Friday, March 20, 2026
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टैक्सपेयर होने के बाद भी उन्हें तवायफ क्यों कहा गया?

भारतीय संगीत के इतिहास में कुछ स्वर ऐसे हैं जिन्हें मंच तो मिला, पर मान नहीं; शोहरत तो मिली, पर सम्मान नहीं। कोठों से उठी जिन आवाज़ों ने शास्त्रीय और उपशास्त्रीय संगीत की नींव रखी, जिनके सुरों पर ग्रामोफोन का पहला चक्र घूमा और जिनकी कमाई देश के ख़ज़ाने तक पहुँची, उन्हीं विदुषी स्त्रियों को इतिहास ने एक शब्द में समेट दिया: तवायफ़। सवाल यह नहीं कि वे कौन थीं, सवाल यह है कि वे होते हुए भी क्यों नहीं मानी गईं।

नयी दिल्ली: अट्ठारहवीं सदी के मध्य में कोठे पर गानेवाली तवायफे देश की बड़ी टैक्सपेयर थीं। देश के निर्माण में उनक़ा भी योगदान था। देशप्रेम के जज्बे से वे भी लबरेज थी,समाज सेवा भी करती थीं। तहज़ीब और तमद्दुन की वाहक थी। कविता और शायरी भी करती थी।ठुमरी दादरा भी गाती थीं फिर उन्हें तवायफ़ क्यों कहा गया?

कोठे से शुरू हुई तवायफ़ों की गायिकी के 104 वर्ष के इतिहास को जब गत दिनों दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल में नृत्य नाटिका के जरिये पेश किया गया तो बनारस घराने की गायिका एवम सविता देवी की शिष्या ने यह सवाल उठाया।

समारोह में इन तवायफ़ों और अन्य महिला गायकों के अवदान पर भी चर्चा हुई।

ये गायिकाएं बड़े गुलाम अली खान अमीर खान और पंडित ओंकार नाथ ठाकुर से पहले की थीं। इन्होंने ही अपनी गायिकी से शास्त्रीय और उप शास्त्रीय गायिकी की मजबूत नींव रखीं पर इतिहास में उन्हें वह जगह नहीं मिली बल्कि आल इंडिया रेडियो पर उनके गाने पर रोक लगा दी गयी। बाद में यह प्रतिबंध हटा।

युवा नर्तकी सोमा बनर्जी ने इस नृत्य नाटिका में तवायफ़ गायिकाओं के इस इतिहास में उनक़ा दर्द संघर्ष बुलंदी शोहरत गुरबत देशभक्ति ,सामाज सेवा और मानवता तथा करुणा को भी दिखाया।

इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के सी डी देशमुख हाल में आयोजित इस समारोह में किवदंती बन चुकी गायिका गौहर जान से लेकर गरीबी और तंगहाली झेलनेवाली असगरी बाई तक 33 भूली बिसरी तवायफ़ गायिकाओं को मंच पर एक बार फिर से नृत्य संगीत के जरिये साकार किया गया।

सोमा बनर्जी के नेतृत्व में 30 से अधिक कलाकारों ने इस ऐतिहासिक यात्रा को स्वर और दृश्य में मंच पर पेश किया गया।

1902 में गौहर जान की पहली ग्रामोफोन रिकार्डिंग से लेकर जानकी बाई, बिब्बो, रसूलन बाई, तमंचा जान, रतन बाई, छमिया बाई, दिलीपा बाई, विद्याधरी, हुस्ना जान, ढेला बाई, अख्तरी बाई को इस नृत्य नाटिका में दिखाया गया। गौरतलब है कि जब जर्मनी से गैसबर्ग कोलकत्ता आया तो पहले उसने शोशिबला और फणी बाला नामक दो लड़कियों के गाने को रिकार्ड किया पर वह उसे पसंद नहीं आया तब गौहर जान का गाना रिकार्ड हुआ और वह भारत की पहली ग्रामोफोन गर्ल बनी।

इस अवसर पर प्रख्यात कवि संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी ने संगीत में स्त्री सशक्तीकरण पर प्रथम रामेश्वरी नेहरू स्मृति लेक्चर दिया

रामेश्वरी नेहरू की 140वीं जयंती की पूर्व संध्या और प्रख्यात कवि पत्रकार रघुवीर सहाय की 96 वीं जयंती के मौके पर आयोजित इस समारोह में श्री वाजपेयी ने कहा कि संगीत की दुनिया में स्त्रियों को अपनी पहचान बनाने के लिए बड़ा स़घर्ष करना बड़ा क्योंकि उनपर तत्कालीन पितृसत्तात्मक समाज की बहुत बंदिशें थी। वे कोठे से लेकर रईसों- राजे रजवाड़े के निजी महफिलों में गाती रहीं।

गौरतलब है कि स्त्री दर्पण ड्रीम फाउंडेशन और द परफोर्मिंग आर्ट ट्राइब्स द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित इस समारोह में बनारस घराने की गायिका मीनाक्षी प्रसाद ने कहा कि उन्नीसवीं सदी के मध्य में ये तवायफ़ गायिकाएं देश की सबसे बड़ी टैक्स पेअर थी। इतना ही नहीं आज़ादी की लड़ाई में भी भाग लिया और गांधी जी ने भी उनसे मदद ली थी।

समारोह में 33 भूली बिसरी तवायफ़ गायिकाओं पर कविताओं की पहली किताब तवायफनामा पर आधारित इन शास्त्रीय गायिकाओं के जीवन इतिहास, उनके संघर्ष और बुलन्दियों शोहरत को नृत्य नाटिका के जरिये रंगारंग कार्यक्रम द्वारा पेश किया गया। साथ ही तीन पुस्तकों और स्त्री लेखा के नए अंक का लोकार्पण भी किया गया।

श्री वाजपेयी ने प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक संगीत में स्त्रियों की भागीदारी का जिक्र करते हुए कहा कि ज्ञान की देवी माँ सरस्वती के हाथों में वीणा है। यह इस बात का प्रमाण है कि स्त्रियां आदिकाल से संगीत से जुड़ी हुई थीं लेकिन उनपर पुरुषों द्वारा कुछ बंदिशें भी लगी थीं पर उन्होंने उसे तोड़कर खुद को भी सशक्त किया और संगीत-नृत्य में लालित्य, सौंदर्य और कोमलता का प्रवेश हुआ। कालांतर में उन्होंने पुरुष कलाकारों को पीछे छोड़ दिया तथा कथक में तो पुरुषों को अपदस्थ भी कर दिया। पहले तो पुरुष ही कथक करते थे लेकिन जब स्त्रियाँ आईं तो यह उनक़ा नृत्य बन गया।

उन्होंने घर-परिवार, शादी ब्याह और लोक-अनुष्ठानों से लेकर फिल्मों में स्त्रियों की भागीदारी का जिक्र करते हुए कहा कि बीसवीं सदी में लता से बड़ा कोई गायक नहीं हुआ। वे तो सांस्कृतिक अस्मिता की प्रतीक बन गईं लेकिन स्त्रियों को इस मुकाम पर पहुंचने के लिए पुरुषों की तुलना में अधिक संघर्ष करना पड़ा।

सविता देवी की शिष्या मीनाक्षी प्रसाद ने इन गायिकाओं को तवायफ़ कहे जाने पर आपत्ति की। उन्होंने कहा कि ये कोठे पर जरूर गाती थीं पर विदुषी महिलाएं थीं। ये तहजीब की मालकिन थी। ये भारतीय संस्कृति की नायिकाएं थी। पुरुषों ने इन्हें बदनाम करने के लिए इन्हें तवायफ़ कहा।

उन्होंने आज़ादी की लड़ाई में गांधी जी को तवायफ़ों से मिली मदद का जिक्र करते हुए कहा कि इन तवायफ़ों का त्याग-बलिदान सब गुमनामी के अंधेरे में चला गया।

1920 में जब गांधी जी कोलकत्ता गए तो उन्होंने स्वराज फण्ड के लिए गाने का एक समारोह आयोजित करने का अनुरोध किया। गौहर इस शर्त पर राजी हुई कि गांधी जी को आना होगा लेकिन वे व्यस्त होने के कारण नहीं आ सके। उस समारोह में 24 हज़ार के टिकट बिके जो आज के हिसाब से करोड़ो रूपये हुए। गौहर ने गांधी जी को वचन तोड़ने के आरोप में उनके दूत को 12 हज़ार रुपए ही दिए। गौहर इतनी संपन्न थी और अंग्रेजों की विरोधी कि उसने वायसराय की फिटिन की तरह अपनी फिटिन सड़कों पर निकाली जबकि यह बैन था। इसके लिए उसने हजारों रुपए जुर्माना भी दिया।

हुस्ना जान ने भी बनारस में गांधी जी के लिए सभा आयोजित की थी और उसमें बीस हज़ार लोगों की भीड़ थी। तब गांधी जी उतने मशहूर नहीं थे। हुस्ना जान ने एक तवायफ़ संघ भी बनाया था।

स्त्री दर्पण से जुड़ी युवा नृत्यांगना और उनकी टीम ने जब नृत्य नाटक पेश किया तो शुरुआत में दो युवा नृत्यांगनाओं ने चपल गति और आंगिक मुद्राओं और भाव भंगिमा से चमत्कृत कर दिया। इससे पहले टीम की एक सदस्या ने इन तवायफ़ गायिकाओं के इतिहास को बताया कि जब 1857 के विद्रोह में इन तवायफ़ों ने भाग लिया तो अंग्रेजों ने एक कानून बनाकर इन्हें तवायफ़ करार दिया और उन पर बंदिशें लगाई।

नृत्य नाटिका में गौहर जान, छप्पन छुरी, बिब्बो, सायरा बानो की नानी छमिया बाई नूतन की नानी रतन बाई और नरगिस की नानी दिलीपा बाई तथा बिहार की ढेला बाई एवम अख्तरी बाई को भी दिखाया गया।

अंत में नृत्य मंडली की 30 नृत्यांगनाओं ने आसमान में उड़ती परियों की तरह इन गायिकाओं की उड़ान मुक्ति आज़ादी को पेश कर अद्भुत दृश्य रच दिया। पहली बार इतनी बड़ी संख्या में इन तवायफ़ गायिकाओं के इतिहास को मंच पर एक साथ पेश किया गया।

यह नृत्य नाटिका मंजरी चतुर्वेदी की प्रस्तुति से अलग थी।इसमें एक तरह से पूरा इतिहास प्रस्तुत था और किरदार बहुत थे। सोमा बनर्जी ने कुछ सालों से कई नाट्य प्रस्तुतियां की हैं।

समारोह में प्रसिद्ध स्वाधीनता सेनानी जे पी के सहयोगी एवम प्रसिद्ध नाटककार नाट्य आलोचक रंगकर्मी बीरेंद्र नारायण की पुस्तक Hindi theatre and stage का भी लोकार्पण हुआ।

डॉक्टर नागेंद्र ने बीरेंद्र जी से यह किताब 40 साल पहले लिखवाई। तब तक अंग्रेजी में हिंदी रंगमचं पर कोई किताब नहीं थी।

अनुराधा ओस द्वारा 60 साल से अधिक आयु की 14 हिंदी कवयित्रियों की कविताओं की संपादित पुस्तक “खिलूंगी यहीं कहीं” का भी लोकार्पण हुआ। भूमिका शुभा ने लिखी है। इसमें तेजी ग्रोवर से लेकर प्रगति सक्सेना तक 14 कवयित्रियों की कविताएँ हैं।

साथ ही संजू शब्दिता द्वारा हिंदी की दस महिला ग़ज़लकारों की पुस्तक बज़्मे शायरात का भी लोकार्पण हुआ। यह पहला अवसर है कि दस हिंदी महिला ग़ज़लकारों की किताब निकली है।अशोक वाजपेयी मीनाक्षी प्रसाद और विजय नारायण ने इन किताबों का लोकार्पण किया।

समारोह में स्त्री लेखा के नए अंक का भी लोकार्पण किया गया।संचालन सुधा तिवारी ने किया। स्त्री लेखा का यह अंक 21 वीं सदी के स्त्रीलेखन पर केंद्रित है।

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पूर्व निदेशक कीर्ति जैन ने कलाकारों को साइटेशन प्रदान किया।

समारोह में जवाहर लाल नेहरू विश्विद्यालय में स्त्री अध्यन विभाग में प्रोफेसर लता सिंह, भाषाविद अन्विता अब्बी मंजरी चतुर्वेदी,वायर के आशुतोष भारद्वाज दिल्ली विश्विद्यालय के पूर्व प्रोफ़ेसर गोपेश्वर सिंह, किरोड़ीमल कालेज की पूर्व प्राचार्य विभा सिंह चौहान, नवीन जाफ़ा आदि मौजूद थे।

विमल कुमार
विमल कुमार
वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक
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