संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने कहा है कि वह 1 मई से ओपेक (OPEC) और ओपेक+ (OPEC+) तेल समूह से बाहर निकल जाएगा। पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव और फिर से क्षेत्र में जंग शुरू होने की आशंकाओं के बीच यह तेल निर्यातक समूहों और इसका नेतृत्व करने वाले सऊदी अरब के लिए एक बड़ा झटका है।
यूएई के ऊर्जा मंत्रालय ने मंगलवार को एक बयान में कहा, ‘यह निर्णय यूएई के दीर्घकालिक रणनीतिक, आर्थिक दृष्टिकोण और विकसित हो रही ऊर्जा प्रोफाइल को दर्शाता है, जिसमें घरेलू ऊर्जा उत्पादन में त्वरित निवेश शामिल है। यह वैश्विक ऊर्जा बाजारों में एक जिम्मेदार, विश्वसनीय और दूरदर्शी भूमिका निभाने की इसकी प्रतिबद्धता को मजबूत करता है।’
UAE के इस कदम के क्या मायने, क्यों ये बड़ा फैसला है?
गौर करने वाली बात है कि संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ओपेक समूह में तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक था। पहले स्थान पर सऊदी अरब और फिर इराक आता है। यूएई 1967 में अबू धाबी अमीरात के माध्यम से ओपेक में शामिल हुआ था। इसके बाद फिर बाद में जब 1971 में सभी अमीरात साथ आए और यूएई एक स्वतंत्र देश बना, तो भी सदस्यता जारी रही।
बीबीसी की रिपोर्ट में कहा गया है कि यूएई के बाहर निकलने से ओपेक अपनी लगभग 15% क्षमता और अपने सबसे सदस्यों में से एक को खो देगा। वहीं, देश के ऊर्जा मंत्रालय ने ताजा फैसले पर कहा, ‘यूएई के बाहर निकलने के बाद, वह जिम्मेदारी से काम करना जारी रखेगा और मांग और बाजार की स्थितियों के अनुरूप धीरे-धीरे और योजनाबद्ध तरीके से अतिरिक्त उत्पादन को बाजार में लाएगा।’
वैसे, माना जा रहा है कि यूएई यह कदम लंबे समय से उठाने पर विचार कर रहा था। इसकी संभावित वजहों में संगठन में रहते हुए उत्पादन सीमाओं और पड़ोसी सऊदी अरब के साथ तनावपूर्ण संबंधों से लगातार मिल रही निराशा हो सकती है। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, खाड़ी देश के ऊर्जा मंत्री ने कहा कि समूह से अलग होने से देश को अपनी नीतियों पर अधिक लचीलापन मिलेगा, क्योंकि वह अब सामूहिक दायित्वों से बंधा नहीं रहेगा।
पहले भी ओपेक की बैठकों में दोनों देशों के बीच (यूएई और सऊदी अरब) टकराव हो चुका है। इसमें संयुक्त अरब अमीरात अपनी विस्तारित उत्पादन क्षमता का उपयोग करने पर जोर दे रहा था, जबकि सऊदी अरब आपूर्ति पर नियंत्रण रखने की बात कर रहा था। बताया जाता है कि इन मतभेदों के कारण अबू धाबी ओपेक समूह से खुद को बाहर निकालने के कगार पर आ गया था, हालांकि आखिर तक उसने ऐसा नहीं किया।
OPEC और OPEC+ क्या हैं?
पेट्रोलियम निर्यातक देशों का संगठन यानी पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज (OPEC) और उसके सहयोगी देश सामूहिक रूप से ओपेक+ के नाम से जाने जाते हैं। इसकी स्थापना 1960 में सऊदी अरब, ईरान, इराक, वेनेजुएला और कुवैत जैसे संस्थापक सदस्यों द्वारा की गई थी। आगे चलकर ओपेक का विस्तार हुआ और वर्तमान में इसमें संयुक्त अरब अमीरात सहित 12 सदस्य देश हैं।
साल 2016 में ओपेक समूह ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए और रूस सहित 10 अन्य तेल उत्पादक देशों को शामिल करने का निर्णय लिया, जिससे OPEC+ का गठन हुआ।
ओपेक की वेबसाइट के अनुसार संगठन का उद्देश्य ‘अपने सदस्य देशों की पेट्रोलियम नीतियों का समन्वय और एकीकरण करना सहित तेल बाजारों को स्थिर करना है ताकि उपभोक्ताओं को पेट्रोलियम की कुशल, किफायती और नियमित आपूर्ति सुनिश्चित हो सके, उत्पादकों को स्थिर आय प्राप्त हो सके और पेट्रोलियम उद्योग में निवेश करने वालों को पूंजी पर उचित रिटर्न यानी फायदा मिल सके।’
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