मुंबई: शिवसेना (यूबीटी) अध्यक्ष उद्धव ठाकरे ने इस बार महाराष्ट्र विधान परिषद (एमएलसी) चुनावों से बाहर रहने का फैसला किया है। उद्धव की बजाय पार्टी की ओर से अंबादास दानवे को मैदान में उतारने की बात कही जा रही है। इस फैसले ने हालांकि, महाराष्ट्र में महा विकास अघाड़ी (एमवीए) के भीतर ही विवाद पैदा कर दिया है। दरअसल, गठबंधन के अंदर से ऐसे संकेत दिए जा रहे हैं कि अगर उद्धव मैदान में नहीं उतरते तो उनकी पार्टी से किसी और के नाम पर सहमति नहीं है।
कांग्रेस ने संकेत दिया है कि वह खुद अपना उम्मीदवार उतार सकती है। महाराष्ट्र विधान परिषद में 9 सीटें खाली हो रही हैं। मौजूदा गणित बताता है कि 9 में से विपक्षी गठबंधन एक सीट ही जीतने की स्थिति में है। चुनाव 12 मई को होना है।
एमवीए सरकार के गठन और मुख्यमंत्री का पदभार संभालने के कुछ महीनों बाद मई 2020 में उद्धव निर्विरोध विधान परिषद के लिए चुने गए थे। उस समय वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे, इसलिए संवैधानिक प्रावधानों के तहत उन्हें मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए छह महीने के भीतर निर्वाचित होना जरूरी था। उद्धव इसी के साथ ठाकरे परिवार से पहले ऐसे सदस्य बने जो किसी सदन में पहुंचा।
कांग्रेस और शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी सहित गठबंधन के सहयोगियों ने तब उनके चुनाव का समर्थन किया और उनका निर्विरोध सदन जाना सुनिश्चित हुआ। उद्धव ठाकरे का सदन में अगले महीने कार्यकाल समाप्त होने वाला है। माना जा रहा था कि उद्धव फिर से एमवीए के सर्वसम्मत उम्मीदवार होंगे। हालांकि, अब उद्धव के पीछे हटने के बाद विपक्षी गठबंधन में हर पार्टी अपने लिए मौके देख रही है।
कांग्रेस उतारना चाहती है अपना उम्मीदवार
कांग्रेस ने पहले संकेत दिया था कि अगर उद्धव चुनाव लड़ने का फैसला करते हैं तो वह उन्हें उम्मीदवार के रूप में समर्थन देगी। कांग्रेस ने हालांकि बुधवार को शिवसेना (यूबीटी) द्वारा दानवे को उम्मीदवार नामित करने के फैसले पर आपत्ति जताई। महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने कहा, ‘मैं व्यक्तिगत रूप से उद्धवजी से विधानसभा चुनाव पर चर्चा करने गया था। हमने पहले ही कहा था कि अगर उद्धवजी चुनाव लड़ेंगे तो हम विरोध नहीं करेंगे। लेकिन अगर फैसले में कोई बदलाव हुआ है, तो इस पर गठबंधन के भीतर चर्चा होनी चाहिए थी। हमें इस फैसले की जानकारी मीडिया से मिली। गठबंधन इस तरह काम नहीं करता।’
सपकाल ने आगे कहा कि अब पार्टी चुनाव मैदान में उतर सकती है। उन्होंने कहा, ‘हम जल्द ही फैसला लेंगे।’ इससे संकेत मिलता है कि अगर आम सहमति नहीं बनी तो कांग्रेस अपना उम्मीदवार खड़ा कर सकती है।
दूसरी ओर एनसीपी (एसपी) ने शिवसेना (यूबीटी) के इस कदम का समर्थन किया है, जिससे फिलहाल कांग्रेस अलग-थलग पड़ती नजर आ रही है। प्रदेश अध्यक्ष शशिकांत शिंदे ने कहा, ‘हमने ठाकरे जी से चुनाव लड़ने की मांग की थी। लेकिन आखिरकार फैसला उसी पार्टी को करना है। हम चर्चा करेंगे और अंतिम निर्णय लेंगे। हमें उम्मीद है कि 12 मई को होने वाले चुनाव निर्विरोध होंगे।’
विपक्ष के पास बस एक सीट जीतने का मौका
महाराष्ट्र में 288 सदस्यीय विधानसभा में सत्तारूढ़ गठबंधन के पास स्पष्ट बहुमत है। ऐसे में एमवीए के 56 विधायकों की ताकत विपक्ष को विधान परिषद में 9 सीटों पर होने वाले चुनाव में केवल एक सीट जीतने दे सकती है। विधान परिषद में किसी उम्मीदवार को जीत के लिए 29 वोटों की आवश्यकता होती है। अगर विपक्षी एमवीए के सभी सदस्य एकजुट होकर मतदान करते हैं, तो वह आराम से सीट जीत सकती है, लेकिन अगर क्रॉस-वोटिंग होती है तो उसके लिए चीजें मुश्किल हो जाएंगी।
इस बीच उद्धव ठाकरे चुनाव क्यों नहीं लड़ रहे हैं, इसे लेकर भी कई तरह की अटकलें हैं। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार उद्धव का यह निर्णय राजनीतिक स्थिति और पार्टी के आंतरिक विचारों दोनों से प्रेरित है। सहयोगियों का समर्थन होने के बावजूद, उद्धव के सदन में नहीं जाने के इस कदम को उनके पिता बाल ठाकरे के अपनाए दृष्टिकोण से भी जोड़ कर देखा जा रहा है।
बाल ठाकरे कभी किसी सदन के लिए निर्वाचित नहीं हुए और न चुनाव लड़ा। उन्होंने कोई संवैधानिक पद भी नहीं लिया। इसी वजह से जब 2020 में उद्धव ने मुख्यमंत्री पद संभाला और फिर सदन गए, तो कई ने इसे बाल ठाकरे से अलग हटते हुए और गलत परंपरा बताया था। माना जा रहा है कि उद्धव संभवत अपनी वो गलती ठीक कर रहे हैं।
इसके अलावा सूत्रों के अनुसार दानवे को सदन में बनाए रखने और एक तरह से पुरस्कृत करने के उद्देश्य से भी यह फैसला लिया गया। दानवे असल में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में 2022 में हुए विभाजन के बाद भी शिवसेना (यूबीटी) के साथ बने रहे, हालांकि उन्हें प्रतिद्वंद्वी खेमे में लाने के कई प्रयास किए गए थे। महाराष्ट्र विधान परिषद में विधायक और विपक्ष के नेता के रूप में दानवे का कार्यकाल जुलाई 2025 में समाप्त हो गया था।
यह भी पढ़ें- बंगाल में भाजपा चखेगी जीत का स्वाद? तमिलनाडु, असम और केरलम में किसकी होगी ताजपोशी?

