Wednesday, April 22, 2026
Homeविचार-विमर्शपीएम मोदी को 'डियर फ्रेंड' कहने वाले ट्रंप की पहलगाम के 'गुनहगारों'...

पीएम मोदी को ‘डियर फ्रेंड’ कहने वाले ट्रंप की पहलगाम के ‘गुनहगारों’ से गलबहियां और जियोपॉलिटिकल खेल

ट्रंप प्रशासन की ही नहीं, अमेरिका की भी विदेशी नीति एक तरह से रियलपॉलिटिक रही है। यानी नैतिकता से ज्यादा उसके अपने रणनीतिक हित अहम हो जाते हैं। इस बार भी यही होता दिख रहा है।

22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए कायराना आतंकी हमले को एक साल पूरा हो गया है। इस हमले में 26 निर्दोष पर्यटकों की जान चली गई थी। इनका धर्म पूछकर इन्हें गोली मारी गई थी। इस बर्बरता के पीछे पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों का हाथ था। दुनिया भर में इस हमले की कड़ी निंदा हुई। अमेरिका ने भी इसे ‘कायरतापूर्ण हमला’ बताया। उस समय राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पीएम मोदी से फोन पर बात की और हर संभव समर्थन का भरोसा दिलाया।

ट्रंप ने यहां तक कहा कि वे पहलगाम के गुनहगारों को न्याय के कटघरे तक लाने में भारत को पूरा समर्थन देते हैं। लेकिन एक साल बाद तस्वीर बदल गई है। बदलते जियोपॉलिटिकल समीकरणों, ईरान-अमेरिका तनाव, चीन की भूमिका के बीच अमेरिका ने पुराना खेल शुरू कर दिया है। ट्रंप, जो कभी मोदी को ‘डियर फ्रेंड’ कहकर संबोधित करते थे, और अब भी हाल-फिलहाल तक करते रहे हैं, आज पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ से गलबहियां कर रहे हैं।

अमेरिका का पुराना खेल

ट्रंप प्रशासन की ही नहीं, अमेरिका की भी विदेशी नीति एक तरह से रियलपॉलिटिक रही है। यानी नैतिकता से ज्यादा उसके अपने रणनीतिक हित अहम हो जाते हैं। इतिहास में ऐसे कई मौके आए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के पहले कार्यकाल में भारत-अमेरिका संबंधों ने कई ऊंचाइयां छुईं। भारत भी यह मानने लगा था कि अमेरिका उसे बड़ा रणनीतिक साझेदार मानने लगा है।

हालांकि ट्रंप की अस्थिर प्रवृति पिछले कुछ महीनों से नया रंग दिखा रही है। ईरान के साथ बढ़ते तनाव, पश्चिम एशिया में प्रभाव की होड़ और चीन को साधने के लिए अमेरिका एक बार फिर पाकिस्तान का सहारा लेना शुरू किया है। वैसे ये भी साफ है कि अमेरिका अपने हितों के अनुसार पाकिस्तान का इस्तेमाल कर रहा है। पाकिस्तान भी इसे समझता है और इसलिए वह भी समय रहते इस बदले समीकरण का पूरा फायदा उठाने की कोशिश कर रहा है।

ईरान के साथ जंग में अमेरिका फंस गया है और ट्रंप इससे किसी भी तरह बाहर आना चाहते हैं। वे दुनिया को बताने के लिए कुछ भी कहें लेकिन युद्ध से निकलने की उनकी छटपटाहट दिख रही है। लेकिन खुद को दुनिया का ‘चौधरी’ बताने वाला अमेरिका खुद तो पैर पीछे खिंचते दिखना नहीं चाहेगा। ये उसकी साथ पर बट्टा होगा। ऐसे में पाकिस्तान अभी ट्रंप के लिए एक मोहरा है, जिसके जरिए युद्धविराम, शांति की कहानी गढ़ी जा रही है। हालांकि, सवाल ये है कि क्या यह अल्पकालिक लाभ के लिए दीर्घकालिक सुरक्षा को दांव पर लगाना नहीं है?

पाकिस्तान: आतंक का जनक, शांति का नहीं

पाकिस्तान का इतिहास गवाह है कि उसने अपनी स्थापना के बाद से ही भारत के खिलाफ प्रॉक्सी वॉर को अपनी विदेश नीति का आधार बनाया। 1947-48, 1965, 1971 और 1999, हर युद्ध में पाकिस्तान ने आतंक और घुसपैठ का सहारा लिया। उसकी असली पहचान ही आतंक का प्रायोजक देश की है।

लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हिजबुल मुजाहिदीन जैसे संगठनों को न केवल पाकिस्तानी सेना और ISI का संरक्षण मिला, बल्कि उन्हें भारत में सक्रियता फैलाने के लिए खुली छूट दी गई। मुंबई 26/11, पठानकोट, उरी, पुलवामा और सबसे हालिया पहलगाम हमला ये सभी इसी नीति के हिस्से हैं। ऐसा नहीं है कि अमेरिका इनसे वाकिफ नहीं है।

भारत समेत दुनिया के सामने चुनौती

यह सही है कि अब अमेरिका का पाकिस्तान से नजदीकियां बढ़ाना न केवल भारत के लिए कूटनीतिक चुनौती है, बल्कि यह वैश्विक सुरक्षा के लिए भी खतरा है। जब एक परमाणु संपन्न देश, जिसे आतंकवाद का गढ़ माना जाता है, उसे महाशक्ति का समर्थन मिलता है, तो यह संदेश जाता है कि आतंक के बावजूद अगर आप रणनीतिक रूप से उपयोगी हैं, तो आपको वैधता मिल सकती है। यह नीति अल-कायदा, ISIS जैसे संगठनों को भी यह संदेश देती है कि दुनिया में नैतिकता से अधिक महत्व ‘स्वार्थ’ का है।

अमेरिका को क्या नुकसान हो सकता है?

पाकिस्तान से गलबहियां अमेरिका के लिए भी आने वाले दिनों में बड़ी मुसीबत बन सकता है। पहली बात ये कि पाकिस्तान का इतना करीबी साथ अमेरिका और ट्रंप की भी विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाता है। जब एक तरफ अमेरिका आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक अभियान की बात करता है और दूसरी तरफ ऐसे देश के साथ साझेदारी करता है जिस पर आतंकवाद को समर्थन देने के आरोप हैं, तो उसका नैतिक आधार कमजोर पड़ता है।

यह अमेरिका की वैश्विक नेतृत्व की छवि भी कमजोर कर रहा, जिसकी बात पहले ही होने लगी है। इसके अलावा भारत जैसे विश्वसनीय साझेदार से दूरी का खतरा को पैदा हो ही गया है। भारत आज अमेरिका के लिए एक विश्वसनीय लोकतांत्रिक और आर्थिक सहयोगी है। पाकिस्तान के साथ बहुत अधिक नजदीकी आज नहीं तो कल भारत-अमेरिका संबंधों में बड़ी खटास ला सकती है।

भारत क्या करे?

भारत को जाहिर तौर पर अभी भावनात्मक नहीं, रणनीतिक और सटीक प्रतिक्रिया पर काम करना चाहिए। अमेरिका से संवाद जारी रखना चाहिए, यह स्पष्ट करते हुए कि आतंकवाद के साथ समझौता आखिरकार सभी के लिए नुकसानदेह होगा।

भारत के सामने यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया और पश्चिम एशिया के अन्य देशों के साथ साझेदारी बढ़ाने के भी मौके हैं। इससे भी पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क और कुटिल डिप्लोमेसी को वैश्विक मंच पर बेनकाब किया जा सकता है।

कुल मिलाकर शांति की बात करने वाले दुनिया के बड़े देशों और नेताओं को यह भी समझना होगा कि शांति की कोई संभावना नहीं होती, जब तक आतंक को पनाह देने वालों पर कड़ी कार्रवाई नहीं होगी। पाकिस्तान जैसे देश, जो दोहरी नीति के साथ चलते हैं, कभी भी स्थायी शांति में भागीदार नहीं बन सकते। अमेरिका के लिए जरूरी है कि अल्पकालिक रणनीतिक लाभ के बजाय दीर्घकालिक स्थिरता और न्याय के पक्ष में खड़ा हो।

यह भी पढ़ें-अमेरिका ने ईरान के साथ संघर्षविराम बढ़ाया, शहबाज शरीफ ने ट्रंप का जताया आभार, तेहरान ने क्या कहा?

विनीत कुमार
विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...
RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Most Popular