तमिल सिनेमा के दिग्गज निर्देशक भारतीराजा का बुधवार को 84 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वह लंबे समय से उम्र से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं और फेफड़ों के संक्रमण से जूझ रहे थे। पारिवारिक सूत्रों के मुताबिक, मार्च 2025 में उनके अभिनेता-निर्देशक बेटे मनोज भारतीराजा के अचानक हुए निधन के सदमे ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया था, जिसके बाद से उनकी सेहत लगातार गिरती चली गई।
भारतीराजा के निधन की खबर के बाद से फिल्म जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। उनके निधन की खबर सुन तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय चेन्नई के नीलांगराई स्थित उनके आवास पहुंचकर अंतिम श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने भारतीराजा को याद करते हुए एक्स पर एक भावुक पोस्ट लिखा और यह घोषणा की कि भारतीराजा की अंतिम यात्रा पूरे राजकीय सम्मान के साथ निकाली जाएगी।
तमिलनाडु के थेनी जिले के छोटे से गांव अल्ली नगरम में 17 जुलाई 1941 को जन्मे चिन्नासामी आगे चलकर भारतीराजा बने। साधारण किसान परिवार से आने वाले इस युवक ने अपने सपनों को पूरा करने के लिए लंबा संघर्ष किया। वह उन चुनिंदा निर्देशकों में से थे जिन्होंने सिर्फ सफल फिल्में नहीं बनाईं, बल्कि एक नई सिनेमाई भाषा भी गढ़ी।
1970 के दशक के आखिर तक तमिल सिनेमा मुख्य रूप से स्टूडियो आधारित, शहरी और नाटकीय कहानियों के इर्द-गिर्द घूमता था। भारतीराजा ने इस चलन को तोड़ा और गांवों, खेतों, लोकगीतों, स्थानीय बोलियों और आम लोगों की जिंदगी को बड़े पर्दे पर मुख्य स्थान दिया। यही वजह है कि उन्हें तमिल सिनेमा का ट्रेंडसेटर और ग्रामीण यथार्थवाद का सबसे बड़ा चेहरा माना जाता है।
एक फिल्म जिसने तमिल सिनेमा को पूरी तरह बदल दिया
भारतीराजा का नाम लेते ही सबसे पहले उनकी पहली फिल्म ’16 वायथिनिले’ (1977) याद आती है। यह सिर्फ उनकी डेब्यू फिल्म नहीं थी, बल्कि तमिल सिनेमा में आई एक क्रांति थी। इस फिल्म में कमल हासन, रजनीकांत और महज 14 साल की श्रीदेवी मुख्य भूमिकाओं में थे। कम बजट में बनी इस फिल्म को शुरुआत में कोई वितरक खरीदने तक को तैयार नहीं था। यहां तक कि कई तकनीकी दृश्यों को फिल्माने के लिए भी पैसे नहीं थे और कलाकारों को स्लो-मोशन प्रभाव देने के लिए खुद धीरे-धीरे चलना पड़ा था।
इस फिल्म से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा कमल हासन ने 2017 में सुनाया था। उन्होंने कहा था कि वर्षों पहले एक व्यक्ति मैले धोती-कुर्ते में उनके दफ्तर आया और फिल्म की कहानी सुनाने लगा। पहली नजर में वह किसी बड़े निर्देशक जैसा नहीं लगता था। कमल हासन के मुताबिक, “अगर मैंने उस दिन उसके कपड़े देखकर उसे मना कर दिया होता, तो शायद आज मैं यहां नहीं होता।” कहानी सुनने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि सामने बैठा व्यक्ति असाधारण प्रतिभा का मालिक है। वह व्यक्ति भारतीराजा थे और कहानी ’16 वायथिनिले’ की थी।
दिलचस्प बात यह भी है कि फिल्म के लिए कमल हासन ने अपनी फीस 30 हजार रुपये से घटाकर 27 हजार रुपये कर दी थी, जबकि रजनीकांत ने 5 हजार रुपये की जगह सिर्फ 2,500 रुपये में काम किया। श्रीदेवी ने बिना मेकअप के कैमरे के सामने आने का फैसला किया। रिलीज के बाद यही फिल्म 175 दिनों से ज्यादा चली और तमिल सिनेमा की दिशा बदल गई।
बॉलीवुड से भी रहा गहरा रिश्ता
हिंदी पट्टी के बहुत से दर्शक शायद नहीं जानते कि भारतीराजा का बॉलीवुड से भी गहरा नाता रहा है। उन्होंने मुख्य रूप से अपनी सफल तमिल फिल्मों के हिंदी रीमेक बनाए और कई बड़े सितारों के करियर में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
1979 में उन्होंने ‘सोल्वा सावन’ बनाई, जो ’16 वायथिनिले’ का हिंदी रीमेक थी। इसी फिल्म के जरिए उन्होंने श्रीदेवी को हिंदी सिनेमा में बतौर मुख्य अभिनेत्री लॉन्च किया। हालांकि फिल्म बड़ी व्यावसायिक सफलता नहीं बन सकी, लेकिन यहीं से श्रीदेवी के बॉलीवुड सफर की शुरुआत हुई। आगे चलकर वह हिंदी सिनेमा की पहली महिला सुपरस्टार बनीं।
इसके बाद 1980 में उन्होंने ‘रेड रोज’ का निर्देशन किया। यह उनकी तमिल फिल्म ‘सिगप्पू रोजाक्कल’ का हिंदी संस्करण थी। फिल्म में राजेश खन्ना ने एक साइकोलॉजिकल किलर का किरदार निभाया था। रोमांटिक हीरो की छवि वाले राजेश खन्ना को इतने डार्क रोल में पेश करना उस दौर में बेहद साहसिक प्रयोग माना गया।
1983 में आई ‘लवर्स’ भी उनकी तमिल सुपरहिट फिल्म ‘अलैगल ओइवथिल्लै’ का हिंदी रूपांतरण थी। इसमें कुमार गौरव और पद्मिनी कोल्हापुरी मुख्य भूमिकाओं में थे।
मुंबई की चमक-दमक छोड़ चुनी अपनी मिट्टी
’16 वायथिनिले’ और ‘सिगप्पू रोजाक्कल’ जैसी फिल्मों की सफलता के बाद बॉलीवुड के कई बड़े निर्माता चाहते थे कि भारतीराजा मुंबई में बस जाएं और लगातार हिंदी फिल्में बनाएं। उन्हें बड़े बजट और बड़े सितारों के साथ काम करने के प्रस्ताव भी मिले। लेकिन उन्होंने सभी प्रस्ताव ठुकरा दिए। उनका मानना था कि उनकी कहानियां तमिलनाडु के गांवों, वहां की संस्कृति, लोकगीतों और लोगों के जीवन से जन्म लेती हैं। वे अक्सर कहते थे कि अगर वे मुंबई की चकाचौंध में बस गए तो उनकी फिल्मों की मिट्टी की खुशबू खत्म हो जाएगी।
भारतीराजा को फिल्म इंडस्ट्री में “स्टार मेकर” भी कहा जाता था। उन्होंने राधिका, रेवती, राधा, रेखा, विजयशांति समेत कई कलाकारों को पहला बड़ा मौका दिया। एक समय यह भी चर्चा में रहता था कि वे अपनी नई अभिनेत्रियों के नाम अक्सर अंग्रेजी के ‘आर’ अक्षर से शुरू करवाना पसंद करते थे।
कैमरे के पीछे ही नहीं, सामने भी चमके
सिर्फ कलाकार ही नहीं, कई सफल निर्देशक भी उनकी पाठशाला से निकले। के. भाग्यराज, आर. पार्थिबन और पांडियाराजन जैसे फिल्मकारों ने उनके साथ काम करके अपने करियर की शुरुआत की। निर्देशन में सफलता के बाद भारतीराजा ने अभिनय की दुनिया में भी अपनी अलग पहचान बनाई। ‘आयुथ एझुथु’, ‘पांडियानाडु’, ‘मानाडु’, ‘थिरुचित्रम्बलम’, ‘महाराजा’ और हालिया मलयालम फिल्म ‘थुदरम’ में उनके अभिनय को खूब सराहा गया।
2023 में दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि जब मणिरत्नम ने उन्हें ‘आयुथ एझुथु’ में एक चालाक राजनेता की भूमिका दी तो मजाक में पूछा था, “सर, आप राजनीति में आने की तैयारी तो नहीं कर रहे?” इस पर भारतीराजा ने हंसते हुए जवाब दिया था, “मेरा पहला और आखिरी प्यार सिर्फ सिनेमा है, चाहे कैमरे के पीछे रहकर हो या सामने।”
एक ऐसी विरासत जो हमेशा जिंदा रहेगी
भारतीराजा की फिल्मों की शुरुआत अक्सर एक मशहूर वाक्य से होती थी—”एन इनिया तमिल मक्कले…” यानी “मेरे प्यारे तमिल लोगों।” यह सिर्फ एक संवाद नहीं, बल्कि दर्शकों के साथ उनके भावनात्मक रिश्ते की पहचान बन गया था। एन इनिया तमिल मक्कले नाम से ही उन्होंने अपना एक यूट्यूब चैनल भी शुरू किया। यहां वह अपनी फिल्मों से जुड़े किस्से कहानी दर्शकों से साझा किया करते थे। इस पर कुल 79 एपिसोड प्रसारित किए। बीमारी की वजह से पिछले 5 सालों से यहां निष्क्रिय थे। आखिरी एपिसोड 24 जुलाई 2021 को प्रसारित हुआ था।
चैनल की घोषणा करते हुए भारतीराजा ने कहा था, “मेरे प्यारे तमिल लोगों, आपका अपना भारतीराजा आपसे बात कर रहा है। आपने मुझे हमेशा भरपूर प्यार दिया है। अपनी फिल्मों के जरिए मैंने इस मिट्टी और यहां के लोगों के साथ अपने रिश्ते को व्यक्त करने की कोशिश की है। अब मैं अपने विचार पूरी स्वतंत्रता और ईमानदारी के साथ आपके सामने रखना चाहता हूं।”
44 फिल्मों का किया निर्देशन
भारतीराजा ने अपने पांच दशक लंबे करियर में करीब 44 फिल्मों का निर्देशन किया और तमिल सिनेमा को कई ऐसी कृतियां दीं, जिन्हें आज भी क्लासिक का दर्जा हासिल है। ‘मुधल मरियाधई’, ‘मन वासनाई’, ‘वेदम पुधिथु’, ‘किझाक्कु चीमईइले’, ‘करुथम्मा’ और ‘नाडोड़ी थेंड्रल’ जैसी फिल्मों के जरिए उन्होंने सिर्फ मनोरंजन नहीं किया, बल्कि जातिगत भेदभाव, महिलाओं की सामाजिक स्थिति, ग्रामीण गरीबी, परंपराओं और बदलते समाज जैसे संवेदनशील मुद्दों को भी बड़े पर्दे पर मजबूती से उठाया। उनकी फिल्मों की खासियत यह थी कि वे दर्शकों को भावनात्मक रूप से जोड़ने के साथ-साथ समाज के आईने से भी रूबरू कराती थीं। 5 दशक के उनके लंबे करियर में उन्हें छह राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, कई फिल्मफेयर पुरस्कार और 2004 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
निर्देशक के रूप में उनकी आखिरी पूर्ण लंबाई की फीचर फिल्म ‘मींडुम ओरु मरियाधई’ (2020) रही, जबकि उनका अंतिम निर्देशकीय काम 2023 की चर्चित एंथोलॉजी सीरीज ‘मॉडर्न लव चेन्नई’ का खंड ‘परवाई कूटिल वाज़ुम मांगाल’ था। हालांकि निर्देशन से उन्होंने धीरे-धीरे दूरी बना ली थी, लेकिन अभिनय के क्षेत्र में उनका सफर जारी रहा। मणिरत्नम की ‘आयुथ एझुथु’ से शुरू हुई उनकी दूसरी पारी में उन्होंने कई यादगार भूमिकाएं निभाईं। नई पीढ़ी के दर्शकों ने उन्हें ‘थिरुचित्रम्बलम’, ‘महाराजा’ और पिछले वर्ष रिलीज हुई तरुण मूर्ति की मलयालम क्राइम थ्रिलर ‘तुदारुम’ में भी सराहा।

