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1970 के बाद दुनिया में दोगुने से ज्यादा हुए उमस वाले दिन, भारत सबसे ज्यादा जोखिम वाले देशों में शामिल!

जलवायु संस्था क्लाइमेट सेंट्रल की नई रिपोर्ट के अनुसार, 1970 के दशक के बाद ऐसे दिनों की संख्या दुनिया भर में दोगुने से भी अधिक हो गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, इन अतिरिक्त खतरनाक उमस वाले दिनों में लगभग 64 प्रतिशत के लिए मानवजनित जलवायु परिवर्तन सीधे तौर पर जिम्मेदार है।

नई दिल्ली: मानसून का इंतजार कर रहे देश के कई हिस्सों में लोग इन दिनों उमसभरी गर्मी की मार झेल रहे हैं। कई शहरों में तापमान भले 40 डिग्री सेल्सियस के आसपास हो, लेकिन हवा में नमी अधिक होने के कारण शरीर इसे 50 डिग्री सेल्सियस या उससे भी ज्यादा महसूस कर रहा है। यही वजह है कि मौसम वैज्ञानिक अब केवल तापमान नहीं, बल्कि गर्मी और नमी के संयुक्त प्रभाव को अधिक खतरनाक मान रहे हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ तापमान नहीं बढ़ा रहा है, बल्कि हवा में नमी (आर्द्रता) भी बढ़ा रहा है, जिससे उमसभरी गर्मी पहले से कहीं ज्यादा खतरनाक होती जा रही है। इसका सबसे बड़ा संकेत दुनिया भर में तेजी से बढ़ रहे ‘खतरनाक उमस वाले दिनों’ (Dangerous Humid Heat Days) से मिलता है।

जलवायु संस्था क्लाइमेट सेंट्रल की नई रिपोर्ट के अनुसार, 1970 के दशक के बाद ऐसे दिनों की संख्या दुनिया भर में दोगुने से भी अधिक हो गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, इन अतिरिक्त खतरनाक उमस वाले दिनों में लगभग 64 प्रतिशत के लिए मानवजनित जलवायु परिवर्तन सीधे तौर पर जिम्मेदार है।

रिपोर्ट के अनुसार, 1970 के दशक में दुनिया में औसतन साल में 10 खतरनाक उमस वाले दिन दर्ज किए जाते थे। यह संख्या 2016-2025 के दौरान बढ़कर 23 दिन प्रतिवर्ष पहुंच गई। अकेले 2025 में दुनिया भर में औसतन 23 ऐसे दिन रहे, जिनमें से 19 दिन यानी 83 प्रतिशत जलवायु परिवर्तन की वजह से थे। वहीं, 2024 में सबसे अधिक 32 खतरनाक उमस वाले दिन दर्ज किए गए।

Infographic bar chart showing how dangerous humid heat days increase by decade from the 1970s to the 2020s, with climate change adding days.
 Image Climate Central

क्या होता है खतरनाक उमस वाला दिन?

रिपोर्ट में “खतरनाक उमस वाला दिन” उसे माना गया है, जब वेट-बल्ब तापमान 25 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक पहुंच जाता है। वेट-बल्ब तापमान केवल हवा का तापमान नहीं, बल्कि तापमान और नमी के संयुक्त प्रभाव को मापता है। यह बताता है कि इंसान का शरीर पसीने के जरिए खुद को कितनी प्रभावी तरीके से ठंडा कर सकता है।

जब हवा में नमी अधिक होती है तो पसीना जल्दी नहीं सूखता। इससे शरीर का प्राकृतिक कूलिंग सिस्टम कमजोर पड़ जाता है और हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, हीट एग्जॉशन तथा गंभीर मामलों में मौत का खतरा तेजी से बढ़ जाता है। वैज्ञानिक 35 डिग्री सेल्सियस वेट-बल्ब तापमान को इंसान के जीवित रहने की सीमा मानते हैं। यहां बता दें कि 35°C सामान्य तापमान कई लोग सहन कर सकते हैं। लेकिन 35°C वेट-बल्ब तापमान का अर्थ है कि गर्मी और नमी का संयुक्त प्रभाव इतना अधिक है कि शरीर पसीने के जरिए खुद को ठंडा नहीं रख पा रहा।

भारत पर सबसे बड़ा खतरा

रिपोर्ट में 59 भारतीय शहरों समेत दुनिया के 961 शहरों का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि भारत उन देशों में शामिल है जहां खतरनाक उमस वाले दिनों में सबसे तेज बढ़ोतरी हो रही है। देश के 50 शहर ऐसे हैं जहां उमस और गर्मी का संयुक्त प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है।

सबसे ज्यादा प्रभावित शहरों में तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के शहर शामिल हैं। तिरुनेलवेली में ऐसे दिनों की संख्या 119 से बढ़कर 273 दिन प्रतिवर्ष हो गई है। चेन्नई में यह 205 से बढ़कर 257 दिन पहुंच गई, जबकि तिरुचिरापल्ली में 129 से बढ़कर 251 और मदुरै में 57 से बढ़कर 200 दिन हो गई है। विजयवाड़ा और विशाखापट्टनम में अब साल के दो-तिहाई से अधिक समय खतरनाक उमस वाली स्थिति बनी रहती है।

इसका असर अब केवल तटीय क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। मुंबई, नवी मुंबई, ठाणे और डोंबिवली जैसे शहरों में भी ऐसे दिनों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं दिल्ली, नई दिल्ली, नजफगढ़, फरीदाबाद, लखनऊ, कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी, जयपुर, भोपाल, इंदौर, रांची और जमशेदपुर जैसे शहर भी तेजी से इस खतरे की जद में आ रहे हैं।

विशेषज्ञों की मानें तो जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ तेजी से बढ़ता शहरीकरण भी इस संकट को और गंभीर बना रहा है। पेड़ों की कटाई, कंक्रीट का विस्तार, जलाशयों का सिकुड़ना और ‘अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट’ शहरों को दिन ही नहीं, रात में भी ठंडा नहीं होने दे रहे। गर्म वातावरण हर एक डिग्री तापमान बढ़ने पर लगभग 7 प्रतिशत अधिक जलवाष्प धारण कर सकता है, जिससे उमस और बढ़ जाती है तथा शरीर के लिए गर्मी सहना और मुश्किल हो जाता है।

स्वास्थ्य पर बढ़ता खतरा

विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल मौसम का नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य का भी गंभीर संकट है। बुजुर्ग, बच्चे, गर्भवती महिलाएं, निर्माण मजदूर, किसान, ट्रैफिक पुलिस, डिलीवरी कर्मी और खुले में काम करने वाले लाखों लोग सबसे अधिक जोखिम में हैं। पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया की विशेषज्ञ उपासना घोष का कहना है कि भारत को केवल हीटवेव एडवाइजरी जारी करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि ठंडी छतें, लचीले कार्य घंटे, हीट हेल्थ इंश्योरेंस और समुदाय आधारित हीट एक्शन प्लान जैसे उपायों को तेजी से लागू करना होगा।

रिपोर्ट बताती है कि यह संकट केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमेरिका के 247 शहरों के विश्लेषण में पाया गया कि 65 प्रतिशत शहरों में जलवायु परिवर्तन के कारण पिछले एक दशक के दौरान हर साल औसतन 19 अतिरिक्त खतरनाक उमस वाले दिन जुड़ गए हैं। अमेरिका के दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी हिस्सों में सबसे अधिक असर देखा गया है, जहां मैक्सिको की खाड़ी के आसपास के कुछ क्षेत्रों में साल में 100 से अधिक खतरनाक उमस वाले दिन दर्ज किए जा रहे हैं। वहीं अपर मिडवेस्ट, ओहायो वैली और उत्तर-पूर्वी अमेरिका जैसे इलाके, जहां पहले ऐसे हालात बहुत कम देखने को मिलते थे, अब तेजी से इस श्रेणी में शामिल हो रहे हैं।

‘अदृश्य हीटवेव’ की चेतावनी

विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में केवल अधिकतम तापमान देखकर गर्मी के खतरे का आकलन करना पर्याप्त नहीं होगा। अब “फील्स लाइक” तापमान और वेट-बल्ब तापमान कहीं अधिक महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। कई बार थर्मामीटर पर तापमान 38 या 39 डिग्री सेल्सियस दिखाई देता है, लेकिन अधिक नमी के कारण शरीर उसे 45 से 50 डिग्री सेल्सियस जैसी गर्मी के रूप में महसूस करता है। यही वजह है कि वैज्ञानिक इसे अदृश्य हीटवेव कह रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि अगर समय रहते जलवायु अनुकूलन, बेहतर शहरी नियोजन और सार्वजनिक स्वास्थ्य तैयारियों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो आने वाले वर्षों में उमस वाली गर्मी दुनिया के सबसे बड़े स्वास्थ्य संकटों में से एक बन सकती है।

ये भी पढ़ेंः तापमान 42-44 डिग्री, लेकिन महसूस हो रहा 50°! क्या है ‘हीट इंडेक्स’ का विज्ञान?

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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