नई दिल्ली: दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने गुरुवार को तृणमूल कांग्रेस के लिए काम करने वाली राजनीतिक रणनीति कंसल्टेंसी कंपनी इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी (I-PAC) के सह-संस्थापक और निदेशक विनेश चंदेल को मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जमानत दे दी। यह आदेश पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव खत्म होने के एक दिन बाद ही आया है।
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा चंदेल की नियमित जमानत याचिका का विरोध नहीं करने के बाद कोर्ट ने उन्हें जमानत दी। चंदेल ने मानवीय आधार पर अंतरिम जमानत की मांग की थी, जिसमें उन्होंने अपनी मां के बिगड़ते स्वास्थ्य का हवाला दिया था। उन्होंने बताया था कि मां डिमेंशिया से पीड़ित हैं।
हाई कोर्ट ने बेल देते हुए क्या कहा?
ईडी के रुख को दर्ज करते हुए अदालत ने कहा कि जांच के दौरान चंदेल के ‘स्वैच्छिक और उद्देश्यपूर्ण सहयोग’ को देखते हुए एजेंसी ने याचिका का विरोध नहीं किया। हालांकि, केंद्रीय एजेंसी ने कुछ शर्तें रखीं। इस पर अदालत ने चंदेल को निर्देश दिया कि वह सबूतों से छेड़छाड़ न करें या गवाहों को प्रभावित न करें।
पीठ ने साथ ही आदेश दिया कि उन्हें जांच में सहयोग करना होगा, जांचकर्ताओं द्वारा मांगी गई सभी जानकारी देनी होगी और पूरी जांच के दौरान उपलब्ध रहना होगा।
वहीं, इससे पहले ईडी ने कोर्ट को बताया कि ‘जांच के दौरान विनेश चंदेल द्वारा स्वेच्छापूर्वक और सार्थक सहयोग देने को ध्यान में रखते हुए और ईडी के अधिकारों और दलीलों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, एजेंसी इस जमानत याचिका का विरोध नहीं कर रही है।’
चंदेल की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास पाहवा ने कहा कि ईडी ने जांच में उनके सहयोग का हवाला देते हुए जमानत याचिका पर कोई आपत्ति नहीं जताई है। उन्होंने कहा, ‘हमने कुछ दिन पहले नियमित जमानत याचिका दायर की थी और ईडी को जवाब दाखिल करना था। कल उन्होंने अपना जवाब दाखिल किया और जमानत देने पर कोई आपत्ति नहीं जताई, मुख्य रूप से इस आधार पर कि उन्होंने जांच एजेंसी के साथ सहयोग किया है और स्वेच्छापूर्वक और सार्थक सहयोग दिया है।’
ईडी की कार्रवाई और राजनीतिक विवाद
ईडी के अनुसार, चंदेल की कंसल्टेंसी मनी लॉन्ड्रिंग मामले में शामिल थी। जांच में कई वित्तीय अनियमितताएं सामने आईं, जिनमें हिसाब-किताब वाले और बिना हिसाब-किताब वाले फंड की प्राप्ति, असुरक्षित ऋण, फर्जी बिल जारी करना और तीसरे पक्ष के माध्यम से फंड का लेन-देन शामिल है।
I-PAC निदेशक चंदेल को 13 अप्रैल को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से कुछ ही दिन पहले गिरफ्तार किया गया था और बाद में न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था।
हालांकि, I-PAC निदेशक की गिरफ्तारी ने बंगाल में बड़े राजनीतिक विवाद को जन्म दे दिया था। तृणमूल कांग्रेस ने आरोप लगाया कि ईडी की कार्रवाई राजनीतिक रूप से प्रेरित है और विपक्षी दलों के साथ काम करने वाले लोगों को डराने के उद्देश्य से की गई है। वहीं, ईडी अधिकारियों ने किसी भी राजनीतिक पहलू से इनकार करते हुए कहा कि उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किया गया।
तृणमूल कांग्रेस ने गिरफ्तारी के विरोध में प्रदर्शन भी किए और सत्ताधारी दल पर केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाया। मामला कितना हाई प्रोफाइल हो चला था, इसका अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद ईडी की छापेमारी के दौरान I-PAC कार्यालय पहुंच गई थी और कुछ दस्तावेज अपने साथ ले गईं।
ममता के इस कदम से राजनीतिक गतिरोध बढ़ने के साथ-साथ एजेंसियों के कामकाज के लिए मिले संवैधानिक अधिकार पर भी बहस छिड़ गई थी। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचा, जहां अदालत ने ममता बनर्जी के कदम को ‘लोकतंत्र को खतरे’ में डालने जैसी टिप्पणी की थी। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी के कथित आचरण पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि किसी मुख्यमंत्री का जांच के बीच में हस्तक्षेप करना लोकतांत्रिक व्यवस्था को कमजोर कर सकता है।
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