पश्चिम एशिया में संकट के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (10 मई) को एक बड़ी अपील देश के लोगों से की। उन्होंने लोगों से एक साल पर सोना नहीं खरीदने, ईंधन बचाने, विदेश यात्रा से बचने को कहा। उन्होंने लोगों ने भारत के विदेशी मुद्रा भंडार को कम से कम खर्च करने को लेकर सहयोग की अपील की। इसे लेकर कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं। विपक्ष की ओर से राहुल गांधी ने इसे सीधे-सीधे सरकार की नाकामी से जोड़ दिया। हालांकि, सच ये है कि ऐसा पहली बार नहीं है जब किसी प्रधानमंत्री ने या सरकार ने लोगों से ऐसे सामूहिक सहयोग की अपील की है। उदाहरण के लिए 1962 की कहानी है, जब देश के प्रधानमत्री जवाहरलाल नेहरू ने लोगों से अपने गहने दान करने की अपील की थी।
ऐसे ही 1965 की जंग में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने लोगों से उपवास करने की अपील की थी। ये वो समय था, जब देश पाकिस्तान के साथ युद्ध में उलझा था और अनाज का भी संकट बना हुआ था। ये वो समय था जब गेंहू भी अमेरिका से मंगाना पड़ता था। वो भी बेहद खराब स्तर का हुआ करता था। ऐसे में रेडियो पर लगातार संदेश चलाए जाते और लोगों से अपील की जाती की हफ्ते में कम से कम एक दिन एक वक्त का खाना छोड़ें।
1962…जब लोगों ने दान किया अपना सोना
1962 में भारत-चीन युद्ध के समय देश सैन्य रूप से कमजोर स्थिति में था। संसाधन सीमित थे और जनता के सामने पहली बार यह अहसास हुआ कि आजादी के बाद बना नया भारत एक बड़े संकट से गुजर रहा है। उस दौर में सरकार ने सीधे जनता से भी सहयोग मांगा।
तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने देशवासियों से अपील की थी कि वे युद्ध के लिए सरकार की मदद करें। लोगों ने अपने घरों से सोना-चांदी, गहने निकालकर सरकार को दान देना शुरू कर दिया। महिलाओं ने अपने गहने उतार दिए, बच्चों ने अपनी गुल्लकें तोड़ दी।
देशभर में ‘नेशनल डिफेंस फंड’ के लिए दान अभियान चलाए गए। स्कूलों में बच्चे चंदा इकट्ठा करते थे। जगह-जगह रक्तदान शिविर लगाए गए। पंजाब में उस समय के मुख्यमंत्री प्रताप सिंह केरोन की भूमिका विशेष रूप से चर्चा में रही। उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों से सहयोग की अपील की। कहा जाता है कि उनकी सभाओं में महिलाएं मंच पर आकर अपने कंगन, हार और झुमके तक उतारकर दे देती थीं।
पंजाब के ग्रामीण इलाकों में किसानों ने अनाज और धन दोनों का योगदान किया। कई जगह युवाओं ने सेना में भर्ती होने की इच्छा जताई और रक्तदान अभियान बड़े स्तर पर चले। यहां तक कि बच्चों से भी कहा गया कि वे अपनी गुल्लकें तोड़कर देश के लिए योगदान दें। यह अपील स्वयं नेहरू ने की थी। उनका संदेश था कि देश कठिन समय से गुजर रहा है और हर भारतीय को अपनी क्षमता के अनुसार योगदान देना चाहिए।
हालांकि, आज का भारत 1962 वाला भारत नहीं रह गया है। बहुत कुछ बदल गया है। देश की अर्थव्यवस्था कहीं ज्यादा मजबूत है, विदेशी मुद्रा भंडार बड़ा है। लेकिन वैश्विक संकटों का असर अब पहले से कहीं अधिक तेजी से देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता है। ऐसे समय में सरकारें केवल नीतियों के जरिए चुनौतियों से नहीं निपट सकती। जनसहयोग से भी स्थिति संभालने में मदद मिलती है।
1962 के युद्ध के दौरान दान किए गए गहनों और टूटी हुई गुल्लकों की कहानियां आज भी यह याद दिलाती हैं कि भारत में संकट के समय सामूहिक भावना कितनी मजबूत रही है। उस दौर में लोगों ने अपने निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर देशहित को प्राथमिकता दी थी। आज शायद सरकार को लोगों के गहने नहीं चाहिए, लेकिन जिम्मेदार आर्थिक व्यवहार की अपेक्षा जरूर है।
वैसे भी ताजा हालात की बात करें सरकार ने जानकारी दी है कि देश में फिलहाल 60 दिनों का कच्चा तेल भंडार, 60 दिनों का प्राकृतिक गैस भंडार, तथा 45 दिनों का रसोई गैस भंडार उपलब्ध है। साथ ही, देश का विदेशी मुद्रा भंडार 703 अरब डॉलर के मजबूत स्तर पर बना हुआ है।
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