नई दिल्ली: एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498A, जो पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता से संबंधित है, अब लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले जोड़ों पर भी लागू होगी। न्यायालय ने जोर देकर कहा कि कानून को बदलती सामाजिक वास्तविकताओं के साथ विकसित होना चाहिए और लिव-इन रिलेशनशिप में उत्पीड़न का सामना करने वाले व्यक्तियों के लिए सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए।
न्यायालय ने कहा कि घरेलू क्रूरता के खिलाफ कानूनी सुरक्षा केवल विवाह तक सीमित रखने का कोई तार्किक आधार नहीं है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि लिव-इन संबंध केवल पुरुष और महिला के बीच ही हों, ऐसा जरूरी नहीं है। समय के साथ ऐसे संबंधों के अलग-अलग स्वरूप सामने आए हैं और कानून को इस सामाजिक वास्तविकता को स्वीकार करना होगा।
धारा 498A के तहत किसी महिला को क्रूरता का शिकार बनाने पर तीन वर्ष तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है। कानून के अनुसार, ऐसी हरकतें जो किसी महिला को आत्महत्या के लिए मजबूर कर सकती हों, उसे गंभीर शारीरिक या मानसिक नुकसान पहुंचाती हों, या दहेज अथवा संपत्ति की अवैध मांग के लिए उसे प्रताड़ित करती हों, क्रूरता की श्रेणी में आती हैं।
क्या है पूरा मामला?
यह फैसला डॉ. लोकेश बीएच और अन्य की ओर से दायर उस अपील पर आया, जिसमें नवंबर 2025 में कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें उनके खिलाफ आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया गया था।
मामले में शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि डॉ. लोकेश ने अपनी पहली शादी बरकरार रहते हुए यह तथ्य छिपाकर उससे विवाह किया। महिला का आरोप था कि इसके बाद उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया, उसके साथ क्रूरता की गई और उसे जिंदा जलाने का भी प्रयास किया गया। डॉ. लोकेश की ओर से दलील दी गई कि दूसरी शादी कानूनन शून्य थी, इसलिए उन्हें धारा 498A के तहत महिला का “पति” नहीं माना जा सकता।
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विवाह का इरादा साबित होना जरूरी
कर्नाटक हाईकोर्ट ने यह तर्क खारिज करते हुए कहा था कि धारा 498A का दायरा अमान्य, शून्यकरणीय विवाहों और विवाह जैसी प्रकृति वाले लिव-इन संबंधों तक भी हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यापक निष्कर्ष से सहमति जताई, लेकिन यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में यह साबित होना चाहिए कि दोनों पक्षों के बीच विवाह करने का वास्तविक इरादा था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि धारा 498A का उद्देश्य केवल पति और उसके रिश्तेदारों को दंडित करना नहीं है, बल्कि महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू क्रूरता पर रोक लगाना और उन्हें समान अधिकार दिलाना भी है। अदालत ने कहा कि यह प्रावधान उस पुरानी सोच से आगे बढ़ने का प्रयास है, जिसमें पुरुष को महिला से श्रेष्ठ माना जाता था।
अदालत ने कहा कि यदि केवल विवाहित महिलाओं को ही यह संरक्षण दिया जाए और विवाह जैसे संबंधों में रहने वाली महिलाओं को इससे बाहर रखा जाए, तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 में निहित समानता के अधिकार का उल्लंघन होगा, क्योंकि इसका घरेलू हिंसा रोकने के उद्देश्य से कोई तार्किक संबंध नहीं है।
घरेलू हिंसा कानून का हवाला भी खारिज
सुनवाई के दौरान यह तर्क दिया गया कि घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 पहले से ही लिव-इन संबंधों में रहने वाली महिलाओं को सुरक्षा देता है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह कानून मुख्य रूप से सिविल राहत प्रदान करता है, जबकि धारा 498A एक आपराधिक प्रावधान है, जिसके तहत दोषी पाए जाने पर दंड का प्रावधान है। इसलिए दोनों कानूनों का उद्देश्य और प्रभाव अलग-अलग हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका यह फैसला केवल धारा 498A की व्याख्या तक सीमित है। इसका अर्थ यह नहीं होगा कि भारतीय दंड संहिता या अन्य आपराधिक कानूनों की दूसरी धाराओं की व्याख्या भी स्वतः इसी आधार पर बदल जाएगी।
गिरफ्तारी से पहले प्रारंभिक जांच अनिवार्य
अदालत ने अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य मामले में तय दिशा-निर्देशों का सख्ती से पालन करने का निर्देश भी दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लिव-इन संबंधों में क्रूरता के आरोप लगने पर किसी भी आरोपी या उसके रिश्तेदार की गिरफ्तारी बिना प्रारंभिक जांच के नहीं की जानी चाहिए।
मामले के तथ्यों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें आपराधिक कार्यवाही रद्द की जाए। इसके साथ ही अदालत ने डॉ. लोकेश और अन्य की अपील खारिज कर दी।

