नई दिल्ली: INDIA ब्लॉक की दो साल बाद हुई औपचारिक बैठक एक बार फिर कई सवाल छोड़ गई। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने बैठक के बाद बताया कि इसमें 25 दलों के नेताओं ने हिस्सा लिया। हालांकि, ये चुनावी रणनीति और इससे जुड़े समन्वय, जो इंडिया ब्लॉक की पार्टियों की असल चुनौती है, उससे इतर मौजूदा मुद्दों पर केंद्र सरकार को घेरने की रणनीति क्या हो, उसी पर केंद्रित रही। इंडिया ब्लॉक की ऐसी आखिरी औपचारिक बैठक 1 जून 2024 को लोकसभा चुनाव से ठीक पहले हुई थी।
इंडिया ब्लॉक की बैठक ऐसे समय में हुई है, जब डीएमके सहित आम आदमी पार्टी के बैठक से दूरी बनाने की बात पहले ही कह दी थी। डीएमके इंडिया ब्लॉक की सबसे मजबूत भागीदारी मानी जाती रही है, हालांकि तमिलनाडु की हालिया राजनीति के बाद उसने कांग्रेस से फिलहाल दूरी बनाने का फैसला किया। बहरहाल, इंडिया ब्लॉक की बात करें तो यह सवाल अब भी रह गया कि INDIA गठबंधन एक मजबूत गठबंधन के तौर पर उभरना चाहता है या केवल भाजपा-विरोध की मजबूरी का मंच बनकर रह गया है? संभव है कि विपक्षी पार्टियां पहले मुद्दों को लेकर जोरशोर से एक साथ आते हुए दिखना चाहती हैं। इसके बाद चुनावी रणनीतियों पर बात हो।
दरअसल, इंडिया ब्लॉक को लेकर सवाल इसलिए उठते हैं क्योंकि मुख्य रूप से लोकसभा चुनाव को लेकर बनी ये साझीदारी अक्सर विधानसभा चुनाव में आकर बिखरने लगती है और यही भाजपा के लिए ये मौका बन जाता है कि वो इस गठबंधन को झूठा करार देती है। इंडिया ब्लॉक के लिए भी इसका जवाब देना आसान नहीं रहा है।
INDIA ब्लॉक की आज की बैठक से क्या निकला?
मीटिंग के बाद कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने बैठक में किन विषयों पर बात हुई और क्या कुछ हुआ, इसकी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि बैठक में 25 दलों ने भाग लिया। सभी ने अपने विचार साझा किए और सभी लोग पांच बिंदुओं पर सर्वसम्मति से सहमत हुए। उन्होंने कहा, ‘आज हमने यह निर्णय लिया है कि हम इन मुद्दों के लिए लड़ेंगे, इन पर काम करेंगे और आगे बढ़ेंगे।’
खड़गे ने कहा, ‘एसआईआर, वोट की लूट और चुनाव में धांधली के संबंध में भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र भेजने पर सहमति बनी। यह पत्र जल्द ही भारत के मुख्य न्यायाधीश को सौंप दिया जाएगा। दूसरा बिंदु यह है कि शिक्षा मंत्री के तत्काल इस्तीफे की मांग पर सर्वसम्मति से सहमति बनी है।’
खड़गे ने आगे कहा, ‘केंद्र सरकार को मौजूदा नाजुक आर्थिक स्थिति, बेरोजगारी, महंगाई, किसानों के मुद्दे और अन्य जन-केंद्रित मुद्दों पर चर्चा करने के लिए तुरंत सर्वदलीय बैठक बुलानी चाहिए। यह सहमति बनी कि सभी दल हर दो महीने में मिलेंगे…संसद समन्वय मानसून सत्र के दौरान विपक्ष के नेता के कार्यालय में प्रतिदिन सुबह की बैठकों के साथ जारी रहेगा।’
खड़गे ने कहा कि उद्धव ठाकरे और हेमंत सोरेन भी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए मीटिंग में जुड़े और अपनी बातें रखी।
इंडिया ब्लॉक: 2024 से 2026 की चुनौती तक
लोकसभा चुनाव 2024 में INDIA गठबंधन ने भाजपा को अपेक्षित बहुमत से दूर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी-कांग्रेस गठजोड़, महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी और कई राज्यों में विपक्षी तालमेल ने भाजपा के सामने चुनौती पेश की थी। लेकिन उसके बाद का राजनीतिक परिदृश्य अलग रहा। पिछले दो वर्षों में हुए विधानसभा चुनावों ने INDIA गठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी उजागर कर दी और ये थी- राष्ट्रीय स्तर पर एकता और राज्यों में प्रतिस्पर्धा का विरोधाभास।
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और वाम दलों का टीएमसी के खिलाफ संघर्ष जारी रहा। दिल्ली में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी एक-दूसरे के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी बने रहे। केरल में कांग्रेस नीत यूडीएफ और सीपीएम नीत एलडीएफ की लड़ाई हमेशा की तरह रही। इस बीच कांग्रेस की ओर से एलडीएफ को भाजपा का सहयोगी बताने वाले बयान ने चीजें और उलझा दी। लेफ्ट की ओर से इस बारे में कांग्रेस के सामने विरोध भी जताया गया है। वहीं, तमिलनाडु में हालिया राजनीतिक उलटफेर ने डीएमके और कांग्रेस के रिश्तों को भी प्रभावित किया है। कांग्रेस ने विजय की टीवीके को समर्थन देने का फैसला किया और डीएमके को ये रास नहीं आया। कुल मिलाकर संसद में साथ और राज्यों में मुकाबला, इंडिया गठबंधन इस बुनियादी अंतर्विरोध का अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं खोज पाया है।
यही कारण है कि भाजपा शुरू से INDIA गठबंधन को ‘बेमेल गठबंधन’ बताती रही है। उसका तर्क रहा है कि यह विचारधारा या साझा कार्यक्रम पर आधारित गठबंधन नहीं, बल्कि केवल नरेंद्र मोदी-विरोधी दलों का समूह है। जब बंगाल में ममता बनर्जी कांग्रेस पर हमला करती हैं, दिल्ली में AAP और कांग्रेस आमने-सामने होते हैं, या केरल में कांग्रेस और वामपंथी दल एक-दूसरे को मुख्य प्रतिद्वंद्वी मानते हैं, तब भाजपा को विपक्षी एकता पर सवाल उठाने का अवसर मिलता है।
आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश, पंजाब जैसे राज्यों में फिर चुनाव है। यूपी में अखिलेश यादव क्या कांग्रेस के साथ जाने की राह पर बढ़ेंगे, ये देखना होगा। ऐसे ही पंजाब में लगभग साफ है आप और कांग्रेस मुकाबले में एक-दूसरे के खिलाफ उतरेंगे। दिल्ली चुनाव में आप और कांग्रेस के बीच कड़वाहट स्पष्ट रूप से देखने को मिली थी और इसके बाद से ही एक तरह से ‘आप’ इंडिया ब्लॉक से दूरी बनाए हुए है।
दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस के लिए स्थितियां बदली हैं। ममता बनर्जी पहले कई मौकों पर इंडिया ब्लॉक में खुद को ज्यादा ताकतवर और कांग्रेस के नेतृत्व में आगे बढ़ने से इनकार करती रही हैं। बंगाल चुनाव के बाद तृणमूल की जो हालत है, उसने ममता बनर्जी के लिए इंडिया ब्लॉक को मजबूरी बना दिया है।
तो क्या विपक्ष में अब कांग्रेस सबसे बड़ी ताकत है?
इंडिया ब्लॉक के गठन के समय तस्वीर अलग थी। उस दौर में नीतीश कुमार इसके प्रमुख सूत्रधार थे। हालांकि, वे अलग भी उतनी ही तेजी से हुए। तब ममता बनर्जी, केसीआर और अन्य क्षेत्रीय नेता कांग्रेस को ‘बराबरी’ की स्थिति में रखना चाहते थे। लेकिन 2026 तक आते-आते राजनीतिक समीकरण बदल चुके हैं।
पश्चिम बंगाल में टीएमसी को झटका लगा है। तमिलनाडु में डीएमके की स्थिति भी कमजोर हुई है। दूसरी ओर कांग्रेस कम से कम राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी बनी हुई है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद राहुल गांधी के पास है। यही कारण है कि कांग्रेस आज गठबंधन के भीतर अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में दिखाई देती है।
फिर भी सवाल तो है क्या ममता और अखिलेश राहुल की लीडरशिप मानेंगे? यह इंडिया ब्लॉक की आज बैठक का सबसे दिलचस्प प्रश्न भी है। वर्तमान परिस्थितियों में कम से कम ममता के सामने विकल्प सीमित दिखाई देते हैं। बंगाल में राजनीतिक चुनौतियों के बीच उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी समर्थन की जरूरत है। यही वजह है कि वे बैठक में शामिल हो रही हैं और विपक्षी एकता की बात भी कर रही हैं।
सीधे 2029 की तैयारी?
दिल्ली की बैठक का महत्व इसलिए है क्योंकि यह सिर्फ वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों पर चर्चा नहीं है। यह 2029 की दिशा तय करने की शुरुआती कवायद भी हो सकती है, क्योंकि ये लगभग तय है कि राज्यों के चुनाव में एकमत होना इन दलों के लिए नामुमकिन जैसा है। भविष्य में क्या होने जा रहा है इन सवालों के जवाब अभी स्पष्ट नहीं हैं।
फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि भाजपा के खिलाफ लड़ाई में क्षेत्रीय दलों के लिए कांग्रेस पहले से अधिक आवश्यक हो गई है। लेकिन कांग्रेस जितनी मजबूत हुई है, नेतृत्व का सवाल उतना ही संवेदनशील बन गया है। दिल्ली की यह बैठक शायद उसी नई राजनीतिक वास्तविकता का पहला बड़ा परीक्षण है।
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