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भारत में E20 ईंधन पर हंगामा….लेकिन ब्राजील कैसे बना इथेनॉल ब्लेंडिंग का सबसे सफल मॉडल?

आज ब्राजील के लगभग हर पेट्रोल पंप पर ग्राहक यह तय कर सकता है कि वह सामान्य मिश्रित पेट्रोल भरवाए या लगभग शुद्ध इथेनॉल (E100)। उसके पास विकल्प है जहां वह अलग-अलग कीमतों पर ईंधन के कई तरह के मिश्रण चुन सकता है।

भारत में इन दिनों पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण (इथेनॉल ब्लेंडिंग) को लेकर बहस छिड़ी हुई है। भारत ने तय समय से काफी पहले ही पिछले साल E20 लक्ष्य को हासिल कर लिया था। पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल मिलाने यानी E20 कार्यक्रम को सरकार अपनी सफलता बताती रही है। वहीं, दूसरी ओर ऐसे दावे आ रहे हैं कि इससे इंजन जल्दी खराब हो रहा है, तो कहीं माइलेज घटने की शिकायत भी है। यह सबकुछ उस समय हो रहा है जब भारत सरकार तेजी से E85 और 100 प्रतिशत इथेनॉल की ओर कदम बढ़ाना चाहती है।

पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने की तकनीक दुनिया भर के कई देशों में अपनाई जाती है। इसमें सबसे बड़ा नाम ब्राजील का है, जहां पिछले करीब 5 दशक से फ्लेक्स-फ्यूल वाहन प्रचलन में हैं। यहां इथेनॉल ब्लेडिंग पूरी तरह सफल रही है। फिर भारत में इसे लेकर इतनी बहस क्यों हो रही है? ब्राजील आखिर कैसे इस प्रयोग में सफल हुआ? वहां क्या सिस्टम है और भारत दक्षिण अमेरिकी देश से इस मामले में आखिर क्या सीख सकता है? पहले ये जानते हैं कि भारत में इथेनॉल ब्लेडिंग पर किए जा रहे तरह-तरह के दावे क्या हैं और सरकार ने इस मामले पर क्या कहा है।

इथेनॉल ब्लेंडिंग पर सरकार ने क्या कहा?

सरकार ने शुक्रवार को भारत के E20 इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम को लेकर सोशल मीडिया पर फैल रही ‘भ्रामक’ जानकारियों का विस्तृत जवाब जारी किया। सरकार ने अत्यधिक पानी की खपत, इंजन को नुकसान, पर्यावरणीय जोखिम और ईंधन की सुरक्षा से जुड़े दावों को खारिज करते हुए कहा कि E20 कार्यक्रम वैज्ञानिक प्रमाणों, व्यापक परीक्षणों और वैश्विक अनुभवों पर आधारित है।

मंत्रालय के अनुसार, गाड़ियों के परफॉर्मेंस को लेकर उठी चिंताओं के जवाब में ऑटोमोटिव रिसर्च एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ARAI) ने यात्री वाहनों पर करीब 40,000 किलोमीटर और दोपहिया वाहनों पर लगभग 20,000 किलोमीटर तक परीक्षण किए हैं। इन परीक्षणों में वाहन की ड्राइविंग क्षमता या ईंधन दक्षता पर कोई महत्वपूर्ण प्रतिकूल प्रभाव नहीं पाया गया। मंत्रालय ने ये भी कहा कि माइलेज में केवल मामूली बदलाव देखने को मिला।

इंजन को नुकसान पहुंचने या वाहन के पुर्जों में जंग लगने संबंधी आरोपों पर मंत्रालय ने कहा कि ARAI ने इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोलियम और सोसायटी ऑफ इंडियन ऑटोमोबाइल मैन्युफैक्चरर्स (SIAM) के साथ मिलकर अध्ययन किया है। इन अध्ययनों में वाहन की ड्राइविंग क्षमता या धातु और प्लास्टिक के पुर्जों से जुड़ी कोई समस्या सामने नहीं आई। हालांकि, पुराने वाहनों के कुछ रबर के पुर्जों को अपेक्षाकृत जल्दी बदलने की आवश्यकता पड़ सकती है।

Ethanol Fuel
फोटो AI

सरकार ने यह दावा भी खारिज किया कि E20 ईंधन के इस्तेमाल से वाहन की वारंटी या इस पर बीमा की शर्तें प्रभावित होती हैं। एक लीटर इथेनॉल के उत्पादन में 10,000 लीटर पानी खर्च होने के दावों को भी सरकार ने गलत बताया। मंत्रालय के अनुसार, इथेनॉल उत्पादन के लिए केवल वही अतिरिक्त चावल इस्तेमाल किया जाता है, जिसे देश की खाद्य सुरक्षा जरूरतों को पूरा करने के बाद मंजूरी दी जाती है।

सरकार ने कहा कि इथेनॉल डिस्टिलरियां प्रति लीटर इथेनॉल उत्पादन में लगभग 3 से 5 लीटर प्रोसेस्ड पानी का उपयोग करती हैं और अब बड़ी संख्या में संयंत्र ‘जीरो लिक्विड डिस्चार्ज’ प्रणाली अपना रहे हैं, जिसके तहत पानी को रिसाइकल किया जाता है।

मंत्रालय ने यह भी बताया कि अब इथेनॉल आपूर्ति में मक्का की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से अधिक हो चुकी है। मक्का की खेती में धान की तुलना में काफी कम सिंचाई की आवश्यकता होती है और इसे बढ़ावा देने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) भी बढ़ाया गया है।

सोशल मीडिया पर वायरल उन दावों पर भी सरकार ने प्रतिक्रिया दी, जिनमें कहा गया था कि E20 ईंधन में मौजूद सुगर के कारण चींटियां और मधुमक्खियां उसकी ओर आकर्षित होती हैं। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि ईंधन-ग्रेड इथेनॉल आसवन (डिस्टिलेशन) की प्रक्रिया से तैयार किया जाता है, जिसमें बची हुई शर्करा पूरी तरह हट जाती है। साथ ही इसमें ऐसे डिनैचुरेंट मिलाए जाते हैं, जो कीटों को दूर रखते हैं। इसके अलावा मिश्रित ईंधन में पेट्रोल की हाइड्रोकार्बन गंध ही प्रमुख रहती है। सरकार ने उन खबरों और दावों का भी खंडन किया जिसमें कहा गया था कि उसने सुप्रीम कोर्ट में E20 कार्यक्रम को ‘प्रयोग’ बताया था।

सरकार के जवाब अपनी जगह ठीक भी हैं। हालांकि, सवाल सिर्फ सोशल मीडिया पर फैली अफवाहों का नहीं है। असली सवाल यह है कि यदि ब्राजील जैसे देश दशकों से 27 से 30 फीसदी तक इथेनॉल मिश्रित ईंधन और यहां तक कि शुद्ध इथेनॉल (E100) का सफलतापूर्वक इस्तेमाल कर रहे हैं, तो भारत में E20 इतना विवादास्पद क्यों बन गया? इसका जवाब दोनों देशों के अलग-अलग मॉडल में छिपा है।

ब्राजील ने इथेनॉल को सिर्फ ईंधन नहीं, पूरी व्यवस्था बनाया

ब्राजील का इथेनॉल कार्यक्रम 1970 के दशक के तेल संकट के बाद शुरू हुआ। आयातित तेल पर निर्भरता कम करने के लिए सरकार ने गन्ने से बनने वाले इथेनॉल को रणनीतिक ईंधन के रूप में अपनाया। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि ब्राजील ने केवल पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने का फैसला नहीं किया, बल्कि खेती, उद्योग, ऑटोमोबाइल सेक्टर और उपभोक्ता- चारों को साथ लेकर एक पूरा इकोसिस्टम विकसित किया।

सरकार ने गन्ना किसानों को प्रोत्साहन दिया, डिस्टिलरी उद्योग में निवेश बढ़ाया, वाहन कंपनियों के साथ मिलकर फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक को बढ़ावा दिया और सबसे अहम, उपभोक्ताओं को विकल्प दिया गया।

आज ब्राजील के लगभग हर पेट्रोल पंप पर ग्राहक यह तय कर सकता है कि वह सामान्य मिश्रित पेट्रोल भरवाए या लगभग शुद्ध इथेनॉल (E100)। दोनों की कीमत भी अलग-अलग होती है और उपभोक्ता बाजार भाव के अनुसार फैसला लेता है। उसके पास पर्याप्त विकल्प है जहां वह अलग-अलग कीमतों पर ईंधन के कई तरह के मिश्रण चुन सकता है। इसी वजह से फ्लेक्स-फ्यूल वाहन वहां बेहद लोकप्रिय हुए। ये वाहन पेट्रोल और अलग-अलग स्तर के इथेनॉल मिश्रण पर बिना किसी तकनीकी परेशानी के चल सकते हैं।

एक और खास बात ये रही है कि ब्राजील ने इस बदलाव को धीरे-धीरे लागू किया और नीति, तकनीक सहित बाजार के बीच संतुलन बनाए रखा। इसी कारण वहां इथेनॉल कोई प्रयोग नहीं बल्कि रोजमर्रा की व्यवस्था जैसा बनता नजर आया।

भारत में बहस और उलझन क्यों है?

भारत ने भी इथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की दिशा में तेजी से काम किया है। साल 2013-14 में जहां पेट्रोल में इथेनॉल की हिस्सेदारी करीब 1.5 फीसदी थी, वहीं दिसंबर 2025 में देश ने 20 फीसदी मिश्रण का लक्ष्य तय समय से पहले हासिल कर लिया। सरकार का दावा है कि इससे 1.9 लाख करोड़ रुपये से अधिक की विदेशी मुद्रा बची, किसानों को 1.6 लाख करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान हुआ, करीब 930 लाख मीट्रिक टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन कम हुआ और 310 लाख मीट्रिक टन से अधिक कच्चे तेल के आयात की जरूरत घटी।

इसके बावजूद भारत में विवाद इसलिए ज्यादा है क्योंकि यहां बदलाव अपेक्षाकृत तेज गति से हुआ। बड़ी संख्या में ऐसे वाहन अब भी सड़कों पर हैं जिन्हें मूल रूप से E20 के लिए डिजाइन ही नहीं किया गया था। कई वाहन मालिकों ने माइलेज में कमी की शिकायत की। कुछ विशेषज्ञों ने पुराने इंजनों में रबर पार्ट्स, वाल्व और अन्य पुर्जों पर लंबे समय में असर की आशंका जताई।

(Photo- IANS)
फाइल फोटो

कुल मिलाकर ब्राजील की सबसे बड़ी ताकत यह रही कि वहां उपभोक्ता के पास विकल्प है। भारत में फिलहाल ऐसा विकल्प उपलब्ध नहीं है। E20 ही मानक ईंधन है और अधिकांश उपभोक्ताओं के पास दूसरा विकल्प नहीं है। यही कारण है कि कई वाहन मालिकों को लगता है कि उनसे बिना पर्याप्त विकल्प दिए बदलाव स्वीकार करने की अपेक्षा की जा रही है।

दूसरा बड़ा अंतर वाहन तकनीक का है। ब्राजील में फ्लेक्स-फ्यूल वाहन वर्षों से आम हैं। भारत में सरकार अब E85 और E100 को मान्यता देने तथा फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों के लिए नियम तैयार कर रही है, लेकिन यह व्यवस्था अभी शुरुआती चरण में है। ऐसे में यदि भविष्य में E25 या उससे अधिक मिश्रण लागू किया जाता है तो ऑटोमोबाइल कंपनियों को इस पर तेजी काम करना होगा।

इसके अलावा लोगों में भी उलझन है कि वे कौन सी गाड़ी लें। यह भी उलझन है कि अगर वे आज कोई गाड़ी लेते हैं और कल इथेनॉल ब्लेडिंग में कोई नया बदलाव आ जाता है, उनकी गाड़ियां उसके अनुरूप ढलने के लिए तैयार हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो जिस तेजी से सरकार अपने कदम इथेनॉल ईंधन की ओर से बढ़ाना चाहती है, वो भी लोगों उलझन पैदा कर रहा है। भारत जैसे देश में जहां गाड़ी खरीदना अब भी एक बड़ी लग्जरी और सपने पूरे करने जैसा है, वहां तेज बदलाव लोगों को भ्रम में डाल सकता है।

दूसरी ओर सरकार अपने पक्ष में यह तर्क देती है कि भारत अकेला देश नहीं है। अमेरिका, ब्राज़ील, कनाडा, थाईलैंड, जापान और कई यूरोपीय देशों में वर्षों से अलग-अलग स्तर पर इथेनॉल मिश्रित ईंधन का इस्तेमाल हो रहा है। इसलिए E20 को किसी ‘अनपरीक्षित प्रयोग’ की तरह देखना उचित नहीं है।

लेकिन यह भी सच है कि इन देशों में अधिकांश जगह इथेनॉल कार्यक्रम केवल ईंधन नीति नहीं रहा, बल्कि उसके साथ वाहन तकनीक, ईंधन वितरण प्रणाली, मूल्य निर्धारण और उपभोक्ता जागरूकता को भी विकसित किया गया। ब्राजील इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

उपभोक्ताओं को विकल्प देना जरूरी है…

भारत की ऊर्जा सुरक्षा, कच्चे तेल के आयात में कमी और किसानों की आय बढ़ाने के लिहाज से इथेनॉल कार्यक्रम महत्वपूर्ण है। लेकिन यदि सरकार भविष्य में E25, E85 और E100 की दिशा में आगे बढ़ना चाहती है, तो केवल मिश्रण बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा।

ब्राजील का अनुभव बताता है कि सफल मॉडल वही होगा जिसमें उपभोक्ता के पास विकल्प हो, वाहन तकनीक पहले से तैयार हो, ईंधन की उपलब्धता पूरे देश में समान हो और लोगों को बदलाव के लिए पर्याप्त समय मिले। भारत में फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती यही है कि नीति की गति, ऑटो उद्योग की तैयारी और उपभोक्ताओं का भरोसा…इन तीनों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

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विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...
विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...
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