महादेवी वर्मा ने ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ में भारतीय स्त्री के जीवन को समझने की एक ऐसी कुंजी दी थी, जो लगभग एक सदी बाद भी पुरानी नहीं हुई है। उनका आशय था कि स्त्री के बंधन हमेशा दिखाई नहीं देते। वे केवल लौह-शृंखलाओं से नहीं बने होते। वे प्रेम, कर्तव्य, मर्यादा, त्याग, परिवार और आदर्श के रूप में भी उसके चारों ओर उपस्थित रहते हैं। उसे प्रेम के नाम पर भी बांधा जा सकता है, कर्तव्य के नाम पर भी, मर्यादा के नाम पर भी और त्याग के नाम पर भी। शायद यही कारण है कि इन्हें पहचानना बहुत कठिन होता है। और जो बंधन अपने भीतर स्नेह का आवरण ओढ़ ले, वह सबसे अधिक स्थायी हो जाता है।
आज समय बदला है, लेकिन यह सच पूरी तरह पुराना नहीं पड़ा है भारतीय स्त्रियां अब शिक्षा प्राप्त कर रही हैं, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर भी है, और सार्वजनिक जीवन में उसकी उपस्थिति पहले से कहीं अधिक स्पष्ट है। वह डॉक्टर है, इंजीनियर है, प्रोफेसर है, पत्रकार है, अफ़सर है। उन्होंने वह कुछ हासिल किया है, जो कभी उसके लिए लगभग असंभव माना जाता था।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह परिवर्तन उसके भीतर की उन अदृश्य संरचनाओं को भी तोड़ पाया है, जो उसके निर्णयों, उसकी आशंकाओं और उसकी स्वतंत्रता को गहराई से प्रभावित करती हैं? समय तो बदला लेकिनव क्या वे अदृश्य शृंखलाएँ भी उतनी ही टूटी हैं?
हाल के दिनों में चर्चित हुए त्विषा शर्मा प्रकरण ने इस प्रश्न को एक बार फिर असहज रूप से हमारे सामने ला खड़ा किया है। इसलिए नहीं कि यह एक युवती की मृत्यु का मामला है, बल्कि इसलिए कि इसके भीतर भारतीय समाज के कुछ पुराने और असुविधाजनक प्रश्न फिर से सिर उठाते दिखाई देते हैं। ऐसे प्रश्न, जिनका संबंध किसी एक परिवार या एक विवाह से नहीं, बल्कि हमारी बेटियों, हमारी पारिवारिक संरचनाओं, विवाह संस्था और पितृसत्ता से है।
यूं भी कुछ घटनाएँ अपने तथ्यात्मक स्वरूप से आगे बढ़कर सांस्कृतिक प्रश्न बन जाती हैं। वे हमें हमारे भीतर झाँकने पर मजबूर करती हैं। इसलिए यह लेख किसी व्यक्ति या परिवार के बारे में निर्णय नहीं है। न ही यह किसी घटना का न्यायिक मूल्यांकन है। यह उस समाज पर प्रश्न है जो ऐसी घटनाओं को संभव बनाता है और फिर उनसे असहज होता है और फिर आगे बढ़ जाता है।
क्यों एक शिक्षित, सफल और आत्मनिर्भर युवती संकट के समय अपने माता-पिता से सहायता की अपेक्षा करती रहती है, लेकिन स्वयं उस रिश्ते से बाहर निकलने का निर्णय नहीं ले पाती? क्यों विवाह आज भी अनेक परिवारों में स्त्री के जीवन का अंतिम और निर्णायक सत्य बना हुआ है? क्यों बेटियों की पीड़ा को अक्सर तब गंभीरता से लिया जाता है, जब बहुत देर हो चुकी होती है? और क्यों किसी लड़की की मृत्यु के बाद उसका जीवन अचानक सबकी दिलचस्पी का विषय बन जाता है? त्विषा के बहाने आज इन प्रश्नों पर फिर से बात की जानी चाहिए।
सफल बेटियाँ, लेकिन क्या स्वतंत्र भी…
भारतीय समाज ने अपनी बेटियों के लिए पिछले कुछ दशकों में बहुत कुछ बदला है। उन्हें उच्च शिक्षा मिली। रोजगार मिला। आर्थिक स्वतंत्रता मिली। बड़े शहरों में रहने, यात्रा करने और अपने पेशेवर जीवन के बारे में निर्णय लेने की अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता मिली।
लेकिन एक प्रश्न आज भी शेष है- हमने अपनी बेटियों को सफल तो बनाया है पर क्या उन्हें अपेक्षित तौर पर स्वतंत्र भी बनाया?
यह प्रश्न हो सकता है पढने और सुनने में असुविधाजनक लगे, लेकिन भारतीय मध्यवर्ग के भीतर झाँककर देखें तो उसकी प्रासंगिकता दिख जाती है। एक युवती आज अपने पेशे में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। लेकिन विवाह के प्रश्न पर आते ही उसके चारों ओर अचानक परंपरा, परिवार, सामाजिक प्रतिष्ठा और रिश्तों का एक घना जाल बुना जाने लगता है।
उसे कहा जाता है कि वह अपने जीवन का निर्माण करे, लेकिन साथ-साथ यह भी कि जिंदगी के एक निश्चित और तयशुदा ढाँचे में उसका सुख निहित है। और उसे वैसे ही परंपरागत तौर पर जीने से उसकी खुशियां हासिल होंगी।
उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होना तो सिखाया जाता है, लेकिन अक्सर यह नहीं सिखाया जाता कि यदि कोई रिश्ता उसके सम्मान, सुरक्षा या मानसिक शांति के विरुद्ध चला जाए तो उससे कैसे निकलना या निबटना है। और यह तो हम कत्तई नहीं कहतें कि इससे बाहर निकलना भी उसका अधिकार है। और वह इससे बाहर भी आ सकती है…
यहीं आकर रघुवीर सहाय की वे प्रसिद्ध पंक्तियाँ याद आती हैं—
“पढ़िए गीता, बनिए सीता
और इन सबमें लगा पलीता
निज घर बार बसाइए।
लकड़ी सीली, आंखे गीली
घर की सबसे बड़ी पतीली,
भर-भर भात पकाइए..”
इन कविता में आये प्रतीक भले ही आज पुराने पड़ गये हों। लकड़ी के चूल्हे पतीलियां, भले आज गुम हो चली हों पर पंक्तियों का अर्थ और व्यंग्य दोनों आज भी प्रासंगिक है। खासकर त्विषा प्रसंग में। वह शायद इसलिए क्योंकि भारतीय समाज ने अपनी बेटियों से अपेक्षाएँ तो बदली हैं, लेकिन उनके लिए निर्मित आदर्शों को अभी पूरी तरह नहीं बदला। अब वह उनसे कहता है- पढ़ो भी, कमाओ भी, आगे बढ़ो भी; लेकिन अंततः वही करो जो एक आदर्श स्त्री से अपेक्षित है- विवाह जरूर करो, निभाओ, सहो, बचाए रखो। आधुनिकता और परंपरा का यह असमान समझौता भारतीय युवतियों के जीवन का सबसे बड़ा अंतर्विरोध है। और फिर जब ये दोनों शिक्षाएँ आपस में टकराती हैं, तब एक त्रासदी जन्म लेती है।
सफलता और स्वतंत्रता एक नहीं होते। एक स्त्री आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो सकती है, फिर भी भावनात्मक रूप से असुरक्षित रह सकती है। वह कार्यक्षेत्र में निर्णायक हो सकती है, लेकिन निजी जीवन में संदेह और भय के बीच खड़ी रह सकती है। वह दुनिया का नेतृत्व कर सकती है, लेकिन अपने ही घर के भीतर स्वयं को असहाय महसूस कर सकती है। और यह विरोधाभास केवल व्यक्तिगत नहीं है। यह हमारी सामाजिक संरचना की देन है। हम बेटियों को कहते हैं-आगे बढ़ो। लेकिन साथ ही यह भी अपेक्षा करते हैं कि वे रिश्तों को बचाएँ। हम उन्हें स्वतंत्र बनाते हैं, लेकिन उनके निर्णयों पर अंतिम स्वीकृति का अधिकार अक्सर परिवार और समाज के पास सुरक्षित रहता है।
हम उन्हें सक्षम बनाते हैं, लेकिन भावनात्मक और सामाजिक सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी भी उन्हीं पर डाल देते हैं। यह ठीक यही वह स्थान है जहाँ आधुनिकता और परंपरा एक-दूसरे में उलझ जाते हैं। विरोधाभास पैदा करते हैं।
विवाह: स्वप्न, संस्था, संस्कार और दबाव
भारत में विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं है। वह एक सामाजिक संस्था है, सांस्कृतिक आदर्श है और कई बार नैतिक अनुशासन भी।
किसी बेटे के लिए विवाह जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है, लेकिन किसी बेटी के लिए वह अक्सर जीवन का निर्णायक मोड़ बना दिया जाता है। उसकी शिक्षा, उसका करियर, उसकी उपलब्धियाँ, सब कुछ महत्वपूर्ण होते हुए भी अंततः विवाह के संदर्भ में मूल्यांकित और प्रश्नांकित होने लगती हैं। यह भी एक कारण है कि विवाह को लेकर समाज का दबाव आज भी आश्चर्यजनक रूप से मजबूत है और एक परंपरावादी किले की तरह सघन ।
दिलचस्प यह भी है कि यह दबाव केवल परंपरावादी परिवारों तक सीमित नहीं है। सबसे आधुनिक, शिक्षित और प्रगतिशील दिखने वाले परिवारों में भी विवाह को लेकर एक गहरी सांस्कृतिक अधीरता दिखाई देती है। एक उम्र के बाद बेटी से पूछा जाने लगता है- ‘अब शादी कब करोगी?’
यह प्रश्न सुनने- कहने में साधारण प्रतीत होता है, लेकिन उसके भीतर एक पूरा सामाजिक आग्रह छिपा होता है।मानो जीवन की उपलब्धियाँ अभी अधूरी हैं, शादी बगैर।मानो सफलता को वैधता तभी मिलेगी जब वह विवाह की मुहर से प्रमाणित होगी। यहीं से अनेक युवतियों के जीवन में वह दबाव शुरू होता है जिसे वे अक्सर स्वयं भी पूरी तरह पहचान नहीं पातीं।
आखिर वह निकल क्यों नहीं आई?
त्विषा प्रकरण पर विचार करते हुए एक प्रश्न बार-बार सामने आता है- ‘आखिर वह अकेली निकल क्यों नहीं आई उस घर से? आखिर उसे मां-बाप से कहने, उन्हें बुलाने की आवश्यकता ही क्यों पड़ी?’ एक शिक्षित, सफल, आत्मनिर्भर युवती, जिसके पास पेशेवर पहचान थी, आर्थिक क्षमता थी, सामाजिक पूँजी थी- वह संकट की स्थिति में अपने माता-पिता से सहायता की अपेक्षा क्यों करती रही?
यह प्रश्न एक कठिन प्रश्न है। साथ ही संवेदनशील और असुविधाजनक भी …
यह प्रश्न केवल त्विषा के लिए नहीं है। यह भारत की लाखों स्त्रियों के संदर्भ में भी उतना ही महत्वपूर्ण है। और इसका उत्तर किसी एक व्यक्ति के भीतर नहीं, हमारी उस सामाजिक संरचना के भीतर छिपा है, जिसमें हम अपनी बेटियों का पालन-पोषण करते हैं।
हम उन्हें मजबूत बनाते हैं, लेकिन साथ ही उन्हें किन्हीं स्तरों पर भीरु भी। और धीरे-धीरे, अनजाने में, उनके भीतर यह धारणा भी पैठती जाती है कि किसी विवाह को छोड़ देना, उसे बचाए रखने की तुलना में कम सम्मानजनक है। यही कारण है कि अनेक स्त्रियाँ, जो अपने पेशेवर जीवन में अत्यंत निर्णायक और आत्मविश्वासी होती हैं, निजी जीवन में वैसी नहीं होतीं। क्योंकि वहाँ वे केवल व्यक्ति नहीं रह जातीं; वे बेटी होती हैं, पत्नी होती हैं, बहू होती हैं, किसी परिवार की प्रतिष्ठा का हिस्सा होती हैं।
और भारतीय समाज में इन भूमिकाओं का भार अक्सर व्यक्ति की स्वतंत्रता से अधिक भारी पड़ता है।
माता-पिता की त्रासदी
चूंकि प्रश्नचिन्ह के घेरे में सबसे पहले माता-पिता और परिवार जन ही आते हैं और यह आना वाजिब भी है- ‘कि लड़की जब अपना दर्द कह रही थी, जब वो उन्हें पुकार रही थी। वे तब क्या कह रहे थे, क्या कर रहे थे?’
इस चर्चा में एक सावधानी बेहद जरूरी है। किसी लड़की की मृत्यु के बाद उसके माता-पिता पर उँगली उठाना सबसे आसान है। लेकिन यह भी सच है कि वे स्वयं उसी समाज के उत्पाद हैं जिसकी आलोचना हम कर रहे हैं, उन्होंने भी वही संस्कार पाए हैं। उन्होंने भी विवाह को एक महत्वपूर्ण संस्था की तरह देखा है। उन्होंने भी यही माना है कि समय के साथ रिश्ते सुधर सकते हैं। और जब कोई त्रासदी घटती है, तब सबसे भारी बोझ भी उन्हीं के हिस्से आता है। क्योंकि उसके बाद वे जीवन भर एक अनचाहे दर्द और एक अंतहीन अपराधबोध के साथ जीते हैं –‘हम कुछ और कर सकते थे पर हमने वक्त पर कदम नहीं उठाया। हम दुविधा और उहापोह में बने रहें?’
किसी भी माता-पिता के लिए इससे बड़ा दुःख नहीं कि उनकी संतान संकट में थी और वे उसे बचा नहीं पाए। यही कारण है कि ऐसी घटनाओं को केवल आरोपों और प्रत्यारोपों के स्तर पर नहीं पढ़ा जा सकता। वे व्यक्तिगत विफलताओं से कहीं अधिक सामाजिक विफलताओं की कहानियाँ होती हैं। और यही वजह है कि त्विषा की कहानी से गुजरते हुए प्रश्नचिन्ह किसी एक व्यक्ति पर नहीं, पूरे समाज के सामनू आ खड़ा होता है।
क्या हम अपनी बेटियों को लौटने का अधिकार देते हैं?
भारतीय परिवारों में बेटियों से प्रेम की कमी नहीं है। समस्या प्रेम की है भी नहीं…समस्या उस परिकल्पना की है, जिसमें विवाह को लगभग अंतिम सत्य मान लिया गया है। अधिकांश माता-पिता अपनी बेटियों से प्रेम करते हैं। उनकी सुरक्षा चाहते हैं। उनके लिए चिंतित रहते हैं। लेकिन साथ ही वे यह भी चाहते हैं कि उसका घर बस जाए। उसका विवाह सफल हो। उसके रिश्ते टिके रहें। यहीं से पैदा होता है वह एक सूक्ष्म …
जब भी बेटी किसी संकट की बात करती है, तब परिवार उसे तुरंत वापस बुलाने और विवाह को बचाने की कोशिश के बीच झूलने लगता है।
उसे सहारा भी दिया जाता है और धैर्य रखने की सलाह भी। उसे सांत्वना भी दी जाती है और समय देने की बात भी कही जाती है।
लेकिन समस्या यह है कि संकट में पड़ी स्त्री को कई बार सलाह नहीं, स्पष्ट आश्वासन चाहिए होता है। उसे यह सुनने की ज़रूरत होती है—‘यदि तुम दुखी हो, यदि तुम असुरक्षित हो, तो वापस आ जाओ। बाकी सब बाद में देखा जाएगा।’लेकिन भारतीय समाज में यह वाक्य बेटियों के हिस्से को बहुत कम आता है।
हम कहते हैं कि बेटियों के लिए घर के दरवाजे हमेशा खुले हैं। लेकिन क्या यह सच है कि वो बिना किसी अपराधबोध के वहां वापिस लौट सकती है? लेकिन क्या उन्हें यह विश्वास दे पाते हैं कि उसके लौट आने को असफलता नहीं माना जाएगा? क्या वह यह मान सकती है कि उसकी सुरक्षा, परिवार की प्रतिष्ठा से अधिक महत्वपूर्ण है?
ये प्रश्न केवल किसी एक परिवार से नहीं, पूरे समाज से पूछे जाने चाहिए।
पितृसत्ता का सबसे अदृश्य हथियार: अपराधबोध
पितृसत्ता हमेशा आदेश नहीं देती। वह हमेशा दमनकारी भाषा में बात नहीं करती। कई बार वह प्रेम की भाषा बोलती है। कर्तव्य की भाषा बोलती है। संस्कार की भाषा बोलती है। और सबसे बढ़कर, वह अपराधबोध की भाषा बोलती है।
महादेवी वर्मा ने जिन अदृश्य बंधनों की बात की थी, वे स्पष्ट रूप में कुछ इस तरह से काम करते हैं-
लड़की सोचती है- शायद मैं ही अधीर हूँ। शायद मुझे थोड़ा और धैर्य रखना चाहिए। शायद समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। शायद मेरे लौटने से माता-पिता दुखी होंगे। शायद गलती मेरी भी हो। समाज बातें बनाएगा…
यह ‘शायद’ देखने-सुनने में भले ही एक बहुत छोटा शब्द है, लेकिन अनगिनत स्त्रियों के जीवन में यह एक अदृश्य जेल बन जाता है। क्योंकि यह उन्हें निर्णय लेने से रोकता है। उनके भीतर लगातार संदेह पैदा करता है। और यही पितृसत्ता की सबसे बड़ी ताकत और सफलता है।
वह स्त्री को केवल बाहर से नियंत्रित नहीं करती। वह उसके भीतर बैठ जाती है।
पितृसत्ता के चेहरे हमेशा पुरुष नहीं होते
पितृसत्ता की चर्चा होते ही हमारे मन में अक्सर पुरुषों की छवि उभरती है। लेकिन भारतीय समाज का विरल अनुभव बताता है कि पितृसत्ता केवल पुरुषों के सहारे नहीं चलती। उसकी सबसे ताकतवर और प्रभावशाली प्रहरी अक्सर स्त्रियाँ होती हैं।
हिंदी और भारतीय भाषाओं के स्त्री-लेखन को पढ़ते हुए बार-बार यह बात सामने आती है कि स्त्री का संघर्ष केवल पुरुषों से नहीं रहा। मन्नू भंडारी की स्त्रियाँ हों, कृष्णा सोबती की हों या प्रभा खेतान की, वे बार-बार उस जटिल संसार की ओर संकेत करती हैं, जहाँ स्त्री का सामना केवल पुरुष सत्ता से नहीं, बल्कि उन स्त्रियों से भी होता है जो उसी सत्ता की संरक्षक बन चुकी होती हैं। शायद इसका कारण यह है कि पितृसत्ता केवल शासित नहीं करती, वह अपने मूल्यों को भी विरासत की तरह आगे बढ़ाती है। जो स्त्री कभी स्वयं पीड़ित थी, वही किसी दूसरी स्त्री से त्याग और सहनशीलता की अपेक्षा करने लगती है। जो कभी किसी व्यवस्था से घायल हुई थी, वही उसी व्यवस्था की रक्षक बन जाती है। यह एक दुखद चक्र है। और भारतीय परिवारों की अनेक त्रासदियों में इसकी भूमिका दिखाई देती है।
यह बात सुनने में कठोर लग सकती है, लेकिन हमारे सामाजिक जीवन की यह एक बड़ी सच्चाई है। वह एक माँ होती है, जो बेटी की पीड़ा को ‘समय के साथ सब ठीक हो जाएगा’ कहकर टाल देती है।
वह एक पढी-लिखी आधुनिक दिखती सास होती है, जो बहू की मृत्यु के बाद भी अपने बेटे को सही साबित करने के लिए मृत स्त्री के जीवन की झूठी-सच्ची सार्वजनिक विवेचना शुरू कर देती है।
और ये सभी लोग किसी किसी सोचे-समझे और तयशुदा षड्यंत्र का हिस्सा नहीं होते। बल्कि वे वही बोल रहे होते हैं जो उन्होंने पीढ़ियों से सुना और सीखा है। यही पितृसत्ता की सबसे बड़ी शक्ति है। वह केवल सत्ता की व्यवस्था नहीं है; वह एक संस्कृति है। वह घरों के भीतर रहती है। वह कहावतों में रहती है। वह सलाहों में रहती है। वह प्रेम और चिंता की भाषा में भी मौजूद होती है। और इसलिए उसका प्रतिरोध करना इतना कठिन होता है। क्योंकि वह हमेशा दुश्मन की तरह दिखाई नहीं देती। कई बार वह माँ की आवाज़ में बोलती है। कई बार वह किसी शुभचिंतक की सलाह में छिपी होती है।
मृत्यु के बाद शुरू होने वाला दूसरा मुकदमा
किसी स्त्री की मृत्यु के बाद उसका जीवन अचानक सार्वजनिक संपत्ति बन जाता है। उसके संदेश सार्पवजनिक तौर पर बांचे जाते हैं। उसके स्वभाव पर चर्चा होती है। उसके निर्णयों का विश्लेषण होता है। उसके संबंधों पर टिप्पणी होती है। उसकी मानसिक स्थिति के अनुमान लगाए जाते हैं। और कई बार उसकी मृत्यु के बाद एक दूसरा मुकदमा शुरू हो जाता है- उसके चरित्र कापर मुकदमा। जिसमें जाहिर है कि उसे चरित्रहीन साबित होना है।
यह हमारी सामाजिक संस्कृति का सबसे क्रूर पक्ष है।क्योंकि मृत व्यक्ति अपना पक्ष रखने के लिए मौजूद नहीं होता। और मृत स्त्री तो विशेष रूप से नहीं।
भारतीय समाज में स्त्रियों के चरित्र पर संदेह करना एक पुरानी आदत रही है। जब किसी स्त्री के साथ अन्याय होता है, तब भी पहला प्रश्न अक्सर उसी से पूछा जाता है। उसने ऐसा क्या किया था? उसने ऐसा क्यों किया था? उसने पहले क्यों नहीं बताया? वह वहाँ गई ही क्यों? वह निकली क्यों नहीं? उसने विरोध क्यों नहीं किया?
ऐसा लगता है मानो समाज हर बार अपराधी से पहले पीड़िता की परीक्षा लेना चाहता हो। अमृता प्रीतम ने स्त्री के दुख को केवल व्यक्तिगत नहीं, सभ्यतागत दुख की तरह देखा था। शायद इसलिए कि स्त्री के जीवन पर उठने वाले प्रश्न अक्सर किसी एक स्त्री तक सीमित नहीं रहते। वे पूरी स्त्री-जाति की ओर मोड़ दिए जाते हैं।
एक ‘स्त्री’ मरती है। लेकिन कटघरे में कई बार उसका ‘स्त्रीत्व’ खड़ा कर दिया जाता है।
सुहागन की तरह विदा की गई एक मृत स्त्री
त्विषा प्रकरण में एक दृश्य बार-बार मन में पीड़ा की तरह लौटता है।
एक मृत युवती को सुहागन की तरह विदा किया जाना। सिंदूर। चूड़ियाँ। श्रृंगार। विवाह के वे सारे चिह्न जिन्हें भारतीय समाज ने स्त्री के सौभाग्य का प्रतीक माना है…
यदि किसी स्त्री का जीवन उसी वैवाहिक संबंध के भीतर त्रासदी में बदल गया हो, तब भी उसकी अंतिम पहचान उसी संबंध से क्यों तय हो? उसकी उपलब्धियाँ कहाँ हैं? उसकी आकांक्षाएँ कहाँ हैं? उसकी शिक्षा, उसकी मेहनत, उसके सपने और उसकी सफलतम पहचान का क्या कोई मोल नहीं?मृत्यु के क्षण में भी उसकी सबसे महत्वपूर्ण पहचान एक पत्नी की ही क्यों?
यहीं आकर भारतीय समाज की सांस्कृतिक संरचना अपने सबसे नग्न रूप में दिखाई देती है। हम स्त्री को जीवन भर रिश्तों के भीतर परिभाषित करते हैं। वह किसी की बेटी है। किसी की पत्नी है। किसी की बहू है। किसी की माँ है। लेकिन वह स्वयं कौन है? यह प्रश्न अक्सर अनुत्तरित रह जाता है। मानो मृत्यु के बाद भी उसे यह स्वतंत्रता नहीं दी जा रही कि वह केवल एक मनुष्य के रूप में याद की जाए। और शायद यही कारण है कि एक मृत स्त्री को सुहाग-चिह्नों से सुसज्जित देखकर मुझे हमेशा बेचैनी होती है। बेचैनी का एक कारण यह भी है कि एक विधवा स्त्री को इस तरह सज संवरकर विदा होने का अधिकार मृत्युपरांत भी नहीं है। क्योंकि शृंगार तो उनका पुरूष है, जिनके होने न होने से ही उनका सजना-संवरना आज भी बंधा हुआ है। यहाँ केवल संस्कार नहीं दिखते। एक पूरी सभ्यता का स्त्री के प्रति दृष्टिकोण दिखाई देता है।
त्विषा के मामले में यह दुख इसलिए दूना हो उठा था कि जीवन भर चाहे उसके हिस्से कितना भी दुख आया हो, मृत्यु के बाद भी उसे ‘सुहागन’ सिद्ध करना आवश्यक समझा गया। वह भी उसके उसी परिवार के जरिए, जो मृत्योपरांत उसके लिए न्याय और हक की लड़ाई लड़ रहा था। सोचिए कि पितृसत्ता की पैठ हमारे भीतर कितने गहरे तक धंसी होती है… सोचें तो यह दृश्य केवल एक पारिवारिक निर्णय नहीं था; यह एक पूरी सांस्कृतिक मानसिकता का रूपक था।
त्विषा से अलग: वो बेटियाँ जिनके नाम अज्ञात हैं..
त्विषा शर्मा की मृत्यु राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गई। समाचार चैनलों ने इसे उठाया। सोशल मीडिया पर बहसें हुईं। लोगों ने पक्ष और विपक्ष चुने। न्याय की माँग उठी।
यह सब होना चाहिए था। किसी भी संदिग्ध या दुखद मृत्यु पर समाज की संवेदनशीलता आवश्यक है। लेकिन इसी के साथ एक दूसरा प्रश्न भी खड़ा होता है। ठीक उसी समय, उसी सप्ताह, उसी महीने, देश के अलग-अलग हिस्सों में कितनी और लड़कियाँ मरी और वे भी बहुत कुछ इसी तरह मरी या मार दी गयीं।
कई दहेज के नाम पर? कितनी घरेलू हिंसा के कारण? कितनी मानसिक प्रताड़ना के कारण? कइयों नेआत्महत्या की? किसी की मृत्यु को दुर्घटना कहकर दर्ज किया गया। कितनों की खबर स्थानीय अखबार के एक छोटे-से कॉलम से आगे नहीं बढ़ी होगी?
उनके नाम क्या थे? उनके सपने क्या थे? उनकी कहानियाँ कहाँ हैं?
यह प्रश्न किसी एक मामले के महत्व को कम करने के लिए नहीं है। यह केवल यह याद दिलाने के लिए है कि चर्चित हो जाना और महत्वपूर्ण होना एक ही बात नहीं है।
मीडिया का अपना तर्क होता है। वह चेहरों को चुनता है। कहानियों को चुनता है। विवादों को चुनता है। लेकिन समाज का नैतिक दायित्व इससे बड़ा होना चाहिए। क्योंकि न्याय केवल उन लोगों का अधिकार नहीं है जो सुर्खियों में आ जाएँ। न्याय उन लोगों का भी अधिकार है जिनके नाम तक हमें याद नहीं रहते।
हमारी बेटियाँ और हमारी चुनी हुई चुप्पियाँ
यहाँ आकर प्रश्न फिर उसी जगह लौटता है जहाँ से शुरू हुआ था। आखिर हमारी बेटियाँ हमसे क्या चाहती हैं? शायद बहुत अधिक कुछ नहीं…
वे यह चाहती हैं कि उनकी बात सुनी जाए। उन पर विश्वास किया जाए। उनकी तकलीफ को भावुकता या अतिशयोक्ति कहकर खारिज न किया जाए।उन्हें यह भरोसा दिया जाए कि उनका जीवन किसी भी संस्था से अधिक महत्वपूर्ण है। विवाह से भी। परिवार की प्रतिष्ठा से भी। समाज की राय से भी।
क्योंकि विवाह मनुष्यों के लिए बना है। मनुष्य विवाह के लिए नहीं।
लेकिन भारतीय समाज आज भी कई बार इस सरल सत्य को भूल जाता है। हम बेटियों को बचपन से कहते हैं कि वे हमारा अभिमान हैं। फिर भी कई बार उनसे यही अपेक्षा करते हैं कि वे हमारे सामाजिक भय और सांस्कृतिक असुरक्षाओं का भार भी उठाएँ। हम उन्हें उड़ने को कहते हैं। फिर उनके पंखों की दिशा तय करना चाहते हैं। हम उन्हें स्वतंत्रता देते हैं। फिर उसके उपयोग की शर्तें भी तय कर देते हैं।
यही विरोधाभास हमारे समय की सबसे बड़ी सामाजिक विडंबनाओं में से एक है। महादेवी वर्मा ने जिन अदृश्य शृंखलाओं की बात की थी, वे शायद आज भी पूरी तरह टूटी नहीं हैं। उनका रूप बदल गया है। उनकी बस भाषा बदल गई है। उनके औचित्य बदल गए हैं। लेकिन उनका अस्तित्व बना हुआ है। उसके जीवन के कुछ निर्णायक प्रश्नों पर समाज का रवैया उतना आधुनिक नहीं हुआ।
क्या हम सचमुच अपनी बेटियों को यह अधिकार दे पाए हैं कि वे अपने जीवन के बारे में अंतिम निर्णय स्वयं ले सकें? क्या हमने उन्हें यह भरोसा दिया है कि किसी भी असुरक्षित, अपमानजनक या असहनीय परिस्थिति से बाहर निकलना उनका अधिकार है, अपराध नहीं?
त्विषा शर्मा की मृत्यु के बारे में अंतिम सत्य अदालतें तय करेंगी। दोषी कौन है, निर्दोष कौन है- यह कानून का विषय है। लेकिन समाज के हिस्से के कुछ प्रश्न अदालतें हल नहीं कर सकतीं। उन्हें हमें स्वयं हल करना होगा।
क्यों एक सफल युवती को अपने ही जीवन के सबसे कठिन क्षणों में इतना अकेला महसूस करना पड़ा? क्यों संकट में पड़ी बेटियों को आज भी अपने निर्णयों पर अपराधबोध होता है? क्यों विवाह अब भी स्त्री के जीवन पर इतना असमान नैतिक दबाव डालता है? क्यों कुछ स्त्रियाँ दूसरी स्त्रियों के दुख को समझने के बजाय उसी व्यवस्था की प्रहरी बन जाती हैं जिसने उन्हें भी सीमित किया था? और क्यों किसी लड़की की आवाज़ उसकी मृत्यु के बाद अधिक गंभीरता से सुनी जाती है?
त्विषा के बहाने उठे ये प्रश्न नए नहीं हैं। दुखद यह है कि वे बहुत पुराने हैं। हम उन्हें लंबे समय से जानते हैं। हम उनके साथ जीते आए हैं और.हम उन्हें बार-बार टालते रहे हैं। आज अमृता प्रीतम के शब्दों में मैं भी वारिस शाह से कहना चाहती हूं कि अतीत में केवल एक स्त्री, एक बेटी ( हीर) रोई थी और आपने उसके दुखों पर महाकाव्य लिख दिया था। लेकिन आज लाखों बेटियां हिंसा और अत्याचार का शिकार हो रही पर आपकी ( लेखकों की) कलम चुप क्यूं है? वे इस पर विरोध क्यूं नहीं दर्ज करा रहीं?
अदालतें व्यक्तियों का फैसला करती हैं। लेकिन समाज सबसे फहले गलती सही का नियामक होता है। अपराधी कोई एक व्यक्ति नहीं होता। अपराधी एक विचार भी हो सकता है। एक संस्कार। एक चुप्पी। एक भय। एक सामाजिक प्रशिक्षण। और कभी-कभी पूरी की पूरी पितृसत्ता।
अदालतें दोष तय कर सकती हैं। लेकिन समाज के भीतर जिम्मेदारी अक्सर बिखरी हुई होती है- परिवारों में, परंपराओं में, अपेक्षाओं में, चुप्पियों में।
कभी माँ के भीतर। कभी पिता की आशंकाओं में। कभी सास की स्वीकार्यता में। कभी समाज की टिप्पणियों में। और कभी उस पूरे सांस्कृतिक ढांचे में जिसे हम “सामान्य जीवन” मानकर चलते हैं।इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि गलती किसकी थी।
प्रश्न अब भी यही है कि- हमने अपनी बेटियों को केवल सफल बनाना चुना है, या उन्हें सचमुच स्वतंत्र देखने का साहस भी हममें है? और इससे भी बड़ा प्रश्न यह है- यदि वे कभी संकट में हों, तो क्या हम उनके साथ खड़े होते हैं, या उन्हें फिर से उसी व्यवस्था की ओर लौटने की सलाह देते हैं, जिसने उन्हें पहले भी असहज किया था?
क्योंकि किसी सभ्यता की परीक्षा उसके आदर्शों से नहीं, उसके संकटों में दिखाई देने वाले व्यवहार से होती है। और किसी भी सभ्यता की सबसे बड़ी विफलता तब होती है, जब उसकी बेटियाँ मदद के लिए पुकारती रहें और हम उनकी आवाज़ सुनने के लिए उनकी मृत्यु की प्रतीक्षा करे।
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