गिरिडीह। झारखंड में नक्सल विरोधी अभियान के दौरान सुरक्षा बलों को बड़ी कामयाबी मिली है। करीब दो दशक से सुरक्षा एजेंसियों को चकमा दे रहे एक करोड़ रुपये के इनामी माओवादी नेता और भाकपा (माओवादी) के पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा को गिरफ्तार कर लिया गया है। उसके साथ 15 लाख रुपये के इनामी रीजनल कमेटी सदस्य मेहनत उर्फ मोछू और गौरव उर्फ सौरभ को भी पकड़ा गया है। इस कार्रवाई को झारखंड में माओवादी नेटवर्क के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी सफलताओं में से एक माना जा रहा है।
झारखंड पुलिस, सीआरपीएफ और कोबरा बटालियन की संयुक्त टीम ने खुफिया सूचना के आधार पर धनबाद-गिरिडीह सीमा के आसपास कार्रवाई की। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सुरक्षा बलों को मिसिर बेसरा की ताजा तस्वीर और उसकी गतिविधियों से जुड़ी सटीक जानकारी मिली थी। इसके बाद घेराबंदी कर उसे जंगल में पहुंचने से पहले ही पकड़ लिया गया। अधिकारियों के मुताबिक, अगर कार्रवाई में थोड़ी भी देर होती तो वह दोबारा जंगलों में पहुंचकर सुरक्षा बलों को चकमा दे सकता था।
करीबी अंगरक्षक के आत्मसमर्पण से मिला सुराग
मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी से कुछ घंटे पहले रांची में 16 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया था। इनमें उसका करीबी अंगरक्षक देवान मुर्मू उर्फ शनिचरवा भी शामिल था। सुरक्षा एजेंसियों को उससे मिसिर बेसरा की गतिविधियों और संभावित ठिकानों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिली। इसी इनपुट के आधार पर सुरक्षा बलों ने अपनी रणनीति तैयार की और उसे गिरफ्तार करने में कामयाब रहे।
पीरटांड़ क्षेत्र का रहने वाला मिसिर बेसरा उर्फ भास्कर लंबे समय से माओवादी संगठन के शीर्ष नेतृत्व का हिस्सा रहा है। वह संगठन की केंद्रीय समिति और बाद में पोलित ब्यूरो का सदस्य बना। सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, झारखंड के अलावा ओडिशा, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में माओवादी नेटवर्क को मजबूत करने और बड़े हमलों की रणनीति बनाने में भी उसकी अहम भूमिका रही है।
150 से ज्यादा मामले, 2009 में पुलिस हिरासत से हुआ था फरार
मिसिर बेसरा के खिलाफ झारखंड, बिहार, ओडिशा और छत्तीसगढ़ में हत्या, सुरक्षाबलों पर हमले, आईईडी विस्फोट, लेवी वसूली और रंगदारी समेत 150 से अधिक मामले दर्ज होने की बात सामने आई है। उसे 2007 में खूंटी पुलिस ने गिरफ्तार किया था, लेकिन 2009 में बिहार के लखीसराय कोर्ट परिसर में माओवादियों ने पुलिस पर हमला कर उसे हिरासत से छुड़ा लिया था। इसके बाद से वह करीब दो दशक तक सुरक्षा एजेंसियों की मोस्ट वांटेड सूची में रहा।
उस पर कई बड़े नक्सली हमलों की साजिश रचने का भी आरोप रहा है। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, सारंडा, कोल्हान, पारसनाथ और झारखंड-बंगाल-ओडिशा के सीमावर्ती इलाकों में माओवादी संगठन के विस्तार में उसका महत्वपूर्ण योगदान रहा।
मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी ऐसे समय हुई है, जब झारखंड में माओवादी संगठन लगातार कमजोर हो रहा है। पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा बलों ने बूढ़ा पहाड़, लुगु पहाड़ी, पारसनाथ और बुलबुल जैसे कभी घोर नक्सल प्रभावित इलाकों में अपना दबदबा कायम किया है। लगातार मुठभेड़ों, गिरफ्तारियों और आत्मसमर्पण ने संगठन के जमीनी नेटवर्क को काफी कमजोर किया है।
मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी से सारंडा और कोल्हान क्षेत्र में भी माओवादी संगठन को बड़ा झटका लगने की उम्मीद है। सुरक्षा एजेंसियां अब उससे पूछताछ कर संगठन के सक्रिय कैडर, हथियारों के ठिकानों, आईईडी के जखीरे, आर्थिक स्रोतों और ओवरग्राउंड नेटवर्क की जानकारी जुटाने की कोशिश कर रही हैं।
तीन स्तर की सुरक्षा में रहता था बेसरा, अब कौन नक्सली बचा?
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, मिसिर बेसरा की सुरक्षा के लिए माओवादी संगठन ने मजबूत सुरक्षा घेरा बना रखा था। उसके आसपास तीन स्तर की सुरक्षा व्यवस्था रहती थी। पहले घेरे में जन मिलिशिया और सेंट्री पोस्ट तैनात रहते थे। जंगल के रास्तों पर आईईडी और स्पाइक होल्स जैसे सुरक्षा इंतजाम किए जाते थे।
दूसरे घेरे में संगठन के प्रशिक्षित कमांडर उसकी गतिविधियों पर नजर रखते थे। सबसे अंदरूनी घेरे में 10 से 12 चुनिंदा बॉडीगार्ड आधुनिक हथियारों के साथ उसकी सुरक्षा में रहते थे। ऐसे में उसकी गिरफ्तारी को सुरक्षा एजेंसियों की सटीक खुफिया कार्रवाई का नतीजा माना जा रहा है।
मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी के बाद झारखंड में एक करोड़ रुपये के इनामी शीर्ष माओवादी नेताओं की सूची लगभग खत्म हो गई है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, अब केवल असीम मंडल उर्फ आकाश ही एक करोड़ रुपये के इनाम वाला प्रमुख नक्सली बचा है। वह पश्चिम बंगाल के मिदनापुर का रहने वाला बताया जाता है।
इससे पहले एक करोड़ के इनामी अनल दा उर्फ तूफान के मुठभेड़ में मारे जाने के बाद मिसिर बेसरा राज्य में बचे बड़े इनामी नक्सली नेताओं में शामिल था। ऐसे में उसकी गिरफ्तारी को झारखंड में माओवादी संगठन के शीर्ष नेतृत्व पर निर्णायक प्रहार के तौर पर देखा जा रहा है।
क्या झारखंड में खत्म होने के कगार पर है नक्सलवाद?
झारखंड में नक्सलवाद का प्रभाव 1980 के दशक से रहा है। गिरिडीह और चतरा जैसे इलाकों में संगठन ने ग्रामीण असंतोष और विकास की कमी को आधार बनाकर अपना प्रभाव बढ़ाया। बाद में पारसनाथ, सारंडा, कोल्हान और दूसरे जंगल क्षेत्रों को जोड़ते हुए माओवादियों ने एक बड़ा नेटवर्क तैयार किया। इसी नेटवर्क के जरिए बिहार, छत्तीसगढ़, ओडिशा और पश्चिम बंगाल से जुड़े नक्सली दस्ते झारखंड में आवाजाही करते रहे।
समय के साथ सुरक्षा बलों ने इस नेटवर्क को तोड़ने के लिए लगातार अभियान चलाए। बीते वर्षों में कई बड़े माओवादी कमांडर मारे गए या गिरफ्तार हुए और बड़ी संख्या में कैडरों ने आत्मसमर्पण किया। अब मिसिर बेसरा की गिरफ्तारी से सुरक्षा एजेंसियों को उम्मीद है कि माओवादी संगठन के बचे हुए नेटवर्क को भी खत्म करने में मदद मिलेगी। क्योंकि दलमा और कुछ सीमावर्ती जंगलों में माओवादी गतिविधियों की मौजूदगी की बात सामने आती रही है। लेकिन मिसिर बेसरा जैसे शीर्ष रणनीतिकार की गिरफ्तारी निश्चित तौर पर संगठन के लिए बड़ा झटका है।

