नई दिल्ली: बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस में जिस कदर उथल-पुथल मची है, उसने कई नए कयासों और संभावनाओं को जन्म दे दिया है। सूत्रों और कुछ मीडिया रिपोर्टों के हवाले से ऐसे खबरें आने लगी हैं कि सरकार एक बार फिर महिला आरक्षण संशोधन और परिसीमन बिल को लेकर कोशिश शुरू कर सकती है। संभावना जताई जा रही है कि आने वाले मानसून सत्र में इसे फिर से पेश कर पास कराने का प्रयास किया जा सकता है। हालांकि, नरेंद्र मोदी सरकार के लिए डगर अभी भी मुश्किल है, लेकिन बंगाल और तमिलनाडु में जिस तरह सत्ता परिवर्तन हुआ और जो हालात अब बने हैं, उसने संसद का नंबर गेम बहुत हद तक बदल दिया है। ऐसे में संभव है कि भाजपा और नरेंद्र मोदी की सरकार नए सिरे से प्रयास करे।
संसद में कितना बदला गणित?
तृणमूल कांग्रेस के संसद में बागी नेताओं का दावा है कि उन्हें लोकसभा में टीएमसी के 28 में से 20 सांसदों का समर्थन हासिल है। इसके अलावा, हाल ही में आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसद भाजपा में शामिल हो चुके हैं और मौजूदा उथल-पुथल के बीच तृणमूल के तीन राज्य सभा सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया है। ये संख्या आगे बढ़ भी सकती है।
ये घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आए हैं जब तमिलनाडु विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस के विजय की ‘तमिलगा वेट्री कझगम’ (टीवीके) के साथ गठबंधन करने के कारण कांग्रेस-डीएमके गठबंधन टूट गया है। इससे भी विपक्ष पर असर हुआ है और इंडिया ब्लॉक कमजोर हुआ है।
अभी मौजूदा स्थिति में एनडीए को 543 सदस्यों वाली लोकसभा में लगभग 293 सांसदों का समर्थन हासिल है। टीएमसी के बागी नेताओं का दावा है कि उन्हें पार्टी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 का समर्थन प्राप्त है। इन्होंने एनडीए सरकार का समर्थन करने की भी बात कही है। अगर ये आंकड़े सही साबित होते नजर आते हैं, तो सरकार के पक्ष में लोकसभा सांसदों की संख्या 293 से बढ़कर 313 हो जाएगी।
इसी साल में अप्रैल में परिसीमन वाले संशोधन बिल पर लोक सभा में सरकार के पक्ष में 298 मत पड़े थे। ऐसे में 20 और जोड़े जाएं तो संख्या 318 की हो जाती है।
डीएमके-कांग्रेस में फूट का भी मिलेगा फायदा?
अब बात डीएमके की भी कर लेते हैं। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की हाल में सबसे मुखर आलोचना डीएमके की ओर से भी आती रही है। स्टालिन तो परिसीमन बिल वाली कॉपी जलाते नजर आए थे। ऐसे में कांग्रेस से डीएमके के अलगाव ने विपक्ष को कमजोर जरूर किया है लेकिन सवाल ये है कि क्या इससे एनडीए को मजबूती मिली है? यानी क्या डीएमके एकदम से पाला बदलेगी। जवाब है- सीधे तौर पर अभी तो ऐसा नहीं लगता।
हालांकि, इस फूट ने भाजपा के लिए संभावनाओं के दरवाजे जरूर खोल दिए हैं। इस फूट के बाद संभव है कि डीएमके और सरकार के बीच कुछ खास विधायी मामलों में मुद्दों के आधार पर सहयोग की संभावना बढ़ सकती है। डीएमके के अभी 22 लोकसभा सांसद हैं। ऐसे में फ्लोर मैनेजमेंट और प्रयासों से अगर कुछ मुद्दों पर डीएमके के 22 सांसदों का साथ मिलता है तो सरकार के पक्ष में संख्या 318 से बढ़कर 340 तक पहुंच जाती है।
किसी भी संविधान संशोधन के लिए दो-तिहाई समर्थन की जरूरत होती है। लोकसभा में दो-तिहाई का आंकड़ा अभी के हिसाब से 360 है।
राज्य सभा का भी गणित बदला है…
राज्य सभा में भी एनडीए पहले के मुकाबले ज्यादा बेहतर स्थिति में दिख रही है। हाल में आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सदस्यों के विलय के बाद भाजपा की संख्या बढ़कर 113 हो गई थी। इसकी बदौलत एनडीए के सदस्यों की कुल संख्या बढ़कर लगभग 148 हो गई।
दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस संकट ने अब एक और मौका पैदा कर दिया है। टीएमसी के तीन राज्यसभा सांसदों ने इस्तीफा दे दिया है, जिससे पार्टी की संख्या 13 से घटकर 10 रह गई है और तीन सीटें खाली हो गई हैं।
अब अगर एनडीए आगे होने वाले राज्य सभा उपचुनावों में तीनों सीटें जीत जाती हैं, तो उसकी संख्या लगभग 148 से बढ़कर 151 हो जाएगी। बंगाल में तीनों राज्य सभा सीट जीतने के आसार एनडीए के लिए इसलिए भी बढ़ गए हैं, क्योंकि वहां भी बागी गुट तैयार है। 80 में से 58 विधायक तृणमूल से अलग गुट बनाए हुए हैं। ऐसे में केवल 22 विधायकों के दम पर ममता के लिए किसी को राज्य सभा भेजना मुश्किल है। साथ ही ये भी देखना होगा कि बागी गुट का रुख क्या रहेगा। राज्य सभा में दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा 163 सदस्यों का है।
तो क्या परिसीमन बिल पर एक बार फिर जोर लगाएगी सरकार?
फिलहाल साफ तौर पर कुछ भी कहना मुश्किल है। लोकसभा में दो तिहाई के आंकड़े को देखें तो 543 सदस्यों के हिसाब से ये 362 होता है। चूकी अभी तीन सीट- बशीरहाट (पश्चिम बंगाल), शिलॉन्ग (मेघालय) और नौगौंग (असम) खाली हैं तो दो- तिहाई का आंकड़ा घटकर 360 पहुंचता है। इस लिहाज से देखें और डीएमके भी नंबर को मिलाएं तो एनडीए के पास अधिक से अधिक 540 वोट आते हैं, यानी बहुमत से कम। राज्य सभा में भी स्थिति कुछ ऐसी ही है। यहां दो-तिहाई का आंकड़ा 163 है। एनडीए 148 से 151 के बीच फंसती हुई दिख रही है।
फिर सवाल है क्या परिसीमन बिल पर सरकार आगे बढ़ेगी? यह सही है कि दोनों ही सदनों में मोदी सरकार के पास संविधान संशोधन बिलों को पास कराने के लिए पर्याप्त दो तिहाई आंकड़ा अभी भी नहीं है। लेकिन सरकार जरूरी संख्या के बहुत करीब पहुँच जरूर गई है। ऐसे में वोटिंग के दिन फ्लोर मैनेजमेंट बहुत हद तक काम आ सकता है।
दूसरे शब्दों में कहें तो सरकार को संविधान संशोधन के लिए पूरी तरह से नया गठबंधन बनाने की जरूरत नहीं होगी। इसके बजाय, उसे विपक्ष के खेमे से कुछ समर्थन सहित वोटिंग से दूरी या अनुपस्थिति जैसे तरीकों से जरूरी संख्या तक पहुंचने में मदद मिल सकती है। भाजपा की टीम इन प्रयासों के लिए कितना तैयार है, या तैयारी कर भी रही है या नहीं…ये तो आने वाला समय ही बताएगा।
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