Sunday, April 26, 2026
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अनिकेतः प्रसाद के बाद उनका घर

लेखक हमेशा से अनिकेत होते हैं। उनका कोई एक निश्चित घर नहीं होता और सारी दुनिया उनके लिए उनका घर होती है। फिर भी वो कोई एक ठौर तो होता ही है जीवन में, जहां वे जीते हैं, लिखते हैं, जहां उनका मन रमता है। लेखक भले चले जायें दुनिया से, सचमुच के अनिकेत हो जायें पर वह घर बना रहता है, उनके होने की गवाही देता हुये। लेखकों के होते हुये और लेखकों के बाद भी उनके इन्हीं घरों की कहानी है ‘अनिकेत’।

यहां छायावाद के प्रमुख स्तम्भ जयशंकर प्रसाद के घर और बनारस की अपनी स्मृतियों को बयान किया है, स्व- विष्णुचंद्र शर्मा ने। यह आलेख आजकल, अप्रैल, 2016 के अंक से साभार है। विष्णुचंद्र शर्मा ख्यात कवि, कहानीकार और आलोचक थे। उन्हें सर्वनाम के संपादक के रूप में भी याद रखा जायेगा।

प्रसाद के घर की तत्कालीन अवस्था और उस समय के लेखकीय परिवेश के अलावे यह आलेख एक लेखक के मन में अपने वरिष्ठ लेखक के लिए श्रद्धा और उसके विरासत और स्मृतियों को बचाये और सहेजे रखने की चिंता के लिए अविस्मरणीय है।

प्रो. दीनबंधु कार से आए थे निराला निवास। कई मोड़ के बाद हम नई सड़क पहुंचे थे। मेरे समय यह सड़क इतनी भरी-भरी नहीं थी। प्रसाद जब थे तो वह अपने घर से निकल कर नई सड़क पार करते थे। वहां था शहर बनारस का बड़ा पार्क। नेहरू की विशाल सभा यहां हुई थी। यह ठीक है कि कबीर का अपना पथ था। तुलसीदास जब काशी आए थे तो शैव पथ और वैष्णय पथ था। वह वैष्णव मठ में रह रहे थे। वैष्णव उदार थे। दलित उस पथ में थे। निराला ने उसे ‘लोकगंगा’ कहा था। रैदास को निराला ने ‘लोकगंगा का कवि’ भी कहा था। उनका पेशा चर्मकार का था। निराला का पद है-

ज्ञानगंगा के समुज्वल चर्मकार

चरण छूकर कर रहा मैं नमस्कार।

मैं कबीर, रैदास और तुलसीदास के बनारस की प्रदक्षिणा कर रहा था और लोलार्क द्विवेदी फोटोग्राफर का इंतजार कर रहे थे, नई सड़क की उस संकरी गली के पास। कभी प्रसाद भी इसी गली से गुज़रते थे और रामकटोरा से प्रेमचंद आते थे बेनियाबाग में। आज वह बेनियाबाग है नहीं, उसका विस्तार धीरे-धीरे सिमट रहा है। इधर-उधर दुकाने है यानी मॉल कल्चर है। अधिकांश को प्रसाद की याद है न प्रेमचंद की।

यहां मेट्रो का टर्मिनस बन रहा है। अगर प्रशासक थोड़ा भी भारतेंदु से प्रसाद तक के साहित्य के पथ का जानकार होगा तो यह मेट्रो स्टेशन जयशंकर प्रसाद नाम का होगा। यह मेरा और जयशंकर प्रसाद के पुत्र रत्नशंकर का सपना था।

संकरी गली में प्रसाद का कोई चिह्न नहीं है। कुछ दूर चलकर एक दरवाजे पर हम थे। यानी 83 साल का मैं विष्णुचंद्र शर्मा, प्रो. दीनबंधु, लोलार्क द्विवेदी और फोटोग्राफर त्रिलोचन। प्रसाद घर से दालमंडी होते हुए चौक थाने के पीछे की गली सुंघनी साव में जाते थे। उस समय दालमंडी वेश्याओं यानी नाचने वालियों का अड्‌डा था। प्रेमचंद ने जब ‘सेवासदन’ लिखा था, तब यहां सुजरा और मुजरा दोनों होता था। कबीर ने सुबह-सुबह हाथ में झरी और सिल्क की साड़ी पहने देखा है उन्हें, जिनका कोई कुल नहीं था। और कहा था- ‘चली कुलबोरनी गगा नहाय’।

प्रसाद की गद्दी के ऊपर मुजरा होता था। प्रसाद के परिवार का धंधा था सुंघनी का। राहुलजी ने कोलकाता में सुंघनी साव को अपनी गद्दी में देखा था। आज घर में प्रसाद के वंश की एक तस्वीर फोटोग्राफर ने ली। वहां रत्नशंकर, जयशंकर प्रसाद और उनके दादा, परदादा की तस्वीर हैं।

घर और वंश के चित्र देखते हुए मुझे याद आए रत्नशंकर प्रसाद। उन्होंने भी एक नाटक लिखा था। धोती चौड़ी पाट की और सिल्क का कुर्ता पहनते थे रत्नशंकर प्रसाद। वह नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री भी थे। सभा से लौटते हुए वह सभा के संस्थापक पं. रामनारायण मिश्र से मिलने आते थे। मैंने उन्हें कालभैरव में तभी देखा था।

आज प्रसाद जी के इस अहाते के किनारे है एक बड़ा शिव मंदिर। घना पेड़ है उसके पास। फोटोग्राफर ने कई कोण से उसकी तस्वीरें खींची हैं। एक देखें आप भी।

रत्नशंकर प्रसाद के दो बेटे हैं। एक से हमारी पहले घर की बैठक में बातचीत हुई। मैंने कभी केडिया जी के संग्रहालय में प्रसाद जी की पांडुलिपि और पत्र देखे थे। फिर प्रसाद की पांडुलिपि, खासकर ‘ध्रुवस्वामिनी’ (नाटक) की और ‘कामायनी’ की कलाविद् रायकृष्ण दास के संग्रहालय में देखी थी। तब उनका घर गंगा के किनारे था पर मूर्ति और चित्र नागरी प्रचारिणी सभा के गलियारे में प्रदर्शित होते थे। किसी बात पर श्यामसुंदर दास से रायकृष्ण दास का मतभेद हुआ था। श्यामसुंदर दास तब काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष थे। मतभेद इतना तनाव भरा था कि उनकी आत्मकथा में इसका प्रसंग भी है। श्यामसुंदर दास ने नाराज होकर अपने मित्र राम (रामनारायण मिश्र को इसी नाम से बुलाते थे) को पांडुलिपि सौंप दी थी। राम ने सिर्फ रायकृष्ण दास का नाम निकाल दिया था।

प्रसाद जी कहीं नहीं जाते थे। एक बार लखनऊ कवि सम्मेलन में गए थे, दूसरी बार गंगासागर। सिर्फ बीमारी में निराला जी को वह अपने इसी घर में लाए थे। उनका उपचार अच्छे वैद्य से कराया था।

एक बाल्टी चूसने वाले आम का वह सेवन करते थे। उस समय कवि जानकी वल्लभ शास्त्री काशी में पढ़ रहे थे। उनके संस्मरणों में बड़ा जीवंत संस्मरण है उस समय की काशी का।

मुझे चिंता थी, प्रसाद जी के नाटक, कहानी-संग्रह, कविता और ‘कामायनी’ की पांडुलिपि कहां है।

एक पुत्र ने बताया- “ट्रस्ट ने उसे बैंक में रखा है।”

“क्या वह सुरक्षित है? क्योंकि पांडुलिपि वैज्ञानिक तरीके से न रखने पर नष्ट हो जाती है।”

मेरे प्रश्न का उत्तर संतोषप्रद नहीं मिला था। हम उसे बैंक में देख भी नहीं सके।

एक बेटी हमें घर में घुमा रही थी। मैंने वह बड़ा कमरा देखा जिसके बीच में एक बड़ा पलंग था। अल्मारियों में किताबें जिल्द की हुई थीं। उन पुस्तकों की कोई सूची भी मुझे नहीं मिली।

एक प्रसंग याद आ रहा है। विश्वविद्यालय में आचार्य जी पद्यनारायण मुझे एम. ए. पढ़ाते थे। वह शाम को एक मेज़ पर ‘कामायनी’ और ‘ऋग्वेद’ रखकर पाठ करते थे। ‘कामायनी’ का एक पद पढ़कर वह ठंडाई का एक घूंट पीते थे, फिर ‘ऋग्वेद’ की ऋचा सुनाते थे।

दूसरा प्रसंग है प्रो. साहनी साहब का। वह काशी हिंदू विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के प्रोफेसर थे। मैंने उन्हें डा. रामअवध द्विवेदी के घर पर पहली बार देखा था। जब डा. द्विवेदी ‘हिंदी रिव्यू’ का संपादन कर रहे थे, तब प्रोफेसर साहनी ने सिलसिलेवार ‘कामायनी’ का अंग्रेज़ी में अनुवाद किया था।

मैं अक्सर लक्सा की सड़क पर उन्हें देखता था। कुर्ता और धोती पहनते थे। चेहरे पर चमक और आंखों में स्नेह। मैंने हिंदी में एम. ए. किया था पर मेरे मित्र विद्यासागर नौटियाल ने अंग्रेज़ी में एम. ए. किया था। उस दिन मैंने पूछा था, “क्या ‘कामायनी’ का पूरा अनुवाद हो चुका है?”

साहनी साहब ने आंखों से स्वीकार किया था, ‘हां’।

मुझे अफसोस हुआ, कई विश्वविद्यालय हैं देश में, खुद हिंदी का अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय वर्धा में है पर किसी ने आज तक ‘कामायनी’ का अंग्रेज़ी में प्रकाशन करना जरूरी नहीं समझा। उस दिन मैंने जिज्ञासावश पूछा था, “साहनी साहब मिलटन के ‘पेराडाइस लॉस्ट’ से प्रसाद की ‘कामायनी’ आपको कैसी लगी?”

साहनी साहब ने कहा, “मिल्टन से बड़ा महाकवि है प्रसाद। अब आपकी पीढ़ी उस पर बहस करेगी।”

प्रसाद के घर पर बैठे बैठे एक के बाद दूसरे प्रसंगों पर सोचता रहा। पलंग पर एक-दो तकिए थे। प्रसाद ने यहीं ‘चंद्रगुप्त’ नाटक लिखा था। शायद यही नाटक था जिसे ‘विक्रम परिषद’ ने चित्रा सिनेमा के हॉल में मंचित किया था। विक्रम परिषद पं. सीताराम चतुर्वेदी ने स्थापित की थी। उस समय यह भ्रम था कि प्रसाद के नाटक खेले नहीं जा सकते। फिर चतुर्वेदी जी ने ही ‘अभिज्ञान शाकुंतलम’ का मंचन किया था और वी. वी. कारंत ने ‘ध्रुवस्वामिनी’ का मंचन 1957 में किया था काशी में। यह प्रसाद के बाद का प्रसंग है। कृष्णदेव प्रसाद ने ‘प्रसाद परिषद’ स्थापित की थी। उस संस्था में मिठाई खाने को मिलती थी। एक ‘प्रसाद’ पत्रिका भी गौड़ जी संपादित किया करते थे। यह प्रसाद की कीर्ति का प्रसार है।

उस समय इलाहाबाद में टैगोर आए थे। बनारसीदास चतुर्वेदी चाहते थे कि प्रसाद और प्रेमचंद उनसे मिलने इलाहाबाद जाएं पर इतिहासकार काशी प्रसाद जायसवाल ने दोनों को रोका था और कहा था, “मिलना हो टैगोर को तो वह काशी आकर प्रसाद और प्रेमचंद से मिलें।” इसी समय रामविलास शर्मा इलाहाबाद गए थे। अपनी डायरी में उन्होंने बड़े गदगद भाव से टैगोर को याद किया है।

याद आ रहा है काशी में नेहरू आए थे। एक तस्वीर मैंने नाना (पं. रामनारायण मिश्र) के पास देखी थी। उसमें रामचंद्र शुक्ल, प्रेमचंद की तस्वीरें मुझे नेहरू के साथ याद रह गई थीं।

बहुत देर तक मैं गुजरे जमाने में घूमता रहा। मैंने पूछा था, “प्रसाद जी के पत्र अभी आपके पास हैं?” “हां हैं, पर वे घरेलू हैं।”

“आप घरेलू पत्र अलग से संपादित करें और साहित्यिक पत्रों का संपादन अलग से करें।”

आज घर के सदस्यों का सपना है, यहां एक बगीचा लगे। उसके बीच में प्रसाद जी की मूर्ति हो और इस संकरी गली का नाम जयशंकर प्रसाद पथ हो। मैंने उनके सपनों को अपनी डायरी में नोट कर लिया है।

मैंने कहा. “रज़ा फाउंडेशन है अभी अशोक वाजपेयी के पास। आप उन्हें पत्र लिखें या बेटा या बेटी उनसे मिले।”

मेरी उम्र का खयाल करके एक कुर्सी प्रसाद के पलंग के पैताने मेरे लिए लगा दी गई। उस कुर्सी में बैठकर मैं कभी गंगा घाट घूम आता, कभी ठाकुर प्रसाद सिंह की याद आई जो एक विराट आयोजन प्रसाद का काशी में करना चाहते थे। उनके अथक परिश्रम से भारतेंदु की मूर्ति हरिश्चंद्र कॉलेज के सामने लगी है। वह उसे ‘हिंदी दरवाजा’ कहते भी थे।

प्रसाद जी ने नाव पर ‘आंसू’ लिखा था। फिर पत्नी की मौत के बाद उस छंद को बदल कर ‘सखी’ छंद में आंसू का दूसरा संस्करण छापा था। मैंने एक फैंटेसी कभी देखी थी। नाव पर मेरे प्रोफेसर विजयदेव नारायण साही प्रसाद जी से बातचीत कर रहे हैं। यह बात जब मैंने उनसे कही तो उन्होंने मेरी पीठ ठोक कर कहा था, “तुम्हारी फैंटेसी मुझे याद रहेगी।” जिस समय ‘सप्तकों’ की परंपरा में अज्ञेय छाए हुए थे, नई पीढ़ी पर उसी समय ‘लघु मानव के बहाने’ उन्होंने ज़ोर देकर कहा था : ‘चिंता’ से ‘इत्यलम’ तक अज्ञेय प्रसाद के बिंब, भाषा और दर्शन के कवि हैं।”

एक बात पूरे विश्वास से निराला जी ने कविता में कही थी, बच्चन, नरेंद्र शर्मा, रामविलास, त्रिलोचन आदि को उन्होंने प्रसाद स्कूल का कवि कहा था। यहां मैं उसी स्वप्न में जी रहा हूं।

मेरे स्वप्न से जुड़े विनोद शंकर व्यास पहले लेखक थे जिन्होंने प्रसाद के समय के रचनाकारों के संस्मरण लिखे थे। मैंने आज से तीन साल पहले ‘प्रसाद का समय’ नाम से एक पुस्तक तैयार की थी जिसमें रायकृष्ण दास, मोदी (प्रकाशक) और विनोद शंकर व्यास के संस्मरण के साथ प्रसाद के नाटक पर विजयमोहन सिंह का लेख, प्रसाद की कहानी पर महेश दर्पण का लेख दिया था। प्रसाद को ‘दूसरे महायुद्ध के बाद का कवि’ सिर्फ मुक्तिबोध ने कहा था। पुस्तक चार साल बाद भी 2015 तक नहीं छपी। लगातार मैं प्रसाद के समय की अपनी पांडुलिपि पर सोचता रहा। आज का बनारस भी प्रसाद के बाद ऐसी चुप्पी जी रहा है। हम प्रसाद के बाद उनके वंश पर सोचते हुए आ गए हैं। एक ओर विशाल पेड़ है। उसके साथ गाय है। घर के बाहर हैं रत्नशंकर प्रसाद के बेटे, प्रो. दीनबंधु, लोलार्क द्विवेदी। मेरा हाथ पकड़े हुए है नई पीढ़ी जिसके हाथ में है प्रसाद का जातीय भविष्य।

 रामनाथ ‘सुमन’ तब नई सड़क के चेतगंज में रहते थे।  उस दौर का संस्मरण मैंने पढ़ा था। पढा था, मीर और ग़ालिब से उनकी दोस्ती का प्रसंग भी। ‘उग्र’ के बनारस पर उनका एक मार्मिक संस्मरण भी है। ‘उग्र’ तब ‘बिंदु-बिंदु विचार’ नाम का कॉलम लिखते थे ‘आज’ में। ‘आज’ तब सांस्कृतिक भारत का एक राष्ट्रीय अख़बार था, पराड़कर जी के नाते।

मुझे याद है निराला जी की कविता मैंने उनसे पूछकर इलाहाबाद में उतार ली थी तो निराला जी ने कहा था, “अपने अखबार में दे देना।” आज’ के मुखपृष्ठ पर छपी थी वह कविता निराला जी की। ‘आज’ में ही निराला ने प्रेमचंद को रामकटोरा में देखा था और एक दिल को हिला देने वाला संस्मरण लिखा था। इसी तरह शांतिप्रिय द्विवेदी और विनोद शंकर व्यास ने भी प्रसाद की शवयात्रा में प्रार्थना की थी।

‘जानसन’ की डायरी लिखी थी वॉसवेल ने। आज भी विनोद शंकर व्यास की पुस्तकें वास्तव में प्रसाद के समय की डायरी ही हैं। प्रसाद के समय पर आप केवल विनोद शंकर व्यास पर सोचेंगे और प्रसाद के घर में लौट आएंगे मेरी तरह।

विष्णुचंद्र शर्मा
विष्णुचंद्र शर्मा
काशी में एक अप्रैल 1933 को जन्मे वरिष्ठ साहित्यकार विष्णुचंद्र शर्मा की मृत्यु कोरोना के दौरान हुई। जिसमें गिरकर पैर की हड्डी टूटना भी एक प्रमुख कारण था। वे राजनीतिज्ञ व साहित्यकार के साथ ही घुमक्कड़ प्रवृत्ति के थे। विष्णुचंद्र को कवि, कहानीकार व आलोचक के रूप में जाना जाता है। उन्होंने दिल्ली आकर सर्वनाम का संपादन भी किया। बंगाल के विद्रोही कवि काजी नजरुल इस्लाम, मुक्तिबोध व राहुल सांकृत्यायन की जीवनी भी उन्होंने लिखी। उन्होंने कविता, उपन्यास, कहानी, जीवनी, संस्मरण व आलोचना की कुल मिलाकर कुछ करीब 50 पुस्तकें लिखी हैं।
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