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यूरोप की हीटवेव भारत के लिए क्यों है चेतावनी? WHO के आंकड़े दर्शाते हैं चिंताजनक स्थिति

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) लू लगने को एक गंभीर चिकित्सा आपातकाल (मेडिकल इमरजेंसी) मानता है। इसमें इलाज में देरी होने पर मृत्यु दर बहुत अधिक होती है लेकिन लू लगने से पहले भी, लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से थकावट, चक्कर आना, भ्रम, मांसपेशियों में ऐंठन और गंभीर निर्जलीकरण (डिहाइड्रेशन) हो सकता है।

यूरोपीय देशों में इन दिनों भीषण गर्मी और लू का प्रकोप देखा जा रहा है। भयंकर लू के चलते कई यूरोप के कई देशों में स्कूल बंद करने पड़े हैं। वहीं स्वास्थ्य संबंधी चेतावनी जारी की गई है और अस्पतालों पर दबाव बढ़ गया है।

लेकिन भले ही पूरे महाद्वीप में तापमान बढ़ रहा हो जलवायु और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि वहां पैदा हो रहे इस संकट में भारत के लिए एक जरूरी संदेश छिपा है क्योंकि भारत में भी हर गुजरते साल के साथ भीषण गर्मी और ज्यादा जानलेवा होती जा रही है।

यूरोप आंकड़ें हैं चिंताजनक

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक दुनिया भर में हर साल गर्मी से जुड़ी वजहों से लगभग 4.9 लाख लोगों की मौत होती है। इन मौतों में से लगभग 45 फीसदी मौतें एशिया में होती हैं। इससे यह क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित है।

WHO प्रमुख टेड्रोस एडनॉम गेब्रियेसस ने रविवार (28 जून) को X पर एक पोस्ट में कहा कि 21 जून के बाद से ” यूरोप में ज्यादा तापमान के कारण ” 1,300 से ज्यादा अतिरिक्त मौतें दर्ज की गई हैं।

उन्होंने आगे कहा कि ” हीट स्ट्रेस को अक्सर ‘साइलेंट किलर’ कहा जाता है और यूरोप के घरों, दफ्तरों और स्कूलों को ऐसे तापमान के हिसाब से नहीं बनाया गया था। “

रविवार सुबह फ्रांस के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि बुधवार से देश में उम्मीद से लगभग 1,000 ज्यादा मौतें हुई हैं। एजेंसी ने यह भी बताया है कि पिछले दो दशकों में 65 साल से ज्यादा उम्र के लोगों में गर्मी से होने वाली मौतों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है क्योंकि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का मिजाज और भी ज्यादा बढ़ता जा रहा है।

जलवायु परिवर्तन और बढ़ता शहरीकरण है हीटवेव का कारण

यूरोप में पड़ रही भीषण गर्मी इस बात की ताजा याद दिलाती है कि हीटवेव (लू) अब मौसम की कोई अलग-थलग या इक्का-दुक्का घटना नहीं रह गई है। जलवायु परिवर्तन और तेजी से हो रहे शहरीकरण की वजह से ये इस सदी के सबसे बड़े सार्वजनिक स्वास्थ्य खतरों में से एक के तौर पर तेजी से उभर रही हैं।

भारत में जहां लाखों लोग खुले में काम करते हैं और गर्मियों में शहरों का तापमान अक्सर 45 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाता है वहां खतरा बहुत ज्यादा है। बाढ़ या चक्रवात के उलट गर्मी चुपचाप जान लेती है। ज्यादा तापमान में लंबे समय तक रहने से लोगों को अक्सर हार्ट अटैक, किडनी फेलियर या सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्याएं होती हैं और उनकी मौत हो जाती है। जबकि डेथ सर्टिफिकेट में मौत की वजह के तौर पर शायद ही कभी गर्मी का जिक्र होता है।

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इसका नतीजा यह होता है कि मरने वालों की असल संख्या का पता नहीं चल पाता और जानकारों का मानना ​​है कि यह संख्या असलियत से कहीं कम आंकी जाती है। आम तौर पर लोग यही सोचते हैं कि गर्मी तभी खतरनाक होती है जब किसी को हीटस्ट्रोक (लू) लग जाए लेकिन डॉक्टर कहते हैं कि यह पूरी सच्चाई नहीं है।

बहुत ज्यादा तापमान का इंसानी शरीर पर बहुत बुरा असर पड़ता है। शरीर को ठंडा रखने के लिए दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है, किडनी को शरीर में पानी का संतुलन बनाए रखने में मुश्किल होती है और लंबे समय तक डिहाइड्रेशन (पानी की कमी) से कई अंगों को नुकसान पहुंच सकता है। गर्मी पहले से मौजूद बीमारियों, जैसे दिल की बीमारी, डायबिटीज, अस्थमा और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं को और भी गंभीर बना देती है।

गर्मी के चलते थकावट, चक्कर आने की समस्याएं

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) लू लगने को एक गंभीर चिकित्सा आपातकाल (मेडिकल इमरजेंसी) मानता है। इसमें इलाज में देरी होने पर मृत्यु दर बहुत अधिक होती है लेकिन लू लगने से पहले भी, लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से थकावट, चक्कर आना, भ्रम, मांसपेशियों में ऐंठन और गंभीर निर्जलीकरण (डिहाइड्रेशन) हो सकता है।

बाहरी कामगार, विशेष रूप से निर्माण, कृषि, वितरण सेवाओं और सड़क किनारे सामान बेचने वाले सबसे अधिक जोखिम में रहते हैं क्योंकि गर्मी से बचना उनके लिए संभव नहीं होता। वैज्ञानिक अब इसके कम स्पष्ट परिणामों का भी पता लगा रहे हैं। शोध से पता चलता है कि अत्यधिक गर्मी नींद की गुणवत्ता, एकाग्रता और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करती है। इससे कार्यस्थल पर दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है और उत्पादकता ( प्रोडक्टिविटी ) कम हो जाती है।

लंबे समय तक चलने वाली भीषण गर्मी के दौरान अस्पतालों में आपातकालीन भर्ती में अक्सर भारी वृद्धि देखी जाती है जिससे पहले से ही दबावग्रस्त स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। भारत में भी इस वास्तविकता को बार-बार अनुभव किया गया है। इसी कारण से अक्सर गर्मियों में स्कूलों के समय-सारणी में बदलाव, अस्पतालों में लू लगने के वार्डों की स्थापना और निर्माण स्थलों पर श्रमिकों के बेहोश होने की खबरें आती हैं। फिर भी विशेषज्ञ मानते हैं कि ये उपाय रोकथाम के लिए उतने कारगर नहीं हैं।

जलवायु परिवर्तन भी है जिम्मेदार

दुनियाभर में बढ़ते स्वास्थ्य संकट को क्लाइमेट चेंज (जलवायु परिवर्तन) से अलग नहीं किया जा सकता। WHO का कहना है कि दुनिया भर में बढ़ता तापमान हीटवेव की संख्या और तीव्रता दोनों को बढ़ा रहा है। इसके अलावा शहरीकरण हालात को और खराब कर रहा है। हरियाली कम होने और कंक्रीट के बढ़ते दायरे की वजह से ” अर्बन हीट आइलैंड ” बन रहे हैं जो सूरज डूबने के बाद भी गर्मी को रोके रखते हैं। अब रातें भी शरीर को दिन की गर्मी से उबरने के लिए जरूरी राहत नहीं दे पा रही हैं।

भारत के लिए इसके गंभीर नतीजे हो सकते हैं क्योंकि यहां तेजी से बढ़ते शहरों में पहले से ही पेड़ों की कमी, घनी आबादी और गरीब इलाकों में कूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी जैसी चुनौतियां हैं। टीन की छत वाले घरों, अनौपचारिक बस्तियों या खराब हवा-आवाजाही वाली इमारतों में रहने वाले लोगों को अक्सर घर के अंदर ऐसे तापमान का सामना करना पड़ता है जो रात भर खतरनाक रूप से ज्यादा बना रहता है। जिन परिवारों के पास एयर कंडीशनिंग या भरोसेमंद बिजली की सुविधा नहीं है उनके लिए गर्मी से बचना लगभग नामुमकिन हो जाता है।

गर्मी का असर सिर्फ लोगों की सेहत तक ही सीमित नहीं है। गर्मी से ट्रांसपोर्ट में रुकावट आती है। बिजली सप्लाई पर दबाव पड़ता है, पानी की उपलब्धता प्रभावित होती है और काम करने की क्षमता (लेबर प्रोडक्टिविटी) कम हो जाती है। इसकी वजह से स्कूल और दफ्तर भी कुछ समय के लिए बंद करने पड़ सकते हैं जिससे आर्थिक नुकसान होता है और इसका असर पूरे समुदाय पर पड़ता है।

इसका बोझ भी बहुत असमान है। जो लोग जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे कम जिम्मेदार हैं। अक्सर उन्हीं पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ता है। दिहाड़ी मज़दूर काम बंद करने का जोखिम नहीं उठा सकते। अकेले रहने वाले बुज़ुर्गों की सेहत पर नजर रखने वाला कोई नहीं होता। बच्चे, जिनके शरीर का तापमान अलग तरह से नियंत्रित होता है उन्हें लंबे समय तक गर्मी के संपर्क में रहने पर ज्यादा खतरा होता है।

जन-स्वास्थ्य विशेषज्ञों का तर्क है कि लोगों को गर्मी से बचाने के लिए तापमान बढ़ने से काफी पहले ही योजना बनाने की जरूरत होती है। इसका मतलब है – भरोसेमंद अर्ली वॉर्निंग सिस्टम, छायादार सार्वजनिक जगहें, कूलिंग सेंटर, पीने के पानी की लगातार सप्लाई और शहर की प्लानिंग इस तरह से की जाए जिसमें कंक्रीट के बजाय हरियाली को प्राथमिकता दी जाए। हेल्थ वर्कर्स को गर्मी से जुड़ी बीमारियों की तुरंत पहचान करने के लिए ट्रेनिंग दी जानी चाहिए और एम्प्लॉयर्स को दोपहर की तेज गर्मी से बचने के लिए काम के घंटों में बदलाव करना चाहिए।

इससे राहत के लिए साधारण सावधानियां ही सबसे ज्यादा असरदार होती हैं। शरीर में पानी की कमी न होने देना, सबसे ज्यादा गर्मी वाले समय में बाहर ज्यादा मेहनत वाला काम न करना, ढीले-ढाले कपड़े पहनना, छाया में रहना काफी हद तक राहत दे सकता है। बुज़ुर्ग पड़ोसियों या परिवार के सदस्यों का नियमित रूप से हाल-चाल लेना भी लेते रहना चाहिए ताकि स्वास्थ्य की स्थिति का पता चल सके और किसी भी प्रकार की इमरजेंसी से पहले जरूरी उपाय किये जा सकें।

WHO यह भी सलाह देता है कि जब भी संभव हो, हर दिन कुछ घंटे ठंडे माहौल में बिताएं और गर्मी से जुड़ी आधिकारिक चेतावनियों पर पूरा ध्यान दें।

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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...
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अमरेन्द्र यादव
लखनऊ विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक करने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया से पत्रकारिता की पढ़ाई। जागरण न्यू मीडिया में बतौर कंटेंट राइटर काम करने के बाद 'बोले भारत' में कॉपी राइटर के रूप में कार्यरत...सीखना निरंतर जारी है...
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