नई दिल्ली: भारत सरकार ने इसी हफ्ते एक ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया, जिससे पता चलता है कि देश में अब E85 यानी 85 प्रतिशत इथेनॉल वाला पेट्रोल बेचने की तैयारी है। आगे जाकर लक्ष्य E100 इथेनॉल फ्यूल को भी आजमाने का है। सरकार ने यह ड्राफ्ट नोटिफिकेशन आम लोगों के लिए जारी किया है, ताकि वे और इस इंडस्ट्री से जुड़े लोग इस विषय पर अपनी राय दें। इन सुझावों के बाद सरकार आगे का फैसला लेगी।
इससे पहले अभी देश में E20 यानी 20 प्रतिशत Ethanol वाला पेट्रोल मिल रहा है। भारत में इथेनॉल को पेट्रोल में मिलाने की प्रक्रिया ने 2014 के बाद रफ्तार पकड़ी। शुरुआत में यह यह डेढ़ से दो प्रतिशत तक था लेकिन अब 20 प्रतिशत तक पहुंच गया है। पेट्रोल पर निर्भरता कम करने के मकसद से सरकार अब भविष्य की ओर देख रही है। पेट्रोल में इथेनॉल को मिलाने को स्वच्छ ऊर्जा समाधान के रूप में पेश किया जा रहा है।
हालांकि, इसके साथ ही ये भी सवाल उठने लगे हैं कि क्या ये कदम देश में जल संकट को तो और नहीं बढ़ाने जा रहे हैं। इथेनॉल और जल संकट का कनेक्शन क्या है, आईए इसे समझते हैं। साथ ही यह भी समझने की कोशिश करेंगे कि अगर इथेनॉल के बढ़ते इस्तेमाल से जल संकट का खतरा है तो इसके क्या उपाय हो सकते हैं।
इथेनॉल और जल संकट का कनेक्शन क्या है?
इथेनॉल मुख्य तौर पर मक्का, गन्ना चावल जैसे अनाज से तैयार होता है। ये सभी ऐसी फसलें हैं जो दूसरे फसलों की तुलना में कहीं अधिक पानी मांगती हैं। फसलों के तैयार होने से लेकर बाद में इथेनॉल को तैयार करने तक की प्रक्रिया में जो कुल वाटर फुटप्रिंट है, वो काफी बढ़ जाता है। इसलिए कई जानकार ऐसा मानते हैं कि अधिक इथेनॉल का मिश्रण भारत के जल संकट को और भी बदतर बना सकता है।
पेट्रोल में इथेनॉल को मिलाने को तकनीकी भाषा में इथेनॉल ब्लेंडिंग कहते हैं। देश इस कार्यक्रम को तेजी से आगे बढ़ा रहा है और चावल इसके लिए एक प्रमुख कच्चा माल बन गया है। भारत में चावल की पैदावार भी खूब है। सरकार ने 2024-25 में इथेनॉल उत्पादन के लिए 52 लाख टन चावल आवंटित किया था और अब 2025-26 में 90 लाख टन का लक्ष्य रखा है।
इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार इस अनाज को बचाने के लिए सरकार सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत गरीबों को वितरित किए जाने वाले टूटे चावल का हिस्सा 25% से घटाकर 10% करने की योजना बना रही है, जिससे होने वाली बचत को सीधे डिस्टिलरी में भेजा जाएगा ताकि इथेनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ावा दिया जा सके।
अब आगे की कहानी और चौंकाने वाली है। चावल से एक लीटर इथेनॉल के उत्पादन में लगभग 10,790 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। इसमें खेती के दौरान सिंचाई के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला पानी भी शामिल है। यह आंकड़े खाद्य सचिव संजीव चोपड़ा ने 2024 में दिल्ली में एक वैश्विक सम्मेलन में साझा किए थे।
आंकड़ों के मुताबिक चावल आधारित इथेनॉल में ज्यादातर पानी का इस्तेमाल खेत में ही होता है न कि फैक्ट्री में प्रोसेसिंग में। एक किलो चावल उगाने के लिए लगभग 3,000-5,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। लगभग 2.5-3 किलोग्राम चावल से एक लीटर इथेनॉल बनता है, जिससे कुल जल उपयोग लगभग 10,000 लीटर से अधिक हो जाता है।
वहीं, चावल की तुलना में मक्के से प्रति लीटर इथेनॉल के लिए लगभग 4,670 लीटर और गन्ने को लगभग 3,630 लीटर पानी की आवश्यकता होती है।
वैसे, ये भी बता दें कि भारत में इथेनॉल के लिए चावल का इस्तेमाल अभी प्रारंभिक चरण में है। देश में मुख्य रूप से गन्ने का ही इस्तेमाल इसके लिए हो रहा है। हालांकि, गन्ना की खेती भी पानी की खपत बढ़ाती है। गन्ने की खेती मुख्य रूप से महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में की जाती है, जहां कई जगहों पर भूजल संकट पहले से ही गंभीर है।
भारत में जल संकट लगातार बढ़ रहा…
भारत में Ethanol को बतौर ईंधन इस्तेमाल को लेकर सरकार तेजी से कदम आगे बढ़ा रही है। हालांकि, जल संकट एक अलग चुनौती बनकर उभर रहा है, जिस पर आंखें नहीं मूंदी जा सकती। नीति आयोग की ही कंपोजिट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स (CWMI) ने चेतावनी दी है कि 2030 तक दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई सहित 21 प्रमुख शहरों में भूजल का स्तर शून्य हो सकता है।
भारत की कुल इथेनॉल उत्पादन क्षमता अभी करीब 1,800 करोड़ लीटर है। जबकि आने वाले दिनों में कई राज्यों में जल संकट बढ़ने वाला है। महाराष्ट्र में 396 करोड़ लीटर इथेनॉल की संयुक्त क्षमता वाले संयंत्र हैं, जबकि विदर्भ और मराठवाड़ा के किसान पीने के पानी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में काम कर रहे इथेनॉल संयंत्र भी भूजल भंडारों का उपयोग कर रहे हैं।
कुल मिलाकर इथेनॉल को लेकर सरकार की सक्रियता बढ़ी है लेकिन भूजल संकट को नजरअंदाज करना कहीं ज्यादा महंगा पड़ सकता है। सरकार इथेनॉल वाली फसलों की पैदावार बढ़ाने के लिए एक्शन मोड में दिख रही है, पर जल संकट पर क्या तैयारी है, यह अभी साफ नहीं है। इथेनॉल गाड़ियों की प्यास बुझा सकते हैं। इंसानी प्यास का क्या होगा, जरूरी है कि इस पर सरकार रुख साफ करे और इन चुनौतियों से निपटने के लिए रोडमैप क्या है, बात इसकी भी करे।
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