रायपुरः छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दो विवाहित बेटियों द्वारा दायर की गई एक याचिका खारिज कर दी है। इस याचिका में अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति की मांग की गई थी। अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति ‘अधिकार’ नहीं बल्कि ‘विशेषाधिकार’ है जो नौकरी के दौरान दिवंगत कर्मचारियों के आश्रित परिवार के सदस्यों को प्रदान किया जाता है।
जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू दो विवाहित बेटियों द्वारा दायर संयुक्त याचिका सुनवाई कर रहे थे। याचिका में छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक द्वारा उनके पिता की सेवा के दौरान हुई मौत के बाद अनुकंपा नियुक्ति से इंकार के फैसले को चुनौती दी गई थी।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने क्या कहा?
अदालत ने 7 मई के अपने आदेश में कहा कि ” यह एक स्थापित कानूनी स्थिति है कि अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति एक अधिकार नहीं बल्कि एक विशेषाधिकार है जो सेवा के दौरान दिवंगत हुए कर्मचारियों के आश्रित परिवार के सदस्यों को प्रदान किया जाता है, यह विशेषाधिकार लागू नीति से उत्पन्न होता है और नीति के बाहर प्रदान नहीं किया जा सकता है।”
अदालत ने इस बात पर जोर देते दिया कि अनुकंपा नियुक्ति संबंधी कानून अच्छी तरह से स्थापित है। हाई कोर्ट के आदेश में कहा गया है कि यह सार्वजनिक रोजगार का समानांतर स्रोत नहीं है, न ही यह विरासत में मिले सेवा लाभ का एक रूप है जो किसी कर्मचारी की मृत्यु पर स्वचालित रूप से परिवार के किसी सदस्य को हस्तांतरित हो जाता है।
जस्टिस साहू ने आगे कहा कि यह भर्ती के सामान्य नियम का एक अपवाद है जो केवल परिवार के मुखिया की सेवा के दौरान मृत्यु के कारण उत्पन्न अचानक वित्तीय संकट से राहत दिलाने की आवश्यकता से ही उचित ठहराया जा सकता है।
बैंक कर्मचारियों की बेटियां हैं याचिकाकर्ता
दोनों ही याचिकाकर्ता बैंक कर्मचारियों की बेटियां हैं। इनमें से एक के पिता छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक में ब्रांच प्रबंधन का काम देखते थे और दूसरे कार्यालय में सहायक के रूप में तैनात थे। इनकी मृत्यु 2015 और 2016 में हुई थी।
कर्मचारी की मृत्यु के समय बैंक में अनुकंपा नियुक्ति योजना लागू नहीं थी। इसके बजाय बैंक ने परिवारों को अनुकंपा राशि का भुगतान किया था।
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बैंक ने बाद में 2019 में अनुकंपा नियुक्ति नीति अपनाई जिसे 2023 में संशोधित किया गया ताकि यह नीति लागू होने से पांच साल पहले हुई मृत्यु पर भी लागू हो। इस संशोधन के बाद याचिकाकर्ताओं ने रोजगार के लिए आवेदन किया लेकिन बैंक ने उनके दावों को इस आधार पर खारिज कर दिया कि “विवाहित बेटियां” नीति में “आश्रित परिवार के सदस्यों” की परिभाषा में शामिल नहीं हैं।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में याचिकाकर्ताओं के वकील ने क्या दलील दी?
इस मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वकील आशुतोष मिश्रा ने दलील दी कि मृतक सरकारी कर्मचारी के आश्रित परिवार की स्थिति का निर्धारण कर्मचारी की मृत्यु के समय किया जाना चाहिए न कि अनुकंपा नियुक्ति देने पर विचार करते समय या विवाह आदि बाद के परिवर्तनों के आधार पर।
उन्होंने आगे दावा किया कि याचिकाकर्ताओं के पिता की मृत्यु के समय उनकी शादी नहीं हुई थी और वे पूरी तरह से पिता पर ही आश्रित थीं। इसलिए प्रतिवादी बैंक को याचिकाकर्ताओं की अनुकंपा नियुक्ति के दावे को अस्वीकार नहीं करना चाहिए था।

यह निवेदन किया जाता है कि आश्रित पुत्री का विवाह, मृतक की मृत्यु के समय आश्रित पुत्री होने और आवेदन करते समय अविवाहित होने के नाते, आश्रित रोजगार का दावा करने के उसके अधिकार को समाप्त नहीं करता है।
यह भी निवेदन किया जाता है कि याचिकाकर्ता के पिता के कोई बेटे नहीं थे केवल बेटियां थीं इसलिए याचिकाकर्ता की माता को पूरी तरह से अपनी पुत्री पर ही निर्भर रहना होगा।
सरकारी बैंक के वकील ने क्या कहा?
वहीं, बैंक की तरफ से वकील एन नाहा राव ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि याचिकाकर्ता के पिता की सेवा के दौरान जब मृत्यु हुई तो प्रतिवादी बैंक में अनुकंपा आधार पर नियुक्ति की कोई नीति प्रचलित नहीं थी और मृतक कर्मचारी पर आश्रित लोग केवल अनुकंपा राशि के ही हकदार थे जो कि याचिकाकर्ता की मां को दी गई थी।
उन्होंने दलील दी कि 2023 की नीति के तहत, अनुकंपा के आधार पर रोजगार का विचार किया जा सकता है। बशर्ते की परिवार का सदस्य कर्मचारी की सेवा के दौरान मृत्यु के समय पूर्णतः उस पर आश्रित रहा हो। ‘विवाहित पुत्रियाँ’ ‘आश्रित परिवार के सदस्यों’ की परिभाषा में शामिल नहीं हैं।

