वॉशिंगटन: डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत समझौते के करीब पहुंच रही है और इससे संघर्ष खत्म हो सकता है। दूसरी तरफ तेहरान ने भी संकेत दिए हैं कि शांति समझौते को लेकर चल रही बातचीत में कुछ प्रगति हुई है। हालांकि सार्वजनिक तौर पर दिखाई जा रही इस सकारात्मक तस्वीर के पीछे कुछ बड़े विवाद अब भी सुलझे नहीं हैं।
दरअसल, यह बातचीत सिर्फ ईरान के परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं रह गई है। इसके केंद्र में आर्थिक प्रतिबंध, खाड़ी क्षेत्र में ताकत का संतुलन, समुद्री रास्तों पर नियंत्रण, मिसाइल क्षमता और क्षेत्रीय प्रभाव जैसे बड़े सवाल भी जुड़े हुए हैं। वहीं, ऐसी भी खबरें हैं कि ट्रंप के अपने राजनीतिक खेमे के भीतर भी इस संभावित समझौते को लेकर बहुत सहमति नहीं है। इन आलोचकों का कहना है कि अगर समझौता मौजूदा रूप में आगे बढ़ा, तो इससे ईरान को रणनीतिक बढ़त मिल सकती है।
इस लिहाज से अभी भी यह साफ नहीं हो रहा है कि ईरान-अमेरिका के बीच कोई फाइनल डील आने वाले कुछ दिनों में हो सकेगी या नहीं, जो लंबे समय तक चले। आईए समझते हैं वह पांच बड़े मुद्दे जिस पर सभी की नजरें टिकी हैं, और एक तरह से इन्हीं मसलों के कारण डील रूकी हुई है।
ईरान-अमेरिका के बीच किन 5 मुद्दों पर अटकी है बात
- ईरान का परमाणु कार्यक्रम: ये सबसे बड़ा विवाद है। एक तरह से पूरी बातचीत का केंद्र ईरान का परमाणु कार्यक्रम बना हुआ है। वाशिंगटन और तेहरान न केवल यूरेनियम संवर्धन पर बल्कि ईरान के पास पहले मौजूद अत्यधिक एनरिच्ड यूरेनियम के भंडार के भविष्य पर भी एक दूसरे से बहुत अलग राय रखते हैं। अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, ईरान के पास वर्तमान में लगभग 970 पाउंड यूरेनियम है जो 60 प्रतिशत शुद्धता तक समृद्ध है, साथ ही लगभग 11 टन यूरेनियम है जो विभिन्न स्तरों पर समृद्ध किया हुआ है।
ट्रंप प्रशासन ने बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि ईरान को अपने अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम भंडार को छोड़ना होगा। उसका तर्क है कि इसका इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने के लिए किया जा सकता है। हालांकि, ईरान ने पूर्ण रूप से भंडार को नष्ट करने की मांगों का विरोध किया है।
न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार हाल में एक अमेरिकी अधिकारी ने पत्रकारों को बताया कि वाशिंगटन और तेहरान ने एक ऐसे ढांचे पर “सैद्धांतिक रूप से” सहमति व्यक्त की है जिसमें तेहरान द्वारा अपने अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम का निपटारा शामिल होगा। हालांकि प्रक्रिया पर अभी भी बातचीत जारी है।
हालांकि, दूसरी ओर ईरानी अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से इस बात का खंडन किया है। न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, तीन वरिष्ठ ईरानी अधिकारियों ने कहा कि परमाणु भंडार से संबंधित किसी भी बात पर सहमति नहीं बनी है और परमाणु मुद्दों पर अगले 30 से 60 दिनों में बातचीत की जाएगी। दोनों पक्षों की ओर से आए ये दो अलग-अलग बयान दर्शाते हैं कि इस मुद्दे पर अभी रस्साकशी जारी है।
- यूरेनियम को लेकर भविष्य का भी सवाल: यह भी अनसुलझा मुद्दा है कि क्या भविष्य में ईरान को यूरेनियम संवर्धन की अनुमति दी जाएगी। अमेरिकी पक्ष ने संकेत दिया है कि मौजूदा मसौदे में संवर्धन पर तत्काल रोक नहीं लगाई गई है और इस मामले को भविष्य की बातचीत में सुलझाया जाएगा।
विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने यह भी सुझाव दिया कि वाशिंगटन ईरान की परमाणु क्षमता को तत्काल और पूरी तरह से नष्ट करने के बजाय एक अंतरिम व्यवस्था स्वीकार करने को तैयार हो सकता है। रुबियो ने भारत यात्रा के दौरान कहा, ‘आप 72 घंटों में कागज पर लिखकर परमाण मसलों का हल नहीं कर सकते।’
हालांकि, इस तरह के कथित नरम रुख ने रिपब्लिकन पार्टी के भीतर ईरान विरोधी कट्टरपंथियों को चिंतित कर दिया है। सीनेटर टेड क्रूज ने चेतावनी दी कि यदि समझौते के परिणामस्वरूप ईरान को ‘अरबों डॉलर मिलते हैं, वह यूरेनियम संवर्धन और परमाणु हथियार विकसित करने में सक्षम होता है, और होर्मुज जलडमरूमध्य पर उसका प्रभावी नियंत्रण होता है, तो यह एक विनाशकारी गलती होगी।’
पूर्व विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने भी कथित रियायतों की आलोचना करते हुए कहा कि जिस समझौते पर बातचीत चल रही है, वह ‘अमेरिका फर्स्ट’ के सिद्धांत पर बिल्कुल भी आधारित नहीं है।
3. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर भी तनातनी: यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में से एक माना जाता है, जहां से वैश्विक तेल और गैस आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। संघर्ष बढ़ने के बाद समुद्री आवाजाही प्रभावित हुई और इससे ऊर्जा बाजारों पर असर पड़ा। इसके जवाब में अमेरिका ने ईरान से जुड़े समुद्री नेटवर्क पर दबाव बढ़ाया।
अब ईरान चाहता है कि अमेरिकी प्रतिबंध और समुद्री नाकेबंदी हटाई जाए। वहीं अमेरिका चाहता है कि इस मार्ग से जहाजों की आवाजाही पूरी तरह सुरक्षित और बिना बाधा जारी रहे। ईरान की ओर से संकेत दिए गए हैं कि यदि नाकेबंदी हटती है तो जहाजों की आवाजाही सामान्य की जा सकती है। लेकिन अमेरिका ने साफ किया है कि अंतिम समझौते से पहले दबाव कम नहीं होगा।
न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट में ईरानी अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि तेहरान ने संकेत दिया है कि प्रस्तावित समझौते के तहत जहाजों को बिना किसी भुगतान के जलडमरूमध्य से गुजरने की अनुमति दी जाएगी, लेकिन केवल तभी जब अमेरिका अपनी नाकाबंदी पूरी तरह से हटा ले।
- ईरान के जब्त संपत्तियों की भी चर्चा: ईरान अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के तहत अपने जब्त अरबों डॉलर की विदेशी संपत्तियों तक पहुंच चाहता है। ईरानी अधिकारियों का दावा है कि प्रस्तावित समझौते से 25 अरब डॉलर तक की संपत्ति जारी हो सकती है। अमेरिका का रुख इस मामले में कहीं अधिक सतर्क है।
अमेरिकी अधिकारियों ने कहा है कि वाशिंगटन फिलहाल ईरानी संपत्तियों को तुरंत अनफ्रीज करने की पेशकश नहीं कर रहा है, लेकिन अगर तेहरान परमाणु संबंधी प्रतिबद्धताओं को पूरा करता है तो वह यह प्रक्रिया शुरू कर सकता है।
आज की तारीख मेंम ईरान के लिए विदेशों में फंसी उसकी संपत्तियों तक पहुंच हासिल करना सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक है। तेहरान को उम्मीद है कि समझौते की स्थिति में अरबों डॉलर की रकम जारी हो सकती है। लेकिन अमेरिकी पक्ष अभी इस मामले में काफी सतर्क दिख रहा है।
अमेरिका का संकेत है कि किसी भी आर्थिक राहत को सीधे लागू नहीं किया जाएगा, बल्कि इसे ईरान की परमाणु प्रतिबद्धताओं से जोड़ा जाएगा। यहीं पर दोनों देशों के बीच भरोसे का संकट भी सामने आता है। ईरान को पहले हुए समझौतों और उनके टूटने का अनुभव याद है। दूसरी ओर ट्रंप के लिए ईरान के लिए नरमी दिखाना घरेलू राजनीति में जोखिम भरा माना जा रहा है।
- समझौता क्या सिर्फ ईरान-अमेरिका तक सीमित रहेगा: ईरानी अधिकारियों का दावा आता रहा है कि प्रस्तावित डील लेबनान समेत सभी मोर्चों पर लड़ाई रोकने में मददगार साबित हो सकती है। लेकिन अमेरिकी अधिकारियों ने अभी तक सार्वजनिक रूप से इसकी पुष्टि नहीं की है कि हिज्बुल्लाह या ईरान समर्थित अन्य समूह भी इस प्रस्ताव में शामिल हैं या नहीं।
अमेरिका में रिपब्लिकन आलोचकों का तर्क है कि ईरान के प्रॉक्सी नेटवर्क को शामिल करने से महीनों से चल रहे सैन्य टकराव के बावजूद तेहरान का क्षेत्रीय प्रभाव प्रभावी रूप से बन रहेगा। इससे समझौते का असर सीमित रह जाएगा
इन सबके बीच ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता लंबे समय से अमेरिका के सहयोगियों और क्षेत्रीय देशों के लिए चिंता का विषय रही है। शुरुआती संकेतों में यह चर्चा थी कि ईरान को मिसाइल क्षमता सीमित करनी पड़ सकती है। लेकिन मौजूदा बातचीत में ऐसा कोई स्पष्ट ढांचा सामने नहीं आया है। यह बात भी चर्चा में है। उनका मानना है कि अगर सिर्फ परमाणु कार्यक्रम पर ध्यान दिया गया और मिसाइल क्षमता जस की तस रही, तो भविष्य में तनाव फिर लौट सकता है।
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