नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजों को लेकर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की ओर से उठाई गई आपत्तियों पर सुप्रीम कोर्ट ने नई याचिकाएं दायर करने का निर्देश दिया है। कोर्ट की ओर से यह टिप्पणी टीएमसी के उन आरोपों पर आई है जिसमें उसने दावा किया है कि बंगाल में हुए हालिया विधानसभा चुनाव के नतीजों पर विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का काफी असर कई सीटों पर पड़ा है। बंगाल में एसआईआर में 90.8 नाम हटाए गए थे।
तृणमूल कांग्रेस का दावा है कि कम से कम 31 सीटों पर हटाए गए मतदाताओं की संख्या भाजपा के जीत के अंतर से अधिक थी। पार्टी के अनुसार इन सीटों पर 2021 में तृणमूल की जीत हुई थी लेकिन इस बार ये भाजपा के खाते में गईं। तृणमूल की ओर से ये बातें उस समय कही गई जब सोमवार को चीफ जस्टिस (सीजेआई) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ चुनाव से पहले निर्वाचन आयोग द्वारा किए गए SIR को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई कर रही थी।
तृणमूल के आरोप, कोर्ट में पार्टी ने क्या दावे किए
तृणमूल कांग्रेस की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने कहा कि कई निर्वाचन क्षेत्रों में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान हटाए गए मतदाताओं की संख्या भाजपा और तृणमूल उम्मीदवारों के बीच जीत के अंतर से अधिक थी।
जांगीपारा विधानसभा क्षेत्र का जिक्र करते हुए बनर्जी ने कहा कि भाजपा उम्मीदवार प्रसेनजीत बाग ने 862 वोटों के अंतर से जीत हासिल की, जबकि मतदाता सूची से एसआईआर प्रक्रिया के दौरान 5,000 से अधिक नाम हटा दिए गए थे। बनर्जी ने कहा कि इस कोर्ट ने संकेत दिया था कि यदि वोटों का अंतर हटाए गए नामों की संख्या से कम है, तो न्यायालय इस मामले की जांच करेगा।
हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि चुनाव परिणामों से संबंधित शिकायतों और मतदाता सूची से नाम हटाने के कथित प्रभाव के लिए एक अलग अंतरिम आवेदन (आईए) की आवश्यकता होगी।
वहीं, चुनाव आयोग की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता दामा शेषाद्री नायडू ने कहा कि चुनाव परिणामों से संबंधित मुद्दों को केवल लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत दायर चुनाव याचिकाओं के माध्यम से ही उठाया जा सकता है।
दूसरी ओर बनर्जी ने यह भी जिक्र किया तृणमूल और भाजपा के बीच वोटों का अंतर लगभग 32 लाख है, जबकि एसआईआर मामले में 35 लाख से अधिक आवेदन अभी भी लंबित हैं। इन याचिकाओं के निपटारे के विषय पर वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि मौजूदा निपटारे की गति को देखते हुए, लंबित याचिकाओं को निपटाने में चार साल लग सकते हैं।
नई याचिका दायर करनी होगी: सुप्रीम कोर्ट
सुनवई में बनर्जी ने कोर्ट से यह भी स्पष्ट करने का अनुरोध किया कि एसआईआर प्रक्रिया के परिणामस्वरूप नाम हटाए जाने को चुनाव याचिका का आधार माना जा सकता है। इस पर पीठ ने टिप्पणी की कि हम ऐसा आदेश कैसे पारित कर सकते हैं।
कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे की जांच तभी की जा सकती है जब संबंधित विवरणों वाला एक उचित आवेदन दायर किया जाए। आगे की घटनाओं के लिए आप आईए दाखिल कर सकते हैं। नायडू जो कहेंगे, वह जवाबी कार्रवाई होगी। हम इस पर गौर करेंगे और आदेश पारित करेंगे।
क्या SIR से प्रभावित हुए नतीजे?
चुनाव आयोग विपक्षी पार्टियों के उन आरोपों की कड़ी आलोचना कर चुका है जिसमें भाजपा के साथ मिलकर नतीजों में हेरफेर करने के दावे किए गए। चुनाव आयोग ने कहा कि मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे जिन निर्वाचन क्षेत्रों में सबसे अधिक मतदाता नाम हटाए गए, वहां तृणमूल को जीत मिली।
चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, उदाहरण के लिए, सुजापुर में 15 लाख, रघुनाथगंज में 13 लाख, समसेरगंज में 12 लाख, रतुआ में 12 लाख और सूती में 12 लाख नाम हटाए गए। लेकिन चुनाव आयोग का तर्क है कि इन सभी पांचों सीटों पर तृणमूल कांग्रेस ने जीत हासिल की।
गौरतलब है कि भाजपा ने राज्य की 294 सीटों में से 207 सीटें जीतकर पूर्वी राज्य में अपनी पहली चुनावी जीत दर्ज की है। इस चुनाव में एसआईआर और इससे जुड़ा मुद्दा, यानी मुस्लिम बहुल बांग्लादेश से आए अवैध अप्रवासी, इस चुनाव के प्रमुख मुद्दों में से एक बन गए थे।
भाजपा ने तृणमूल पर आरोप लगाया कि वह वोटों के बदले अवैध अप्रवासियों को प्रवेश देने में अनदेखी कर रही है। वहीं तृणमूल ने पलटवार करते हुए दावा किया था कि एसआईआर को चुनाव आयोग और भगवा पार्टी ने लाखों वंचित मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करने के लिए अंजाम दिया था।

