Friday, March 20, 2026
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दृश्यम: कोर्ट मार्शल- छोटा अन्याय हमेशा बड़े अन्याय को जन्म देता है

13 दिसंबर, सायं 7 बजे स्वदेश दीपक लिखित चर्चित नाटक ‘कोर्ट मार्शल’ का मंचन श्रीराम सेंटर, मण्डी हाऊस, नई दिल्ली में हुआ। 1990 के दशक में लिखा गया यह नाटक आज भी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से उतना ही प्रासंगिक है और दर्शकों पर अपनी गहरी छाप छोड़ता है। यह समाज के अंतर्विरोधों पर भी सवाल उठाता है। यह नाटक अपने तीखे संवादों, सामाजिक आलोचना और दमदार अभिनय के लिए जाना जाता है। स्वदेश दीपक लिखित और अरविंद गौड़ द्वारा मंचित यह नाटक सिर्फ एक सैनिक-मुकदमे की कहानी नहीं, बल्कि पूरे समाज में अंतर्निहित पूर्वाग्रहों और विडंबनाओं का दर्पण है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या वाकई हम न्याय और समानता के सिद्धांतों पर चल रहे हैं?

कोर्ट मार्शल आजाद भारत में जाति की घृणित व्यवस्था पर सवाल उठाता है। जाति जैसी आत्मसम्मान कुचलने वाली बुराई के हर पहलू पर लेखक स्वदेश दीपक कितना महीन और शार्प पकड़ रखते थे। इस नाटक का एक-एक संवाद यह साबित करता है।

नाटक सेना के कोर्ट रूम से शुरू होता है, प्रीसाइडिंग अफसर कर्नल सूरज सिंह की कोर्ट में सवार रामचंद्र पर अभियोग है कि उसने दो अफसरों पर गोली चलाई जिसमें एक अफसर मौके पर ही मारा गया और दूसरे अफसर कैप्टन बीडी कपूर को दिल के पास गोली लगी। समय पर अस्पताल की मदद मिलने के कारण वह बच गया। मेजर पुरी इसमें अभियोग लगाने वाले वकील हैं और कैप्टेन बिकाश रॉय अभियुक्त रामचंद्र के बचाव पक्ष के वकील हैं।

अभियोग साबित माना जा रहा है क्योंकि रामचंद्र अपना अपराध कुबूल कर चुका है। इस आधार पर मेजर पुरी रामचंद्र को स्पष्ट तौर पर मृत्युदंड की माँग करते हैं।

जब सब कुछ इतना स्पष्ट है तो कैप्टन रॉय आखिर इस बहस से चाहते क्या हैं? इतनी पुष्ट गवाही के बाद भी क्या रामचंद्र के जीवन को वे बचा पाएंगे! कर्नल सूरत सिंह के पूछने पर वह कहते हैं – ‘मैं वो बात बचाने की कोशिश कर रहा हूँ जो जीवन से भी बड़ी है- वह है सत्य। उसने मर्डर क्यों किया! कैप्टन रॉय कहते हैं– ‘मैं आत्मा का अहेरी (hunter of the soul) हूँ। कर्नल सूरज सिंह को भी एहसास है कि जब हम किसी की जान लेते हैं तो हमारे प्राणों का भी एक हिस्सा मर जाता है… उसके साथ।

इसके बाद कोर्ट में तीखी बहस शुरू होती है। गवाहों की कई परतों के नीचे दबे ‘सत्य’ तक पहुँचने में आखिर कैप्टन रॉय सफल हो ही जाते हैं।

नाटक लम्बी बहस के बाद सच तक पहुँचता है, कैप्टन रॉय बहस को इस सीमा तक उद्वेलित करने में कामयाब हो जाते हैं कि कैप्टन बीडी कपूर खुद अपना घृणित जातिवादी चेहरा उघाड़ कर सामने आ जाता है। यह पूरी प्रक्रिया ही इस नाटक की जान है। इस जटिल जाति व्यवस्था की क्रूरता को सामने लाने में स्वदेश दीपक की कलम की महारथ दर्शकों के हृदय तक ऐसे पहुँचती है कि हॉल तालियों से गूंज उठता है।

जाति का क्रूर सच उघड़ने के साथ ही नाटक एक पॉजिटिव मोड़ लेता है। जो वास्तविकता में शायद सम्भव न हो पाए। जहाँ जातिवादी गाली गलौज और हिंसक व्यवहार करने वाला कैप्टन बीडी कपूर कहता है– ‘खानदानी लोग फ़ौज में भर्ती होते हैं। ये छोटे लोग आकर माहौल बिगाड़ते हैं। पिछली चार पुश्तों से हमारे खानदान के लोग फौज में राज कर रहे हैं। ‘वी आर इन रूलिंग क्लास.’ कैप्टेन रॉय उसे उकसाता है- ‘रामचंद्र से रेस में हारने के बाद आप उसके दुश्मन हो गये। आप उसे चूहड़ा और भंगी कहते थे!

असलियत खुलने पर ऐसे चार पुश्तों के अहंकारी कपूर को कोर्ट में सब घृणा की नज़र से देखने लगते हैं और कोर्ट की सहानुभूति रामचंद्र के साथ हो जाती है, कहानी को यहाँ थोड़ा आदर्शवादी एंगल दिया गया है। खासकर तब और ज्यादा जब कपूर को उससे निचली रैंक का सिपाही भी हिकारत से जवाब देता है कि मुझे रामचंद्र मत समझना, मेरा निशाना कभी नहीं चूकता। इसी तरह कर्नल सूरज सिंह पार्टी में हाथ मिलाने के लिये उसके बढ़े हाथ को झिड़क देता है।

कपूर चिढ़कर रॉय पर आरोप लगाता है कि उसका बड़ा भाई नक्सलवादी था। तो रॉय जवाब देता है– ‘बड़ा भाई नक्सलवादी था। न्याय की जो लड़ाई वह बंदूक से लड़ रहा था मैं कानून से लड़ रहा हूँ। भाई भले नक्सल था पर मेरे पिता कोलकाता हाईकोर्ट में जज हैं। रॉय यह भी कहता है कि छोटा अन्याय हमेशा बड़े अन्याय को जन्म देता है। यही सिस्टम है छोटे आदमी की शिकायत को वहीं दबा दो और बड़े आदमी की ग़लती पर आँखें बन्द कर लो।

नाटक इसी तरह सच की कड़वाहट और एक कल्पित बराबरी के प्रति सहानुभूति के मेल से आगे बढ़ता है और कुल मिलाकर जाति के भयावह उत्पीड़न को दर्शकों के मन तक पहुंचाने में कामयाब हो जाता है।

नाटक के अंत में अच्छाई बुराई को बैलेंस करने का प्रयास है, जब कपूर खुद को गोली मार लेता है और कर्नल सूरज सिंह इसे पोएटीक जस्टिस कहता है– ‘जब नीचे की अदालत इंसाफ नहीं करती तो ऊपर वाले की अदालत इंसाफ कर देती है। बैलेंस इसलिये कहा कि रामचंद्र की फाँसी बरकरार है तो न्याय तो नहीं हुआ पर कुछ बैलेंस तो बन ही गया। अन्याय का पलड़ा पूरा नीचे नहीं गिर गया।

नाटक के सफल मंचन में अभिनेताओं की शानदार अदाकारी का जादू है। खासकर कैप्टन बिकाश रॉय का रोल करने वाले बजरंग बली सिंह इस नाटक की धुरी हैं। उनका अभिनय परिपक्व और मंझा हुआ है।अपने हाव- भाव, संवाद अदायगी, बॉडी लैंग्वेज, सभी में वे कसे हुए हैं। कर्नल सूरत सिंह के रोल में सुसान बरार का अभिनय भी बार बार तालियाँ बटोरता रहा। रामचंद्र के रोल में आशुतोष सिंह की मंच पर मौजूदगी पूरे समय रही पर उनके हिस्से डायलॉग कम थे। वे जब बोले तो उनका मार्मिक बयान नाटक की दिशा बदल देता है।अदाकारी का स्तर यह रहा कि दर्शकों ने सचमुच में सेना के जवानों की मौजूदगी को महसूस किया।

स्वदेश दीपक का यह नाटक रंगमंच में पसन्द किया जाने वाला अग्रणी नाटक है। देश भर में अलग अलग नाट्य ग्रुपों ने इसका खूब मंचन किया है। अस्मिता ग्रुप भी कई दशकों से इसका मंचन लगातार कर रहा है। आज भी देश में जातीय अपमान की जो स्थिति है उसमें इस नाटक की प्रासंगिकता कम होती नजर नहीं आती।

अस्मिता थिएटर ग्रुप के इस नाटक का निर्देशन अरविन्द गौड़ ने किया। जो अपने सधे हुए काम से दर्शकों में विश्वसनीयता अर्जित कर चुके हैं। आज लोग उनके नाम पर टिकट खरीद कर नाटक देखने आते हैं।

नाटक में संगीत परिकल्पना डा. संगीता गौड़ की थी।

यह नाटक शनिवार शाम को श्री राम कला सेंटर, मंडी हाउस, नई दिल्ली में मंचित हुआ। सुखद रूप से जाड़ों की रात में भी दर्शकों की मौजूदगी ने हाउस फुल कर दिया।

संध्या नवोदिता
संध्या नवोदिता
कवि, अनुवादक, पत्रकार और एक्टिविस्ट
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