कुछ शायर अपनी किताबों में नहीं रहते। वे लोगों की ज़िंदगी में रहने लगते हैं। किसी बरसाती शाम में, किसी उदास सफ़र में, किसी पुरानी डायरी के पन्ने पर, किसी अधूरी मोहब्बत की टीस में, किसी अकेले आदमी की चुप्पी में; अचानक उनका कोई शेर सामने आकर बैठ जाता है। तभी लगता है कि कविता साहित्य भर नहीं, मनुष्य के भीतर जलती हुई एक अनवरत पर धीमी-सी लौ है, वह लौ जो सबसे अँधेरे दिनों में भी नहीं बुझती। बशीर बद्र ऐसे ही शायर थे।
मेरे लिए वो अपने शेरों के सिवा जहां ठहरे हुये हैं, वो एक लम्हा है, 1999 में उर्दू भाषा के लिए ‘आस’ किताब के लिए उन्हें साहित्य अकादमी मिलने का दिन। मुझे दिल्ली आये कुछ महीने ही हुए थे, स्वभाव से हमेशा की संकोची रही हूं। पर भीड़ के कारण देर तक उनको भोजन तक न पहुंच पाते देख मैं भागकर कतार में लगी थी और उनके लिए खाना परसकर लेती आई थी।
फिर अन्य कई वरिष्ठ आगंतुक भी मुझसे निवेदन करने लगे थे। मैंने उनकी बात अनसुनी कर दी थी। मेरी यह कोशिश मेरे प्रिय शायर के लिए थी। उनके खाने तक मैं चुपचाप रुकी रही। फिर खा चुकने के बाद हठात् न जाने क्या हुआ था कि ऑटोग्राफ के लिए मैंने अपना नोटबुक उनकी तरफ बढा दिया था। उन्होंने निमिष मात्र को मेरी ओर देखा था। और मेरी कॉपी में उनका इक शेर दर्ज हो आया था-
‘मैं हर लम्हें में सदियां देखता हूं,
तुम्हारे साथ, इक लम्हा बहुत है।’
उस वक्त तो मैं सचमुच धन्य-धन्य हो आई थी। किस- किसको न दिखाया होगा वो नोटबुक। फिर अच्छे से उसे सहेजकर रख देती। अब भी वह कॉपी है मेरे पास, पुराने नोटबुकों के बीच कहीं दबी हुई…
इस खुशी का वायस एक दूसरी बात भी थी- इस मीटर के शेर तो मिले मुझे मिले उनके संग्रहों में, पर यह कहीं नहीं मिला। हो सकता है यह न मिलना सिर्फ एक संयोग भी हो, पर जमाने तक दिल को बहलाने के लिए यह खयाल काफी रहा।
यूं भी ये दिन उन दीवाने दिनों के ठीक बाद के दिन थे जब बशीर बद्र, परवीन शाकिर और निदा साहब, न सिर्फ हर्फ-दर-हर्फ पढे जा रहे थे, समझे और गुने जा रहे थे, बल्कि मेरे लिए सिरहाना और तकिया भी हुये जा रहे थे। प्रेम में होना, प्रेम को जीना और उसे बहुत हद तक समझना या समझने की कोशिश करना इन्हीं से सीखा था। और यह मेरा नहीं हमारी एक पूरी पीढी का साझा बयान है।
इसीलिए आज जब उनके जाने की ख़बर आई तो लगा जैसे अपनी जिंदगी के कुछ सुनहरे पन्ने फड़फड़ाकर उड़ गयें या फिर फट गये हों अधबीच से, शायद मुझ से ही।
स्मृति का बुझता हुआ दीपक
बशीर बद्र के चले जाने से हिंदुस्तानी साझा तहज़ीब का कोई आख़िरी नरम लहजा चुप हो गया। जैसे किसी पुराने घर की वह खिड़की बंद हो गई हो, जहाँ से बरसों तक धूप आती रही थी। यह अजीब-सी उदासी थी, यह उदासी आखिर थी भी तो क्यों, जबकि सच तो यह है कि वो पिछले डेढ़ दशक के आसपास से धीरे-धीरे हमसे दूर होते जा रहे थे, और दुनिया उनसे। डिमेंशिया ने उनकी स्मृतियों पर धुंध बिछा दी थी। वे हमारे बीच थे, मगर यादों की सीढ़ियाँ उतरते हुए कहीं बहुत भीतर खोते जा रहे थे। कितनी करुण विडंबना है कि जिसने पूरी उम्र लोगों की यादों को भाषा दी, अंततः वही स्मृति के अँधेरे में खो गया-
‘उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।’
आज यह शेर पढ़ते हुए लगता है जैसे बशीर बद्र ने अनजाने में अपनी ही अंतिम यात्रा लिख दी थी।
यह बीमारी केवल याददाश्त नहीं लेती; यह मनुष्य के भीतर बसे पुराने समय को, उसकी यादों को भी चुरा लेती है। चेहरे धुँधले होने लगते हैं, नाम खो जाते हैं, स्मृतियों के कमरे बंद होने लगते हैं। जैसे बारिश में रखी हुई स्याही फैलती चली जाए और आख़िर में केवल काग़ज़ बचा रह जाए। जो शायर पूरी उम्र लोगों की यादों में रहा, वही अपनी यादों से दूर होता चला गया। वह लोगों से दूर होता चला गया और लोग उससे। पर उसके शेर बहुत जिद्दी थे, वे लोगों की स्मृतियों में दर्ज और काबिज रहें। और इस तरह वह भी बतौर शायर जिंदा रहा और जगमगाता हुआ भी। जबकि जिंदगी रोज- ब- रोज अंधेरे के दलदल में धंसती जा रही थी…
उनसे मिलने वाले लोग बताते थे कि कभी-कभी वह पहचानते थे, कभी नहीं। यह दृश्य उनके चाहनेवालों के लिए बहुत तकलीफ़देह था। मैंने (और अन्य बहुतों ने भी) तब एक वीडियो सोशल मीडिया पर देखा, वो अपने घर में, पत्नी और पत्रकारों के संग हैं। वे किसी को भी नहीं पहचान रहें, उन्हें उनकी पत्नी उनकी हीं पंक्तियां सुना रहीं, दुहरा रहीं। वे उसे अजनबियों की तरह दुहरा रहे। कभी- कभी पहचान की कोई किरण उगती है उन आंखों में, चमक की तरह। उन्हें आगे के शब्द स्मृत होते हैं, वे उन्हें दुहराते हैं, लेकिन आगे फिर वही बेनाम अंधेरा… जैसे कोई बहुत रोशन घर धीरे-धीरे अँधेरे में डूब रहा हो। और तब उनके कुछ पुराने शेर एक नई उदासी से भरकर मेरे भीतर जागने लगे थे।
‘मैं चुप रहा तो और ग़लतफ़हमियाँ बढ़ीं,
वो भी सुना है उसने जो मैंने कहा नहीं।’
डिमेंशिया के अँधेरे में उतरता हुआ आदमी शायद सचमुच बहुत कुछ कहना चाहता है, लेकिन शब्द उसका साथ छोड़ने लगते हैं। दृश्य उसकी पहचान से गुमने लगते हैं।
बच्चों की तरह उनका खयाल रखती हुईं उनकी पत्नी जैसे अपने इन शब्दों में यही कह रही थीं- शोहरत की बुलंदी भी, इक पल का तमाशा है/ जिस शाख पे बैठे हो, वह टूट भी सकती है…’ ‘ – जब तक हवास में थे, घर में पांव कभी टिके ही नहीं। अब जब… तो मैं हूं, ये घर है, ये दीवारें और इसके बीच पसरा हुआ यह सन्नाटा।’ आज उनके बगैर उनका यह घर और कितना अकेला हुआ होगा… सन्नाटा और कितना ज्यादा गहरा…
मोहब्बत को इंसानी लहजा देने वाला शायर
बशीर बद्र की शायरी की सबसे बड़ी ख़ूबी उसकी आत्मीयता है। उन्होंने ग़ज़ल को मुश्किल अल्फ़ाज़ और ऊँची बौद्धिक चौकियों से उतारकर आम आदमी की ज़िंदगी के पास बैठाया। उनकी कविता में किताबों की ठंडी विद्वता नहीं, मनुष्यता की गरम साँसें हैं। उनके शेर पढ़ते हुए हमेशा लगता है कि कोई बहुत अपना आदमी बहुत मद्धिध स्वर में हमसे बात कर रहा हो। बिना शोर, बिना प्रदर्शन, बिना किसी बनावटी गहराई के। उनकी ग़ज़लें इसलिए लोकप्रिय हुईं क्योंकि वे लोगों को अपनी आवाज़ लगती थीं। उन्हें पढ़ते हुए लगता था कि यह शायर हमारी ही कोई अनकही बात कह रहा है।
उन्होंने प्रेम को कभी शोर नहीं बनाया। उनके यहाँ मोहब्बत धीरे-धीरे आती है, जैसे बंद कमरे में धूप उतरती है-
‘मोहब्बतों में दिखावे की दोस्ती न मिला,
अगर गले नहीं मिलता तो हाथ भी न मिला।’
बशीर बद्र की लोकप्रियता का एक कारण यह भी था कि उन्होंने प्रेम को बहुत निजी, बहुत घरेलू और बहुत मानवीय ढंग से लिखा। उनके यहाँ प्रेम केवल बड़ी घोषणाओं में नहीं आता; वह कपड़ों, मौसमों, इंतज़ारों और छोटी चीज़ों में उतरता है-
‘वो जाफ़रानी पुलोवर उसी का हिस्सा है,
कोई जो दूसरा पहने तो दूसरा ही लगे।’
यह शेर केवल प्रेम का नहीं, अनुपस्थिति का शेर है। किसी व्यक्ति की मौजूदगी कैसे चीज़ों में बस जाती है, इसे इससे सुंदर ढंग से शायद ही कहा जा सकता है।बशीर बद्र की मोहब्बत में स्मृति बहुत गहरी है। लोग चले जाते हैं, मगर उनकी चीज़ें, उनकी आवाज़ें, उनका स्पर्श रह जाता है।
‘अजीब शख़्स है नाराज़ हो के हँसता है,
मैं चाहता हूँ ख़फ़ा हो तो वो ख़फ़ा ही लगे।’
या—
‘उसे किसी की मोहब्बत का ऐतबार नहीं,
उसे ज़माने ने शायद बहुत सताया है।’
उनकी शायरी इसलिए इतनी लोकप्रिय हुई क्योंकि उसमें प्रेम किसी फ़िल्मी कल्पना की तरह नहीं, जीवन की तरह आता है। टूटा हुआ, झिझकता हुआ, लेकिन सच्चा।
बशीर बद्र ने विभाजन के बाद का भारत देखा, बदलते हुए शहर देखे, रिश्तों की थकान देखी और मनुष्य के भीतर धीरे-धीरे बढ़ती हुई वीरानी महसूस की। उन्होंने देखा कि लोग पास आते गए, मगर दिल दूर होते गए-
‘यही बहुत है कि तुमने पलट के देख लिया,
ये लुत्फ़ भी मेरी उम्मीद से ज़्यादा है।’
कितनी छोटी-सी बात, और कितना गहरा अकेलापन। धीमी उदासी। कई बार धीमी आवाज़ें ज़्यादा देर तक बची रहती हैं-
‘कभी यूँ भी आ मेरी आँख में कि मेरी नज़र को ख़बर न हो,
मुझे एक रात नवाज़ दे मगर उसके बाद सहर न हो।’
उनके शेरों में प्रेम है, मगर वह प्रेम हमेशा थोड़ा उदास रहता है। जैसे उन्हें मालूम हो कि दुनिया में कोई चीज़ हमेशा नहीं रहती।
मुशायरों की चमक से लोगों के दिल तक
बशीर बद्र उन शायरों में थे जिन्हें केवल साहित्यिक हलकों ने नहीं, आम लोगों ने भी प्यार किया। उनके शेर मुशायरों से निकलकर लोगों की रोज़मर्रा की भाषा का हिस्सा बन गए। प्रेमपत्रों में, डायरी के पन्नों पर, स्टेशन की किताबों की दुकानों में, कॉलेज की बातचीतों में, टूटे हुए दिलों में, खोये हुये अफसानों में, यहां तक कि वो ट्रक के पीछे लिखी गयी पंक्तियों में भी मौजूद थे-
‘ उजाले अपनी यादों के, हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में जिंदगी की शाम हो जाये।’
‘मुसाफिर हैं हम भी, मुसाफिर हो तुम भी/किसी मोड़ पर फिर मुलाकात होगी.’..
उनकी लोकप्रियता का सबसे बड़ा रहस्य यही था कि वे कठिन बातों को बहुत सहज ढंग से कह देते थे। लेकिन वह सहजता सतही नहीं थी; उसके पीछे जीवन का लंबा अनुभव और गहरी संवेदना थी-
‘सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जाएगा,
इतना मत चाहो उसे वो बेवफ़ा हो जाएगा।’
या—
‘अँधेरा घर में कैसे ठहर गया यारो,
कोई तो टूट के बिखरा है रोशनी की तरह।’
अगर उनके मानवीय करुणा और तहज़ीब वाले हिस्से को याद में रखना हो, तो यह शेर हजारहां याद आता है, और याद आता रहेगा—
‘बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना,
जहाँ दरिया समंदर से मिला दरिया नहीं रहता।
परखना मत परखने में कोई अपना नहीं रहता,
किसी भी आईने में देर तक चेहरा नहीं रहता।’
उन्होंने जीवन की सबसे मुश्किल बात सबसे आसानी से कह दी थी। वह भी किसी स्वगत कथन या भाषण के रूप में नहीं, बस दो पंक्तियों में। आज जब दुनिया लगातार कठोर से कठोरतर हुई जा रही, यह शेर और ज़्यादा ज़रूरी हुआ जाता है। इसमें जीवन की समूची दार्शनिकता है, जीवन को आसान किये जाने का एक बड़ा गुर है। पर जो चीजें आसान होती हैं क्या सचमुच वो आसान होती हैं? उनसे मुश्किल और दुरूह भी कुछ हुआ है भला?
एक जला हुआ घर और राख में बदलती स्मृतियाँ
बशीर बद्र केवल प्रेम और उदासी के शायर नहीं थे। उनकी ज़िंदगी में आग भी थी, धुआँ भी था, और उजड़ जाने का भयावह अनुभव भी। वह भी एक नहीं दो-दो बार। इस एक शेर में पूरा बदलता हुआ समय कैद है। शहर बड़े होते गए, मगर आदमी भीतर से सिकुड़ता गया। रिश्ते बचे रहे, आत्मीयता कम होती गई।
‘कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है, ज़रा फ़ासले से मिला करो।’
इस एक शेर में पूरा बदलता हुआ समय कैद है। शहर बड़े होते गए, मगर आदमी भीतर से सिकुड़ता गया। रिश्ते बचे रहे, आत्मीयता कम होती गई। उन्होंने आधुनिक मनुष्य के अकेलेपन को बहुत नरम, लेकिन बहुत गहरे ढंग से लिखा।
वे लोगों को कठघरे में खड़ा करने वाले शायर नहीं थे। वे टूटे हुए लोगों को समझते थे। शायद इसलिए उनके यहाँ शिकायत भी आती है तो करुणा के साथ। उन्होंने प्रेम को कभी चीख़ नहीं बनाया। उनके यहाँ प्रेम धूप की तरह आता है। धीरे, चुपचाप, घर के भीतर फैलता हुआ। इसीलिए ‘कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी/यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता।’ केवल प्रेम का नहीं, मनुष्य को समझने की समझ का शेर है।
मेरठ के सांप्रदायिक दंगों में उनका घर जला दिया गया। किताबें, काग़ज़, स्मृतियाँ, पांडुलिपियाँ : सब आग में चले गए। एक लेखक के लिए घर का जलना केवल संपत्ति का नष्ट होना नहीं होता; वह उसकी आत्मा का एक हिस्सा जल जाने जैसा होता है। उसी राख से वह शेर निकला, जो अब इस देश की अंतरात्मा में दर्ज है-
‘लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में।’
यह केवल दंगों का बयान नहीं है; यह मनुष्य की क्रूरता के विरुद्ध एक थरथराती हुई पुकार है। इसमें एक ऐसे आदमी का दुख है जिसने अपना उजड़ा हुआ घर देखा था। बशीर बद्र की शायरी में घर बार-बार लौटता है। शायद इसलिए कि जिसने घर खोया हो, वह जीवन भर भीतर-भीतर एक घर खोजता रहता है।
उनके यहाँ शहर भी आते हैं, धुआँ भी, बिछड़न भी और वह बेचैनी भी, जो हिंसा के बाद लंबे समय तक मनुष्य के भीतर रहती है-
“किसने जलाई बस्तियाँ, बाज़ार क्यों लुटे,
मैं चाँद पर गया था, मुझे कुछ पता नहीं।’
इस शेर की सादगी जितनी मासूम दिखती है, उसका व्यंग्य उतना ही भयावह है। यह उस समाज पर टिप्पणी है जो विज्ञान, विकास और उपलब्धियों पर गर्व करता है, लेकिन अपने ही पड़ोस में जलती हुई बस्तियों के सामने अंधा बना रहता है।
वह अजीब विरोधाभास
बशीर बद्र की ज़िंदगी का एक ऐसा पहलू भी रहा जिसने बहुत लोगों को असमंजस और दुख में डाला। जिस शायर ने सांप्रदायिक हिंसा में अपना घर खोया, जिसने बस्तियों के जलने पर इतने मार्मिक शेर लिखे, वही बाद के वर्षों में भाजपा के निकट दिखाई दिया। यह प्रश्न आज भी लोगों को बेचैन करता है। उनके इस विचलन को उन्हीं के इस शेर से समझने की कोशिश की-‘ कुछ तो मजबरियां रही होंगी’…
मनुष्य केवल विचारधारा से नहीं बना होता; वह अकेलेपन, असुरक्षाओं, समय, बीमारी, सामाजिक संबंधों और जीवन की थकान से भी बनता है। बड़े रचनाकार भी अपनी कमज़ोरियों, विरोधाभासों और उलझनों के साथ अंततः मनुष्य ही होते हैं। संभव है कि उनके जीवन के कुछ निर्णय उनकी कविता के नैतिक संसार से मेल न खाते हों। मगर यह भी उनके जीवन का उतना ही बड़ा सच है कि उनकी शायरी आज भी नफ़रत के बरक्स मोहब्बत और मनुष्यता की तरफ़ खड़ी दिखाई देती है। रचनाकार अपने जीवन से छोटे साबित हो जाते हैं, मगर उनकी रचना उनसे बड़ी बनी रहती है। बशीर बद्र की कविता भी उनसे बड़ी है। उनके उहापोहों और विचलन से भी..
एक टूटते हुए समय की नरम आवाज़
बशीर बद्र उस पीढ़ी के शायर थे जिसने विभाजन के बाद का भारत देखा, बदलते हुए शहर देखे, टूटते हुए रिश्ते देखे और मनुष्यता के भीतर धीरे-धीरे बढ़ती हुई ठंडक महसूस की। उन्होंने देखा कि आदमी के पास साधन बढ़ते गए, मगर सुकून कम होता गया। संवाद बढ़े, मगर आत्मीयता घटती गई। इसलिए उनके शेरों में एक अजीब-सी उदासी रहती है। जैसे कोई आदमी भीड़ में खड़े-खड़े अचानक अपने अकेलेपन को महसूस कर ले।
‘दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे,
जब कभी हम दोस्त हो जाएँ तो शर्मिंदा न हों।’
यह केवल एक अच्छा शेर नहीं, एक सभ्य समाज का सपना है। आज जब हर तरफ़ नफ़रत इतनी तेज़ आवाज़ में बोल रही है, बशीर बद्र की धीमी और मुलायम आवाज़ और भी ज़रूरी लगती है।
कुछ लोग मरने के बाद इतिहास में दर्ज होते हैं। कुछ लोग लोगों की यादों में। बशीर बद्र दूसरी तरह के शायर थे। वे जब भी याद आएँगे, किसी अकेली शाम की तरह आएँगे। किसी पुराने दोस्त की तरह। किसी ऐसे मनुष्य की तरह जिसने हमारे दुखों को हमसे पहले पहचान लिया था।
उनकी ग़ज़लें इसलिए नहीं बचेंगी कि वे बहुत लोकप्रिय थीं। वे इसलिए बचेंगी क्योंकि उन्होंने मनुष्य के भीतर बची हुई नरमी को आवाज़ दी। जब कोई अपने उजड़े हुए घर को याद करेगा, जब कोई किसी बिछड़े हुए प्रेम की टीस महसूस करेगा, जब कोई इस कठोर समय में थोड़ी-सी मनुष्यता खोजेगा, तब बशीर बद्र याद आएँगे।
अब वे अपनी किताबों में कम, लोगों की ज़िंदगी में ज़्यादा मिलेंगे। किसी अकेले आदमी की मेज़ पर रखी चाय में, किसी पुराने प्रेमपत्र में, किसी जली हुई बस्ती की ख़बर में, किसी उदास रात में अचानक याद आ जाने वाले एक शेर में।
वे फिर-फिर याद आयेंगे। और शायद बहुत धीरे से उनका कोई शेर फिर हमारे भीतर उतर आएगा-
‘उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में,
फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते।’
सचमुच, कुछ शायर लौटकर नहीं आते। वे बस अपनी आवाज़ छोड़ जाते हैं, लंबे समय तक हमारे भीतर गूंजती हुई। सदा-सर्वदा ठहरी हुई। और इस ठहरने में वे भी ठहरें रह जाते हैं, हमारे बीच; हमेशा-हमेशा के लिए।


क्या कहूँ , एक एक शब्द दिल पर लग रहा है
बस विनम्र श्रद्धांजलि मेरे प्रिय शायर को
शुक्रिया नीलिमा जी!
प्रतीक्षा थी तुम्हारे आलेख की…कल जब बशीर बद्र के निधन की ख़बर सुनी तभी ख़्याल आया था कि आज तुम्हारा लिखा पढ़ने मिलेगा। और क्या ख़ूब लिखा है। तुम जानती हो मेरे पास शब्दों की कमी रहती है, मुझे जितना पसंद आता है उतनी तारीफ़ कर नहीं पाती हूँ। बस समझ जाना 😊 सारे काम छोड़ कर एक बैठक में पढ़ लिया।
शुक्रिया और स्नेह नमिता!