पिछले कुछ वर्षों से एक तबक़ा अकसर यह बताने में लगा है कि प्रेमचंद प्रगतिशील नहीं थे, वामपंथी नहीं थे, वह तो हिंदू संस्कृति के प्रशंसक थे, करुणा के लेखक थे वग़ैरह-वग़ैरह। वह कई बार यहाँ तक कह देता है कि प्रेमचंद का प्रगतिशील लेखक संघ के स्थापना सम्मेलन में जाना महज़ एक संयोग था और उन्होंने न तो उस सम्मेलन की अध्यक्षता की थी और न ही कोई अध्यक्षीय भाषण दिया था। और भी इस तरह के रोचक दावे किए जाते हैं। यह सब कहने वाले दरअसल सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की राजनीति के पैरोकार हैं, जो अपने विचार की वैधता साबित करने के लिए न सिर्फ़ इतिहास को तोड़-मरोड़ रहे हैं बल्कि साहित्य-संस्कृति के नायकों के अधिग्रहण में लगे हैं। वे यह साबित करना चाहते हैं कि उनका सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भारत की महान शख़्सियतों के विचारों का ही विस्तार है।
प्रेमचंद को ‘अपना’ बताने के लिए बड़ी चालाकी से उनके लेखों के कुछ अंश को उसके मूल संदर्भ से काटकर प्रस्तुत किया जाता है और कहा जाता है कि देखिए, प्रेमचंद तो हिंदू धर्म की तारीफ़ कर रहे हैं। देखिए, प्रेमचंद तो मार्क्सवाद की आलोचना कर रहे हैं। उनकी ऐसी कहानी का ज़िक्र किया जाता है, जिसमें इस्लामिक कट्टरपंथ की चर्चा रहती है, लेकिन ऐसी कहानी पर मुँह नहीं खोला जाता जिसमें हिंदू धर्म की निंदा रहती है, या दोनों ही धर्मों के ठेकेदारों को खरी-खोटी सुनाई जाती है। सच तो यह है कि पिछले कुछ समय से सुनियोजित तरीक़े से प्रेमचंद का एक ‘हिंदू पाठ’ तैयार करने की कोशिश की जा रही है। इस तरह का पाठ तैयार करने वालों को मुख्यतः कमलकिशोर गोयनका से इसके सूत्र मिलते हैं, जो प्रेमचंद को ‘हिंदू चेतना’ का लेखक सिद्ध करने की क़वायद में शुरू से ही लगे रहे, पर कर नहीं पाए।
अभी कुछ समय पहले एक लेख में कहा गया था कि प्रेमचंद ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवादी’ हैं। ‘सोज़े वतन’ से चला उनका राष्ट्रवाद ‘गोदान’ में गाय की महत्ता कहते हुए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की व्याख्या भी कर जाता है। यह प्रेमचंद के मुँह में जबरन अपने अजेंडे को ठूँस देने का एक उदाहरण है। ज़रा राष्ट्रीयता पर प्रेमचंद के विचार को देखें, ‘राष्ट्रीयता वर्तमान युग का कोढ़ है, उसी तरह जैसे मध्यकालीन युग का कोढ़ साम्प्रदायिकता थी। नतीजा दोनों का एक है। साम्प्रदायिकता अपने घेरे के अन्दर पूर्ण शान्ति और सुख का राज्य स्थापित कर देना चाहती थी, मगर उस घेरे के बाहर जो संसार था, उसको नोचने-खसोटने में उसे जरा भी मानसिक क्लेश न होता था। राष्ट्रीयता भी अपने परिमित क्षेत्र के अन्दर रामराज्य का आयोजन करती है। उस क्षेत्र के बाहर का संसार उसका शत्रु है। सारा संसार ऐसे ही राष्ट्रों या गिरोहों में बॅंटा हुआ है, और सभी एक-दूसरे को हिंसात्मक सन्देह की दृष्टि से देखते हैं और जब तक इसका अन्त न होगा, संसार में शान्ति का होना असम्भव है। जागरूक आत्माएँ संसार में अन्तर्राष्ट्रीयता का प्रचार करना चाहती हैं और कर रही हैं, लेकिन राष्ट्रीयता के बन्धन में जकड़ा हुआ संसार उन्हें ड्रीमर या शेखचिल्ली समझकर उनकी उपेक्षा करता है।’
प्रेमचंद का स्पष्ट इशारा है कि जिस राष्ट्रीयता का बार-बार उद्घोष किया जाता है, असल में वह एक ख़ास वर्ग द्वारा अपना वर्चस्व बनाए रखने का उपक्रम है। वह वर्ग इसकी आड़ में जनता पर नियंत्रण बनाए रखता है और उसे उसके अधिकारों से दूर करता है। राष्ट्रीयता का हवाला देकर आम आदमी की आवाज़ को दबा दिया जाता है, हर तरह के भेदभाव और ग़ैर-बराबरी को बरक़रार रखा जाता है। आम जनता का काम बस नारे लगाना रह जाता है।
इसलिए राष्ट्रीयता के इस ढाँचे के बरअक्स प्रेमचंद एक ऐसी राष्ट्रीयता की कल्पना करते हैं, जिसकी बुनियाद में आम जनता हो। उनके मुताबिक, ‘हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं उसमें तो जन्मगत वर्णों की गंध तक न होगी, वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा, जिसमें न कोई ब्राह्मण होगा, न हरिजन, न कायस्थ, न क्षत्रिय। उसमें सभी भारतवासी होंगे, सभी ब्राह्मण होंगे या सभी हरिजन होंगे।’
प्रेमचंद के लिए स्वराज्य का अर्थ था विदेशी ग़ुलामी के साथ-साथ सामाजिक ग़ुलामी से मुक्ति। ‘सद्गति’, ‘ठाकुर का कुआँ’, ‘ दूध का दाम’, ‘सवा सेर गेहूं’, ‘मंदिर’ सरीखी कहानियाँ भारतीय समाज के वर्ण-जातिगत विभेद व शोषण का ही आख्यान हैं। वह हिंदू धर्म की आलोचना उसके वर्णवादी स्वरूप के लिए करते थे, धर्मतंत्र द्वारा आमजन के शोषण के लिए करते थे। वह इस बात को रेखांकित करते थे कि हिंदू धर्म के भीतर एक छोटे से वर्ग का प्रभुत्व है, जो साधारण और कमज़ोर लोगों को धर्म और ईश्वर का भय दिखाकर उसका शोषण करता है। वह इस वर्ग को टकेपंथी दल कहते हैं। यह कहते हुए उनका इशारा पंडे, पुजारियों और धर्म के ठेकेदारों की तरफ़ था। वह कहते हैं, ‘हिंदू-जाति का सबसे घृणित कोढ़ ,सबसे लज्जाजनक कलंक यही टकेपंथी दल है ,जो एक विशाल जोंक की भांति उसका खून चूस रहा है, और हमारी राष्ट्रीयता के मार्ग में यही सबसे बड़ी बाधा है….राष्ट्रीयता की पहली शर्त वर्ण-व्यवस्था, ऊंच-नीच के भेद और धार्मिक पाखंड की जड़ खोदना है।’
प्रेमचंद ने हिंदू धर्म की रूढ़ियों पर प्रहार करने के साथ इसके प्रतीकों को भी ध्वस्त करने में संकोच नहीं किया। गाय की पवित्रता को लेकर आज जिस तरह की अतिवादी राजनीति देखी जा रही है, उसकी शुरुआत उसी दौर में हो गई थी। प्रेमचंद का मत था कि ‘गौ कितनी ही पवित्र हो, लेकिन मनुष्य की तुलना नहीं कर सकती। मुसलमान कितने ही गए-गुजरे हों, फिर भी आदमी हैं। क्या अंधेर है कि हम अपने खाने के बरतनों में कुत्ते को ग्रास खिलाते हैं, लेकिन किसी मुसलमान को पानी पिलाना हो तो कुल्हड़ की तलाश करते हैं। कुत्ते के मुख का स्पर्श मांजने से साफ हो जाता है, लेकिन मुसलमान के मुख का स्पर्श अमिट है! क्या ऐसी स्थिति में भी हम आशा कर सकते हैं कि कोई आत्माभिमानी मुसलमान हमसे भाईचारे का बर्ताव करेगा?’
जिन लोगों को गोदान में गाय एक सांस्कृतिक-धार्मिक प्रतीक के रूप में नज़र आती हो, उन्हें इस उद्धरण पर ध्यान देना चाहिए। गोदान में गाय को ग्रामीण- कृषि जीवन के एक स्वाभाविक हिस्से के रूप में ही देखा गया है जिसका आर्थिक महत्त्व है, न कि धार्मिक। शायद यही वजह है कि धर्म के ठेकेदारों ने प्रेमचंद को ‘घृणा का प्रचारक’,’हिंदू द्रोही’, ‘ब्राह्मण द्वेषी’ आदि कहकर लांछित किया।
बीसवीं शताब्दी के शुरुआती एक-दो दशकों में संस्कृति, धर्म और राष्ट्रवाद के सवाल बड़े तीखे हो गए थे। उस दौर में राष्ट्रीय चेतना के समानांतर एक सांप्रदायिक अजेंडा भी व्यवस्थित रूप ले रहा था। एक तरफ़ मुस्लिम लीग की राजनीति थी तो दूसरी तरफ़ हिंदू राष्ट्र बनाने की क़वायद भी शुरू हो चुकी थी। धर्म के नाम पर गोलबंदी के लिए दोनों ही पक्षों की तरफ़ से अपनी-अपनी संस्कृति की दुहाई दी जा रही थी। ऐसे में संस्कृति की श्रेष्ठता के दावों को चुनौती देते हुए प्रेमचंद कहते हैं, ‘….हिन्दू अपनी संस्कृति को कयामत तक सुरक्षित रखना चाहता है, मुसलमान अपनी संस्कृति को। दोनों ही अभी तक अपनी-अपनी संस्कृति को अछूती समझ रहे हैं, यह भूल गये हैं कि अब न कहीं हिन्दू संस्कृति है, न मुस्लिम संस्कृति और न कोई अन्य संस्कृति। अब संसार में केवल एक संस्कृति है, और वह है आर्थिक संस्कृति मगर आज भी हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति का रोना रोये चले जाते हैं। ….फिर हमारी समझ में नहीं आता कि वह कौन सी संस्कृति है, जिसकी रक्षा के लिए साम्प्रदायिकता इतना ज़ोर बाँध रही है। वास्तव में संस्कृति की पुकार केवल ढोंग है, निरा पाखण्ड। शीतल छाया में बैठे विहार करते हैं। यह सीधे-सादे आदमियों को साम्प्रदायिकता की ओर घसीट लाने का केवल एक मन्त्र है और कुछ नहीं। हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति के रक्षक वही महानुभाव और वही समुदाय हैं, जिनको अपने ऊपर, अपने देशवासियों के ऊपर और सत्य के ऊपर कोई भरोसा नहीं, इसलिए अनन्त तक एक ऐसी शक्ति की ज़रूरत समझते हैं जो उनके झगड़ों में सरपंच का काम करती रहे। इन संस्थाओं को जनता को सुख-दुख से कोई मतलब नहीं, उनके पास ऐसा कोई सामाजिक या राजनीतिक कार्यक्रम नहीं है जिसे राष्ट्र के सामने रख सकें। उनका काम केवल एक-दूसरे का विरोध करके सरकार के सामने फरियाद करना है। वे ओहदों और रियायतों के लिए एक-दूसरे से चढ़ा-ऊपरी करके जनता पर शासन करने में शासक के सहायक बनने के सिवा और कुछ नहीं करते।’
प्रेमचंद हिंदुत्व के पैरोकारों के इस्लाम विरोधी अभियान से अत्यंत क्षुब्ध थे। जब आचार्य चतुरसेन ने इस्लाम का विष वृक्ष नामक किताब लिखी, तो प्रेमचंद ने जैनेंद्र को इसकी आलोचना लिखने की सलाह देते हुए कहा, ‘इस कम्युनल प्रोपेगेण्डा का जोरों से मुकाबला करना होगा।’ इस प्रकार के इस्लाम विरोधी अभियान का प्रतिकार करने के लिए ही प्रेमचंद ने ‘कर्बला’ नाटक लिखा और इसकी भूमिका में कहा, ‘कितने खेद और लज्जा की बात है कि कई शताब्दियों से मुसलमानों के साथ रहने पर भी अभी तक हम लोग प्राय: उसके इतिहास से अनभिज्ञ हैं। हिंदू-मुसलिम वैमनस्य का एक कारण यह भी है कि हम हिंदुओं को मुसलिम महापुरुषों के सच्चरित्रों का ज्ञान नहीं। ‘नबी का न्याय’ कहानी को भी इसी कड़ी में देखा जा सकता है।
कई हिंदुत्ववादी उनकी ‘जिहाद’ जैसी कहानी का हवाला देकर बताते हैं कि देखिए प्रेमचंद ने तो इस्लाम के कट्टरपन की कितनी आलोचना की है और वह मानते हैं कि मुस्लिम जिहादी मानसिकता के होते हैं। लेकिन ये लोग प्रेमचंद की ‘हिंसो परमोधर्मः’ या मोटेराम शास्त्री को चरित्र बनाकर लिखी गई कहानियों और उन अनेक कहानियों को भूल जाते हैं जिनमें प्रेमचंद ने हिंदू धर्म के पाखंड और कट्टरपन को निशाना बनाया है। प्रेमचंद सांप्रदायिकता के विरोधी थे, चाहे वह हिंदू सांप्रदायिकता हो या मुस्लिम सांप्रदायिकता। वह मानते थे कि किसी भी हाल में वर्षों से चले आ रहे सामाजिक सौहार्द को बनाए रखना होगा, इसी में देश का, आम जनता का कल्याण निहित है। वह इस बात को भलीभाँति समझते थे कि सांप्रदायिक विभाजन से किन तत्त्वों को फ़ायदा हो रहा है।
यह भी कैसी विडंबना है कि प्रेमचंद जिन स्थितियों से उस दौर में जूझ रहे थे, आज वही स्थितियाँ कहीं ज़्यादा भयावह रूप में हमारे सामने उपस्थित हैं। आज हिंदुत्ववादी-फ़ासीवाद, राजनीति और समाज पर क़ाबिज हो गया है। उसने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की आड़ में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ दिया है। वह मनुवादी व्यवस्था और तमाम रूढ़ियों-पाखंडों को फिर से स्थापित करना चाहता है। और सबसे दुखद तो यह है कि बौद्धिकों-लेखकों का एक तबक़ा भी इस सोच को अपना प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन दे रहा है। ऐसे हालात में प्रेमचंद की शिद्दत से याद आती है। प्रेमचंद हमें वर्णवादी-फासीवादी तत्त्वों से लड़ने की प्रेरणा देते हैं। उन तत्त्वों के दुष्प्रचार का कड़ा जवाब भी उन्हीं के पास है और वैचारिक उलझनों से निकलने का रा्स्ता भी वही सुझाते हैं।
इसलिए मुद्दा यह नहीं है कि प्रेमचंद कम्युनिस्ट पार्टी के मेंबर थे कि नहीं या उन्होंने वामपंथी होने का कभी दावा किया या नहीं। आज जो भी सामाजिक न्याय, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के लिए ईमानदारी से लड़ रहा है, वह प्रेमचंद का वारिस है, चाहे वह कम्युनिस्ट हो, समाजवादी हो या गांधीवादी। आज सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर थोपे गए हिंदुत्ववादी-फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ एक व्यापक संघर्ष की ज़रूरत है, और निश्चय ही इस संघर्ष के एक प्रतीक और नायक प्रेमचंद होंगे।
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