अगस्त का महीना शुरू होते ही देशभक्ति के गीत फिर से गूंजने लगते हैं। स्कूलों की परेड हो, सरकारी समारोह, रेडियो हो या टीवी, स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के अवसर पर कुछ गीत ऐसे हैं, जिनके बिना माहौल अधूरा लगता है। “मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरे मोती…” ऐसा ही एक गीत है। पिछले लगभग छह दशकों से यह गीत हर 15 अगस्त और 26 जनवरी को नई पीढ़ियों को भी उसी उत्साह से देशभक्ति का एहसास कराता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस गीत के शब्द एक ऐसे शख्स ने लिखे थे, जिसने बचपन में देश के विभाजन की त्रासदी अपनी आंखों से देखी थी। उस शख्स का नाम था गुलशन बावरा।
अगस्त का महीना गुलशन बावरा के चाहने वालों के लिए कई मायनों में खास है। इसी महीने देश आजादी का जश्न मनाता है और हर साल स्वतंत्रता दिवस के आसपास उनका लिखा “मेरे देश की धरती सोना उगले…” देशभर में गूंज उठता है। संयोग यह भी है कि उनके फिल्मी सफर की शुरुआत भी अगस्त में ही हुई थी। 23 अगस्त 1958 को संगीतकार कल्याणजी-आनंदजी ने फिल्म चंद्रसेना के लिए गुलशन बावरा का पहला गीत रिकॉर्ड कराया था, जिसे लता मंगेशकर ने अपनी आवाज दी। लेकिन इसी अगस्त में, 7 अगस्त 2009 को यह गीतकार हमेशा के लिए दुनिया को अलविदा कह गया। इस तरह अगस्त उनके जीवन की शुरुआत, उनकी सबसे बड़ी पहचान और उनकी विदाई, तीनों का साक्षी बन गया।
विभाजन का दर्द, जिसने संवेदनशील गीतकार गढ़ा
गुलशन बावरा का जन्म 12 अप्रैल 1937 को लाहौर से करीब 30 किलोमीटर दूर शेखूपुरा (अब पाकिस्तान) में हुआ था। उनका बचपन सामान्य नहीं था। 1947 के विभाजन की हिंसा में उन्होंने अपने माता-पिता को खो दिया। जान बचाने के लिए वे अपने भाई के साथ खेतों में छिपे रहे और बाद में सेना के ट्रक से भारत पहुंचे। उनका पालन-पोषण जयपुर में बड़ी बहन ने किया। बाद में वे दिल्ली आए, दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी की और यहीं कविता लिखने की शुरुआत हुई। शायद यही वजह थी कि उनके गीतों में मिट्टी की खुशबू भी थी, बिछड़ने का दर्द भी और उम्मीद की चमक भी।
फिल्मों में आने का सपना उन्हें मुंबई खींच लाया। 1955 में रेलवे में क्लर्क की नौकरी मिल गई। दिन दफ्तर में गुजरता और शाम स्टूडियो के चक्कर लगाते हुए। संघर्ष के उन्हीं दिनों में वे एक छोटे से कमरे में एक और युवा लेखक के साथ रहते थे। वह युवक आगे चलकर हिंदी साहित्य और सिनेमा का बड़ा नाम बना, जिसे दुनिया गुलजार के नाम से जानती है। गुलजार ने ही गुलशन को रविन्द्र देव से मिलवाया। देव ने उनके एक-दो गीत सुने और कल्याणजी-आनंदजी के पास भेज दिया। उन्होंने गुलशन से गीत सुने और फिर ‘चंद्रसेना’ में एक गीत लिखने को दे दिया। सिचुएशन दे दी गई। गुलशन ने जो गीत लिखा वह था- ‘मैं क्या जानूं काहे यह सावन मतवाला है।’ लता मंगेशकर की आवाज में रिकॉर्ड यह गीत उस वक्त खूब चला।
ऐसे बने गुलशन मेहता से गुलशन बावरा
चंद्रसेना के इस गीत के पसंद किए जाने के बाद आनंद-कल्याण ने गुलशन को ‘सट्टा बाजार’ फिल्म में फिर से मौका दिया। यहां यह जिक्र कर देना जरूरी होगा कि इसी फिल्म के दौरान ही गुलशन को उनके उपनाम ‘बावरा’ से दुनिया जानने लगी। गौरतलब है कि उनका असली नाम गुलशन कुमार मेहता था। दरअसल गुलशन चटक रंग के कपड़े पहनना पसंद करते थे और बाल भी उनके बिखरे से रहते थे।
1959 में जब ‘सट्टा बाजार’ बन रही थी, फिल्म के डिस्ट्रीब्यूटर शांतिभाई पटेल की नजर उन पर पड़ी। रंग-बिरंगी शर्ट, बिखरे बाल और बेफिक्र अंदाज देखकर उनके मुंह से निकला, “अरे, यह तो बिल्कुल बावरा लगता है।” यह बात मजाक में कही गई थी, लेकिन गुलशन के साथ यह नाम हमेशा के लिए चिपक गया। यहीं से गुलशन कुमार मेहता, ‘गुलशन बावरा’ बन गए।
सट्टा बाजार में गुलशन बावरा के कुल तीन गाने थे- (1) ‘तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थे’ (2) चांदी के चंद टुकड़ों के लिए’ (3) ‘आंकड़े का धंधा, कभी तेजी कभी मंदा’। “तुम्हें याद होगा कभी हम मिले थे” हेमंत कुमार और लता मंगेशकर की आवाज में आया और लोगों के दिलों में उतर गया। बावरा के अलावा बाकी के गीत हसरत जयपुरी और शैलेंद्र ने लिखे थे। दोनों ही उस वक्त के स्टार गीतकार थे। लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह थी कि फिल्म के प्रचार बैनरों पर ‘म्यूजिक: कल्याण-आनंदजी के साथ गीतकार के रूप में सिर्फ ‘लिरिक्स: गुलशन बावरा’ ही लिखा गया था। बाद में गुलशन बावरा खुद हैरानी से कहा करते थे, “शैलेंद्र और हसरत जयपुरी जैसे बड़े गीतकार फिल्म में थे, लेकिन बैनर पर उनका नहीं, सिर्फ मेरा नाम था।” इन गीतों ने गुलशन की किस्मत के द्वार खोल दिए। यहां से वह मुड़कर पीछे नहीं देखे। उन्होंने तो एन.दत्ता, रवि, हंसराज बहल, उषा खन्ना आदि के साथ भी गीत लिखने का अवसर मिलता चल गया।’ सट्टा बाजार में बावरा ने एक छोटा सा रोल भी निभाया था।
कहा जाता है कि मनोज कुमार ने एक बार गुलशन बावरा को किसी यात्रा के दौरान कुछ पंक्तियां गुनगुनाते सुना था। वर्षों बाद उपकार बनाते समय उन्होंने उसी भाव पर गीत लिखने का आग्रह किया। यह महज एक फिल्मी गीत नहीं बन पाया। स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के हर समारोह में यह गीत आज भी पूरे सम्मान के साथ बजता है। स्कूलों के बच्चों से लेकर सेना के बैंड तक, इसकी गूंज हर साल सुनाई देती है। शायद इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इसे लिखने वाले गीतकार ने देश को सिर्फ नक्शे पर नहीं, बल्कि बिछड़ते हुए भी देखा था।इस गीत के लिए गुलशन बावरा को 1968 में पहला फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।
जब अपने गीत को पर्दे पर भी जिया
गुलशन बावरा ना सिर्फ गीतकार थे बल्कि वह गीतों में छोटे-मोटे अभिनय भी किया करते थे। जंजीर, उपकार, पवित्र पापी सहित कई फिल्मों में छोटे-छोटे किरदार निभाए। दरअसल निर्माता-निर्देशक रविन्द्र देव ने बावरा को काम ही इस शर्त पर दी थी कि वह उनके लिए एक्टिंग भी करेंगे। 1972 में जंजीर के गीत “दीवाने हैं दीवानों को…” की रिकॉर्डिंग चल रही थी। रमजान का महीना था और मोहम्मद रफी रोजे में थे। कई टेक के बाद रिकॉर्डिंग पूरी हो चुकी थी, लेकिन लता मंगेशकर एक और टेक चाहती थीं।
थके हुए रफी साहब दोबारा गाने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने कहा कि जब टेक ओके हो चुका है तो फिर क्या गाना। वह अपनी गाड़ी में जाकर बैठ गए। गुलशन बावरा दौड़ते हुए उनके पास पहुंचे और रफी से कहा, “रफी साहब, आपको पता है स्क्रीन पर यह गीत कौन गा रहा है?” रफी ने कहा, क्या दिलीप कुमार गा रहा है।” गुलशन बावरा ने कहा, नहीं, स्क्रीन पर आपका खादम गाने वाला है। रफी चौंकते हुए बोले- स्क्रीन पर तू गाना गाने वाला है। तो पहले क्यों नहीं बताया। रफी तुरंत स्टूडियों के अंदर गए और सारे म्यूजिशियन को बुलाया और गाने को फिर से गाया। फिल्म में हारमोनियम बजाते हुए जो कलाकार दिखाई देता है, वह कोई अभिनेता नहीं, बल्कि खुद गीतकार गुलशन बावरा थे।
जंजीर का ही दूसरा गीत “यारी है ईमान मेरा, यार मेरी जिंदगी” दोस्ती पर लिखे हिंदी सिनेमा के सबसे बेहतरीन गीतों में गिना जाता है। इसके लिए उन्हें 1974 में दूसरा फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। आज भी दोस्ती की मिसाल देनी हो तो यह गीत सबसे पहले याद आता है। 1975 के बाद गुलशन बावरा और आरडी बर्मन की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को कई यादगार गीत दिए। खेल खेल में, कसमे वादे, अगर तुम न होते, सत्ते पे सत्ता और सनम तेरी कसम जैसी फिल्मों में दोनों ने साथ काम किया।
कम लिखा, लेकिन ऐसा लिखा कि हमेशा याद रहे
गुलशन बावरा अपने समकालीन गीतकारों (जैसे आनंद बक्शी या मजरूह सुल्तानपुरी) की तुलना में बहुत ज़्यादा लिखने वाले गीतकार नहीं थे। उन्होंने अपने चार दशकों के करियर में केवल लगभग 250 से 300 गाने ही लिखे। लेकिन उनका रिकॉर्ड यह रहा कि उनका हर दूसरा गाना चार्टबस्टर या अमर नगमा साबित हुआ। 1967 में आई उपकार के लिए लिखा गया “मेरे देश की धरती सोना उगले…” हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय देशभक्ति गीतों में गिना जाता है। समय बदला, पीढ़ियां बदलीं, लेकिन यह गीत आज भी अपनी चमक बनाए हुए है।
“प्यार हमें किस मोड़ पे ले आया” आज भी युवाओं के बीच उतना ही लोकप्रिय है, जितना रिलीज के समय था। कम लोग जानते हैं कि इस गीत में सुनाई देने वाली आवाजों में एक आवाज खुद गुलशन बावरा की भी है। गुलशन बावरा ने कभी कठिन शब्दों के सहारे बड़े गीत लिखने की कोशिश नहीं की। उन्होंने वही भाषा चुनी, जो लोग रोज बोलते थे। शायद यही वजह है कि उनके गीत फिल्मों से निकलकर लोगों की यादों का हिस्सा बन गए।
80 के दशक में फिल्म संगीत का दौर बदलने लगा। डिस्को का प्रभाव बढ़ा और गीतों की शैली भी बदल गई। इस बदलते दौर में उनका मन धीरे-धीरे फिल्मी गीतों से दूर होता गया। 7 अगस्त 2009 को मुंबई के पाली हिल स्थित अपने घर में हृदय गति रुकने से उनका निधन हो गया।





