केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का माध्यम भी माना जा रहा था। आईपीटीए ने उनके भीतर के कलाकार को नई दिशा दी और उन्हें समझाया कि मंच समाज से संवाद का सबसे प्रभावी माध्यम हो सकता है।

लंदन से लौटकर गांवों की ओर किया रुख

1950 के दशक में हबीब तनवीर रंगमंच की पढ़ाई के लिए लंदन गए। उन्होंने रॉयल एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट और यूरोप की अन्य संस्थाओं में आधुनिक थिएटर की तकनीकों का अध्ययन किया। वहां उन्होंने शेक्सपियर से लेकर बर्टोल्ट ब्रेख्त तक की परंपराओं को समझा, विश्व रंगमंच के नए प्रयोगों को देखा और मंचन की आधुनिक बारीकियां सीखीं।

हबीब तनवीर के पास वह सब कुछ था जो उन्हें पश्चिमी शैली का एक प्रतिष्ठित रंग निर्देशक बना सकता था। लोग उम्मीद भी कर रहे थे कि भारत लौटने के बाद वे पश्चिमी शैली के रंगमंच को आगे बढ़ाएंगे। लेकिन उन्होंने एक बिल्कुल अलग रास्ता चुना। हबीब ने महसूस किया कि भारतीय रंगमंच की असली ताकत विदेशी तकनीकों में नहीं, बल्कि अपनी लोक परंपराओं में छिपी है।

वे रायपुर और छत्तीसगढ़ के गांवों में लौटे, जहां उन्होंने लोकनाट्य शैली ‘नाचा’ को करीब से देखा। वहां के कलाकारों में उन्हें वह सहजता, जीवंतता और अभिनय कौशल दिखाई दिया जो किसी रंगमंच विद्यालय में नहीं सिखाया जा सकता। यहीं से भारतीय रंगमंच में एक सांस्कृतिक क्रांति की शुरुआत हुई।

जब गांव के कलाकार पहुंचे अंतरराष्ट्रीय मंच पर

हबीब तनवीर ने छत्तीसगढ़ के ग्रामीण कलाकारों को अपनी मंडली में शामिल किया। ये कलाकार पेशेवर अभिनेता नहीं थे। वे किसान थे, मजदूर थे, गांवों में रहने वाले साधारण लोग थे। लेकिन उनके भीतर लोक जीवन की गहरी समझ और अभिनय की स्वाभाविक प्रतिभा थी।

1959 में स्थापित उनकी संस्था ‘नया थिएटर’ भारतीय रंगमंच के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुई। यहां लोक कलाकार और आधुनिक रंगमंच एक-दूसरे के पूरक बने। उस दौर में जब हिंदी रंगमंच शहरी मध्यवर्ग की भाषा और संवेदनाओं तक सीमित होता जा रहा था, हबीब तनवीर ने मंच पर लोकभाषाओं, लोकगीतों, लोककथाओं और आम आदमी की दुनिया को जगह दी। उन्होंने दिखाया कि कला की उत्कृष्टता का संबंध भाषा या वर्ग से नहीं, बल्कि संवेदना और अभिव्यक्ति की शक्ति से होता है।

‘आगरा बाजार’ से ‘चरणदास चोर’ तक

हबीब तनवीर के नाटक भारतीय रंगमंच की धरोहर माने जाते हैं। ‘आगरा बाजार’ ने रंगमंच को बाजार, गली और आम जनता के बीच पहुंचा दिया। तनवीर द्वारा 1954 में लिखे और निर्देशित यह नाटक उर्दू के महान शायर नजीर अकबराबादी के जीवन और उनके समय के सामाजिक परिवेश के इर्द-गिर्द बुनी गई थी। इस नाटक के लिए लिए 500 रुपये का सहयोग शुल्क रखा गया था। कई लोगों को लगा कि इतनी कीमत पर दर्शकों का पर्याप्त समर्थन मिलना मुश्किल होगा। लेकिन नतीजे इसके उलट रहे। प्रस्तुति से जुड़े ‘हम थिएटर’ के अनुसार, दोनों शो के लिए 100 से अधिक टिकट बिके, जबकि कुल मिलाकर करीब 300 दर्शक नाटक देखने पहुंचे।

आगार बाजार के बाद ‘मिट्टी की गाड़ी’, ‘पोंगा पंडित’, ‘गांव का नाम ससुराल, मोर नाम दामाद’, ‘जिन लाहौर नइ देख्या’ और कई अन्य नाटकों ने उनकी रचनात्मक क्षमता का परिचय दिया। लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान बना ‘चरणदास चोर’।

एक साधारण चोर की कहानी पर आधारित यह नाटक सत्ता, नैतिकता और सामाजिक पाखंड पर ऐसा व्यंग्य था जिसने दुनिया भर के दर्शकों को प्रभावित किया। इस नाटक ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभूतपूर्व प्रशंसा हासिल की और भारतीय रंगमंच को वैश्विक पहचान दिलाई। आज भी इसे भारतीय थिएटर की सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुतियों में गिना जाता है।

लोक और आधुनिकता के बीच पुल

हबीब तनवीर की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होंने लोक संस्कृति को संग्रहालय की वस्तु नहीं बनने दिया। उनके लिए लोक कला कोई बीती हुई परंपरा नहीं थी, बल्कि वर्तमान समाज की जीवंत अभिव्यक्ति थी।

उनके नाटकों में छत्तीसगढ़ी बोली, लोकगीत और हास्य स्वाभाविक रूप से उपस्थित रहते थे। लेकिन वे केवल लोक रंगों का प्रदर्शन नहीं करते थे। उनके भीतर सामाजिक आलोचना, राजनीतिक चेतना और मानवीय संवेदना की गहरी परतें होती थीं। वे मानते थे कि आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों से कट जाना नहीं है। शायद इसी वजह से उनका रंगमंच एक साथ स्थानीय भी था और वैश्विक भी।

हबीब तनवीर को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप, पद्मश्री और पद्मभूषण जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से सम्मानित किया गया। फ्रांस सरकार ने भी उन्हें अपने महत्वपूर्ण सांस्कृतिक सम्मान से नवाजा। वे राज्यसभा के सदस्य भी रहे।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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