लखनऊः इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद को तलब किया। हाई कोर्ट द्वारा यह कार्रवाई पुलिस कस्टडी में हुई मौत के मामलों में मुआवजे के भुगतान के लिए नियम न बनाने के चलते हुई है। इससे पहले हाई कोर्ट ने ऐसे मामलों के लिए गाइडलाइंस बनाने का आदेश दिया था।
जस्टिस सौरभ लवानिया ने कहा कि संजय प्रसाद ‘कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट, 1971’ की धारा 12 के तहत सजा के हकदार हैं। इसलिए उन्होंने प्रसाद को 31 जुलाई को कोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया ताकि आगे की कार्यवाही की जा सके। इसमें आरोप तय करना भी शामिल है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने क्या कहा?
अपने आदेश में कोर्ट ने कहा कि ” ऊपर बताई गई बातों को ध्यान में रखते हुए संबंधित अधिकारी को 31.07.2026 को इस कोर्ट के सामने पेश होने का निर्देश दिया जाता है। “
गौरतलब है कि हाई कोर्ट अदालत की अवमानना से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। इसमें आरोप लगाया गया था कि राज्य ने 20 फरवरी को डिवीजन बेंच के दिए आदेश का अभी तक पालन नहीं किया है।
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क्या है पूरा मामला?
यह याचिका एक महिला ने दायर की थी जिसके नाबालिग बेटे की मौत 20 फरवरी 2024 को जिला जेल में हो गई थी। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि राज्य ने उसे हाई कोर्ट के आदेश के मुताबिक 10 लाख रुपये का मुआवजा अभी तक नहीं दिया है।
इस मामले में नाबालिग पर 2016 के एक मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत बलात्कार के आरोप थे। फरवरी 2022 में जमानत मिलने से पहले उसने लगभग तीन साल और दस महीने जेल में बिताए थे।
हालांकि ट्रायल कोर्ट के सामने पेश न हो पाने के कारण उसे 7 फरवरी, 2024 को गिरफ्तार कर लिया गया। 20 फरवरी, 2024 को उसने जेल के अंदर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली।
पुलिस पर आरोप था कि जेल में नाबालिग को प्रताड़ित किया गया क्योंकि वह ₹4,500 के मासिक भुगतान सहित अवैध मांगों को पूरा नहीं कर पाया था। राज्य ने इन आरोपों से इनकार किया और तर्क दिया कि उसकी मौत में अधिकारियों की कोई भूमिका नहीं थी।
कोर्ट ने हालांकि फैसला सुनाया कि जेल के अंदर होने वाली असामान्य मौतों के लिए राज्य पूरी तरह से जिम्मेदार है। कोर्ट ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि भारतीय कानून में गैर-कानूनी हिरासत या हिरासत में हुई मौत के लिए मुआवजा देने का कोई साफ प्रावधान नहीं है।
इस मामले में वकील रमाकांत दीक्षित और उदय कुमार ने याचिकाकर्ता का पक्ष रखा।

