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पाकिस्तान के इतिहास की किताबों में क्या-क्या पढ़ाया जाता है, जिस पर उठते रहे हैं सवाल

पाकिस्तान के ही कई जानकार दशकों से कहते रहे हैं कि यहां स्कूली इतिहास की किताब में कई फेरबदल हैं और सच्चाई को छिपाने का प्रयास रहा है। ख्वाजा आसिफ का ताजा बयान भी इसी ओर इशारा करता है।

पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के हालिया बयान ने पाकिस्तान की शिक्षा व्यवस्था और खासकर इतिहास लेखन पर लंबे समय से चली आ रही पुरानी बहस को एक बार फिर जिंदा कर दिया है। ख्वाजा आसिफ ने पाकिस्तान में एक टीवी इंटरव्यू में कहा कि उनके पूर्वज हिंदू थे और पाकिस्तान के स्कूलों में बच्चों को सही इतिहास नहीं पढ़ाया जा रहा है। उन्होंने ये भी सवाल उठाया कि आखिर चंद्रगुप्त मौर्य, सम्राट अशोक और इस इलाके (भारतीय उपमहाद्वीप) की दूसरी गैर-इस्लामी विरासत को पाकिस्तान की किताबों से लगभग गायब क्यों कर दिया गया।

आसिफ का यह बयान भले ही नया हो लेकिन पाकिस्तान में इतिहास की पाठ्यपुस्तकों को लेकर विवाद कोई नया नहीं है। कई बार इसे लेकर पाकिस्तान के ही शिक्षाविद्, बुद्धिजीवी और विशेषज्ञ सवाल उठाते रहे हैं। भारत में भी हाल के दशकों में इतिहास की बातों को लेकर कई तरह के सवाल उठे हैं, तोड़ने-मरोड़ने जैसी बातें हुई हैं लेकिन पाकिस्तान में यह चलन पुराना है। आसिफ ने पूरी बहस को फिर से छेड़ दिया है। आसिफ ने कहा क्या, पहले इसे सुनिए-

सवाल है कि पाकिस्तान में इतिहास को लेकर ऐसी उलझन क्यों है? दरअसल, पाकिस्तान के ही कई जानकार दशकों से कहते रहे हैं कि यहां इतिहास को राजनीतिक जरूरतों और ‘टू नेशन थ्योरी’ के हिसाब से ढाला गया। यानी ऐसा इतिहास, जिसमें यह साबित करने की कोशिश की गई कि हिंदू और मुसलमान हमेशा से अलग-अलग राष्ट्र थे और पाकिस्तान का बनना ऐतिहासिक रूप से अनिवार्य था।

पाकिस्तानी इतिहासकार केके अजीज की बहुत चर्चित किताब ‘द मर्डर ऑफ हिस्ट्री’ है। ख्वाजा आसिफ ने भी इसका जिक्र अपने बयान में किया है। इसमें लिखा है कि पाकिस्तान की इतिहास की स्कूली किताबों में तथ्यात्मक गलतियां, आधे-अधूरे सच और वैचारिक व्याख्याएं भरी हुई हैं। कई घटनाओं को जानबूझकर इस तरह पेश किया गया ताकि पाकिस्तान की ‘अलग पहचान’ का नैरेटिव मजबूत हो सके। पाकिस्तान की इतिहास की किताबों को ऐसी क्या-क्या बातें हैं, जिन पर विवाद होता रहा है, उसकी भी कुछ बानगी देखते हैं।

पाकिस्तान की इतिहास की किताबों में क्या हैं?

  • पाकिस्तान का इतिहास 712 ईस्वी से शुरू होने का दावा: कई किताबों में यह धारणा दी गई कि पाकिस्तान का इतिहास मोहम्मद बिन कासिम के सिंध आने से शुरू हुआ। किताबों में यही सें पाकिस्तान का इतिहास शुरू होता है। आलोचकों का कहना है कि इससे सिंधु घाटी सभ्यता, मौर्य साम्राज्य, बौद्ध, जैन और हिंदू विरासत को लगभग नजरअंदाज कर दिया गया।

इस्लामी शासन से पहले के इतिहास को कम महत्व देना: पाकिस्तानी विद्वान मुबारक अली समेत कई इतिहासकारों ने लिखा कि पाठ्यपुस्तकों में यह संदेश दिया गया कि इस्लाम से पहले का इतिहास कम महत्वपूर्ण था, जबकि सच ये है कि आज का पाकिस्तान मोहनजोदड़ो और तक्षशिला जैसी प्राचीन सभ्यताओं का भी वारिस है।

  • हिंदुओं को नकारात्मक तरीके से पेश करना: यह भी एक बड़ी समस्या पाकिस्तान की इतिहास की किताबों में रही है। हिंदुओं को अक्सर मुसलमानों के विरोधी या दुश्मन की तरह पेश किया गया। ऐसी भाषा कई पाकिस्तानी बच्चों में धार्मिक पूर्वाग्रह पैदा करने की अहम वजहें रही।

भारत के साथ साझा इतिहास को छोटा करना: कई किताबों में यह जोर दिया गया है कि हिंदू और मुसलमान कभी साथ नहीं रह सकते थे। आलोचकों का कहना है कि इससे उपमहाद्वीप की साझा संस्कृति, भाषा और सामाजिक रिश्तों की तस्वीर अधूरी रह जाती है।

कांग्रेस को ‘हिंदू पार्टी’ की तरह दिखाना: भारत जब अंग्रेजों से आजादी की लड़ाई लड़ रहा था, उस दौर की कहानी भी गलत तरीके से रखी गई है। पाकिस्तान की इन किताबों में स्वतंत्रता आंदोलन को ‘मुस्लिम लीग बनाम हिंदू कांग्रेस’ के संघर्ष के रूप में भी पेश किया गया। तब की कांग्रेस को एक तरह से हिंदुओं की पार्टी के तौर पर पेश किया गया है। जबकि कांग्रेस में बड़ी संख्या में मुस्लिम नेता भी सक्रिय थे। ऐसे ही महात्मा गांधी सहित भगत सिंह, मंगल पांडे और दूसरे क्रांतिकारी नेताओं आदि की भूमिका भी कम करके बताई गई है। गांधी का जिक्र है, लेकिन उन्हें एक तरह से पाकिस्तान की मांग का विरोध करने वाले नेता के रूप में पेश किया जाता है। गांधी की अहिंसा की राजनीति, हिंदू-मुस्लिम एकता की बातों और विभाजन के दौरान हिंसा रोकने की भूमिका पर चर्चा नहीं के बराबर है।

  • मोहम्मद अली जिन्ना को एकमात्र केंद्रीय नायक बनाकर पेश किया गया है। पाकिस्तान की किताबों में जिन्ना को राष्ट्र निर्माण का लगभग अकेला चेहरा बना दिया गया, जबकि खान अब्दुल गफ्फार खान जैसे नेताओं की भूमिका काफी सीमित तरीके से दिखाई गई है। टीपू सुल्तान, जनरल बख्त खां, आखिर मुगल शासक बहादुर शाह जफर, सर सैय्यद अहमन खान आदि का जिक्र जरूर है। पिछली कई पीढ़ियों से पाकिस्तान में ऐसा ही इतिहास पढ़ाया जा रहा है।

जिया-उल-हक के दौरे में हुए बड़े बदलाव

इतिहास की किताबों सबसे ज्यादा इस्लामीकरण और इनमें बदलाव जिया-उल-हक के दौर में हुआ। इनके शासनकाल में इतिहास और सामाजिक विज्ञान की किताबों में जिहाद, शहादत और भारत-विरोधी दृष्टिकोण को ज्यादा प्रमुखता दी गई। कुल मिलाकर इससे इतिहास पढ़ाने का मकसद आलोचनात्मक सोच के बजाय राष्ट्रवादी मानसिकता तैयार करना बन गया।

बहरहाल, ख्वाजा आसिफ का बयान मौजूदा समय में महत्वपूर्ण जरूर माना जा सकता है। क्योंकि यह आलोचना किसी बाहरी ने नहीं खुद पाकिस्तान के मौजूदा रक्षा मंत्री ने की है। उनका यह स्वीकार करना कि ‘हमारे बच्चे गलत इतिहास पढ़ रहे हैं’, उस बहस को फिर से तेज कर सकता है जो पाकिस्तान में दशकों से चल रही है।

आखिर में असल सवाल अब भी वही है…क्या पाकिस्तान अपने इतिहास को केवल धार्मिक पहचान के चश्मे से देखता रहेगा, या फिर वह सिंधु घाटी से लेकर बौद्ध, हिंदू, सिख और मुस्लिम दौर तक फैली पूरी विरासत को भी स्वीकार करेगा? क्योंकि इतिहास का काम राष्ट्रवादी भावनाएं तैयार करना नहीं, बल्कि समाज को अपने अतीत की जटिल सच्चाइयों से परिचित कराना होता है।

यह भी पढ़ें- अमेरिका ने ईरान पर फिर किया सैन्य हमला, होर्मुज के पास हमलावर ड्रोनों को मार गिराया

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विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...
विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...
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