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पुस्तक समीक्षा: नामवरों की स्मृतियों में अविस्मरणीय नामवर

डॉ. रामबक्ष जाट द्वारा संपादित पुस्तक ‘मेरे लिए नामवर जी’ के बहाने यह समीक्षा उन संस्मरणों की दुनिया में प्रवेश करता है, जहाँ हिन्दी साहित्य के अनेक बड़े नाम अपनी-अपनी स्मृतियों में बसे नामवर सिंह को फिर से जीवित करते हैं। हरीश शिवनानी द्वारा की गयी यह समीक्षा इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह नामवर जी को किसी स्थापित प्रतिमा की तरह नहीं, बल्कि अपने समय की जटिलताओं, अंतर्विरोधों, आत्मीयताओं और प्रभावों से बने एक जीवित मनुष्य की तरह देखता है। शिक्षक, आलोचक, संस्थापक, सत्ता-संरचनाओं से जूझते बुद्धिजीवी और अपने विद्यार्थियों के लिए लगातार सक्रिय गुरु, इन तमाम रूपों में उभरते नामवर जी का यह पाठ इसलिए भी उनके शताब्दी वर्ष की शुरुआत के ठीक पहले, एक अर्थपूर्ण साहित्यिक दस्तावेज़ बन जाता है।

उम्र का एक कालखंड, वक़्त का एक दौर ऐसा भी आता है जब स्मृतियां ही मनुष्य की सहचरी होती हैं। यदि ये स्मृतियां साहित्य की किसी नामवर हस्ती से जुड़ी हों तो वे भी विशिष्ट बन जाती हैं। ऐसी ही नामवर हस्ती से जुड़ीं विशिष्ट हस्तियों विशिष्ट स्मृतियों का कोठार है – मेरे लिए नामवरजी

हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाओं में संस्मरण विधा लंबे समय तक उपेक्षित – सी हाशिए पर पड़ी रही है। जबकि संस्मरण लिखना किसी व्यक्ति, विशेषतः किसी रचनाकार को समझने, उसकी स्मृतियों की तलछट में जाकर उसके भीतरी रूप, मानसिकता को समझना ज़रा मुश्किल काम है। उम्र का एक कालखंड, वक़्त का एक दौर ऐसा भी आता है जब स्मृतियां ही मनुष्य की सहचरी होती हैं। यदि ये स्मृतियां साहित्य की किसी नामवर हस्ती से जुड़ी हों तो वे भी विशिष्ट बन जाती हैं। ऐसी ही नामवर हस्ती से जुड़ीं विशिष्ट हस्तियों विशिष्ट स्मृतियों का कोठार है – मेरे लिए नामवरजी। यह संग्रह प्रस्तुत किया है 

उनके विश्वस्त और जोधपुर से लेकर अंतिम दिनों तक शिवालिक तक से जुड़े रहे उनके शिष्य डॉ. रामबक्ष जाट ने। जेएनयू में भारतीय भाषा केंद्र के अध्यक्ष पद पर रहते हुए प्रो.रामबक्ष ने नामवर जी की उपस्थिति में उनके जन्मदिवस पर जेएनयू में एक कार्यक्रम आयोजित किया था। कार्यक्रम में नामवर जी के युवावस्था के संगी-साथियों से लेकर उनके अंतिम समय के दौर में उनके संपर्क में रहे विद्यार्थियों, शोधार्थियों तक के अनुभव – स्मृतियां हैं जिन्हें ‘मेरे लिए नामवर जी’ में संजो कर प्रो.रामबक्ष ने संस्मरण विधा को पुनर्जीवित किया है। वे लिखते हैं – “संस्मरण लेखक को अपने ‘स्व’ का बलिदान और दूसरे के महत्व को स्वीकार करना पड़ता है। मेरे मन में गुरु प्रो. नामवर सिंह के प्रति अत्यधिक श्रद्धा का भाव है। यहाँ तक कि लगभग पूजा का भाव है। उनके आगे अनायास ही मेरे ‘स्व’ का लोप हो जाता है और मन उनके माहात्म्य-बोध से नतमस्तक हो जाता है।” स्वयं नामवर जी ने इस कार्यक्रम को ऐतिहासिक बताया था – “ आज सच्चे आर्थों में जे.एन.यू. में मेरा पहला जन्मदिन है। शायद यह मेरे लिए ऐतिहासिक स्मृति की घटना है। इसमें सभी प्रियजन हमारे वक्ताओं में शामिल हैं और जिसने सम्भव किया वह रामबक्ष है…न जाने कितने प्रोफ़ेसर हुए यहाँ जिसमें अधिकांश को लाने का श्रेय मुझे है किन्तु कभी किसी को नहीं सूझा। एक रामबक्ष ही है जिनको ये सूझा। रामबक्ष इतने प्रिय हैं कि ‘ना’ नहीं सुन सकते और वे जो तय कर लेते हैं, करके रहते हैं। इसलिए मुझे सिर झुकाना पड़ा कि जैसा कहो।”

इन संस्मरणों से नामवर जी के विभिन्न रूप परिलक्षित होते हैं। जब आप इस किताब की भूमिका पढ़ते हैं तो रामबक्ष – आपके सामने यह स्वीकारते हुए भी कि ‘नामवर जी मेरे लिए ‘सर्वोत्तम शिक्षक’ हैं –  उनके विभिन्न रूपों को सार्वजनिक रूप से ‘खोलने’ में नहीं हिचकते। कहा जा सकता है वे उन्हें ‘छोड़ते नहीं’ हैं। देखिए जरा, वे क्या कहते हैं – “लोगों के लिए वे शिक्षक हैं- आदरणीय शिक्षक। लेकिन वे सिर्फ हिन्दी साहित्य के शिक्षक मात्र नहीं हैं। उनके कई रूप हैं। वे सीधे-साधे, सरल भले मनुष्य नहीं है। वे पर्याप्त चौकन्ने व्यक्ति थे।.. वे लोगों को नौकरी देने में सक्षम थे। वे लेखकों को पुरस्कृत करवा सकते थे। उनकी पुस्तकें किसी बड़े प्रकाशक से छपवा सकते थे। ..भारत के कई प्रधानमंत्रियों के साथ चाय पीने वालों में उनका नाम सबसे ऊपर आता है।..उन्होंने हिन्दी के कई प्रकाशकों को मालामाल कर दिया। .. हिन्दी में वे चयन समितियों के बादशाह थे.. पुरस्कारों में भी मामवर जी भारी पड़ते थे।” इन सब के साथ किताब में ‘ गरबीली गरीबी’ के दौर के बेरोज़गार नामवर भी हैं तो शिक्षक, विभागाध्यक्ष, संपादक से लेकर चयन समितियों के अध्यक्ष नामवरसिंह भी। नामवर जी को लेकर उनके पुराने मित्र मैनेजर पाण्डेय कहते हैं – 

नामवर जी हिंदी साहित्य में दुविधा की तरह हैं और वे दुविधा पैदा भी करते हैं। जिसका सीधा संबंध उनके जन्मदिन से है। हम लोग दशकों तक यह जानते थे कि वे एक मई को पैदा हुए हैं। यह हुआ था या नहीं,अब वह बात महत्वहीन हो गई है तो नामवर जी 28 जुलाई को पैदा हो गए। यह दुविधा है। नामवरजी को बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से निकाला गया था, यह बात सब जानते हैं लेकिन क्यों निकाला गया। इसका मूल कारण ‘मेरे लिए नामवर जी’ से ही तुलसीराम के माध्यम से पता चलता है। वे बताते हैं – “1957-1958 में जब नामवर जी बनारस यूनिवर्सिटी में पढ़ाते थे, हिन्दी विभाग में, एक विचित्र कमीशन बैठाया गया यूनिवर्सिटी में। ‘मुदालियर कमीशन के नाम जाना था। उस कमीशन को जिम्मेदारी यह सौंपी गई थी कि बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय का स्तर गिरता जा रहा है, दिन-पर-दिन तो उसके लिए वह उपाए सुझाएँ, कि क्यों ऐसा हो रहा है। ‘मुदालियर कमीशन’ के बैकग्राउंड के बारे में मैं बता दूँ कि वहाँ बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में दक्षिण भारतीय प्रोफेसरों का बोलबाला था उस समय। उसका कारण यह था कि कुछ वाइस चांसलर वहाँ दक्षिण भारतीय थे। दक्षिण भारत में तो हिन्दी विरोधी एक भावना दक्षिण भारतीय लोगों के बीच में उस समय ज्यादा होती थी। तो ‘मुदालियर कमीशन’ ने जो रिर्पोट दी उसमें यह कहा गया कि कुछ पूर्वी उत्तर प्रदेश के 

प्रोफ़ेसर या अध्यापक बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में आ गए हैं, जिनकी वजह से बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में एजुकेशन का स्टैण्डर्ड गिर गया है। रिपोर्ट के चलते नामवर सिंह और हजारी प्रसाद द्विवेदी को निकाला गया।.. उसके कारण नामवर जी ने वर्षों तक एक तरह से बेरोजगारी का जीवन  बिताया।” अब किसी को नौकरी से निकाल दिया जाए और इस बात को कोई अच्छा बताए तो इसे आप क्या कहेंगे? लेकिन केदारनाथ सिंह हैं, जो इस बात से ख़ुश हैं कि यह तो अच्छा हुआ – “ कितना अच्छा हुआ कि नामवरजी को बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में नियुक्ति नहीं मिली.. नामवर जी अगर वहाँ अध्यापक हो गए होते, जे.एन. यू. का क्या होता?..अगर नामवर बनारस से नहीं आए होते और रह गए होते, तो जे.एन.यू. का ऐसा रूप नहीं होता। ये जे.एन.यू. का सौभाग्य था। हम भारतीय भाषा केन्द्र के प्रथम नागरिक का अभिनन्दन कर रहे है। जैसे राष्ट्र का प्रथम नागरिक होता है, डॉ. नामवर सिंह भारतीय भाषा केन्द्र के प्रथम नागरिक है और सौभाग्य से अब भी केन्द्र से जुड़े हुए है।”

केदारनाथ जी ने यह सौभाग्य जेएनयू के लिए माना लेकिन यही बात जेएनवीयू (जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय, जो उस समय जोधपुर विश्वविद्यालय था) के लिए ज़्यादा महत्वपूर्ण है क्योंकि जेएनयू का पाठयक्रम मूलतः जेएनवीयू (जोधपुर विश्वविद्यालय) में ही तैयार हुआ था। ज़ाहिर है, नामवर जी को काशी में भैरव जी का जो सोंटा लगा, वो जोधपुर और जेएनयू के लिए वरदान ही बना। जोधपुर में प्रोफ़ेसर बन के आए और हिन्दी विभाग के अध्यक्ष भी रहे। जोधपुर में जिनसे नामवर जी की निकटता रही उनमें अंग्रेजी विभाग के प्रो.श्याम डी कपूर और राजनीति विभाग के लक्ष्मण सिंह राठौड़ थे। ये दोनों उन प्रबुद्ध लोगों में से थे जिनके साथ नामवर जी का संवाद जोधपुर में रहने के दौरान से ही लगातार बना रहता था। फरवरी 1999 में प्रो. लक्ष्मण सिंह राठौड़ जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय (जोधपुर विवि) के कुलपति बने। कुलपति बनते ही उन्होंने विश्वविद्यालय में प्रो. नामवर सिं व्याख्यान माला की शुरुआत की। ‘मेरे लिए नामवर जी’ में दोनों ने उन्हें शिद्दत से याद किया है। नामवर जी मानते थे कि अध्यापक का काम सिर्फ दिए पाठ्यक्रम को पढ़ाना ही नहीं है, बल्कि अच्छा पाठ्यक्रम तैयार करना भी है। शिक्षा जगत् के भ्रष्टाचार का एक बड़ा गढ़ पाठयक्रम है।

प्रो. नामवर सिंह ने इस गढ़ में सबसे पहले जोधपुर विश्वद्यिालय में दख़ल दिया। उन्होंने लगभग 50 वर्षों बाद हिन्दी पाठ्यक्रम का ढाँचा बदला। यहाँ से जो नामवारसिंह का विरोध हुआ, उनके विरूद्ध जो षड्यंत्र रचे गए,उसने हिन्दी साहित्य और अकादमिक जगत के भीतर जमे मवाद और नकारात्मकता को सतह पर ला दिया। नामवर जी ने पहली बार पाठ्यक्रम में हिन्दी के अनेक नए रचनाकारों को रखा। कुँवरनारायण, राही मासूम रजा का ‘आधा गाँव’ आदि। ‘आधा गाँव’ को केन्द्र बनाकर डॉ. नामवर सिंह के विरोध में जोधपुर जो सुनियोजित आन्दोलन शुरू हो गया। इस मुद्दे पर जोधपुर के तमाम प्रतिक्रियावादी लोग संगठित हो गए। हिन्दी विभाग में भी थोड़ा बहुत विरोध हुआ व विभाग की पाठ्यक्रम समिति के तीन वरिष्ठ सदस्यों ने ‘आधा गाँव’ के विरोध में अखबार में बयान भी दिए। दिलचस्प बात यह विरोध ‘आध गाँव’ के पाठ्यक्रम में लगने के तीन वर्ष बाद में शुरू हुआ। वास्तव में नए पाठ्यक्रम के बनने से जिन लोगों के आर्थिक हितों व वैचारिक खेमों पर ये चोट पहुँची थी, उन्होंने अवसर की तलाश की और इस मुद्दे पर वे सब एक हो गए। डॉ. नामवर सिंह के पाठ्ययक्रम पर दो प्रमुख आरोप गए-एक तो यह कि डॉ. नामवर सिंह अपने पाठ्यक्रम के द्वारा कम्युनिस्ट विचारों का प्रचार कर रहे हैं और दूसरा, पाठ्यक्रम में ‘आधा गाँव’ जैसी अश्लील पुस्तक पढ़ाई जा रही हैं।

डॉ. नामवर सिंह ने सिर्फ एम. ए. हिन्दी का ही नहीं, बल्कि बी.ए. के पाठ्यक्रम में भी व्यापक परिवर्तन ही नहीं किए बल्कि पूरा ढाँचा बदल दिया। बी. ए. में पहले निजी प्रकाशकों की पुस्तकें चलती थीं। उन्होंने तत्कालीन कुलपति वी.वी. जॉन से विचार-विमर्श करके उन सब को हटा दिया और बी.ए. के लिए नए संकलन तैयार करवाए तथा उनके प्रकाशन वितरण का जिम्मा विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपने हाथ में लिया। अनिवार्य हिन्दी की इन पुस्तकों में कई उर्दू रचनाकारों को भी स्थान दिया। (हिन्दी में यह काम शायद पहली बार हुआ) जाहिर है इससे पाठ्यक्रम से जुड़े हुए भ्रष्टाचार की नींव हिली और उन लोगों ने नामवर जी के विरोध का माहौल बनाया। ‘आधा गाँव’ संबंधी विवाद का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू यह था कि हिन्दी के साहित्याकरों ने पहली बार हिन्दी पाठ्यक्रम में रुचि दिखाई और इस बिन्दु पर डॉ. नामवर सिंह का साथ दिया। नामवर जी के विरोध का कोई मौका न चूकने वाले धर्मवीर भारती ने भी ‘धर्मयुग’ में उनका इस मुद्दे पर समर्थन किया। लेकिन हुआ यह कि विरोध और षड्यंत्रों से खिन्न होकर मौका मिलते ही नामवर जी ने जोधपुर को अलविदा कह दिया और जेएनयू पहुंच गए। बाद में उन्होंने जोधपुर विश्वविद्यालय के इस पाठ्यक्रम को ही जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में और अधिक विकसित किया। जेएनयू के अपने अनुभवों को साझा करते हुए प्रो.आनंद कुमार लिखते हैं,” मैं तो नामवर जी के बगल में पहले एक समाजशास्त्री था। पड़ोसी था, भारतीय भाषा केन्द्र का शिक्षक बना, फिर मैंने देखा कि नामवर जी एक शिक्षक के रूप अपने विद्यार्थियों के साथ आचरण कैसे करते हैं। जैसा एक कुम्हार मिट्टी के साथ करता है। उन्होंने भी उसे गढ़ने में अपना पूरा कौशल लगा दिया, फिर उसे स्वतंत्र कर दिया और अपना कोई सम्प्रदाय विकसित नहीं किया।”

रामबक्ष इसे आगे बढ़ाते हैं – “दरअसल,नामवर जी के छात्रों के कई स्तर हैं। कुछ ऐसे हैं जिन्होंने उनसे कक्षा में पढ़ा है जैसे विश्वनाथ त्रिपाठी, केदारनाथ सिंह। कुछ ऐसे हैं जिन्होंने उनके साथ शोध-कार्य किए हैं। बी.ए. से लेकर पी-एच.डी. तक अध्ययन करने वाला तो मैं इकलौता छात्र ही हूँ। तुलसीराम उनको द्रोणाचार्य की तरह अपना गुरु मानते हैं। राजकमल प्रकाशन के अशोक माहेश्वरी उनके सामने अपने को शिष्यवत् मानते हैं। बनारस, जोधपुर और दिल्ली में उनके अनेक छात्र रहे हैं जो इस बात पर गर्व करते हैं कि वे नामवर जी के छात्र हैं। हालांकि विश्वनाथ त्रिपाठी और नामवर जी दोनों आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के शिष्य थे लेकिन एक समय में कभी नामवर जी ने विश्वनाथ त्रिपाठी को पढ़ाया भी था, इस बात त्रिपाठी जी यहाँ विनम्रता से स्वीकारते भी हैं – “मैं नामवर जी का सतीर्थ भी हूँ, नामवर जी का शिष्य भी हूँ।” उनके आगे त्रिपाठी जी स्वयं को ज्ञानलवदुविर्दग्ध ही मानते हैं। सबने नामवर जी से कुछ-न-कुछ पाया है। बकौल रामबक्ष जी, नामवर जी शिक्षक के साथ-साथ आपकी नौकरी की भी चिंता करते हैं। कई बार आपके बदले में, आपके लिए जोड़-तोड़ करते हैं। आपको पता भी नहीं चलता कि आपके लिए उन्होंने क्या किया?

‘मेरे लिए नामवर जी’ विषयक कार्यक्रम में वीरभारत तलवार ने कहा, “मेरे लिए नामवर जी का क्या महत्त्व है, ये अगर सिर्फ एक वाक्य में कहूँ तो मैं कहूँगा कि मैं इस समय इस विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केन्द्र के प्रोफ़ेसर के रूप में जो आपके सामने खड़ा हूँ, वो नामवर जी के ही कारण। नामवर जी मेरे जीवन में अगर न होते तो जे.एन.यू. में मैं आज पढ़ा रहा होता या नहीं यह कहना निश्चित रूप से असम्भव है।” जो भी हो, नामवर जी भी तो सिफ़ारिश करते थे और सिफ़ारिश मानते भी थे। कभी-कभी उनको विवश भी कर दिया जाता था। एक बार उनके एक छात्र ने अपनी पुस्तक पर ‘आलोचना’ का एक विशेषांक निकलवा लिया। वे कई दिनों तक अपने इस कार्य से दुःखी होते रहे।’ रामबक्ष जी हालांकि यहाँ छात्र का नाम उजागर नहीं करते लेकिन दिल्ली के साहित्यिक गलियारों की कानाफूसी के मुताबिक वे छात्र ‘अत्यंत उत्तम पृष्ठभूमि’ के थे। हर जगह मजबूती का नहीं, अधिकांशतः मजबूरी का ही नाम है, हर युग में गांधी नाम की लूट मची है। कल के गांधी के नाम पर भी तो आज के गांधी की छत्रछाया में भी।दिल्ली और जेएनयू साक्षी है कि उस छात्र ने नामवर जी के अंतिम दिनों में उनकी कैसी उपेक्षा की थी। कबीर के इस दोहे में सारा सार निहित है, इसके लिए कबीर साहित्य का (स्वयंभू) विशेषज्ञ बनने की भी आवश्यकता नहीं है –

सुख के संगी स्वार्थी, दुःख में रहते दूर।
कहैं कबीर परमारथी, दुःख सुख सदा हजूर॥

ख़ैर..इसी मौके पर आलोचक निर्मला जैन ने नामवरजी के मिस दिल्ली की आधी दशक की साहित्य यात्रा से परिचित करवा दिया। निर्मला जी ने एक बात बड़ी रोचक कही – “ पचास सालों से समापन भाषण दे रहे हैं नामवरजी दिल्ली में और पूरे भारत में समापन भाषण नामवर जी का ही होता है।” दरअसल इसके मूल में जो महत्वपूर्ण बात होती थी, वो थी नामवर जी की गहन अध्ययनशीलता। नामवर जी के गंभीर अध्यवसाय का हिन्दी पर कितना प्रभाव पड़ा है, यह बताते हैं गंगाप्रसाद विमल – “ अगर आप‌को भविष्य के साहित्य के बारे में कोई परिज्ञान चाहिए तो नामवर जी मिलना चाहिए क्योंकि नामवर जी जो हैं वो अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया उन दिनों के सोवियत रूस इन सब के सब जगहों के साहित्य की नई चीजें पढ़ते थे और फिर लोगों को एक तरह से केवल ये बताने के लिए नहीं कि उन्होंने पढ़ी है, ऐसा नहीं, बल्कि ये बताने के लिए कि हिंदी में और क्या कर सकते हैं? और इससे हिन्दी का भविष्य और क्या हो सकता है? ऐसी कोई योजना नहीं थी कि वे योजनाबद्ध ढंग से सोचते हों परन्तु हिंदी पिछड़ी न दिखाई दे, हिन्दी एक ऐसी | जागृत भाषा के रूप में दिखाई दे जैसी वो आज है।

आज हम बड़े गौरव से कह सकते हैं कि भारतीय भाषाओं में हिन्दी एक ऐसे सेतु के रूप में काम करती है, जो चीज हिन्दी में आ जाती है उसे लोग अन्य भाषाओं में अनुदित करने के लिए हिन्दी का ही सहारा लेते हैं। परन्तु इसके अतिरिक्त विश्व की भाषाओं में जो अद्यतन लिखा जा रहा है उससे हिन्दी का वो पिछड़ापन तब दूर होता है जब उसमें नामवर जी जैसे लोग बसे होते हैं।” यही बात श्याम डी.कपूर भी बताते हैं,” नामवर जी नियमित रूप से पार्टीजन रिव्यू, न्यू लेफ्ट रिव्यू, न्यू लिटरेरी हिस्ट्री, हायर एजुकेशन सप्लीमेंट, न्यूयार्क रिव्यू ऑफ बुक्स नियमित रूप से पढ़ते थे। इसी किताब में नामवर जी अपनी आलोचना यात्रा की चर्चा करते हुए स्पष्ट करते हैं कि “मुझे राजशेखर की ‘काव्य मीमांसा’ बहुत प्रिय है।..आलोचना लिखते समय बराबर मेरे सामने राजशेखर का यह (तत्वाभिनिवेशी) मानदंड रहता है।” और यदि आप नामवरजी की संपूर्ण आलोचना के तत्व के अभिनिवेशी हैं, उस यात्रा का सूक्ष्म मूल्यांकन चाहते हैं तो रामबक्ष का ही लिखा ‘मन के शिक्षक’ और परिशिष्ट दो पढ़ लीजिए, कई जिज्ञासाओं का समाधान हो जाएगा,कई प्रश्नों के उत्तर मिल जाएंगे। नामवर सिंह सिर्फ एक व्यक्ति नहीं थे। वे हमारे समय की सांस्कृतिक उत्पाद थे। हिंदी आलोचना नामवर जी के बगैर अपूर्ण है। हिन्दी का कोई विद्यार्थी, शोधार्थी, विद्वान नामवर जी के कहे-लिखे को सुने-पढ़े बगैर नहीं रह सकता।

अफ़सोस कि फिनलैंड के विख्यात कम्पोज़र जीन सिबेलियस करीब सत्तर साल पहले दुनिया से चले गए। आज अगर वे होते तो नामवर जी की जो स्मृति-प्रतिमाएं हिंदी साहित्यिक-संसार के मन-मस्तिष्क में दृढ़ता से स्थापित हैं, उन्हें देखकर, महसूस कर वे चुपचाप अपने ये शब्द वापस ले लेते-

“ Pay no attention to what the critics say. A statue has never been erected in honor of a critic.”

मेरे लिए नामवर जी – रामबक्ष जाट 
कुटज पब्लिकेशन, दिल्ली – 16
संस्करण – 2023
मूल्य – तीन सौ रुपए 

यह भी पढ़ें- पुस्तक समीक्षाः कारा- मनुष्य से कनेक्ट करती कहानियाँ

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हरीश शिवनानी
हरीश शिवनानी वरिष्ठ पत्रकार हैं और अभी स्वतंत्र लेखन कर रहे। ईमेल[email protected] Mob.9829210036
हरीश शिवनानी
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