हिंदी में कथा साहित्य के विपुल भंडार को देखते हुए कथेतर साहित्य की दुनिया अब भी ख़ासी छोटी है। पढ़ने वालों का बड़ा तबक़ा है, जिसे कथेतर किताबों में गल्प जैसी रस की अनुभूति नहीं होती और शायद यह भी एक वजह है कि दूसरी विधाओं के मुक़ाबले हिंदी में कथेतर साहित्य बड़े संकोच से लिखा जाता रहा है। पिछली सदी में हिंदी में लिखी गई मौलिक कथेतर किताबों के नाम याद करने की कोशिश करेंगे तो शायद यह बात अतिरंजित न लगे। और जब मैं ऐसा कह रहा हूँ तो आशय अकादमिक विषयों पर लिखी गई विद्वानों की किताबों से हरगिज़ नहीं, आम पाठकों की दिलचस्पी वाले विषयों से हैं। नई सदी में ज़रूर यह जड़ता टूटती हुई मालूम देती है, मौलिक किताबों के साथ ही दूसरी भाषाओं, ख़ासकर अंग्रेज़ी, से तर्जुमा करके, आत्मकथा, संस्मरण, डायरी, निबंध, सफ़रनामा और दीगर विधाओं में हिंदी में तमाम किताबें आई हैं। इस लिहाज़ से देखें तो बीत रहे साल में कथेतर किताबों की दुनिया थोड़ी और समृद्ध हुई हैं। हालाँकि इस बरस जो किताबें मैं पढ़ सका, उनमें ज़्यादातर अनुवाद ही हैं, पर मुझे इसलिए भी मानीख़ेज़ लगी हैं कि वे मूल ज़बान में ही रह जातीं तो कौन जाने मैं या मेरे जैसे बेशुमार लोग उन्हें कभी पढ़ भी पाते या नहीं।
अक्षय बहिबाला की किताब की किताब ‘भाँग जर्नीज़ः स्टोरीज़, मिस्ट्रीज़, ट्रिप्स एण्ड ट्रेवेल्स’ को ही लें. इसका अंग्रेज़ी शीर्षक पढ़कर, अपनी तरह की इस अनूठी किताब को, मालूम नहीं पढ़ने के लिए चुनता या नहीं मगर हिंदी में जब यह ‘रसभांगः क़िस्से, इतिहास, मौज और सफ़र’ के नाम से आई तो सबसे पहले इसके शीर्षक ने ही ध्यान खींचा. यह किताब भाँग, अफ़ीम और गाँजा जैसे नशे के सामान की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं और उनके इतिहास के साथ ही अक्षय के व्यक्तिगत अनुभवों की डायरी भी है। जो लोग कुँभ के मेले में गए हैं, वे जानते होंगे कि गाँजे की चिलम किसी जटाधारी साधु के हाथ में हो तो पुलिस वाले भी उन्हें हाथ जोड़कर आगे बढ़ जाते हैं, वैसे किसी को हिरासत में लेने के लिए मालखाने में रखी गाँजे की पुड़िया पुलिस के बड़े काम आती है। शिवरात्रि के मौक़े पर जो भाँग भोले बाबा का प्रसाद है, आम दिनों में वही वर्जित द्रव्य हो जाती है। प्रयाग में लोकनाथ के इलाक़े में कभी खुले आम मिल जाने वाली भाँग की ठंडाई और मुनक्का अब अप्राप्य है, हालाँकि ढलती दुपहरी में तीर्थ पुरोहित अब भी भाँग घोंटते-छानते ही हैं। नशे पर निषेध के हमारे पैमाने अजब-गजब हैं। पिछली सदी में हिप्पियों की बड़े पैमाने पर हिंदुस्तान में आवाजाही, देशी नौजवानों में उनकी नक़ल करने की होड़ और इसके नतीजे समाजशास्त्रीय अध्ययन का विषय भले ही हो, पर नशे के कारोबार में इज़ाफ़े की बात तो ज़माने को मालूम है।

तो अक्षय की यह किताब ओडिशा में क़रीब से देखी-समझी हुई नशे की दुनिया का ऐसा आख्यान है, जिसमें हैरतअंगेज़ तफ़्सील है, स्मृतियाँ हैं, इतिहास के दिलचस्प क़िस्से हैं, सफ़र के ब्यौरे हैं, नशे के कारोबार का तंत्र, किसानों और तस्करों के क़िस्से हैं, आंकड़े और तथ्य जुटाने के लिए जोख़िम भरा फ़ील्ड वर्क है और इन सबको पेश करने की ऐसी दिलचस्प कहन है कि पढ़ते-पढ़ते यह नशे का उत्सव मालूम होने लगता है। वह ख़ुद दस बरस तक इस उत्सव का हिस्सा बने रहे, तो इस सपनीली दुनिया के मज़े और ख़ूबियों का बयान करते हुए उनकी किताब ख़बरदार भी करती है। यह ऐसी चेतावनी है, जो नशे की पुड़िया पर लिखी हुई नहीं मिलती क्योंकि नशे का सामान तो पुराने अख़बार के टुकड़े में लिपटा हुआ मिलता है।
एक आम पाठक के तौर पर मैं आलोचना के विषय कम ही साध पाता हूं, यह विधा मुझे विद्वानों का अकादमिक विमर्श ज़्यादा लगती है। हाल ही में आई प्रो.पुरुषोत्तम अग्रवाल और डेविड एन. लॉरेंजन की किताब ‘जन गोपालः संत दादू के जीवनीकार’ मेरी अपनी इस समझ को ख़ारिज करती है। ‘सो सेज़ जन गोपालः द लाइफ़ ऑफ़ अ भक्ति पोएट ऑफ़ अर्ली मॉडर्न इंडिया’ का यह अनुवाद अशोक कुमार ने किया है। संत दादू दयाल की जीवनी लिखने वाले उनके शिष्य जन गोपाल और उनके काम पर केंद्रित यह गहन अध्ययन कई अर्थों में अपूर्व है और बहुत अहम भी। निर्गुणपंथ के महत्वपूर्ण संत दादू की जीवन लीला और जन गोपाल की दूसरी रचनाओं की मीमांसा करते हुए यह किताब जन गोपाल की शख़्सियत, उनके कृतित्व, काव्य-संवेदना और प्रगतिशीलता को रेखांकित करती है, साथ ही भक्ति परंपरा में उनके महत्व की शिनाख़्त भी करती है। यह औपनिवेशिक दौर की उस मान्यता का खंडन भी करती है जो, बक़ौल प्रो.अग्रवाल, यह यक़ीन दिलाती आई कि भारतीय प्रतिभा की श्रेष्ठ अभिव्यक्ति या तो संस्कृत में हुई है या फ़ारसी-अरबी में और इस विश्वास के चलते देशज भाषाओं की रचनाओं को दोयम दर्जे का मानकर उनकी उपेक्षा की जाती रही। जनगोपाल ने जिन पौराणिक गाथाओं की पुनर्रचना करके उन्हें समकालीन नैतिकता से जोड़ा, हिंदी में उनकी व्याख्या के साथ ही मूल जड़भरत चरित्र, ध्रुव चरित्र और प्रह्लाद चरित्र किताब में शामिल हैं। निर्गुण भक्ति परम्परा के अध्येताओं के लिए यह महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ भी है।

अपनी हिमालय की यात्राओं के बारे में डॉ. अजय सोडानी काफ़ी पहले से लिखते आ रहे हैं। उनके सफ़रनामों की इसी कड़ी की नई किताब ‘एक था जाँस्कर’ है. उनके यात्रा वृतांतों में ‘मैं’ के बजाय ‘हम’ के तजुर्बे दर्ज होते हैं। यानी वह जहाँ होते हैं, वहाँ के लोग, उनकी ज़िंदगी, संस्कृति और इतिहास, प्रकृति, पेड़, पहाड़, परिंदे और जानवर पूरी संवेदना के साथ सफ़र के ब्यौरे का हिस्सा बनते हैं, आत्मचिंतन और सांस्कृतिक अंतर्दृष्टि बराबर साथ चलती है। और इस तरह ये वृतांत किसी सैलानी के सपाट बयान की तरह नहीं, एक चिंतनशील-जिज्ञासु-तार्किक घुमक्कड़ के सरोकारों का आईना बनकर पाठकों के बीच आते हैं. जाँस्कर घाटी के अपने इस सफ़र में भी वे जगह-जगह इतिहास, धर्म-शास्त्र, साहित्य और पुरातत्व के अर्थपूर्ण संदर्भ देकर अपने अनुभव साझा करते हैं, पर्यटन की ख़ातिर होने वाले विकास और हिमालय पर आसन्न ख़तरों को विज्ञान की कसौटी पर जाँचते हैं, तर्क देते हैं, और कितनी ही लोक-कथाओं और आख्यानों का हवाला देकर पढ़ने वालों को समृद्ध करते चलते हैं। वह ऐसा बहुत कुछ दिखाते हैं, जो मंज़र में कहीं नहीं है। उनकी भाषा का जादू और प्रवाह आद्योपांत पढ़ने के लिए उकसाता है.श। और यह सब मिलकर ‘एक था जाँस्कर’ को हमारे दौर की हक़ीक़त का प्रामाणिक दस्तावेज़ बनाते हैं।

जॉन बर्जर की किताब ‘वेज़ ऑफ़ सीइंग’ कला और छवियों की दुनिया के निहितार्थ समझने के कुछ मौलिक सूत्र देती है, और बहुतेरी कला मान्यताओं के पीछे देखने की दृष्टि भी। पाँच दशकों से ज़्यादा समय से कला की दुनिया में बर्जर की वैचारिकी बहसों और आलोचनाओं के केंद्र में रही है. हिंदी में यह किताब ‘देखने के तरीक़े’ नाम से आई है। आशीष मिश्र का यह अनुवाद पढ़ना सचमुच सुखद है, पर यह बात कम हैरान नहीं करती कि इसके अनुवाद में भला आधी सदी का वक़्त क्यों लग गया। हालाँकि देर आयद दुरुस्त आयद। सात निबंधों का यह संग्रह पेंटिग्ज़, फ़ोटोग्राफ़ और विज्ञापनों के हवाले से यूरोप में कला और पूँजीवाद के रिश्तों की पड़ताल के साथ ही यह भी रेखांकित करता है कि कला ने किस तरह पूँजी, ताक़त और विचारधाराओं को जायज़ ठहराने का काम किया।

आज के दौर में जब दृश्य माध्यमों की मार्फ़त अतिश्योक्ति और दुष्प्रचार चरम पर है, इंसानी विवेक और समझ पर कृत्रिम बुद्धि के हमले हैं, ताक़तवर अभिजात तबक़ा अपना स्वार्थ साधने की नीयत से इन माध्यमों का धुंआधार इस्तेमाल करने में जुटा पड़ा है, यह किताब चाक्षुष साक्षरता मज़बूत करने और ऐसी नज़र पैदा करने की उम्मीद जगाती है, जो छद्म आवरण के पीछे छिपे पाखंड को पहचान सके।
रस्किन बॉन्ड की आत्मकथा ‘लोन फ़ॉक्स डांसिंग’ का हिंदी अनुवाद ‘अपनी धुन में’ के नाम से आया है. यह एक ज़िंदादिल, जुझारू और कल्पनाओं के चितेरे हिंदुस्तानी की ज़िंदगी का दिल-फ़रेब बयान है, लेखक के तौर पर, जो हर पढ़ने वाले को अपना-सा लगता है। वह अंग्रेज़ी में लिखते ज़रूर हैं मगर हिंदी में पढ़ने वालों के भी उतने ही अज़ीज़ हैं। ‘अपनी धुन में’ उनकी कहानियों की तरह ही दिलचस्प है। अपनी ज़िंदगी की कहानी सुनाते हुए भी वह चौंकाते हैं, भावुक करते हैं, हाज़िरजवाबी के अपने हुनर से गुदगुदाते हैं, रहस्य रचते हैं, पर्दाफ़ाश करते हैं। और बड़ी साफ़गोई से अपना मन खोलकर पढ़ने वालों के आगे पेश करते हुए यह डिस्क्लेमर भी दर्ज कर देते हैं कि ज़रूरी नहीं कि ज़िंदगी का हर कोना-अंतरा साझा करने के लायक़ ही हो।

‘अपनी धुन में’ पढ़ते हुए लेखन के उनके विपुल और समृद्ध संसार को समझने के बहुतेरे सूत्र मिलते जाते हैं, और जहाँ-तहाँ डेजा वू की जो अनुभूति होती है, उसका उत्स दरअसल उनका साहित्य ही है। बहुतेरे जिज्ञासु पाठकों को रस्किन के ताउम्र कुँवारे रह जाने की वजहों का पता भी इन पन्नों में मिल जाता है।
‘यूँ गुज़री है अब तलक’ थिएटर और टेलीविज़न की दुनिया की जाने-मानी शख़्सियत सीमा कपूर की आत्मकथा है। उनकी ज़िंदगी के उतार-चढ़ाव के साथ ही इस किताब में कितने ही नामालूम से गाँवों-क़स्बों की समाजी ज़िंदगी और वहाँ के लोगों के किरदार की झाँकी है, कुदरती नज़ारों की तस्वीरें हैं, नौटंकी का इतिहास है, फ़िल्म और रंगमंच का अंतरंग संसार है, बहुतेरे पहचाने हुए चेहरों की ज़िंदगी के अनदेखे पहलुओं की तफ़्सील है। और इसकी कहन और बुनावट किसी उपन्यास जैसी ही है। ओम पुरी की ब्याहता रहीं सीमा कपूर ने अपने अलगाव के हालात पर भी विस्तार और बेबाक़ी से लिखा है। उनकी साफ़गोई और भाषा इस किताब की बड़ी ताक़त हैं।

आज़ाद भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की ज़ाती और सियासी ज़िंदगी के बारे में तमाम किताबें हैं। इस लिहाज़ से एस. इरफ़ान हबीब की लिखी आज़ाद की जीवनी मुझे कई मायनों में अलग और आज के दौर में प्रासंगिक भी लगी। ‘मौलाना आज़ादः एक जीवनी’ इसी का हिंदी तर्जुमा है, जो कमोबेश उनकी शख़्सियत के हर पहलू पर ग़ौर करती है—अख़बारनवीस, अदीब, इस्लामी विद्वान, राष्ट्रवादी, विचारक, दार्शनिक और दूरदृष्टा—और उन हालात, सोहबतों और अध्ययन के बारे में बताती है, जिसने आज़ाद का मानस और किरदार गढ़ा। हमारे दौर के राष्ट्रवाद के हल्ले में मौलाना आज़ाद का नज़रिया और उनकी दलीलें किसी खोई हुई नज़ीर की तरह सामने आती हैं। तर्जुमान अल-क़ुरआन के हवाले से आज़ाद के आलोचनात्मक चिंतन और ग़ुबार-ए-ख़ातिर के हवाले से उनके दार्शनिक विचारों पर रौशनी डालती है। तालीम और वैज्ञानिक नज़रिये के हामी आज़ाद ने सांस्कृतिक पुनर्निर्माण और बहुलतावादी लोकाचार का जो सपना देखा, आज़ाद हिंदुस्तान में उसे साकार की उनकी कोशिशों की मुख़्तसर झाँकी भी इस किताब में मिलती है।

देश का बँटवारा हुए 78 साल बीत गए, निर्वासन और विस्थापन की झँझा झेलने वाली पीढ़ी भी गुज़र गई, मगर उसका दर्द कुछ ऐसा है, जो नहीं जाता. ‘स्मृति और दंशः विभाजन, निरंतरता और तीसरी पीढ़ी’ की लेखक बलवन्त कौर, ओरहन पामुक के हवाले से कहती भी हैं, ‘हम दर्द को तभी सह सकते हैं जब हमारे पास उसकी याद दिलाने वाली कोई चीज़ हो।’ और अपने ही मुल्क में शरणार्थी बनकर आए एक बड़े तबक़े के लिए यही जख़्म क्या कम थे, कि सियासत ने उन्हें बँटवारे की उस हैवानियत और बर्बरता के मंज़र भी भूलने न दिए, और वही सब इतनी बार दोहराया गया कि कुछ समुदायों और लोगों के लिए उजाड़े जाने का वह साल जैसे ख़त्म ही नहीं हुआ। 1984 से लेकर 2002 तक वे वैसी ही त्रासदी की निरंतरता का शिकार बार-बार होते रहे। यह किताब बँटवारे और दंगे के शिकार लोगों की बाद की पीढ़ियों में जीवित स्मृतियों का ऐसा दस्तावेज़ है, जिसमें आत्मकथा, संस्मरण, समाजशास्त्र, इतिहास, साहित्य और संस्कृति के मिले-जुले संदर्भ इसी सामूहिक दर्द को रेखांकित करते हैं, मुखर स्वर देते हैं। पन्नों से निकलकर यही स्वर पिघलाते हैं, झिंझोड़ते हैं, खीझ और क्षोभ पैदा करते हैं, बेचैन करते हैं और चेतना में कुछ इस तरह पैवस्त हो जाते हैं कि किताब पूरी हो जाने के बाद भी आपका पीछा नहीं छोड़ते, कचोटते रहते हैं।

रंगमंच और कला की दुनिया की क़द्दावर शख़्सियत इब्राहम अलक़ाज़ी और एलेक पद्मसी के नाम-काम पर अंग्रेज़ी में ख़ूब लिखा-पढ़ा जाता रहा है, पर उन्हें जानने-समझने वालों के लिए हिंदी में बहुत कुछ उपलब्ध नहीं है। फ़ैसल अलक़ाज़ी की चार बरस पहले लिखी किताब ‘एंटर स्टेज राईट’ का हिंदी में आना इस ख़ला को पूरा करने वाला है। ‘मंच प्रवेश’ नाम से यह अनुवाद नाट्य आलोचक अमितेश कुमार ने किया है, और मूल किताब के भाव और प्रवाह को सहजते हुए बड़े जतन किया है। वैसे तो किताब का उपशीर्षक अलकाज़ी/ पद्मसी परिवार की यादें हैं, पर फ़ैसल अलक़ाज़ी इन यादों में ख़ूबियों और ख़ामियों को रेखांकित करते हुए अतीत में फिर से झांकते हैं ताकि यह समझा सकें कि संस्कृतियों के बीच सूक्ष्म और असरदार बातचीत इतिहास को कैसे प्रभावित करती है और वर्तमान को गढ़ती है। ये संस्मरण रंगमंच और कला की ऐतिहासिक और समकालीन चिंताओं से बनी एक ऐसी दुनिया उजागर करते हैं, जो तजुर्बों के गहरे व्यक्तिगत और व्यापक सामाजिक पहलुओं में बसी हुई है। गुज़रे ज़माने की बंबई और दिल्ली में विकसित होती थिएटर और कला की दुनिया के साथ ही यह किताब इन शहरों के खान-पान और मौसमों की ख़ुशबू भी समेटे हुए है, बहुतेरे ख्यात कलाकारों के संघर्षों और उनकी प्रतिबद्धताओं से भी परिचित कराती है।

तंजावुर और चेन्नै के मृदंगम कारीगरों की ज़िंदगी और इतिहास के बारे में टी.एम. कृष्णा की किताब ‘सेबस्टियन एंड संस’ का अनुवाद यक़ीनन इस साल की यादगार किताबों में से एक है। अपनी अनूठी और असरदार ध्वनि की वजह से कर्नाटक संगीत के ताल वाद्यों में मृदंगम की हैसियत बादशाह सरीखी होती है, और मृदंगमवादक का रुतबा भी ख़ासा ऊँचा होता है, मगर मृदंगम बनाने वालों को भला कौन जानता है? कृष्णा का यह विस्तृत और शानदार शोध हमें इन्हीं कारीगरों के हुनर, उनकी ज़िंदगी, उनके तजुर्बों और उनके इतिहास से रूबरू कराता है। इनमें से ज़्यादातर कारीगर दलित हैं और इन नाते संगीत की बिरादरी में हाशिये पर ही रहे हैं। मृदंगम बनाने के श्रमसाध्य तरीक़े के साथ ही किताब हमें उनके व्यक्तिगत और सामाजिक संघर्षों का पता देती है, पुरुषों तक सीमित रहे इस हुनर में महिलाओं की भागीदारी के बारे में बताती है, आंध्र प्रदेश में विजयवाड़ा और विजयनगरम की मृदंगम परम्परा के बारे में भी संक्षेप में बताती है। इसका हिंदी अनुवाद निधीश त्यागी ने किया है।

अपनी किताब ‘सीपियाँ’ में जावेद अख़्तर ने कबीर, तुलसी, रहीम और वृंद के चुनींदा 89 दोहों की बड़ी दिलचस्प और आमफ़हम व्याख्या की है। किताब की प्रस्तावना में सांस्कृतिक बोध का हवाला देते हुए प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं कि कुछ तो दोहों की भाषा और कुछ सामाजिक संदर्भों में आए बदलावों की वजह से बहुतेरे लोगों को दोहे समझने में मुश्किल पेश आ सकती है, जावेद अख़्तर ने रोज़मर्रा की ज़िंदगी के अनुभवों के हवाले से दोहों के गूढ़ार्थ बोलबाल की ज़बान में समझाए हैं। यह किताब एक टेलीविज़न शो में की हुई बातों का संग्रह है, तो इसकी भाषा में ख़ास तरह की रवानी और रस है, जैसा कि हम उन्हें सुनते हुए पाते हैं।

‘राग जौनपुरी’ अजय कुमार के लेखों और संस्मरणों का ऐसा संग्रह है, जिसमें शहर जौनपुर की तहज़ीब, वहाँ के ख़ास-ओ-आम लोगों, रवायतों, साहित्य, इतिहास, वास्तुकला, गली-मोहल्लों को बड़े दिलकश ढंग से दर्ज किया गया है। बरसों पहले शहर पर केंद्रित उनकी ऐसी ही एक किताब ‘लाल कोठी का सन्नाटा’ नाम से छपी थी। ‘राग जौनपुरी’ में उस किताब के कुछ क़िस्से शामिल हैं, पर अपने शहर को वह जितनी शिद्दत से महसूस करते और प्यार करते थे, उनके पास क़िस्सों का अक्षय भंडार था, क़िस्सा कहने का उनका ढंग निराला था, इसकी बानगी इस किताब में मिलती भी है. किताब नवारुण प्रकाशन ने छापी है।
कुछ किताबें जो अभी पढ़नी बाक़ी हैं, वे हैं- मधु कांकरिया का यात्रा वृतांत ‘मेरी ढाका डायरी’, कैलाश सत्यार्थी की आत्मकथा ‘दियासलाई’, प्रो.बद्रीनारायण की किताब का रमाशंकर सिंह का किया हुआ अनुवाद ‘हिंदुत्व का गणराज्य’, और पिछली साल के आख़िर में आई अनिमेष मुखर्जी की किताब ठाकुरबाड़ीः गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर का कुटंब वृतांत है। यह एक संयोग ही है कि राग जौनपुरी के सिवाय बाक़ी जिन किताबों पर यहाँ बात की गई है, वे सभी राजकमल प्रकाशन से छपी हैं।

