नई दिल्ली: मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला परिसर का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। मुस्लिम पक्ष ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के हालिया फैसले को चुनौती दी है जिसमें परिसर को हिंदू मंदिर मानने और हिंदु समुदाय को पूजा अधिकार दिया गया था। काजी मोइनुद्दीन नाम के एक व्यक्ति ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 15 मई को यह फैसला सुनाया था कि यह संरचना धार्मिक दृष्टि से मंदिर के रूप में है। अदालत ने अपने फैसले में कहा, “भोजशाला परिसर और कमाल मौला मस्जिद का विवादित क्षेत्र संरक्षित स्मारक है। भोजशाला परिसर और कमल मौला मस्जिद के विवादित क्षेत्र की धार्मिक दृष्टि से यह क्षेत्र देवी सरस्वती के मंदिर सहित भोजशाला है।”
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने भोजशाला पर क्या फैसला सुनाया था?
जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने अपने फैसले में भोजशाला परिसर को राजा भोज की संपत्ति और हिंदू मंदिर माना था। अदालत ने इस दौरान कहा था कि हिंदू समुदाय का पूजा का अधिकार कभी समाप्त नहीं हुआ।
हाई कोर्ट ने यह भी कहा था कि परिसर में नमाज की अनुमति देने वाली 7 अप्रैल 2003 की भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की व्यवस्था स्थल के मूल स्वरूप के अनुरूप नहीं थी। इस दौरान अदालत ने हिंदू पक्ष को पूजा का अधिकार देते हुए मुस्लिम समुदाय के लिए अलग स्थान पर मस्जिद निर्माण हेतु वैकल्पिक जमीन देने पर विचार करने की बात कही थी।
यह भी पढ़ें – भोजशाला में अब केवल पूजा होगी, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का फैसला- ये वाग्देवी का मंदिर; नमाज पर रोक
पीठ ने अपने फैसले में 2024 के पुरातात्विक सर्वेक्षण का भी उल्लेख किया था जिसमें संस्कृत शिलालेख, हवन कुंड और हिंदू मंदिर वास्तुकला से जुड़े कई प्रमाण मिलने की बात कही गई थी।
हाई कोर्ट के फैसले के बाद एएसआई ने जारी किया आदेश
अदालत के फैसले के बाद एएसआई ने 16 मई 2026 को नया आदेश जारी कर हिंदू समुदाय को भोजशाला परिसर में पूजा और मां सरस्वती से जुड़े अध्ययन कार्यों के लिए बिना रोक-टोक प्रवेश की अनुमति दी थी। हालांकि संरक्षित स्मारक होने के चलते इसका प्रशासनिक नियंत्रण एएसआई के पास ही रहेगा।
हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह प्रयास करने का भी निर्देश दिया था कि लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी मां सरस्वती की प्राचीन प्रतिमा को भारत वापस लाया जाए। समचाार एजेंसी आईएएनएस के मुताबिक, हिंदू पक्ष ने भी सुप्रीम कोर्ट में कैविएट याचिका दाखिल कर अनुरोध किया है कि हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ किसी भी याचिका पर बिना उनका पक्ष सुने कोई अंतरिम आदेश पारित न किया जाए। यह कैविएट याचिका जितेंद्र सिंह विशेन ने दायर की गई है।
यह भी पढ़ें – भोजशाला विवाद पर हाई कोर्ट में हिंदू और मुस्लिम पक्षकारों ने क्या-क्या दलीलें दी थी? ASI के सर्वे में क्या था
गौरतलब है कि भोजशाला विवाद लंबे समय से मध्य भारत के सबसे संवेदनशील धार्मिक और ऐतिहासिक मामलों में शामिल रहा है। हिंदू पक्ष का दावा है कि यह स्थल 1034 ईस्वी में राजा भोज द्वारा मां सरस्वती के मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र के रूप में स्थापित किया गया था जबकि मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यहां सदियों से कमाल मौला मस्जिद मौजूद है और पूर्व प्रशासनिक व्यवस्थाओं के जरिए इस स्थल की कानूनी स्थिति पहले ही तय की जा चुकी है।
(आईएएनएस से इनपुट्स के साथ)

