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अनिकेतः नरेश सक्सेना के घर पर- एक लम्बी दोपहर में कविता के बुजुर्ग कारीगर की संगत का सुख

लेखक हमेशा से अनिकेत होते हैं। उनका कोई एक निश्चित घर नहीं होता और सारी दुनिया उनके लिए उनका घर होती है। फिर भी वो कोई एक ठौर तो होता ही है जीवन में, जहां वे जीते हैं, लिखते हैं, जहां उनका मन रमता है। लेखकों के होते हुये और लेखकों के बाद भी उनके इन्हीं घरों की कहानी है ‘अनिकेत’। आज इस स्तंभ में वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना के घर की चर्चा।

पेशे से इंजीनियर रहे वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना अपने असाधारण जीवन और असाधारण कविताओं के लिए जाने जाते हैं। समुद्र में हो रही है बारिश’, ’सुनो चारूशीला’ तथा ’एक अनाम पत्ती का स्मारक’ उनके प्रमुख काव्य संग्रह हैं। फिलहाल नरेश जी अपने मित्र और हिंदी के वरिष्ठ कवि विनोद कुमार शुक्ल पर अपनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म की एडिटिंग में व्यस्त हैं। उनके पुत्र राघव के असमय गुजर जाने के बाद अब उनके घर के तीन स्थायी सदस्य हैं- नरेश जी, उनकी पुत्रवधू और पिता की मृत्यु के बाद जन्मा उनका पौत्र।’ तीन पीढियों के तीन लोगों से बसे और बने इस घर की यात्रा आज करवा रहे हैं- सुदीप सोहनी

लगातार जीवन और पेशे की व्यस्तता में भागते-दौड़ते हुए; और पहले थिएटर और अब सिनेमा की यात्राओं के चलते एक शहर से दूसरे शहर का सिलसिला मेरे लिए पिछले दस-बारह बरसों से जारी है। ज़ाहिर है काम के बाद की थकान कविता-कहानी की छाँव में ठौर पाती है। मुझे जानने वाले लोग इस बात से अच्छी तरह वाकिफ़ हैं कि मिलने-बतियाने के सुख और लुत्फ़ उठाने में कोई कोताही नहीं बरतता। मित्रताओं का सिलसिला भी इसी तरह क़ायम हुआ। दिल्ली, बंबई, पूना, कलकता, पटना, राँची, बीकानेर, बनारस, बैंगलोर, शिलॉन्ग, गुवाहाटी, जयपुर, देहरादून, शिमला, चंडीगढ़, हैदराबाद, रायपुर, भोपाल, इंदौर, पणजी, नागपुर, बिलासपुर, जबलपुर (इतने ही याद आ रहे अभी) और इन शहरों के आसपास के कितने ही गाँव-कस्बे यात्राओं के दौरान नापे और सिनेमा-कविता-कहानी-कला-रंगमंच का कोई भी सिरा पकड़ कर वह समय समृद्ध हुआ। पहले की यात्राओं में सोशल मीडिया और ख़ासकर फेसबुक पर बस लिख देता – इतनी से इतनी तारीख पर यहाँ हूँ। कविता-कहानी-चाय पर मिला जाये, आइये। और फिर सिलसिला बनता जाता। मिलने-बैठने के लिए किसी कैफ़े-रेस्टॉरेंट से लेकर किसी पार्क या सड़क किनारे फुटपाथ पर कोई चाय की थड़ी मिल जाती और बातें शुरू। स्वयं संपादक कविता जी भी इस बात की तस्दीक़ करेंगी ही कि दिल्ली में एक दोपहर फेसबुक पर साझा करने के दो घंटे बाद ही हम कुछ मित्रगण मंडी हाउस के चौराहे पर बने पार्क में थे और साहित्य-सिनेमा-कविता-रंगमंच-यात्राओं और सपनों की दुनिया में टहल रहे थे। वह समय अब थोड़ा पेचीदा हुआ है और मिलना-बतियाना इतना आसान रहा नहीं। उस मासूम समय की जगह अब एक सजग और होशियार बुद्धि ने ले ली है। लेकिन अब भी मन करता है और थोड़े सोचने-समझने के बाद जिस शहर भी होता हूँ वहाँ व्यक्तिगत मैसेज से संपर्क तो कर ही लेता हूँ।     

अप्रैल के शुरुआती हफ़्ते में इस बार मेरी नई फ़िल्म ‘जग्गू और मागाहारी’ का प्रदर्शन लखनऊ के प्रतिष्ठित सीएमएस स्कूल के चिल्ड्रेन फ़िल्म फ़ेस्टिवल में तय हुआ। भोपाल से निकलते हुए मन में था कि लखनऊ में फ़िल्म का मामला तो बन ही जाएगा लेकिन साहित्यिक बैठकी का क्या? फिर घूमना-फिरना भी है। अपने कुछ मित्रों से लखनऊ के कुछ ‘म्यूचुअल’ मित्रों का संपर्क भी लिया। लेकिन एक बड़े शहर में अब किसी को बग़ैर किसी काम से मिलने के लिए संपर्क करना असहज करता है कि पता नहीं क्या सोचेगा अगला कि भई क्यों मिलना है? बड़े शहर की दूरियाँ अलग। फिर यह कि एक साथ सबको किसी एक जगह पर मिलने के लिए बुलाना भी ठीक नहीं लगता। अब मैं भी समय देख कर कॉल या मैसेज करता हूँ। बहुत साल पहले एक बार प्रयाग शुक्ल को मैंने किसी काम से दोपहर दो-ढाई बजे कॉल कर लिया था। वे भोजन कर रहे थे। तो उन्होंने बात करने के बाद मुझे कहा था कि किसी को भी फोन करने के लिए उपयुक्त समय सुबह (बहुत सुबह नहीं) लगभग नौ-साढ़े नौ (9:00-9:30) से ग्यारह-साढ़े ग्यारह (11:00-11:30) का होता है। जब मैं मुंबई में रहता था तब तो दिन भर या अक्सर रात में दस (10:00) या ग्यारह बजे (11:00) भी सामान्य ही था किसी को भी फोन कर लेना। लेकिन भोपाल आने के बाद मैंने यह पाया कि यहाँ या उत्तर भारत में किसी को भी फोन करने का उपयुक्त समय प्रयाग जी ने जो बताया या तो वह है या फिर शाम पाँच (5:00-5:30) से लगभग साढ़े सात-आठ (7:30-8:00) तक। इस दायरे के बाहर मैं किसी को भी फोन करने के पहले मैसेज करता हूँ। अमूमन तो मैसेज ही कर देता हूँ और पूछ लेता हूँ कब कॉल करना उपयुक्त होगा। किसी से मिलना हो तो तुरंत कैसे मिला जाएगा किसी से, इसलिए एक दिन पहले ही अब प्लानिंग करता हूँ कि अगले दिन का कोई उपयुक्त समय तय हो जाये। और कभी-कभी तो अपने शहर से चलने के दो-तीन पहले ही। और हर बार मुझे यह फीलिंग आती है कि यह चिट्ठी लिखने वाले दिनों की तरह ही है। मोबाइल के जीवन का हिस्सा बन जाने के बाद भी अब अगर किसी को ई-मेल करो तो मैसेज कर के यह बताना पड़ता है कि भई ई-मेल किया है। और किसी आयोजन के व्यक्तिगत आमंत्रण का संदेश भेजने के बाद कॉल करके बताना पड़ता है कि व्हाट्सअप पर मैसेज देख लीजिएगा। लेकिन इतने सब के बाद भी बुजुर्ग पीढ़ी से मिलने-बतियाने का सुख अब भी कमोबेश आसान, सहज है। इसलिए प्रयाग जी का कहा मैं सोचता हूँ बेहद सहज और अपनेपन से भरा था। भोपाल में विजय बहादुर सिंह जितने स्पष्ट, तीखे प्रहारों के लिए जाने जाते हैं, उतने ही सहज भी तब लगते हैं जब फेसबुक पर कोई पोस्ट डीलीट हो जाने या तकनीकी रूप से असहाय होने पर फोन कर के पूछ लेते हैं। हालाँकि उनके फोन करने का समय लगभग साढ़े दस (10:30) के बाद है क्योंकि अल-सुबह से दस-साढ़े दस (10:00-10:30) तक का समय उनके लिए अध्ययन-लेखन का है। हालाँकि मुझे वे ये छूट दे देते हैं कि मैं उन्हें कभी भी फ़ोन कर सकता हूँ। इन दोनों ही स्पष्टताओं में मुझे हमारी पीढ़ी की तरह का कोई नकलीपन नज़र नहीं आता। 

Older man with glasses in a green shirt sits on a bed, reading a card, with floral bedding and white curtains behind.
अपने घर में नरेश सक्सेना इमेजः SUDEEP SOHNI

तो इन सब अनुभवों की छाया के बीच भोपाल से चलते हुए मैंने नरेश जी को मैसेज किया कि वे अगर लखनऊ में हैं तो क्या फ़िल्म देखने आ सकेंगे और मुलाक़ात होगी? फ़िल्म के लिए आमंत्रित करने का आग्रह इसलिए भी था कि वे स्वयं थिएटर और सिनेमा से जुड़े हैं। लेकिन मेरे आग्रह का अधिकार वाया साहित्य ही था। यह मेरे लिए आश्वस्ति इस तरह भी थी कि अपनी पहचान में साहित्य का स्वर मुझे भीतर से संतुष्ट रखता है। दूसरा यह भी कि बीते अक्तूबर माह में भोपाल में मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा मुझे अपने कविता संग्रह ‘मन्थर होती प्रार्थना’ पर जो वागीश्वरी पुरस्कार प्राप्त हुआ वह नरेश जी के हाथों ही मिला था। तो वहाँ हुई ताज़ा मुलाक़ात का एक सिरा अब भी खुला हुआ ही था। नरेश जी का मैसेज आया – फ़िल्म कहाँ और किस समय है? अगर कोई साथ रहा तो आऊँगा। लेकिन न आ सका और यदि संभव हो और आप मुझसे मिल सकेंगे तो और अच्छा होगा।‘ अगले दिन लखनऊ पहुँच कर मैंने उन्हें सुबह सवा दस बजे के लगभग कॉल किया और उनके न उठाने पर मैसेज किया। कुछ समय बाद उनका कॉल आया। कुशलक्षेम के बाद उन्होंने जगह का पता और समय पूछा। जब मैंने उन्हें बताया कि फ़िल्म के दो शो होंगे – एक सुबह लगभग 11 बजे और दूसरा दोपहर 2:30 बजे तब अपने पिछले अनुभवों के आधार पर मैंने ज़ोर देते हुए सुबह आने का आग्रह किया। दोपहर के लिए तो मैं स्वयं हतोत्साहित था। मगर मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उन्होंने कहा कि बढ़िया, दोपहर ढाई बजे फ़िल्म देखेंगे और फिर फ़िल्म देखने के बाद आप मेरे साथ ही घर आ जाना तो शाम को इत्मीनान से बात भी करेंगे। लेकिन शाम को फिर पता चला कि दोपहर की स्क्रीनिंग कैंसल हो गई है और सुबह वाली स्क्रीनिंग में डिस्कशन का सत्र जोड़ दिया है। नरेश जी ने मुझे कहा ठीक है फिर सुबह सत्र खत्म करके आप सीधे घर आ जाइए। अपना पता – मिठाई वाला चौराहा के पास, गोमती नगर और नजदीक के लिए बाटी-चोखा रेस्टॉरेंट का हवाला दिया। यह भी बताया कि ओला-उबर किसी टैक्सी में आने पर लोकेशन आ जाती है। बातों में ही पता चला कि मैं उनके घर से लगभग बीस किलोमीटर दूर कानपुर रोड पर एयरपोर्ट के नजदीक था। मैंने सोचा अच्छा हुआ अन्यथा उन्हें इतनी दूर आना होता! खैर, फ़िल्म के बाद मैं अपने भांजे ध्रुव को लेकर नरेश जी के घर चल पड़ा। 

लखनऊ में मौसम सुहाना था, गर्मी बिलकुल नहीं थी। उनके घर के लिए निकलते हुए फोन पर बात हुई और बीच में थोड़े ट्रेफिक के कारण मैंने उन्हें बताया लगभग डेढ़ बजे तक पहुँच जाऊंगा। मुझे बार-बार ये ख़याल आ रहा था कि अपने बुजुर्ग रचनाकार के दोपहर आराम के समय पर मैं पहुँच रहा हूँ। तब भी यह ख़याल भी था कि उन्होंने समय दिया है तो भी मैं ज़्यादा देर नहीं लूँगा और जल्द मिल कर लौट आऊँगा। कुछ डेढ़ बजे मिठाई वाले चौराहे पर पहुँच कर फोन लगाया तो उन्होंने ‘रिसिव’ नहीं किया। तब गूगल मैप की मदद से बाटी-चोखा रेस्टॉरेंट तलाश किया जो मेन रोड के बिलकुल बगल में बनी सर्विस रोड पर था और वहीं उतर गया। वहाँ मुझे किन्ही सक्सेना जी के नाम की पट्टी दिखी। लेकिन थोड़ी-चहलकदमी करते हुए मैंने वहाँ खड़े चौकीदार से पूछा जो नरेश जी का घर बता सके। दिमाग में बड़े शहरों के चौकीदारों का ख़याल आया कि एक बार दिल्ली में GK-2 में इमरोज साहब (अमृता प्रीतम के घर) से मिलने गया था और गलियों में भटकता रहा लेकिन इमरोज साहब के दिये हुए मकान नंबर से ढूँढ ही नहीं पाया और न ही वहाँ किसी चौकीदार ने बताया जबकि उनका घर पास ही था। तब चौकीदार से मैंने अमृता प्रीतम और इमरोज जी ये दो नाम ज़ोर देकर बताए थे मगर उसके माथे पर जूँ तक न रेंगी थी। यहाँ भी लगा कि साहित्यकार कोई बिजनेसमैन, पोलिटीशियन या फ़िल्मस्टार थोड़ी न हैं जो उन्हें कोई पहचानता हो। मैंने रेस्टॉरेंट पर खड़े चौकीदार से पूछा ही था कि एक सज्जन ने मुझे कहा, अच्छा दादा के घर जाना है जिनके यहाँ भैया अभी कुछ साल पहले नहीं रहे! मैं चौंका तो उन्होंने बताया दादा बहुत भले व्यक्ति हैं। उनके घर से कपड़े (इस्त्री करने के लिए) मैं ही लेता हूँ। 

और हम उस सड़क पर बने एक बंगलेनुमा घर के दरवाजे के सामने खड़े थे जिस पर नरेश सक्सेना, पूर्वा नरेश (उनकी बेटी) और दो-एक नामों (संभवत: नरेश जी की पत्नी या परिवार जन) की पट्टिका लगी थी। पहली नज़र में ही वह घर किसी कॉटेज जैसा महसूस हो रहा था। प्रवेश पर बड़ा-सा लोहे का दरवाजा था। पहले तो मैंने फोन किया लेकिन जब उन्होंने उठाया नहीं तो बेल बजाई। सोनी जी (नरेश जी की बहू) आईं और टाइल लगे हुए सुंदर से चढ़ाव-नुमा रास्ते से होते हुए जहाँ आसपास पेड़-पौधे, गमले रखे थे, हम भीतर द्वार पर पहुँचे। उस द्वार से प्रवेश करते ही बरामदे में आना हुआ। बरामदे में भोजन के लिए टेबल और कुर्सियाँ रखी थीं और एक गोल, घुमावदार सीढ़ी ऊपर की ओर जा रही थी। सीढ़ियों के सहारे ऊपर तक नरेश जी की दिवंगत पत्नी विजय जी की तस्वीरें लगी हुई थीं। दाहिनी ओर बैठकी थी। सोनी जी ने बताया कि नरेश जी स्नान कर के आ रहे हैं, तब तक आप बैठिये। सफ़ेदी वाला बैठकी का कमरा सुंदर और कलात्मक था। उल्टे यू (U) के आकार में जमे सोफा पर दाहिनी तरफ मैं यह सोच कर बैठा कि ठीक मध्य की जगह पर नरेश जी बैठ जाएँगे। कमरे में टैराकोटा के बने घड़े और गुल्लकनुमा बर्तनों में मनी प्लांट और नीचे रखी मेटल की कुछ मूर्तियों के अलावा एक नृत्यरत गणेश जी की सुंदर प्रतिमा सोफ़े के बाजू वाले छोटे टेबल पर रखी थी। लग रहा था वह प्रतिमा किसी खदान से उत्खनन में प्राप्त हुई होगी क्योंकि हाथ के पास वह कुछ भंग अवस्था में थी। मेरे ठीक सामने एक लंबा, आयताकार सुंदर चित्र टंगा हुआ था। पास की दीवारों पर नरेश जी और बेटी (युवा दिनों की) तस्वीर थी। हल्के पीले रंग की वर्गाकार फ्रेम में यह श्वेत-श्याम तस्वीर चस्पा थी जो अपने फ़्रेम के कारण पहली नज़र में ही आकर्षित कर रही थी। आमतौर पर मैंने तसवीरों के फ्रेम आयताकार देखे हैं। वर्गाकार में यह तस्वीर और फ़्रेम दोनों ही ख़ूबसूरत नज़र आ रही थी। उस पर नरेश जी के युवा दिनों की झलक मतलब कि वे सचमुच हैंडसम हीरो ही लग रहे थे (अपने युवा दिनों में उनका अलग ही जलवा रहा होगा)। थोड़ी देर में नरेश जी आए। औपचारिक शिष्टाचार और अभिवादन के बाद हम बैठे। वे कहने लगे कि जब आप चले थे तब ही अंदाज़ा लगा लिया था कि आधे घंटे के करीब समय आपको आने में लगेगा लेकिन जब बीच ट्रेफिक में आपने फोन किया तो फिर मैं बहू को बोल कर स्नान के लिए चला गया था । नरेश जी के न आने तक उनका पाँच वर्षीय पोता अनहद हमारे साथ खेल रहा था। हमारे आते ही वह ख़ुश-सा लग रहा था कि साथ खेलने के लिए उसे कोई मिल गया। जब मैंने अपने पाँच वर्षीय बेटे प्रत्यूष के बारे में उसे बताया और उसकी हरकतों के बारे में भी तो सोनी जी थोड़ी बेफिक्र हुईं। मैंने बताया कि मुझे भी आदत है जब घर में किसी आगंतुक के आने पर मेरा बेटा भी अति-उत्साह में क्या-क्या कर गुज़रता है! फिर वे हमें पानी दे कर निश्चिन्त हो कर चली गईं और अनहद के साथ हम खेलते रहे। नरेश जी के आने के बाद भी अनहद की मस्ती थोड़ी देर चलती रही और कुछ समय बाद उसकी माँ ने भीतर आवाज़ देकर बुला लिया तो वह खेलने चला गया। 

Two men seated on a floral sofa indoors, conversing with each other on a bright living room backdrop.

नरेश जी ने कहना शुरू किया – मैं सुबह देर से ही सोकर उठता हूँ लगभग 11 बजे। इसलिए दोपहर का समय मेरे लिए उपयुक्त था आपकी फ़िल्म देखने के लिए। यह मेरे लिए सुखद आश्चर्य था। संभवत: मैं पहले किसी साहित्यकार से मिल रहा था जिनका दिन देर से शुरू होता है। मेरी देर से आने की ग्लानि थोड़ी कम हुई। संशय तब भी था कि कुछ देर मिलकर शायद लौट जाऊंगा। हमारी बातें शुरू हुईं। अनहद और प्रत्यूष में थोड़ी समानता जान कर (नमस्ते करने से लेकर आगंतुकों से बिंदास बातचीत करना, सवाल करना, मौज करना) वे प्रसन्न लग रहे थे। ध्रुव से परिचय भी लिया और कुछ देर हम भोपाल, हिन्दी साहित्य सम्मेलन में हुई पिछली मुलाक़ात, पूना फ़िल्म संस्थान के मेरे अनुभवों, मेरी लखनऊ में हुई फ़िल्म स्क्रीनिंग आदि पर बात करते रहे। मैंने उन्हें बताया कि सबसे पहली मुलाक़ात साल 2013 में वर्धा में कृत्या पोएट्री फेस्टिवल के दौरान हुई थी जब विनोद जी (विनोद कुमार शुक्ल) और आप दोनों से मिला था। फिर वे मेरी फ़िल्मों और काम के बारे में विस्तार से पूछते रहे। बीच-बीच में खुश भी होते रहे कि भोपाल में रहकर मैं काम कर रहा हूँ। फ़िल्मों के लिए धन के सवाल पर थोड़े संशय से भरे भी दिखाई देते रहे और फिर हमारे प्रयासों, और संघर्ष के बीच कमर्शियल कामों की जानकारी से संतुष्ट भी होते रहे। उन्होंने बताया कि विनोद जी पर एक वृत्तचित्र वे तैयार कर रहे हैं, जिसकी थोड़ी जानकारी भोपाल में भी उन्होंने मुझे दी थी। विस्तार से हमने इस पर चर्चा की और भोपाल में आगे होने वाली संभावित शूटिंग के लिए मेरी मदद भी उन्होंने चाही। हम बातें कर ही रहे थे और भीतर से भोजन लग गया है की आवाज़ आई। मैं संशय में था कि अब चलना चाहिए या नरेश जी से कह देता हूँ कि आप भोजन करिए। लेकिन नरेश जी का आग्रह इतना अधिकार और सहजता से भरा था, लगा मैं अपने घर के बुजुर्ग से ही बात कर रहा। सोनी जी ने भी आत्मीयता से भोजन का आग्रह किया और अब संशय को अलग रख हम बरामदे में भोजन की टेबल पर थे। 

Decorative split scene: left a black metal plant stand with plants and small statues on a dark wooden table; right a carved stone Ganesha statue on a wooden table with a white ceramic cup nearby.

देस-परदेस कोई हो, चाहे कितना भी अच्छा होटल क्यों न हो, घर के खाने की बात कुछ अलग ही होती है। सोनी जी गरमा-गरम फुल्के सेंक कर परोस रही थीं। मेथी का साग, आलू टमाटर की तरीदार सब्ज़ी, पचरंगी दाल, दही में छौंका डालकर बना रायता, चावल, सलाद, अचार और मिष्ठान। सारा भोजन इतना स्वादिष्ट कि क्या ही कहा जाये! खासतौर से पचरंगी दाल और आलू-टमाटर की तरी वाली सब्ज़ी। इतनी-सी देर में उन्होंने इतना सब कुछ तैयार कर दिया था, और एक सब्ज़ी हमारे कारण बना ली थी। अपने घर की याद भी आई जब माँ या एकता मेरे मित्रो के घर आने पर किचन में भिड़ जाते हैं और वह भी मैंने उनसे साझा किया। फिर किचन से काम निबटा कर सोनी जी भी आ गईं और हम साथ भोजन कर रहे थे। बीच-बीच में अनहद के नटखटपन से शुरुआत में जो असहजता उन्हें लग रही थी अब वह खत्म हो गयी थी क्योंकि उन्हें प्रत्यूष के अनुभव मैं भी बताता चल रहा था। ध्रुव ने भोजन जल्दी खतम किया और वह अनहद के साथ खेलने लगा। नरेश जी से मैं बतियाने लगा। लखनऊ कैसे आना हुआ? और फिर उन्होंने अपनी जीवन यात्रा के बारे में बताना शुरू किया। ग्वालियर में पैदाइश और जबलपुर में इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद नौकरी के सिलसिले में वे यहाँ आए और यहीं के होकर रह गए। लखनऊ की मेहमाननवाज़ी और स्वाद के बीच मैंने उनसे बुन्देली का ज़िक्र किया और फिर सोनी जी ने बताया कि वे अब भी बहुत अच्छी बुन्देली बोलते हैं। फिर कुछ देर नरेश जी बुन्देली में बतियाते रहे। मैं मध्य प्रदेश के निमाड़ जनपद से आता हूँ लेकिन हमारे यहाँ निमाड़ी, मालवी, और बुन्देली में हिन्दी का आधार बना रहता है और इसलिए समझने में दिक्कत नहीं होती। हाँ, बघेली का पुट ज़रूर कुछ अलग है। नरेश जी बता रहे थे कि नौकरी की शुरुआत से ही वे मेधावी इंजीनियर रहे। इंजीनियरिंग के अलावा भी उच्च अध्ययन और डिग्री भी साठ के दशक में वे प्राप्त कर चुके थे। तो नौकरी में रहते हुए उनके पास बड़े विभाग भी रहे, बड़ी जिम्मेदारियाँ भी। अपने से ऊपर के अफ़सरों के चहेते भी रहे इसलिए बेफ़िक्र भी कि काम अपनी सहूलियत से करते रहे। वे बता रहे थे कि कॉलेज में पढ़ाई के दौरान ही, लगभग किशोरवय से, विनोद जी से उनका परिचय था और शुरुआत से ही वे विनोद जी की कविताओं के प्रशंसक रहे। भोजन पर संवाद में हम नरेश जी के युवा दिनों का ज़िक्र, साहित्यिक यात्रा का आरंभ, कविता से जुड़ाव, विवाह इत्यादि पर बात करते रहे। भोजन उपरांत अनहद अपनी माँ के साथ यह वायदा लेकर गया कि जब वह दोपहर की नींद लेकर उठेगा तो हम उसे यहीं मिलेंगे।

Angled black-framed photo collage hanging on a beige wall, showing grayscale portraits inside the frame.
पत्नी के साथ नौजवान नरेश सक्सेना

हम पुनः बैठकी में आए। नरेश जी ने कुछ फल लिए यह बताते हुए कि भोजन उपरांत उनकी दिनचर्या में फल शामिल हैं। हमारा संवाद फिर शुरू हुआ। समय की माप में ढले बुजुर्ग लेकिन जीवन के उल्लास में अब भी नौजवान कवि की कविताई समझ में हमने बीते, वर्तमान और संभव होने वाली कविता की अंगुलियाँ पकड़ी. मेरे पास हर माध्यम के रचनाकार के लिए शुरुआती एक ही सवाल होता है : आपके लिए आपका माध्यम क्या है? (सिनेमा, कविता, संगीत, चित्रकला … क्या है). और फिर नरेश जी जैसे कवि के पास देखने की जो आँख है, जीवन का ताप है, कविता की मुलायम काया और भाषा-व्यंजना के साथ तार्किक-वैज्ञानिक अभिव्यक्ति, अपने समय के तीखे चुभते सवाल हैं – उनमें हर अगले क्षण रोशनी ही पहुँच रही थी. कविता में शिल्प और कथ्य पर लम्बी बात उनसे हुई। उनकी कविताओं ‘शिशु, लोरी के गीत नहीं’, ‘पुल पार’, ‘चंबल’ ‘मछलियाँ’ सुनना और उस पर उनसे सुनना सुखद था।  नरेश जी के पास पाठ का अपना कौशल है. यह कहाँ से आया के सवाल पर वे अपने शुरुआती समय में सुने नीरज, बच्चन, भवानीप्रसाद मिश्र आदि के कवि सम्मेलनों में पढ़ने के अंदाज़ और मंत्र मुग्ध हुए श्रोता समूह का ज़िक्र करते रहे. पाठ की यही शक्ति उनके पास स्वयं की कविताओं के लिए तो है ही, अन्य रचनाकारों की कवितायें भी उन्हें कंठस्थ है। विनोद जी और केदार जी की कविताओं का उन्होंने पाठ किया और लगभग हर कविता के विषय में वे उसके शिल्प पर अपनी बात रखते जा रहे थे। मसलन, हिन्दी कविता में अतुकांत कविता को वे शिल्प की दृष्टि से तो महत्त्वपूर्ण मानते हैं। उनका कहना था कि छंद, तुक, मीटर, लय आदि छोड़ने के बाद भी अगर हम यहाँ तक पहुँचे हैं तो यह भी कविता के लिए मायने रखता है कि वे तो अलंकरण थे जिनके बाद भी कविता अपने आप में सशक्त बनी हुई है। स्ट्रक्चर पर वे कह रहे थे कि कोई कविता कहाँ पहुंचेगी यह उसकी पहली पंक्ति से पता चल जाता है जिसकी बुनियाद वही स्ट्रक्चर है। वे कह रहे थे मसलन यह कमरा इसी तरह डिजाइन किया है कि इसमें आठ दीवारें हैं। इस स्ट्रक्चर का अपना महत्त्व है। लगे हाथों मैंने उनसे हिन्दी साहित्य में ट्रोलिंग की प्रवृत्ति और स्वयं उनके विषय में होने वाली बहसों, आरोप-प्रत्यारोपों पर सवाल किया और वे मुस्कुरा उठे। मैंने जाना यह मुस्कान और ऊर्जा ही उनकी कविता और जीवन की शक्ति है। अपने समवर्ती रचनाकारों में स्वयं को पीछे रखने की स्वीकारोक्ति को सुनना भी मेरे लिए कवि से इतर उनमें एक बड़े मनुष्य होने को चीन्ह्ना था.  

और फिर वह क्षण आया जब कच्ची-पक्की पाँत में ढले अपने शब्दों को मैं उनके सामने बाँच रहा था. मैंने उन्हें बताया कि ‘पुल पार’ कविता नहीं पढ़ी थी तब लिखी थी। और तब मुझे मित्रो ने आपकी कविता तक पहुँचाया था। एक लम्बी दोपहर इस तरह हमारे साथ चलती चली जा रही थी। बीच-बीच में ध्रुव से भी उसके स्कूल और पढ़ाई-लिखाई का ज़िक्र करते जा रहे थे। जब लगा कि अब चलना चाहिए तो फिर एक सवाल कौंधा, गणेश जी की उस मूर्ति के विषय में। मैंने पूछा यह क्या किसी उत्खनन के दौरान मिली थी। तो उन्होंने बताया मेरी पत्नी विजय जो पूना फ़िल्म संस्थान से पास होने वाली पहली महिला निर्देशिका थी, उन्होंने 1980 के आसपास लखनऊ में एक फ़िल्म फेस्टिवल आयोजित किया था। और इस मूर्ति की प्रतिकृति सभी भाग लेने वाले फ़िल्मकारों को हमने भेंट की थी। फिर उन्होंने कुछ तस्वीरें लेने का आग्रह किया जिसमें ख़ास तौर से पार्श्व में लगी सीरज सक्सेना की पेंटिंग ज़रूर आए। मैंने उनसे अपनी डायरी में कुछ लिखने का आग्रह किया। विदा देने वे मुख्य द्वार तक आए। 

वे कह रहे थे – ‘मेरी स्मृति में बीता हमेशा सुख की तरह ही रहा! बहुत सुख से गुज़रा जीवन’. वाक़ई यह सुख या सुकून उनकी उपस्थिति में मैं महसूस कर पा रहा था. एक सुख की स्मृति मेरे साथ भी लौट कर आई इस तरह. कविता की ताक़त क्या है – मेरे लिए यह पूरा दिन ही उसे समझने का सबब रहा. सोच रहा था जीवन में अगर कविता न आई होती तो क्या अपनी जड़ों में गहरे धँसे और पुष्पों से सुरभित, पल्लवित वृक्ष की ही तरह अपने अग्रज कवि के साथ यह सुखद समय मैं संजो पाता कभी? 

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सुदीप सोहनी
भारतीय फ़िल्म एवं टेलीविज़न संस्थान, पुणे के वर्ष 2013-14 के छात्र. कवि, पटकथा लेखक, निर्देशक, परिकल्पक व सलाहकार के रूप में सिनेमा, साहित्य, व संस्कृतिकर्म में संलग्न। नीहसो – उपनाम से कविता लेखन। विगत वर्षों से देश की प्रमुख पत्रिकाओं, अखबार, ब्लॉग, वेबसाइट्स आदि पर कविता, गद्य तथा कला व सिनेमा सम्बन्धित आलेखों का नियमित प्रकाशन। अमेरिका के आर्कियोलॉजी चैनल द्वारा स्थापित डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के दुनिया के अनोखे ओटीटी प्लेटफॉर्म ‘हेरिटेज’ पर अपनी फ़िल्मों -‘तनिष्का’ और ‘यादों में गणगौर’ के इंटरनेशनल डिस्ट्रीब्यूशन और रीलीज़ पाने वाले मध्य प्रदेश के पहले और एकमात्र फ़िल्मकार। भारत, अमेरिका, यूरोप, वेस्टइंडीज और बांग्लादेश के महत्त्वपूर्ण फिल्म समारोहों में फ़िल्मों के प्रदर्शन. जनजातीय संग्रहालय, संस्कृति विभाग(मध्य प्रदेश) के लिए तैयार मध्य प्रदेश के पद्मश्री कलाकारों भूरी बाई, भज्जू सिंह श्याम, दुर्गा बाई व्याम, रामसहाय पांडे और अर्जुन सिंह धुर्वे पर बनी फिल्मों का लेखन व सहायक निर्देशन। देश के कई शिक्षा संस्थानों में सिनेमा पाठयक्रम निर्माण और सिने कार्यशालाओं में हिस्सेदारी। एक कविता संग्रह 'मन्थर होती प्रार्थना (2023)' और एक मोनोग्राफ़ 'साहित्य, सिनेमा और समय (2019)' प्रकाशित। हाल ही में मध्य प्रदेश साहित्य सम्मेलन द्वारा कविता के लिए उन्हे वागीश्वरी पुरस्कार 2025 के लिए चुना गया है। इसके पहले रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय द्वारा जूनियर टैगोर फ़ेलोशिप भी प्राप्त है। इन दिनों सुदीप सोहनी फ़िल्म्स के तहत भोपाल (म प्र) में रहकर स्वतंत्र फ़िल्म निर्माण।
सुदीप सोहनी
भारतीय फ़िल्म एवं टेलीविज़न संस्थान, पुणे के वर्ष 2013-14 के छात्र. कवि, पटकथा लेखक, निर्देशक, परिकल्पक व सलाहकार के रूप में सिनेमा, साहित्य, व संस्कृतिकर्म में संलग्न। नीहसो – उपनाम से कविता लेखन। विगत वर्षों से देश की प्रमुख पत्रिकाओं, अखबार, ब्लॉग, वेबसाइट्स आदि पर कविता, गद्य तथा कला व सिनेमा सम्बन्धित आलेखों का नियमित प्रकाशन। अमेरिका के आर्कियोलॉजी चैनल द्वारा स्थापित डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के दुनिया के अनोखे ओटीटी प्लेटफॉर्म ‘हेरिटेज’ पर अपनी फ़िल्मों -‘तनिष्का’ और ‘यादों में गणगौर’ के इंटरनेशनल डिस्ट्रीब्यूशन और रीलीज़ पाने वाले मध्य प्रदेश के पहले और एकमात्र फ़िल्मकार। भारत, अमेरिका, यूरोप, वेस्टइंडीज और बांग्लादेश के महत्त्वपूर्ण फिल्म समारोहों में फ़िल्मों के प्रदर्शन. जनजातीय संग्रहालय, संस्कृति विभाग(मध्य प्रदेश) के लिए तैयार मध्य प्रदेश के पद्मश्री कलाकारों भूरी बाई, भज्जू सिंह श्याम, दुर्गा बाई व्याम, रामसहाय पांडे और अर्जुन सिंह धुर्वे पर बनी फिल्मों का लेखन व सहायक निर्देशन। देश के कई शिक्षा संस्थानों में सिनेमा पाठयक्रम निर्माण और सिने कार्यशालाओं में हिस्सेदारी। एक कविता संग्रह 'मन्थर होती प्रार्थना (2023)' और एक मोनोग्राफ़ 'साहित्य, सिनेमा और समय (2019)' प्रकाशित। हाल ही में मध्य प्रदेश साहित्य सम्मेलन द्वारा कविता के लिए उन्हे वागीश्वरी पुरस्कार 2025 के लिए चुना गया है। इसके पहले रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय द्वारा जूनियर टैगोर फ़ेलोशिप भी प्राप्त है। इन दिनों सुदीप सोहनी फ़िल्म्स के तहत भोपाल (म प्र) में रहकर स्वतंत्र फ़िल्म निर्माण।
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