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ट्रंप का दावा- ईरान के साथ नया समझौता ओबामा के JCPOA से बेहतर, जानिए आखिर क्या थी वो पुरानी डील?

ट्रंप ने शनिवार को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर कहा कि ओबामा प्रशासन की यह डील कमजोर और अमेरिका के लिए नुकसानदायक थी। उनका दावा है कि ईरान के साथ प्रस्तावित नया समझौता पहले की तुलना में कहीं अधिक सख्त और प्रभावी होगा।

नई दिल्लीः अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि वे ईरान के साथ एक नया और ऐतिहासिक समझौता करने जा रहे हैं, जो पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में हुई ‘जेसीपीओए’ (JCPOA) डील से कहीं बेहतर होगा। ट्रंप ने शनिवार को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा कि ओबामा प्रशासन द्वारा किया गया वह परमाणु समझौता अमेरिका के लिए बेहद नुकसानदायक और एक ‘खराब डील’ था।

ट्रंप के मुताबिक, उस समझौते के कारण ईरान को अरबों डॉलर (जिसमें 1.7 अरब डॉलर नकद शामिल थे) की आर्थिक राहत मिली, जिसका इस्तेमाल उसने अपनी आक्रामक नीतियों और परमाणु कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए किया। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि आखिर क्या था वह ‘जेसीपीओए’ (JCPOA) समझौता और क्यों इस पर इतना विवाद है-

क्या थी 2015 की JCPOA डील?

दरअसल, साल 2015 में ईरान और दुनिया की छह बड़ी शक्तियों के बीच एक ऐतिहासिक परमाणु समझौता हुआ था। इसे ज्वाइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (JCPOA) कहा गया, जिसे आम तौर पर ईरान परमाणु समझौता भी कहा जाता है।

इस समझौते में ईरान के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस और चीन शामिल थे। इसका मुख्य उद्देश्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर लगाम लगाना और बदले में उस पर लगे अंतरराष्ट्रीय आर्थिक प्रतिबंधों में राहत देना था।

समझौते के तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर कई अहम सीमाएं स्वीकार की थीं। उसे अपने संवर्धित (एनरिच्ड) यूरेनियम के भंडार को 300 किलोग्राम से कम रखना था और यूरेनियम संवर्धन का स्तर अधिकतम 3.67 प्रतिशत तक सीमित करना था। यह स्तर परमाणु हथियार बनाने के लिए जरूरी लगभग 90 प्रतिशत संवर्धन से काफी कम माना जाता है और केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों, जैसे बिजली उत्पादन, के लिए पर्याप्त है।

इसके अलावा, ईरान ने यूरेनियम संवर्धन में इस्तेमाल होने वाली सेंट्रीफ्यूज मशीनों की संख्या करीब 20,000 से घटाकर 6,104 करने पर सहमति दी थी। अराक स्थित हेवी वॉटर रिएक्टर को भी इस तरह दोबारा डिजाइन किया गया कि वहां हथियारों में इस्तेमाल होने वाला प्लूटोनियम पैदा न हो सके।

इस समझौते की सबसे महत्वपूर्ण शर्तों में से एक यह थी कि इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (आईएईए) को ईरान के परमाणु ठिकानों की व्यापक निगरानी और निरीक्षण का अधिकार मिला। विशेषज्ञों ने इसे दुनिया की सबसे सख्त परमाणु निगरानी व्यवस्थाओं में से एक माना था।

ट्रंप ने क्यों तोड़ी थी यह डील?

हालांकि यह डील ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकी। 2018 में राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को इस समझौते से बाहर निकाल लिया। उनका कहना था कि यह समझौता अमेरिका के हितों के खिलाफ था और इससे ईरान को अरबों डॉलर की आर्थिक राहत मिली, जिसका इस्तेमाल उसने अपने परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने में किया।

ट्रंप ने शनिवार को अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर कहा कि ओबामा प्रशासन की यह डील कमजोर और अमेरिका के लिए नुकसानदायक थी। उनका दावा है कि ईरान के साथ प्रस्तावित नया समझौता पहले की तुलना में कहीं अधिक सख्त और प्रभावी होगा। हालांकि, यह नया समझौता किन शर्तों पर आधारित होगा और जेसीपीओए से कैसे अलग होगा, इसकी जानकारी फिलहाल सार्वजनिक नहीं की गई है।

समाचार एजेंसी आईएएनएस इनपुट के साथ

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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