नई दिल्ली: दुनिया पर एक बार फिर गंभीर जलवायु संकट के सबसे बड़े खतरों में से एक का साया मंडरा रहा है। प्रशांत महासागर में तेजी से बन रही परिस्थितियां इस साल एक बेहद शक्तिशाली ‘सुपर अल नीनो’ को जन्म दे सकती हैं। अप्रैल 2026 में समुद्री सतह के तापमान रिकॉर्ड स्तर के करीब पहुंच गए हैं, जिससे आशंका जताई जा रही है कि आने वाले महीनों में वैश्विक तापमान और चरम मौसम घटनाओं में भारी बढ़ोतरी हो सकती है। इस खतरे ने 1877 में हुए इसी तरह के आए ‘अल नीनो’ की कहानी को भी चर्चा में ला दिया है, जब पूरी दुनिया में असर नजर आया था। तब दुनिया भर में करोड़ों लोग चरम मौसमी आपदाओं और इसके असर से मारे गए थे।
इस साल की बात करें तो यूरोपीय संघ की कॉपरनिकस क्लाइमेट चेंज सर्विस के अनुसार अप्रैल 2026 में ध्रुवीय क्षेत्रों को छोड़कर दुनिया के महासागरों का औसत सतही तापमान 21 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। यह किसी भी अप्रैल महीने के लिए दूसरा सबसे गर्म तापमान है। इससे पहले अप्रैल 2024 सबसे गर्म अप्रैल दर्ज किया गया था। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह बदलाव अल नीनो परिस्थितियों के तेजी से विकसित होने का संकेत है।
वैज्ञानिकों के अनुसार इस बार स्थिति सामान्य अल नीनो से कहीं अधिक गंभीर हो सकती है। अमेरिका की नेशनल ओशिएनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन (NOAA) ने अनुमान लगाया है कि जुलाई 2026 तक एल नीनो विकसित होने की 61 प्रतिशत संभावना है। साथ ही लगभग 25 प्रतिशत संभावना यह भी है कि यह ‘बहुत मजबूत’ यानी सुपर एल नीनो का रूप ले ले।
1877 के सुपर अल नीनो की तबाही की कहानी, क्या हुआ था?
1877-78 का ‘सुपर अल नीनो’ आधुनिक इतिहास की सबसे विनाशकारी जलवायु घटनाओं में गिना जाता है। इसका असर दुनिया के लगभग हर हिस्से पर पड़ा था। उस समय मौसम विज्ञान आज जितना विकसित नहीं था, लेकिन बाद में ऐतिहासिक रिकॉर्ड, समुद्री तापमान के अध्ययन और अकाल संबंधी दस्तावेजों से पता चला कि यह अल नीनो बेहद शक्तिशाली था।
भारत पर इसका बहुत गंभीर असर पड़ा था। इसके अलावा चीन और ब्राजील जैसे देश भी भयंकर सूखे की चपेट में आ गए थे। फसलें सूख गईं, जलस्रोत खत्म होने लगे और खाद्यान्न संकट गहरा गया था। अकाल में मरने वालों की कोई सटीक संख्या मौजूद नहीं है लेकिन अनुमान के अनुसार दुनिया भर में एक से तीन करोड़ लोगों तक की मौत हुई हो सकती है।
अल नीनो क्या है, क्यों और कैसे आता है?
मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार अल नीनो की स्थिति विकसित होने पर भारत में सामान्य से कम मानसून, अधिक तापमान और लंबी हीटवेव की संभावना बढ़ जाती है। यह केवल एक जलवायु घटना नहीं, बल्कि ऐसी वैश्विक मौसमीय बाधा है जो भारत जैसी मानसून पर निर्भर अर्थव्यवस्था के लिए सीधे आर्थिक जोखिम में बदल सकता है।
अल नीनो को समझने के लिए पहले यह जानना होगा कि सामान्य परिस्थितियों में प्रशांत महासागर के ऊपर मौसम कैसे काम करता है। आमतौर पर भूमध्य रेखा के आसपास चलने वाली Trade Winds पूरब से पश्चिम की ओर बहती हैं। ये हवाएं दक्षिण अमेरिका के पास मौजूद गर्म सतही समुद्री पानी को धकेलकर इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया की दिशा में ले जाती हैं। इस वजह से पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र के ऊपर गर्म और नमी से भरे बादल बनते हैं, जबकि दक्षिण अमेरिका के तट के पास अपेक्षाकृत ठंडा पानी ऊपर आता रहता है। यही संतुलन वैश्विक मौसम प्रणाली का एक अहम हिस्सा है।
लेकिन अल नीनो के दौरान यह संतुलन बिगड़ जाता है। ट्रेड विंड्स कमजोर पड़ जाती हैं या कई बार दिशा और गति में असामान्य बदलाव आता है। जब ऐसा होता है, तो गर्म पानी पश्चिम की ओर नहीं धकेला जा पाता और प्रशांत महासागर के मध्य तथा पूर्वी हिस्से में जमा होने लगता है। ऐसे में वहां समुद्र का सतही तापमान सामान्य से अधिक बढ़ जाता है। समुद्र की इस अतिरिक्त गर्मी से वायुमंडल की संरचना बदलती है, बादलों और वर्षा के पैटर्न शिफ्ट होते जाते हैं, और पूरी दुनिया के मौसम तंत्र पर इसका असर पड़ता है।
सीधी भाषा में कहें तो अल नीनो पृथ्वी के “हीट और नमी के बंटवारे” को बिगाड़ देता है। जहां सामान्य तौर पर बारिश होनी चाहिए, वहां कम हो सकती है; और जहां कम होती है, वहां ज्यादा हो सकती है। भारत के लिए समस्या यह है कि अल नीनो अक्सर उस वायुमंडलीय सिस्टम को कमजोर कर देता है जो भारत में मॉनसून को ताकत देता है। यही कारण है कि अल नीनो को भारत के मौसम वैज्ञानिक हमेशा गंभीरता से देखते हैं। हमेशा अल नीनो भारत में सूखा नहीं लाता, लेकिन इतिहास बताता है कि देश के कई बड़े सूखे वर्ष इसी जलवायु घटना से जुड़े रहे हैं।
‘सुपर अल नीनो’ कितना खतरनाक?
‘सुपर एल नीनो’ शब्द अत्यधिक शक्तिशाली अल नीनो घटनाओं के लिए किया जाता है, जिनमें समुद्री तापमान सामान्य से 2 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक बढ़ जाता है। पिछले चार-पांच दशकों को देखें तो इतिहास में 1982-83, 1997-98 और 2015-16 के अल नीनो को सुपर अल नीनो माना गया था। इन घटनाओं ने दुनिया भर में विनाशकारी प्रभाव डाले थे।
1997-98 का सुपर अल नीनो विशेष रूप से विनाशकारी था। उस दौरान कई देशों में सूखा, जंगलों में आग, भीषण वर्षा और समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को भारी नुकसान हुआ था। भारत में अल नीनो के असर की बात करें तो आमतौर पर इसे भीषण गर्मी और कमजोर मानसून से जोड़ा जाता है।
कोपरनिकस क्लाइमेंट चेंज सर्विस (C3S) के आंकड़ों के अनुसार, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी सहित उत्तरी हिंद महासागर के बड़े हिस्से में औसत से अधिक तापमान दर्ज किया जाने लगा है। इससे यह भी पता चला है कि मध्य एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया में सतह का तापमान एक बार फिर अत्यधिक बढ़ गया है।
अल नीनो से पहले, उत्तर-पश्चिमी भारत में तापमान आमतौर पर हल्का रहा है, हालांकि मई में बीच-बीच में गरज के साथ बारिश हुई है।

