कहानी को लेकर मेरे भीतर संकोच और संदेह निरंतर बढ़ता जा रहा है। मैं नहीं जानता ऐसा क्यों हो रहा है। इतना जानता हूँ कि ऐसा हो रहा है। मैं अधिक से अधिक कहानियाँ पढ़ने की कोशिश करता हूँ- हिन्दी की भी और विदेशी भी। और कहानी को लेकर मेरा संदेह और बढ़ जाता है। ऐसा नहीं है कि मैं यह तय नहीं कर पाता कि अच्छी कहानियाँ कौन-सी है। मैं जानता हूँ कि अच्छी और बड़े फ़लक की कहानियाँ किन्हें कहा जाना चाहिए।
हालांकि एक वर्ष का समय कहानियों के मूल्यांकन के लिए बहुत कम है, फिर भी इस परंपरा का निर्वाह करते हुए इस वर्ष पढ़ी गई कुछ अच्छी कहानियाँ मेरे ज़ेहन में आती हैं। मुझे लगता है कहानियों में ‘फेकनेस’ मुझे रास नहीं आती। ‘फेकनेस’ का अर्थ है परिवेश और कथ्य का आपस में सिंक्रोनाइज़्ड ना होना, कहानी की दुनिया से बाहर खड़े होकर कहानी लिखना, कहानी में लेखक की संलग्नता कम होना या ना होना, कहानी केवल तकनीकी आधार पर लिखना-यानी अगर आपसे कहा जाए कि दलित विमर्श पर कहानी लिखनी है…तो बिना दलितों की दुनिया को जाने, समझे, बिना उनके दुख-सुख जाने आप केवल इंटरनेट से प्राप्त जानकारियों के आधार पर कहानी लिख दें-क्योंकि लिखना तो आप जान ही गए हैं!
फिर भी मैं यह तय नहीं कर पाता कि कहानी क्या है। हाँ, क्या कहानी नहीं है, वह शायद मैं जानता हूँ। अपनी बात पुख्ता तरीके से कहने के लिए आपको सोलहवीं सदी में लिए चलता हूँ। एकदम शुरू की बात है। इटली के मूर्तिकार माइकल एंजेलो ने एक मूर्ति बनाई। पुरुष सौंदर्य की प्रतीक इस मूर्ति को ’डेविड’ कहा गया। ठीक उसी तरह जैसे स्त्री सौंदर्य का प्रतीक ‘वीनस’ को माना जाता है। माइकल एंजेलो से किसी ने पूछा, इतनी सुन्दर परिपक्व और प्रौढ़ मूर्ति आपने कैसे बनाई? एंजेलो ने बड़ी सादगी से जवाब दिया, मैंने चट्टान का एक टुकड़ा लिया और उसमें से वे हिस्से निकालता गया जो डेविड नहीं थे। एक चट्टान को तराशते चले जाना ही डेविड को जन्म देता है। यह भी तय है कि डेविड की छवि माइकल एंजेलो के ज़ेहन में पहले से दर्ज़ रही होगी।
अब मान लीजिए ’डेविड’ एक कहानी है तो आपको इसमें से वो हिस्से निकालने हैं, जो कहानी नहीं है। वह क्या है जो कहानी नहीं है? कहानी क्या है, यह बताने से बेहतर यह बताना है कि क्या कहानी नहीं है। घटनाएँ, समाचार, निजी सुख-दुख, अनावश्यक डिटेलिंग, डायवर्जन, इतिहास में चले जाना, उन्हें लिखना जो आपके अनुभव का हिस्सा नहीं रहे। लेखक को इनसे बचना चाहिए। उनके ज़ेहन में हमेशा ’डेविड’ (कहानी) रहनी चाहिए। यह भी कि जिन विषयों पर लेख लिखने चाहिए, उनपर कहानियाँ लिखने से बचना चाहिए। इस्राइल के लेखक एमोस ओज़ ने कहा था कि मैं सरकार के विरुद्ध कहानी लिखने के बजाय जनता के बीच जाकर यह कहना पसन्द करूंगा कि यह सरकार निकम्मी है, इसे वोट ना दें। लेखक को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कहानी में कहे गये से ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है अनकहा।
यहाँ साल के कुछ कहानी संग्रहों की बात करते हैं, जिन्होंने मुझे प्रभावित किया और जो मेरी नज़र में फेक नहीं है और जिनमें अनुभव से उपजा सत्य दिखाई पड़ता हैः
शुभ दिन-कलम हुए हाथ से आगे…!
बलराम की पहली कहानी ‘उसने देखा’ 1968 में प्रकाशित हुई। कहा गया कि इस पर जयशंकर का प्रभाव है। यह कोई अस्वाभाविक नहीं था। उस समय अधिकांश युवा कथाकारों पर अपने आदर्श साहित्यकारों का प्रभाव रहता ही था। उस दौर के बहुत से साहित्यकारों की भाषा शरतचंद्र चट्टोपाध्याय की भावुकतापूर्ण भाषा से प्रभावित रहती थी। लेकिन बलराम को जल्दी ही समझ आ गया कि ‘उसने देखा’ उनकी कहानी की ज़मीन नहीं है। उन्होंने अपने भीतर और बाहर देखा। दोनों तरफ उन्हें ग्रामीण परिवेश और अपना अंचल दिखाई दिए। ग्रामीण जीवन में पले-बढ़े बलराम के लिए गांवों की दुनिया उनकी अपनी दुनिया थी। इस दुनिया पर लिखने के लिए उन्हें किसी से कुछ भी उधार नहीं लेना होगा, न भाषा, न अनुभव और न यथार्थ। सब कुछ उनका अपना होगा, मौलिक होगा और यही मौलिकता उनकी पहचान बनाएगी।
बलराम ने यही रास्ता चुना। 1976 में सारिका में प्रकाशित हुई ‘कलम हुए हाथ’…ने बलराम को एक साहित्यिक पहचान दी। बलराम ने कहानी में ‘कलम हुए हाथ एक्सप्रेशन’ का इस्तेमाल ठीक वैसे ही किया जैसे हम सिर कलम होने की बात करते हैं। राजा ठाकुर उसकी ज़मीन ह़ड़पने के लिए पूरा जाल बिछा लेता है, हालांकि माधौ बापू कहते हैं, लेकिन ठाकुर को हम अइस करन न देबे, चहौ कुछु होइ जाय।
अगले दिन ठाकुर ट्रैक्टर पर माधौ के घर आ गया। शंकर ने बापू की रजाई हटाई तो वे हिले तक नहीं। उसने उनका हाथ पकड़ा तो वह ठंडा था, काठ की मानिंद। यह बलराम की सबसे चर्चित और बहुप्रशंसित कहानी है। यही कहानी है जो कहानी की तकलीफ़ को विस्तार देती है। जिसमें माधौ के घर की कहानी, गांव के हर घर की कहानी बन जाती है। बलराम ने कई कहानियां इस मिजाज़ की लिखी।
‘पालनहारे’ और ‘शिक्षाकाल’ ऐसी ही कहानियां हैं। वास्तव में बलराम के चेतन और अवचेतन में ग्रामीण परिवेश, वहां के मूल्य बसे हुए हैं। अपने अंचल में जीते हैं बलराम। अपनी शुरुआती कहानियों में चाहकर भी वे उससे मुक्त नहीं हो पाए। या शायद स्वयं ही मुक्त होना नहीं चाहते। लेकिन शिक्षाकाल तक आते-आते बलराम के नायक के सुर थोड़े कमज़ोर पड़ जाते हैं। ‘सामना’ कहानी में नौकरी की तलाश में शहर आया युवा एक मित्र के झांसे में आकर गांव के बखार में भरे साल भर के अनाज से भी हाथ धो बैठता है। नौकरी लगवाने वाले सोमनाथ को मीठी-मीठी कल्पनाओं में घुमाता रहता है। लेकिन सोमनाथ के सारे सपने टूट जाते हैं। बहुत से युवाओं के इस तरह नौकरी पाने के सपने आज भी टूट रहे हैं।
बलराम की कहानियों के नायक के सपने भी टूट रहे थे। टूटते सपनों से गुजरते हुए नायक अख़बार की दुनिया में पहुंचता है। संभवतः यही वह टर्न है जहाँ से बलराम का परिवेश छूट जाता है या वह जानबूझकर उसे छोड़ देते हैं और दोबारा उस परिवेश को अपनी कहानियों में जीवित नहीं कर पाते।
‘मालिक के मित्र’ इसी बदली हुई दुनिया की कहानी है। अख़बारी दुनिया से मोहभंग के बाद बलराम की कहानियों का नायक प्रेम की खोज में निकलता है। वास्तव में शहर में आते ही बलराम की कहानियों के विषय बदल जाते हैं। वह प्रेम, स्त्री-पुरुष संबंध और वैवाहिक जीवन पर कहानियाँ लिखते हैं। ‘सबक’, मान गई बाबा और ‘अनचाहे सफर’ इसी मिजाज़ की कहानियां हैं। अनचाहे सफर के माध्यम से बलराम ने प्रेम संबंधों और बेरोजगारी के अंतर्संबंधों से बनते बिगड़ते घटनाचक्र को अंकित किया गया है।
यह तय है कि महानगर में आने के बाद ‘ग्रामीण बलराम’ कहीं पीछे छूट गया और बलराम ने भी उस तक लौटने की कभी कोई कोशिश नहीं की। वापस लौटना संभव भी नहीं होता। वह ना तो पूरी तरह महानगरीय हो पाए और ना ही ग्रामीण जीवन और संस्कारों को छोड़ पाए। लेकिन गाँवों की दुनिया के साथ शायद उन्होंने ख़ुद को अपडेट भी नहीं किया। वह नहीं देख पाए कि ग्रामीण जीवन कितना बदल गया है, उनके मूल्य अब वह नहीं रहे जो साठ या सत्तर के दशक में थे, अब उनकी प्राथमिकता और संवेदनाएँ बदलने लगी हैं, उनके शोषण के तरीके भी रोज़ बदल रहे हैं, ग्रामीणों की आस्थाएँ और सपने पहले जैसे नहीं हैं, बैंकों के ऋण किस तरह किसानों को तबाह कर रहे हैं। शहरों की चमकधमक ने भी ग्रामीण जीवन को धुंधला कर दिया है। ग्रामीण जीवन पार्श्व में जाता रहा और महानगरीय संस्कृति ने बलराम को अपने कब्ज़े में ले लिया।
यही वज़ह है कि महानगर में आने के बाद बलराम की लिखी कहानियों में ‘कलम हुए हाथ’ का लेखक बलराम कहीं दिखाई नहीं देता। जबकि पाठक उसी बलराम को खोजता रहता है। बलराम की कुछ कहानियों में महानगर अपने पूरे चरित्र के साथ दिखाई पड़ता है। ‘शुभ दिन’, महानगर में रहने वाले ऐसे ही पति पत्नी की कहानी है। इस कहानी का परिवेश और लोकेल शहर में बदल चुका है। जैसा आमतौर पर महानगरों में होता है, घर में पति है, पत्नी है और एक बच्चा है। मां बाप बच्चे को समय दे सकें इसलिए वे अलग अलग शिफ्ट में काम करते हैं। परिणामस्वरूप वे एक दूसरे के लिए समय नहीं निकाल पाते। बलराम की यह कहानी महानगर में रहने वाले कमोबेश हर पति पत्नी की कहानी लगती है और तक़लीफ भी।
‘गोआ में तुम’ एक ऐसी कहानी है जिसमें महानगरीय जीवन के तनाव गोआ में चित्रित किए गये हैं। इसमें पति पत्नी गोआ यात्रा पर जाते हैं। वे गोआ इसलिए आए हैं ताकि अपने बच्चे की असामयिक मृत्यु से पैदा हुआ अवसाद से उबर सकें। ‘गोआ में तुम’ वास्तव में उस मित्र की कहानी है जो कहानी में उपस्थित नहीं है। बलराम ने दिखाया है कि कई बार अनुपस्थित व्यक्ति उपस्थित व्यक्ति से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है।
निसंदेह बलराम के पास अकृत्रिमता नहीं है, इसके बावज़ूद बलराम ने कहानीकार के रूप में ग्रो करना स्वीकार नहीं किया। जिन कहानियों ने कहानीकार के रूप में उन्हें बचाये रखा वे लगभग साढ़े तीन या चार दशक पुरानी कहानियाँ हैं। जबकि बलराम की कहानियों को पसन्द करने वाले निश्चित रूप से यह सोचते होंगे कि बलराम आज के इस जटिल दौर मॆं जब यथार्थ पलभर में बदल जाता है, जब शोषण और शोषक का चरित्र पूरी तरह बदल चुका है, जब तकनालॉजी और बाज़ार घर के हर कोने में पहुँच गया है, तब कलम हुए हाथ का लेखक कैसी कहानियाँ लिखता!
पुस्तक- शुभ दिन
लेखकः बलराम
प्रकाशकः राजकमल पेपरबैक्स
मूल्यः रुपए 250
दूरस्थ दाम्पत्य – दूर होता दाम्पत्य!
ममता कालिया वरिष्ठ साहित्यकार हैं। उनके अनेक उपन्यास, कहानी संग्रह,कविता संग्रह और संस्मरण प्रकाशित हो चुके हैं। उन्हें अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। हाल ही में प्रकाशित उनका कहानी संग्रह ‘दूरस्थ दाम्पत्य’ की कहानियाँ पढ़ते हुए यह साफ़ दिखाई देता है कि वह कहानियों के विषय तलाश करने कहीं बाहर नहीं जातीं। बल्कि आसपास की दुनिया में जो हो रहा है, उन्हें ही कहानियों का विषय बनाती हैं। उनकी कहानियों में दीखने वाली घटनाएँ आपको अपने आसपास की या अपने ही जीवन की घटनाएँ लगती हैं। आप कह सकते हैं, अरे यही तो मेरे साथ हुआ…बिल्कुल ऐसा ही तो फलां के साथ हुआ। यानी अपनी कहानियों के लिए वे उधार के अनुभवों नहीं लातीं, बल्कि निजी अनुभवों को पूरी संवेदनशीलता और गहराई से कहानी में कन्वर्ट करती हैं।
शीर्षक कहानी में नायक एक मशहूर लेखक है। जिसका बड़ी फैन फॉलोइंग है। लड़कियाँ उसकी लिखी कहानियों पर फिदा रहती हैं। वह ख़ुद भी अपने लेखक होने को एन्जवॉय करता है। लेखक महोदय का विवाह एक विपरीत स्वभाव की, गणित की अध्यापिका से हो जाता है। जल्द ही दोनों को समझ आ जाता है कि दोनों की जीवन पद्धतियाँ, जीवन शैली और विचार पद्धिताँ नितांत अलग हैं। उनका दाम्पत्य ज़मीन नहीं पकड़ पाता! दोनों एक दूसरे से दूर होते चले जाते हैं। यही है दूरस्थ दाम्पत्य।

ममता कालिया अपनी कहानियों में ‘पिज्जा डिलीवरी ब्वॉय’ की तक़लीफ भी देखती हैं तो एक बड़े अधिकारी की पत्नी नन्दा द्वारा घर में सेवक के रूप में काम कर रहे मनमोहन की उस पीड़ा को भी दर्ज़ करती हैं, जो बार बार सेवक का नाम बदल देता है। और अंत में बालम नामक सेवक का नाम-यह कहकर बहादुर रख देता है कि सब घरेलू सेवकों को बहादुर कहकर ही बुलाते हैं। यह अपनी तरह का पहचान का संकट है। ‘आईना’ कहानी में एक ऐसी स्त्री की पीड़ा है दो घर का आईना टूटने के बाद नया आईना खरीदना चाहती है, लेकिन उसे कोई भी आईना पसन्द नहीं आता। आईने की तलाश वास्तव में अपनी ही तलाश है।
ममता कालिया की कहानियों में सरलता है, सहजता है, कोई भाषिक आडम्बर नहीं है। लेकिन ऐसा कतई नहीं है कि वह राजनीतिक कहानियाँ नहीं लिखतीं। ‘महमूद बनाम मोहन’ ऐसी कहानी है जो पिछले कुछ सालो में बढ़ी साम्प्रदायिकता पर तो चोट करती ही है, साथ ही यह भी दिखाती है कि किस तरह सत्तापक्ष महमूदों को मोहन बनने के लिए बाध्य कर रहे हैं। यह एक साहसिक कहानी है। इस संग्रह को पढ़ा जाना चाहिए।
पुस्तकः दूरस्थ दाम्पत्य
लेखकः ममता कालिया
प्रकाशकः सेतु
मूल्यः 225
मिर्रः कहानियों की अनोखी खुशबू
आयशा आरफ़ीन की कहानियाँ किसी ऐजेंडे को लेकर नहीं लिखी गई हैं। ये कहानियाँ मनुष्य की, उसके चेतन-अवचेतन, स्मृतियों, फंतासी, किस्सों और ख़्वाबों से निकली कहानियाँ हैं। ये नितांत मौलिक कहानियाँ हैं। इन कहानियों में सन्देह, अस्पष्टता और ‘छलावा’ है। ये यथार्थ के चित्रण की ‘ठोस’ कहानियाँ भी नहीं हैं। बल्कि ये तेजी से बदल रहे यथार्थ का पीछा करने की कहानियाँ हैं और पीछा भी ‘रियल वर्ल्ड’ में नहीं किया जा रहा बल्कि कई कहानियों में पीछा ‘ख़्वाबों’ में किया जा रहा प्रतीत होता है। इन कहानियों में गहरी संलग्नता (पैशनेट इन्वाल्वमेंट) होने के साथ-साथ, सघनता और बेहद इंटेंस परिवेश भी है।
‘शहर बदर’ उन स्थितियों की कहानी है, जो व्यक्ति को अपने ही घर में, अपने शहर में अजनबी बना देती है। ‘एक घोड़े की मौत’ में नायिका ट्रेन से धनबाद जा रही है, लेकिन वास्तव में यह ट्रेन का सफर नायिका के भीतर का सफ़र है। आयशा की कहानियों में प्रेम भी एकदम सपाट तरीके से नहीं आता। कहीं यह सहज रूप से आता है लेकिन ड्रामाई अंदाज़ में जुदा हो जाता है (इलहाम) तो कहीं पति की हत्या करने वाले प्रेमी के रूप में (सोलमेट्स), जो पुराने जालों के बीच टंगा रहता है, हवा में डोलता सिर्फ़ एक टूटे रिश्ते के धागे-सा। ‘फ़रयाल’ (जिसका अर्थ है ख़ूबसूरत गर्दन वाली) में यही प्रेम एक खुशबू की तरह आता है, जिसे प्रेमी समय रहते नहीं पहचान पाते।

कमोबेश इसी मिज़ाज की कहानी है, ‘मुश्क’। आयशा आरफ़ीन की कहानियों में प्रेम के अनेक रूप दिखाई देते हैं-कभी हत्या के बाद भी प्रेम की खुशबू महसूस होती है और कभी स्थितियाँ एक सम्भ्रम पर ख़त्म होती हैं। आयशा की कहानियों में मृत्यु और ‘न्यूरो प्रोब्लम’ प्रोब्लम भी निरंतर आवाजाही करते हैं। ‘स्कूएर वन’ और ‘ताज़ियत’ ऐसी ही कहानियाँ हैं। इस संग्रह की दो बेहतरीन कहानियाँ। आर एक्स 100 और ख़ला का तिलिस्म। खला का तिलिस्म नायिका और उसके स्व की मुठभेड़ है तो ‘आर एक्स हंड्रेड’ यह संकेत देती है कि नायिका कहीं अपने अतीत की यात्रा करती दिखाई देती है तो कहीं भविष्य की यात्रा।
‘मिर्र’ संग्रह को पढ़ना अपने ही भीतर के अनेक कालखण्डों की यात्रा करना है। आयशा के पास बेहद परिपक्व भाषा है। वह भाषाई वैभव या परिवेश की चिन्ता नहीं करतीं और न ही वे कहानी के ‘कहानीपन’ को बनाए-बचाए रखने का कोई प्रयास करती हैं।
पुस्तकः मिर्र
लेखकः आयशा आरफ़ीन
प्रकाशकः लोकभारती पेपरबैक्स
मूल्यः299 रुपए
किस्से काफ़ियाना-प्रेम की छायाएँ!
यह संग्रह दो खंडों में है। पहले खंड की कहानियों की धुरी प्रेम, विवाह, सेक्स, ब्रेक अप, फिर प्रेम, फिर विवाह, प्रेग्नेंसी, अबार्शन, अकेलापन, प्रेम के अधूरापन के इर्द गिर्द घूमती हैं। लेकिन दुष्यंत की कहानियों केवल यही भर नहीं है। बेरोजगारी, जीवन, नौकरी पर आने वाले संकट, आर्थिक मंदी, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, ग्लोबल कारपोरेट पूंजी, जातीयता, साम्प्रदायिकता और यौनिक संघर्ष भी इन कहानियों में दिखाई पड़ता है। इन कहानियों की सबसे अच्छी बात यह है कि एक तरफ़ दुष्यन्त कहानी के परंपरागत शिल्प को तोड़ते दिखाई देते हैं (लगता है वह शिल्प के मोहताज़ नहीं हैं), वहीं वह साहस के साथ उन क्षेत्रों में भी सहजता के साथ प्रवेश करते हैं, जहाँ जाने के बारे में बात करना भी गुनाह-सा लगता है।
प्रेम की बहुत-सी छवियाँ इन कहानियों में दिखाई देती हैं। किसी रोड साइड रेस्त्रां में बैठे नंदिता और राहुल एक दूसरे के होंठों को चूम सकते हैं (ताला चाबी), लड़की ब्वायफ्रेंड को बुलाती है और कहती है कि वह प्रेग्नेंट है, लेकिन बच्चा नहीं चाहती और अबार्शन के लिए डॉक्टर से समय ले लेती है(उलटी वाकी धार), ब्रेक अप के बाद का अकेलापन (डायरीः जुलाई की एक रात), प्रेम में बेरोजगार होना और उसके बाद प्रेमिका का सकारात्मक व्यवहार (प्रेम की उप कथा), ब्रेक अप के बाद पैच अप की कोशिश (यार, तुम भी बस!) ऐसी ही कहानियाँ हैं।

दरअसल दुष्यन्त इन कहानियों में प्रेम की खोज करते दिखाई देते हैं। रिश्ते बनाना और उनका टूट जाना आज के समय में एक सहज बात है। युवा इस बात को समझता है। अबॉर्शन आज लड़कियों के लिए भी ऐसा निर्णय नहीं है, जिसे लेने के लिए उसे बहुत सोचना पड़े। करियर युवाओं के लिए पहली प्राथमिकता है।‘शाम, नॉस्टेल्जिया और मोनालिसा की हंसी’ जैसी कहानियों में दुष्यंत यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि युवा सबकुछ के बावज़ूद अकेलापन महसूस करते हैं।
संग्रह के दूसरे खंड की कहानी ‘कबूतर’ वर्तमान माहौल पर एक शानदार कहानी है। यह उस वाहियात कानून पर बहस है जो कहता है कि ज़ुबानों को मजहबों और जमातों से जोड़ दिया जाए। यह इस संग्रह की सबसे मजबूत कहानी है। संग्रह को पढ़ना एक अलग नज़रिए से दुनिया को देखना भी है।
पुस्तकः किस्से काफ़ियाना
लेखकः दुष्यन्त
प्रकाशकः पेंगुइन स्वदेश
मूल्यः 299,
साखः ताकि बची रहे कहानी की ‘साख’
संग्रह की इन कहानियों में दुर्गा पूजा है, काली पूजा है, शहर का स्थापत्य है, रास्ते हैं, वनस्पतियाँ हैं, सूर्योदय है, सूर्यास्त है, बिथोवेन है, मोजार्ट है और बदलते हुए दिन हैं। कहानी यहाँ आपको खोजनी पड़ सकती है। बहुत-सी कहानियाँ दृश्य के समानांतर चलती दिखाई देती हैं। शर्मिला की कहानियाँ शोर नहीं करती लेकिन वर्तमान समय के ख़ासकर स्त्री और उससे जुड़े सभी प्रश्न उनकी कहानियों में मानो स्वतः ही चले आते हैं। स्त्री यहाँ अकेली नहीं है बल्कि पूरे समाज और उसकी विसंगतियों के साथ है। उसका विद्रोह भी व्यक्त ना होकर अव्यक्त अधिक है।
एक तरफ़ शर्मिला की कहानियों की नायिकाएँ जिए गए, भोगे गए जीवन को छोड़कर नया जीवन जीने का साहस करती हैं और अपनी स्मृतियों को भागीरथी से कहती हैं (ओट), तो दूसरी तरफ़ वे बिना किसी की परवाह के, अपने दोस्त के साथ सिगरेट पीने को अपने चेहरे की पाक़ीज़गी मानती हैं (नयी लड़की का पाक़ चेहरा), ये नायिकाएँ पति से अलग होने का भी साहस दिखाती हैं (सितम्बर, दुर्गा पूजा और निवेदिता)। लेकिन शर्मिला की कहानियाँ अपने परिवार के ईर्द गिर्द भी घूमती दिखाई देती हैं, जहाँ बहुत छोटी-छोटी घटनाओं के केन्द्र में कहानी जन्म लेती है (साख), कोरोना के समय मनुष्यता को बचाए रखने का आह्वान भी उनकी कहानियों में देखा जा सकता है (श्यामान्द बाबू) और बचपन में हुई शोषण की घटना के अँधेरे भी उनकी कहानियों में दिखाई पड़ते हैं (अँधेरों के अवशेष) और बलात्कार पीड़ितों पर एक उपन्यास लिखने की आकांक्षा भी यहाँ दिखाई देती है (पद्माक्षी), वह तलाक़ पर भी बात करती हैं लेकिन एकदम नये अन्दाज़ में (व्हाट्सअप) और बाज़ार के दबाव में आता मध्यवर्ग भी उनकी कहानियों में आता है(रोज़-ब-रोज़)।
लेकिन ‘ग्रीफ़’ इस संग्रह की सबसे सशक्त कहानी है। चेखव की ‘ग्रीफ’ में अपना दुख साझा करने वाला कोई ना मिलने पर कोचवान घोड़े से अपना दुख साझा करता है। शर्मिला की कहानी में एक स्त्री (श्यामा) लाइब्रेरी में किसी लेखक की प्रतीक्षा कर रही है, जो उसका दुख लिख सके। लेकिन शर्मिला की कहानी में अपना दुख नायिका को ही लिखना है, दुख क्या है यह भी संकेतों में ही दर्ज़ किया गया है। यह कहानी चेखव की ग्रीफ़ पर भारी पड़ती है। प्रेम कहानी-सी लगती ‘शोकगीत’ संग्रह की एक अन्य महत्वपूर्ण कहानी है। संग्रह को पढ़ना कृत्रिमता से कोसों दूर जीवन के करीब जाना है।
पुस्तकः साख
लेखकः शर्मिला जालान
प्रकाशकः वाणी प्रकाशन
मूल्यः 299
मन विचित्र बुद्धि चरित्रः मरीचिका की गंध दर्ज़ होनी चाहिए!
सुषमा गुप्ता का यह दूसरा कहानी संग्रह (तुम्हारी पीठ पर लिखा मेरा नाम) है। उनका एक उपन्यास (क़ितराह) भी आ चुका है। लेखन में सुषमा के पास जो चीज़ है, वह है जादुई भाषा। साथ ही वह अपने मन, अवचेतन, स्वप्न, फंतासी और बाहरी की दुनिया से कुछ किरदार बनाती हैं (या वे स्वयं ही बन जाते हैं) जो पाठक को चकित करता है। इन किरदारों की भाषा और व्यवहार भी पूरी तरह ‘सिंक्रोनाइज़्ड’ और तार्किक होता है। इस संग्रह की भी अधिकांश कहानियाँ ऐसे ही किरदारों से लिखी गई हैं।
‘मंद्रविद्ध’ ‘मरीचिका की गंध’ ऐसी ही कहानियाँ हैं। मंत्रविद्ध में नायक को स्टेशन पर एक लड़की मिलती है। वह उसे अपने घर ले जाती है। दोनों बातें करते हैं, घूमते हैं। बाद में यह खुलता है कि नायक तो स्टेशन पर उतरा ही नहीं। अब पाठक सोचता रहे कि वह लड़की कौन थी। इसी तरह मरीचिका की गंध में एक रहस्यमयी नायिका माया है, जिसके ज़रिये सुषमा प्रेम के ठोस, वायवीय होने के अर्थ खोज रही हैं। स्त्री पुरुष संबंध, रूमानियत सुषमा की कहानियों में पूरी शिद्दत से उभरते हैं। ऐसा भी नहीं है कि वह प्रेम से बाहर की दुनिया को देखती-समझती नहीं या उनपर कलम नहीं चलातीं। भद्दी हँसी, उठान हाड़ की लड़की कुछ ऐसी ही कहानियाँ हैं।

‘मूक चीखें’ स्कूल में बच्चों (लड़कों)के साथ होने वाली यौन शोषण की घटनाओं पर आधारित है तो ‘ख़्वाब की छाल में यथार्थ की कील’ बलात्कार पीड़िता की कहानी है जिसमें लड़की उसी व्यक्ति को दोषित ठहराती है जो उसे बचाकर अस्पताल लाया था। क्या यही आज का यथार्थ है? ‘मिस्टिक स्टे’ में हया और समर्थ की जोड़ी ब्लू सिटी में, 600 साल पुरानी एक हवेली में रात को स्टे करते हैं। कुछ दिन बाद जब ये दोनों जोधपुर की लोकल मार्केट के शेडी से वीडियो पार्लर में देखते हैं कि सॉफ्ट पोर्न कैटेगरी में एक नया वीडियो एड हुआ है-स्टीमी सनलाइट सेक्स-टाइटल के साथ। क्या यह भी आज फैलते बाज़ार का एक यथार्थ है!
इस संग्रह की सबसे महत्वपूर्ण कहानी है-ग्रेवडिगर। इसे पढ़ना मृत्यु से अपने रिश्ते को भी पहचानना है। यूँ पूरे संग्रह को पढ़कर आपको जीवन, रूमानियत और विसंगतियों के नये रंग दिखाई देंगे।
पुस्तकः मन विचित्र बुद्धि चरित्र
लेखकः सुषमा गुप्ता
प्रकाशकः हिन्द युग्म
मूल्यः 299
विज्ञापन वाली लड़की-ग़र बाहर आए!
दिनेश की कहानियाँ बाहर से भीतर नहीं जातीं बल्कि भीतर से बाहर जाती हैं। यही वजह है कि उनकी कहानियों में स्वप्न, फंतासी, माजी और अवचेतन सक्रिय रहते हैं। वह आमतौर पर घटनाओं में कहानियाँ नहीं तलाश करते बल्कि अपने मन की कन्दराओं में ठहरी हुई कहानियों को आकार देते हैं। दिनेश के पास बहुत-सी स्मृतियों और स्वप्न हैं, वह कहानियों में इनका इस्तेमाल करते हैं। लेकिन इस सबके साथ-साथ उनके पास बदल रही दुनिया-विज्ञापनों के ज़रिए, साहित्यिक पत्रिकाओं के ज़रिए और संचार माध्यमों के ज़रिए के दीखते-अनदीखते दृश्य भी हैं।
‘उड़न खटोला’ ऐसी ही एक कहानी है, जिसमें दिनेश व्यवस्थित तरीकों से इनका प्रयोग करते हैं। उनकी स्मृतियों में एक परिंदा है जो घोंसले से नीचे गिरकर मर गया है। उसे ना बचा पाने का कहीं अपराध-बोध भी है। संगीत की कुछ धुनें हैं। पिता हैं, पिता की मृत्यु है। माँ है जो निरंतर बूढ़ी हो रही है-मृत्यु की ओर बढ़ रही है। बचपन की स्मृतियों का कोलाज-सा है, जो उसे ना सोने देता है, ना स्वप्न में जाने देता है। छत पर एक लड़की से रूमानी-सी मुलाकात है। जो स्वप्न भी हो सकती है और फंतासी भी।
इसी मिज़ाज की एक अन्य कहानी है-‘उजाले के द्वीप’। यह कहानी भी इकहरी और प्लेन नहीं है। कहानी में एक लकवाग्रस्त पिता है, उसकी देखभाल करती बेटी है, जो एक अस्पताल में नर्स है और सैमुअल टेल कॉलरिज की बहुचर्चित कविता है- द राइम ऑफ द एन्शिएंट मेरिनर। पाँच कहानियों के इस संग्रह में ‘मत्र्योश्का’ एक महत्वपूर्ण कहानी है। सपने से या मन की अँधेरी सुरंग से शुरू हुई यह कहानी धीरे-धीरे खुलती है और जब अंत तक पहुँचती है तो पाठक सन्न रह जाता है।

धुंध, धुधलापन, अस्पष्टता दिनेश की कहानियों को नये अर्थ देती है। ‘नीलोफ़र’ में नायक के इनर सेल्फ़ बाहर आता है और दोनों एक ही लड़की से प्रेम करते हुए प्रतीत होते हैं। दिनेश के इस संग्रह को पढ़कर लगता है कि वह चेतन, अवचेतन, स्वप्न और फंतासी की दुनिया में ही कहानियाँ तलाश करते हैं। लेकिन इस संग्रह को पढ़ना आपको निराश नहीं करेगा।
किताबः विज्ञापन वाली लड़की
लेखकः दिनेश श्रीनेत
प्रकाशकः भावना प्रकाशन
मूल्यः 200 रुपए
सतरूपाः पुरा और परिकथाओं के बीच जीवन
शिवेन्द्र को समकालीन हिन्दी कहानी का एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर माना जाता है। पहली बार उनके संग्रह की कहानियाँ पढ़ीं। पहली कहानी ‘जादू’ एक सरल और सहज कहानी है, जब चुम्बन जादू-सा लगता है (18वर्ष की उम्र में)। उनकी दूसरी कहानी ‘गेम’ ऐसी कहानी है जिसमें मोबाइल पर गेम न खेलने वाले को कमांडोज़ गोली मार देते हैं। यही वजह है कि सब अपने अपने मोबाइल में घुसे हैं- अपने आसपास की दुनिया से नावाकिफ़। कहानी की अन्तिम पंक्तियों में साफ़ लिखा है-देश में अब भी ‘गेम रूल’ चल रहा है। ज़ाहिर है ये गेम रूल सरकार द्वारा लागू किया गया है।
इसे पढ़कर मुझे अनायास इतालो काल्विनो की कहानी ‘अक्कड़ बक्कड़’ याद आ गई। इसमें एक ऐसा शहर है जहाँ हर चीज़ वर्जित है सिवाय ‘अक्कड़ बक्कड़’ गेम खेलने के। एक दिन शासक को लगा कि अब किसी चीज़ को वर्जित करना ज़रूरी नहीं है तो शहर में यह मुनादी की गई, अब आप कुछ भी कर सकते हैं। लोग फिर भी अक्कड़ बक्कड़ खेलते रहे। जब अक्कड़ बक्कड़ पर प्रतिबंध लगा दिया गया तो सारे बाशिंदे बग़ावत पर उतर आए और उन्होंने व्यवस्था के सभी लोगों को मार गिराया। शिवेन्द्र की कहानी मोबाइल गेम तो दिखाती है लेकिन वह इसकी परिणति तक नहीं पहुंचती।
‘ब्रेकअप टूल’ में शिवेन्द्र अपनी जाति बताकर प्यार से वंचित हो जाने वाले और सीवर में ही ज़िन्दगी खपा देने वाले दलित जीवन को चित्रित करते हैं। यहाँ नायक को एक ब्रेकअप टूल मिलता है ‘सीजेके’ (छोटी जात का) जिसके कह भर देने से ब्रेकअप हो जाता है। ‘लत’ में शिवेन्द्र सिगरेट और स्त्री की लत को दिखाते हैं, लेकिन यह लत पुराकथाओं तक जाती है, जहाँ नायक मृत्यु तक पहुँच जाता है। वह अपनी मृत्यु पर सब मित्रों-ख़ासकर लड़कियों को आमंत्रित करता है। क्या नायक का मृत्यु की ओर अग्रसर होना उसका अपराध बोध है? शिवेन्द्र की कहानियाँ सवाल खड़े करती हैं।
संग्रह में फणीश्वरनाथ रेणु की लाल पान की बेगम को आधार बनाकर लिखी गई एक कहानी है-क्वीन ऑफ हार्ट। रेणु की कहानी पढ़ी हुई थी तो इसे पढ़ने की इच्छा नहीं हुई। एक रात अचानक प्रधानमंत्री द्वारा की गई घोषणा के बाद लोग अचानक ‘जौम्बी’(जौम्बी का अर्थ है विवेकहीन, आप किसी ड्रग्स से या किसी निर्णय से जौम्बी बन सकते हैं) बनने लगे। बैंकों और एटीएम के पास उनकी भीड़ लगने लगी। यह कहानी कहीं न कहीं प्रधानमंत्री की उस घोषणा का विरोध करती है, जो उस रात की गई। पाठकों के लिए भी यह अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि घोषणा क्या थी।
संग्रह में दूसरों की आज़ादी छीनने वालों और आज़ादी चाहने वालों का संघर्ष सुनाई देता है। इस संग्रह को यह देखने के लिए भी पढ़ा जाना चाहिए कि कहानी में शिवेन्द्र की उपस्थिति का क्या अर्थ है।
पुस्तकः सतरूपा
लेखकः शिवेन्द्र
प्रकाशकः लोकभारती पेपरबैक्स
मूल्यः 299 रुपये
शिया बटर-कल्पना और फंतासी के बीच
जिन संग्रहों पर यहाँ बात की गई है उनमें सबसे युवा लेखक हैं क़ैफी हाशमी। महज़ 31वर्ष। लेकिन शिया बटर पढ़ने के बाद यह लगता उनका संग्रह एक आश्वस्ति देता है कि हिन्दी कहानी सही हाथों में है। उनके संग्रह की सभी कहानियाँ फैंटेसी और यथार्थ से बुनी गई है। उनकी लगभग हर कहानी यह संकेत भी देती है कि ये कहानियाँ नहीं हैं बल्कि अपने समय की आँख में आँख डालकर पूछे गए सवाल हैं। कैफ़ी की कहानियों की शैली और शिल्प किसी भी पाठक को चमत्कृत करता है।
बकौल उदय प्रकाश जब समय और वस्तुजगत को किसी भाषा में व्यक्त या उत्कीर्ण करने की तमाम प्रविधियाँ आजमाई जा चुकी हों और उनकी असफलताएं हर जगह दर्ज़ हो रही हों, ऐसे समय में कैफ़ी हाशमी का हिन्दी कहानी के परिक्षेत्र में आना किसी महत्वपूर्ण घटना की तरह है। एक घटना के तहत शुरुआती तीन कहानियाँ-कैनवास से दूर रहो पाओपाओ, दुनिया का पहला और आखिरी सवाल, कैफ़े काफ़ी डे-ही यह संकेत दे देती हैं कि कैफ़ी लीक से हटकर कहानीकार हैं।
पहली कहानी में पेंटर है, कैनवास है, रंग हैं, उदासी, निराशा और अवसाद है। इस सबके बीच कुछ रिलीफ़ देने वाली एक तलाक़शुदा महिला नीतू चौहान है। और है देशभक्ति पर पेंटिंग बनाने की मांग। नायक अंत में सारी पेंटिंग्स को आग लगा देना चाहता है। यह कहानी कला, कलाकार और सत्ता के आपसी रिश्तों को उघाड़ती है। दुनिया का पहला और आख़िरी सवाल, दुनिया की बेहतरी के लिए हर हाल में बदलाव की पैरोकार कहानी है।
एक जगह नायक कहता है, मैंने एक हाथ ज़मीन पर रखा और एक झटके में ज़मीन को उलट दिया। अब आसमान ऊपर था और ज़मीन नीचे। बदलाव की ऐसी ही इच्छा इस कहानीकार में दिखाई देती है। कैफ़े काफ़ी डे एक आत्मकथात्म कहानी है जिसमें मनुष्य से इतर किरदार भी हैं, जो सामाजिक-प्रशासनिकों का संकेत तो देते ही हैं साथ ही टेढ़े मेढ़े रास्तों से ग़ुज़रकर अंधेरों में उजालों की ओर ले जाने की वकालत करती है।

शीर्षक कहानी ‘शिया बटर’ अपने जल, जंगल और ज़मीन को बचाने के आदिवासियों के संघर्ष का जीवंत दस्तावेज है तो ‘बंकर’ रहस्य, रोमांच, विज्ञान, मनोविज्ञान और संवेदनात्मक छवियों का एक नया संसार पाठकों के सामने खोलती है। इस संग्रह को पढ़ना कहानी के शिल्प में अपने समय को पढ़ना है।
मुहावरे की मौत-यानी त्रासदी का सिद्धांत
अनुराग अनंत के संग्रह पढ़ने के बाद कहानियों के कुछ वाक्य ज़ेहन में रह जाते हैं। जैसेः किसी के होने से हम उसका होना नहीं समझते। किसी के ना होने से हम उसका होना समझते हैं। (त्रासदी का सिद्धांत), ग़ैर ज़रूरी लोगों के लिए प्रेम, भालू की तरह आता है। अपनी ही मस्ती में झूमते हुए (ग़ैर ज़रूरी कहानी)। दुनिया में हर कोई बेमेल जोड़ी चप्पलें पहने हुए घूम रहा है(सुधा-चन्दर और बरेली का झुमका)। दरअसल लगभग हर कहानी में इस तरह के वाक्य अनुराग के कहानियों के दर्शन को उजागर करते हैं। अनुराग प्लेन कहानियाँ नहीं लिखते।
पहली कहानी ‘त्रासदी का सिद्धांत’ लक्ष्मी नाम की एक वेश्या की खोज पर आधारित लगती है लेकिन यह कहानी उस त्रासदी की ओर इशारा करती है, जो कहता है कि किसी के ना होने से हम उसका होना समझते हैं। एक जगह लेखक लिखता है, सच कह रहा हूँ और सच मेरे जैसा ही अजीब होता है। बदबूदार, अन्धा और पागल। अनुराग की कई कहानियों में आत्मालाप की झलक दिखाई देती है, लगभग वैसी ही जैसी चीन के कथाकार लू शुन की कहानियों में दिखाई देती है।
‘मीरा, पिताजी और मासूम पेंटर’ एक ऐसे बच्चे की कहानी है, जिसके पिता ने दूसरी शादी की है। दूसरी माँ और पिता के बीच के सम्बंधों को बच्चा कैसे देखता है, यह वह अपनी चित्रकारी में दिखाता है। यहाँ अनुराग आत्मालाप की शैली से उतरते दिखाई दे रहे हैं। ‘एक ग़ैर ज़रूरी’ कहानी में वह पुनः आत्मालाप की तरफ़ लौटते हैं। अनुराग अपनी कहानियाँ बाहरी दुनिया से भी उठाते है। ‘ग्रांड ईवेंट’ में प्रेम है, दंगे हैं, समाज में बढ़ रही अंधभक्ति है और रंडी बाबा नाम से एक दिलचस्प किरदार है।

‘सुधा-चन्दर और बरेली का झुमका’ एक सामान्य कहानी है, इसमें अनुराग की कोई छाप दिखाई नहीं देती। शीर्षक कहानी ‘मुहावरे की मौत’ भेदभाव से उपजी त्रासदियों की मार्मिक कहानी है, कहानी कुछ कुछ फिल्मी अंदाज़ में ख़त्म होती है। अनुराग के इस संग्रह को इसलिए भी पढ़ा जाना चाहिए कि वह आने वाले समय के बड़े कहानीकार हो सकते हैं।
जिन कहानी संग्रहों पर यहाँ बात की गई है, मुझे लगता है कि 2026 में भी ये संग्रह अपनी जगह बनाए रखेंगे।
पुस्तकः मुहावरे की मौत
लेखकः अनुराग अनन्त
प्रकाशकः लोकभारती पेपरबैक्स
मूल्यः 299

