Friday, March 20, 2026
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दृश्यमः फिल्मों के आईने में ‘इच्छामृत्यु’ का प्रश्न

इच्छामृत्यु या यूथेनेशिया आज दुनिया के सबसे जटिल नैतिक और कानूनी प्रश्नों में से एक है। असाध्य बीमारी, असहनीय पीड़ा और जीवन की गरिमा जैसे सवालों ने इसे चिकित्सा, कानून और दर्शन तीनों के केंद्र में ला खड़ा किया है। चंद रोज पहले आये हरीश राणा के परिवार के हक में आये पैसिव युथेनेशिया के फैसले ने इस विवाद को और गहरा कर दिया है। नीदरलैंड्स, बेल्जियम और कनाडा जैसे देशों में इसके कुछ रूपों को कानूनी मान्यता मिल चुकी है, जबकि भारत में 2018 से सीमित परिस्थितियों में निष्क्रिय इच्छामृत्यु स्वीकार की गई। इस विषय ने साहित्य और सिनेमा को भी गहराई से प्रभावित किया है—’Me Before You’, ‘The Sea Inside’, ‘Million Dollar Baby, ‘Mar Adentro, ‘The Barbarian Invasions’ और भारत में ‘सलाम वेंकी’ जैसी फिल्मों में जीवन, पीड़ा और मृत्यु के अधिकार पर मार्मिक प्रश्न उठाए गए हैं। प्रस्तुत लेख इन्हीं सवालों के बीच इच्छामृत्यु के नैतिक, सांस्कृतिक और व्यक्तिगत आयामों पर विचार करता है।

मृत्यु जीवन का अंतिम सत्य है, लेकिन कैसी मृत्यु? यह प्रश्न हमेशा से मनुष्य को परेशान करता रहा है। जब जीवन असाध्य बीमारी, असहनीय दर्द और निर्भरता की लंबी यातना में बदल जाता है, तब क्या व्यक्ति को अपनी मृत्यु चुनने का अधिकार होना चाहिए? यही सवाल इच्छामृत्यु (यूथेनेशिया) की बहस को जन्म देता है।

दुनिया के कई देशों में इच्छामृत्यु कानूनी, नैतिक और मानवीय विमर्श का केंद्र बन चुका है, जबकि भारत में यह अभी भी संकोच और नैतिक दुविधाओं के बीच खड़ा है। दिलचस्प यह है कि इस जटिल प्रश्न को सिनेमा ने कई बार बेहद संवेदनशीलता से उठाया है—चाहे वह “Me Before You” हो, “The Sea Inside”, “Million Dollar Baby” या भारतीय फिल्म “सलाम वेंकी”। इन फिल्मों के आईने में इच्छामृत्यु का सवाल केवल कानून या चिकित्सा का मुद्दा नहीं रह जाता, बल्कि करुणा, प्रेम, पीड़ा और मानवीय गरिमा का गहरा नैतिक प्रश्न बन जाता है।

यूथेनेशिया (इच्छामृत्यु) अर्थात् “अच्छी मृत्यु”। यह दो ग्रीक शब्दों का युग्म है—eu और thanatos। Eu का अर्थ है अच्छा और thanatos का अर्थ है मृत्यु।

जब कोई व्यक्ति ऐसी बीमारी से पीड़ित हो जिसे ठीक नहीं किया जा सकता और वह असहनीय दर्द में जीवन जी रहा हो, तब उसकी इच्छा से, विशेष परिस्थितियों में डॉक्टरों द्वारा उसकी मृत्यु को सहज और पीड़ारहित बनाने की प्रक्रिया को यूथेनेशिया कहा जाता है।

कई यूरोपीय देशों में यह प्रचलित है, हालांकि अलग-अलग देशों में इसके अलग-अलग कानून हैं। सर्वप्रथम यूथेनेशिया को नीदरलैंड्स में वैधता मिली थी। वहाँ इसे कानूनी भाषा में यूथेनेशिया नहीं बल्कि “सहायक आत्महत्या और अनुरोध पर जीवन की समाप्ति” कहा जाता है।

यहाँ एक बात कहना बहुत ज़रूरी है कि वॉलंटरी यूथेनेशिया में मृत्यु चाहने वाले की सहमति अनिवार्य होती है। यूरोप में यूथेनेशिया की प्रक्रिया में इच्छुक व्यक्ति की स्पष्ट स्वीकृति आवश्यक है; उसकी सहमति के बिना किसी गुहार को स्वीकार नहीं किया जाता। इसमें रोगी स्वयं इच्छामृत्यु की अनुमति देता है।

इसके विपरीत नॉन-वोलंटरी यूथेनेशिया में परिवार या कानूनी निर्णय के आधार पर व्यक्ति को जीवन से मुक्त किया जाता है।

यूथेनेशिया के भी कई प्रकार हैं। एक्टिव यूथेनेशिया अर्थात सक्रिय इच्छामृत्यु—नीदरलैंड्स, बेल्जियम, कनाडा और स्विट्ज़रलैंड में वैध है, किंतु अधिकांश देशों में यह अब भी एक विवादास्पद विषय है। एक्टिव यूथेनेशिया में डॉक्टर की उपस्थिति में दवा या इंजेक्शन देकर रोगी को पीड़ा से मुक्त किया जाता है। इस विषय पर एक बेहद खूबसूरत फ़िल्म है “Me Before You.”

इसका मुख्य पात्र विल ट्रेनर, एक बेहद ज़िंदादिल और सफल बैंकर, जो एक दुर्घटना के कारण टेट्राप्लेजिया का शिकार होकर व्हीलचेयर पर आ जाता है। उसकी केयरटेकर लू एक दिन चुपके से सुन लेती है कि छह महीनों बाद वह स्विट्ज़रलैंड जाकर सहायक मृत्यु (assisted suicide) का विकल्प चुनने वाला है। लू उसे बचाने और समझाने की बहुत कोशिशें करती है लेकिन उसकी तमाम कोशिशों के बावजूद विल का निर्णय नहीं बदलता। वह कहता है- ‘तुम्हें अपनी ज़िंदगी पूरी तरह जीने का हक है, न कि मेरी सेवा करते हुए आधी-अधूरी ज़िंदगी बिताने का।’ इस फ़िल्म में विल और उसके माता-पिता के बीच होने वाली बातचीत दर्शक को भीतर तक हिला देती है। प्रियजनों के लिए इच्छामृत्यु का निर्णय कितना पीड़ादायक होता है, यह यहाँ गहराई से महसूस होता है।

दूसरा प्रकार है पैसिव यूथेनेशिया, अर्थात निष्क्रिय इच्छामृत्यु। इसमें रोगी का इलाज बंद कर दिया जाता है और जीवनरक्षक उपकरण हटा लिए जाते हैं। कई बार यह प्रक्रिया अमानवीय भी लग सकती है, क्योंकि रोगी को धीरे-धीरे मृत्यु की ओर बढ़ने दिया जाता है।

भारत में अरुणा शानबाग केस के बाद कुछ शर्तों के साथ 2018 में पैसिव यूथेनेशिया को कानूनी मान्यता मिली।

भारत में जैन धर्म में संथारा या सल्लेखना की परंपरा भी है। इसे धार्मिक साधना माना गया है, हालांकि जैन परंपरा इसे इच्छामृत्यु नहीं मानती। असाध्य रोग, बुढ़ापे या मृत्यु के निकट होने पर व्यक्ति धीरे-धीरे अन्न-जल का त्याग कर पूर्ण जागरूकता और समभाव के साथ अपने प्राणों का उत्सर्ग करता है। इसे आत्महत्या से भिन्न माना गया है।

पिछले वर्ष इंदौर में ब्रेन ट्यूमर से पीड़ित तीन वर्ष की एक बच्ची को संथारा दिलाए जाने की घटना पर सोशल मीडिया में कड़ी आलोचना हुई। बहुतों ने इसे अमानवीय भी बताया।

बनारस (काशी) में मृत्यु की प्रतीक्षा करने की परंपरा भी मोक्ष की गहरी आध्यात्मिक आस्था से जुड़ी है। हिंदू मान्यता है कि जो व्यक्ति अपने अंतिम समय में काशी में प्राण त्यागता है वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है। इसी कारण कई लोग अपने जीवन के अंतिम दिनों में मुक्ति भवन या मुमुक्षु भवन जैसे आश्रमों में आकर ठहरते हैं और शांतिपूर्वक मृत्यु की प्रतीक्षा करते हैं।

तमिलनाडु में कभी तलईकुत्तल नामक एक पारंपरिक प्रथा भी प्रचलित थी, जिसे अब हत्या का एक रूप माना जाता है। इस प्रथा में बुजुर्गों को परिवार का बोझ समझकर पारंपरिक तरीकों से मार दिया जाता था। जैसे उन्ह़े ठंडे पानी से नहलाना, किरोसिन पिलाना या नाक बंद कर दूध पिलाना। इसे अब अवैध घोषित किया जा चुका है, हालांकि कहीं-कहीं यह चोरी-छिपे अब भी जारी है। यह मृत्यु किसी भी अर्थ में मानवीय या सम्मानजनक नहीं कही जा सकती।

यूथेनेशिया को ‘सम्मानजनक मृत्यु’ कहा जाता है और इस शब्द में ही उसका अर्थ छिपा है। ग़रीबी, भूख या उपेक्षा से मिली मृत्यु पूरे समाज के लिए शर्मिंदगी का विषय है।

किसी का अचानक चले जाना उतना पीड़ादायक नहीं लगता, जितना किसी को असहनीय दर्द में धीरे-धीरे मरते देखना। मुझे हमेशा लगता है कि यदि मृत्यु बिना बताए आए, शांतिपूर्ण और पीड़ामुक्त, तो वह भी किसी माँ की गोद जैसी कोमल और स्वर्गीय हो सकती है।

‘Illegal’ वेब-सीरीज़ के एक एपिसोड में एक बीमार युवा यूथेनेशिया की मांग करता है, लेकिन न अस्पताल उसकी मांग मानता है न अदालत। अंततः उसकी माँ ही उसका ऑक्सीजन सपोर्ट बंद कर उसे मुक्त कर देती है। ऐसा करते समय उस माँ पर क्या गुज़री होगी, यह सोचकर ही कलेजा काँप जाता है।

इसी विषय पर बनी “सलाम वेंकी” फ़िल्म में भी अदालत इच्छामृत्यु की अनुमति नहीं देता। हमारे समाज में नैतिकता का बोझ इतना भारी है कि हम कई बार वास्तविक पीड़ा को देखने से बचते रहते हैं। ‘ ऐश्वर्या और ऋतिक की फिल्म ‘ गुजारिश’ का सम्बंध भी कहीं-न-कहीं इच्छामृत्यु से है।

इसी विषय पर बनी 2004 की स्पैनिश फ़िल्म :The Sea Inside’ अत्यंत मार्मिक है। इसका मुख्य पात्र रामोन सांपेद्रो अपने इच्छामृत्यु के अधिकार के लिए 28 वर्षों तक संघर्ष करता है।

मैं यूथेनेशिया, यानी इच्छामृत्यु या “गुड डेथ”, का सम्पूर्ण समर्थन करती हूँ। पश्चिमी समाज में इसे सम्मानजनक मृत्यु भी कहा जाता है।

मुझे याद है, माँ अपने अंतिम दिनों में दर्द से कराहती थीं।कभी कहतीं ‘इंजेक्शन मत दो, मुझे मर जाने दो; और कभी असहनीय पीड़ा में कहतीं जल्दी इंजेक्शन दो। वे मौत से नहीं डरती थीं, वे दर्द से मुक्ति चाहती थीं।
हम ईश्वर से उनकी मृत्यु की प्रार्थना करते थे। उनकी मुक्ति की।दस साल बाद बड़े पापा को भी उसी अवस्था में देखा। वे गिड़गिड़ाते थे-‘मुझे ज़हर का इंजेक्शन दे दो, मैं अब और नहीं जीना चाहता।’उनकी मृत्यु पर मेरी आँखों से आँसू नहीं गिरे। मुझे लगा वे कैंसर जैसे राक्षस के चंगुल से मुक्त हो गए।
हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय देते हुए गरिमा के साथ मरने को मौलिक अधिकार माना है और गाजियाबाद के 32 वर्षीय हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी गई। हरीश साल 2013 में एक पीजी की चौथी मंजिल से गिरने के बाद से पिछले 11 वर्षों से ‘परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट’ (PVS) में है।हरीश चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के इंजीनियरिंग टॉपर थे, जिसकी पूरी जिंदगी एक हादसे ने तबाह कर दी। पिछले एक दशक से बिस्तर पर पड़े बेटे की असहनीय पीड़ा और परिवार की लाचारी को देखते हुए माता-पिता ने शीर्ष अदालत से उसे इस दर्दनाक जीवन से मुक्ति दिलाने की गुहार लगाई थी। पिता का कहना था कि बेटे के ठीक होने की अब कोई उम्मीद नहीं बची है और वे उसे इस हाल में और नहीं देख सकते।

लेकिन दुखद यह है कि भारत में हर कानून का दुरुपयोग होने का खतरा रहता है। संथारा और तलईकुत्तल जैसी परंपराओं का पतन हमने देखा है।मुझे लगता है कि हम अभी इतने परिपक्व नहीं हुए हैं कि ऐसे संवेदनशील कानूनों का पूरी जिम्मेदारी के साथ पालन कर सकें।

और सच कहें तो इच्छामृत्यु पर बनी फिल्में भी दरअसल मृत्यु के पक्ष या विपक्ष में कोई अंतिम फैसला नहीं सुनातीं; वे केवल मनुष्य की असहायता, करुणा और गरिमा के बीच चल रहे उस मौन संघर्ष को सामने रखती हैं जिसे समाज अक्सर देखने से बचता है। Me Before You में विल का निर्णय प्रेम के बावजूद अपनी स्वतंत्रता और आत्मसम्मान को बचाए रखने की जिद जैसा लगता है, जबकि The Sea Inside का रामोन वर्षों तक अपने अधिकार के लिए लड़ते हुए इस प्रश्न को एक गहरे दार्शनिक और मानवीय स्तर पर ले जाता है। Million Dollar Baby में यह निर्णय करुणा की उस सीमा तक पहुँच जाता है जहाँ प्रेम ही मुक्ति का रूप ले लेता है, और सलाम वेंकी जैसी भारतीय कथा में कानून, नैतिकता और माँ-बेटे के संबंधों के बीच यह सवाल और भी उलझ जाता है। इन फिल्मों को साथ रखकर देखें तो स्पष्ट होता है कि इच्छामृत्यु केवल मृत्यु की इच्छा का प्रश्न नहीं है; यह जीवन की गरिमा, पीड़ा की सीमा और प्रेम की अंतिम परीक्षा का प्रश्न है। शायद इसीलिए इन कथाओं के अंत में कोई ठोस निष्कर्ष नहीं मिलता। केवल एक गहरी चुप्पी बची रह जाती है, जो हमें अपने भीतर झाँकने के लिए मजबूर करती है कि सचमुच अधिक मानवीय क्या है: हर हाल में जीवन को खींचते रहना, या किसी प्रिय को उसकी असहनीय पीड़ा से मुक्त कर देना?

प्रियंका ओम
प्रियंका ओम
प्रियंका कथाकार हैं, तंजानिया में रहती हैं।
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