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ईरान की न्यूक्लियर साइट पर हमला, IAEA ने दी जानकारी, संयम बरतने की अपील

गौरतलब है कि ईरान (Iran) से टकराव के बीच अमेरिका ने बढ़ती वैश्विक तेल कीमतों और आपूर्ति संकट के बीच बड़ा कदम उठाते हुए ईरानी तेल पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों में अस्थायी ढील का ऐलान किया था। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट के अनुसार, यह छूट 30 दिनों के लिए दी गई है।

नई दिल्लीः ईरान (Iran) के नतांज परमाणु ठिकाने पर हमला हुआ है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) ने इसकी जानकारी सोशल मीडिया पर दी है। आईएईए ने कहा है कि उसे ईरान की ओर से नतांज परमाणु ठिकाने पर हमले की सूचना दी गई है। एजेंसी ने स्पष्ट किया कि फिलहाल बाहरी क्षेत्रों में कोई रेडिएशन रिसाव नहीं पाया गया है, हालांकि स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है।

आईएईए के महानिदेशक राफेल ग्रॉसी ने सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। उन्होंने कहा कि किसी भी तरह की सैन्य कार्रवाई से परमाणु दुर्घटना का खतरा बढ़ सकता है, इसलिए सतर्कता बेहद जरूरी है।

गौरतलब है कि इससे पहले ही अमेरिका ने बढ़ती वैश्विक तेल कीमतों और आपूर्ति संकट के बीच बड़ा कदम उठाते हुए ईरानी तेल पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों में अस्थायी ढील की घोषणा की थी। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने सोशल मीडिया एक बयान में कहा था कि यह छूट 30 दिनों के लिए दी गई है, जिसका मकसद बाजार में अतिरिक्त आपूर्ति लाकर कीमतों को नियंत्रित करना है।

अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि इस फैसले से करीब 140 मिलियन बैरल तेल वैश्विक बाजार में आएगा, जिससे सप्लाई पर दबाव कम होगा। मौजूदा हालात में कच्चे तेल की कीमतें 50 प्रतिशत तक बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं, जो 2022 के बाद सबसे ऊंचा स्तर है।

अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच जारी संघर्ष के कारण पश्चिम के ऊर्जा ढांचे पर हमले हुए हैं। इसके चलते होर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल और एलएनजी गुजरता है, गंभीर रूप से प्रभावित हुआ है।
विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक यह अहम समुद्री मार्ग पूरी तरह नहीं खुलता, तब तक कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।

क्या है छूट का दायरा, क्या है अमेरिका की रणनीति?

अमेरिका की ओर से जारी लाइसेंस के तहत 20 मार्च तक जहाजों पर लोड किए जा चुके ईरानी कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री और डिलीवरी 19 अप्रैल तक की जा सकेगी। हालांकि, यह छूट नई खरीद या उत्पादन को अनुमति नहीं देती, बल्कि पहले से ट्रांजिट में मौजूद तेल तक सीमित है।

अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि इससे ईरान को सीधे आर्थिक लाभ नहीं मिलेगा, क्योंकि उसकी कमाई तक पहुंच सीमित रहेगी और उस पर वित्तीय दबाव जारी रहेगा। हालांकि, कुछ विश्लेषकों ने आशंका जताई है कि इससे ईरान को अपने युद्ध प्रयासों के लिए अप्रत्यक्ष रूप से मदद मिल सकती है।

पिछले दो हफ्तों में यह तीसरी बार है, जब अमेरिका ने ऊर्जा बाजार को स्थिर करने के लिए प्रतिबंधों में अस्थायी ढील दी है। कई सालों तक अमेरिका ने ईरानी तेल की वैश्विक बिक्री पर कड़े प्रतिबंध लगाए थे, लेकिन अब वही वॉशिंगटन उस देश के तेल को बाजार में लाने की कोशिश कर रहा है, जिसके साथ उसका टकराव चल रहा है। ट्रंप प्रशासन ने पहले समुद्र में मौजूद रूसी तेल पर छूट दी और अब ईरानी कच्चे तेल पर भी एक महीने के लिए अस्थायी राहत दे दी है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, यह कदम बढ़ती तेल कीमतों को काबू में रखने के लिए उठाया गया है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कई साल के उच्च स्तर पर पहुंच गई हैं, जिससे अमेरिका में भी ईंधन महंगा हो गया है। ऐसे में ट्रंप प्रशासन ज्यादा से ज्यादा तेल को अंतरराष्ट्रीय बाजार में लाकर सप्लाई बढ़ाना और कीमतों को नीचे रखना चाहता है, खासकर चुनावी साल को देखते हुए।

भारत और एशिया की नजर ईरानी तेल पर

अमेरिकी फैसले के बाद भारत समेत एशियाई देशों की नजर फिर से ईरानी कच्चे तेल पर टिक गई है। रिपोर्टों के मुताबिक, भारतीय रिफाइनरियां सरकार और वॉशिंगटन से भुगतान और नियमों को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश का इंतजार कर रही हैं, जिसके बाद ही खरीद पर अंतिम फैसला लिया जाएगा।

बीबीसी के अनुसार, भारत लंबे समय तक ईरान के कच्चे तेल का एक प्रमुख खरीदार रहा है। 2018 में प्रतिबंध कड़े होने से पहले देश के कुल तेल आयात में ईरानी हिस्सेदारी करीब 11.5 फीसदी तक पहुंच गई थी। हालांकि 2019 में अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते यह आपूर्ति लगभग बंद हो गई, जिसके बाद भारत ने खाड़ी देशों और अमेरिका की ओर रुख किया। बाद में यूक्रेन युद्ध के बाद बदले वैश्विक समीकरणों में रियायती रूसी तेल ने इस जगह को काफी हद तक भर दिया और भारतीय रिफाइनरियों ने तेजी से उसका आयात बढ़ा लिया।

एशिया अपनी करीब 60 प्रतिशत तेल जरूरतों के लिए मध्य-पूर्व पर निर्भर है। मौजूदा संकट के चलते कई रिफाइनरियों को उत्पादन घटाना पड़ा है और निर्यात में कटौती करनी पड़ी है। ऐसे में ईरानी तेल की वापसी से सप्लाई स्थिर करने में मदद मिल सकती है।

ऊर्जा कंसल्टेंसी के मुताबिक, करीब 130 से 170 मिलियन बैरल ईरानी कच्चा तेल इस समय समुद्र में विभिन्न स्थानों पर ट्रांजिट में है, जो वैश्विक बाजार में आने का इंतजार कर रहा है। हालांकि, प्रशासनिक, बैंकिंग और लॉजिस्टिक प्रक्रियाओं के कारण इस तेल के बाजार तक पहुंचने में समय लग सकता है।

उधर, ईरान ने दावा किया है कि उसके पास अतिरिक्त कच्चा तेल उपलब्ध नहीं है। ईरान के तेल मंत्रालय का कहना है कि अमेरिका का यह बयान केवल बाजार को मनोवैज्ञानिक रूप से नियंत्रित करने की एक कोशिश है। तेहरान का दावा है कि वर्तमान में समुद्र में कोई अधिशेष तेल उपलब्ध नहीं है जो अंतरराष्ट्रीय खरीदारों को बेचा जा सके। इसके विपरीत, शिपिंग डेटा और विशेषज्ञों का मानना है कि लगभग 140 से 170 मिलियन बैरल ईरानी तेल वर्तमान में जहाजों पर लदा हुआ है, जिसका एक बड़ा हिस्सा अब तक केवल चीन द्वारा खरीदा जा रहा था।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले का सबसे ज्यादा फायदा चीन को मिल सकता है, जो पहले से ही ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है। वहीं जापान जैसे देश भी इस स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए हैं जो अपनी 90 प्रतिशत तेल आपूर्ति होर्मुज मार्ग से हासिल करते हैं।

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अनिल शर्मा
दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में उच्च शिक्षा। 2015 में 'लाइव इंडिया' से इस पेशे में कदम रखा। इसके बाद जनसत्ता और लोकमत जैसे मीडिया संस्थानों में काम करने का अवसर मिला। अब 'बोले भारत' के साथ सफर जारी है...
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