यह साल भी बीत गया कुछ खट्टी मीठी यादों को लेकर। देश-दुनिया में अनेक घटनाएं दर्ज की गईं पर साहित्य की दुनिया में क्या-क्या हुआ, यह जानना कुछ कम दिलचस्प नहीं होगा। इससे हिंदी की दुनिया की हलचलों और गहमागहमी का पता तो चलेगा ही, परिदृश्य भी समझ में आएगा और एक लेखा जोखा भी सामने होगा।
वर्ष 2025 की प्रमुख साहित्यिक घटनाएं
वर्ष 2025 की प्रमुख साहित्यिक घटनाओं को याद करें तो हिंदी की दुनिया के अनेक रंग, अनेक छवियाँ और अनेक स्वर मिलेंगे।
‘जाना’, हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है’…
इस साल हिंदी जगत के लिए सबसे बड़ी क्षति तीन प्रमुख हस्तियों का जाना रहा। हिंदी की सबसे पुरानी सक्रिय पीढ़ी के लोग एक-एक करके अब विदा ले रहे हैं।
लगता है हिन्दी की दुनिया अब ख़ाली होती जा रही है। नामवर सिंह राजेन्द्र यादव निर्मल वर्मा और कुंवर नारायण के जाने से यह दुनिया वैसे पहले ही खाली हो गयी थी। 101 वसंत देख चुके हिंदी के प्रसिद्ध लेखक रामदरश मिश्र ने पहले अलविदा कहा तो दिसम्बर के अंतिम सप्ताह में विनोद कुमार शुक्ल भी नहीं रहे। इससे कुछ दिन पूर्व ही 90 वर्षीय राजी सेठ भी नहीं रही। इन तीनों लेखकों ने हिंदी को कविता,कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में बहुत कुछ दिया, जिससे हिंदी साहित्य समृद्ध हुआ है।
इससे पहले अप्रैल में हिंदी की प्रख्यात आलोचक निर्मला जैन नहीं रहीं। उनक़ा जाना स्त्री आलोचना के स्तम्भ का गिरना है।

इनके बाद की पीढ़ी के लेखकों में नारायण सिंह, कथकार अवधेश प्रीत और नवें दशक के कवि नासिर अहमद सिकन्दर भी इस साल हमसे विदा ले गए। इस तरह उन 6 प्रमुख लेखकों से हिंदी जगत अब वंचित हो गया है, जिसने हिंदी की दुनिया का विस्तार किया।
इस साल एक महत्वपूर्ण घटना यह रही कि पटना पुस्तक मेले को अवधेश प्रीत की स्मृति मे समर्पित किया गया।
साहित्य अकादमी पुरस्कार की घोषणा रद्द
साहित्य की दुनिया मे इस साल सबसे बड़ी घटना यह हुई कि सरकार ने साहित्य अकादमी पुरस्कार की घोषणा ही रोक दी। गत 75 वर्षों में यह पहली घटना है जब सारे अवार्ड रोक दिये गए। इस घटना के अब दो सप्ताह बीत रहे पर कोई घोषणा नहीं आई। ऐसा इस देश में पहले कभी नहीं हुआ। इसका अर्थ यह हुआ कि सरकार अब मीडिया और संवैधानिक संस्थाओं को ही नहीं साहित्यिक संस्थाओं को भी अपने कब्जे में लेना चाहती है। क्या वह पद्म सम्मान की तरह साहित्य के पुरस्कारों के चयन भी खुद करना चाहती है? सोशल मीडिया पर लेखकों ने विरोध तो किया पर उससे कुछ अधिक संभव नहीं हो सका।
कई लेखकों ने इस मुद्दे पर चुप्पी ही लगा ली। अभी तक तो लेखक संगठन भी खुल कर सामने नही आए।
इस साल विनोद कुमार शुक्ल को 30 लाख की रॉयल्टी मिलना भी एक बड़ी और ऐतिहासिक घटना रही।इतनी बड़ी रकम किसी लेखक को रॉयल्टी के रूप में आजतक नहीं मिली। इससे हिंदी में एक उम्मीद जगी है पर रायपुर में जिस तरह हिंदी युग्म का आयोजन हुआ उसको लेकर सवाल भी उठे।
लेखकों की जन्मशती
1947 में लेस्बियन रिश्तों पर एकाकिनी नामक पहला उपन्यास लिखनेवाली आशा सहाय का भी यह जन्मशती वर्ष रहा पर किसी ने उनकी सुध नहीं ली।
इस वर्ष विजय देव नारायण साही, धर्मवीर भारती, मोहन राकेश, नंद चतुर्वेदी, अमरकांत, नामवर सिंह, विद्यानिवास मिश्र, ठाकुर प्रसाद सिंह, गोपेश जी की जन्मशातियाँ भी मनाई गई। कई शहरों में कई आयोजन हुए।
विशेषांक
मोहन राकेश, विजयदेव नारायण साही, कृष्णा सोबती की जन्मशती पर पत्रिकाओं के उन पर केंद्रित अंक निकले। इस साल कथादेश, सृजन सरोकार, स्त्रीलेखा, प्रयाग पथ, वागर्थ, साखी, बनास जन के विशेषांक भी आये।
इस साल वयोवृद्ध आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी पर पाखी पत्रिका का अंक निकला, जो इस साल की महत्वपूर्ण घटना रही।पत्रिकाओं में बनास जन ने पंकज मित्र पर अंक निकाला।
इस साल कविता कृष्णपल्लवी का अन्वेषा कविता अंक भी चर्चा में रहा।
इस साल उद्भावना पत्रिका ने मंगलेश डबराल पर एक महत्वपूर्ण अंक निकाला और उस पर चर्चा भी आयोजित की गई।
अशोक मिश्र ने विभूति नारायण राय पर अपनी पत्रिका का अंक निकाला।
इस साल आलोचना पत्रिका का कविता अंक विवादों में रहा। कवियों के चयन को लेकर हिंदी जगत में विवाद हुए। कृष्ण कल्पित ने इस मुद्दे को उठाया जिस पर आशुतोष कुमार के साथ लोगों की काफी नोंकझोंक होती रही।
पुरस्कार
पुरस्कारों की दृष्टि से देखें तो मैत्रेयी पुष्पा को इफ्को सम्मान मिलना इस साल की बड़ी घटना रही। उनका लेखन ग्रामीण कथा और किसान चेतना से भले ही जुड़ा रहा हो पर उनकी स्त्रियां हमेशा सचेत, बहिर्मुखी और समाज-चेता रही हैं। वे देर से चुनी गईं।

इफ्को अवार्ड की चयन समिति भी अब काफी बदल गयी है पर उनके इस निर्णय का सबने खुले दिल से स्वागत किया, इस पुरस्कार को लेकर किसी ने कोई आपत्ति नहीं जताई, जैसा कि आमतौर पर होता रहा है। युवा इफको सम्मान लेखक और ऑर्गेनिक खेती से जुड़ी अंकिता जैन को मिला।
बिहार में विश्वनाथ त्रिपाठी को 6 लाख रुपए का राजेन्द्र शिखर सम्मान मिला तो महेंद्र मधुकर, आनंद कुमार , हृषिकेश सुलभ, वंदना राग, शिवनारायण आदि को भी अवार्ड मिले। वरिष्ठ कवि विमल कुमार ने 4 लाख का दिनकर पुरस्कार लौटा दिया।
कवयित्री जसिंता करकेंटा को बैंगलुरु में ‘अज्ञेय शब्द शिखर सम्मान’ मिला तो पटना में मिथिलेश प्रियदर्शी को ‘जानकी पुल, शशिभूषण द्विवेदी पुरस्कार मिला। युवा कवयित्री अनुराधा सिंह को केदारनाथ अग्रवाल पुरस्कार मिला।
हिंदी की दुनिया में पुरस्कारों की धूमिल होती छवि के बीच युवा कवयित्री प्रिया वर्मा और देवेश पथ सरिया समेत तीन कवियों को ‘भारत भूषण अग्रवाल’ पुरस्कार प्रदान किया गया।
कोलकत्ता में हिंदी मेले में वरिष्ठ आलोचक गोपेश्वर सिंह को ‘कल्याणमल लोढ़ा अवार्ड’ से और सबलोग पत्रिका के संपादक किशन कालजयी को ‘जुगल किशोर शुक्ल अवार्ड’ से सम्मानित किया गया।
भोपाल में विष्णु नागर को ‘भवभूति अलंकरण’ दिया गया। साल के अंत में भोपाल में ही उदयप्रकाश को दुष्यंत अलंकरण मिला। इस वर्ष दुष्यंत कुमार की 50 वीं पुण्यतिथि भी मनाई गई।
कुछ महत्वपूर्ण घोषणाएं
विनोद कुमार शुक्ल की स्मृति में ‘आज की जनधारा’ ने एक लाख रुपए का पुरस्कार शुरू किए जाने की घोषणा शुरू की।
अखिल भारतीय शिक्षा बोर्ड नामक संस्था ने भी एक लखटकिया पुरस्कार शुरू किया। रामदरश मिश्र की स्मृति में यह पुरस्कार दिया जाएगा।
इस साल श्रीकांत वर्मा के पुत्र ने भी अपने पिता की स्मृति में कई लखटकिया अवार्ड की घोषणा की।
लिट फेस्ट का साल
गत वर्षों की तरह इस साल भी लिट् फेस्ट की भी बाढ़ रही। आजतक के साहित्य महोत्सव में फिल्मों से जुड़े लोग इस वर्ष भी आये। गत वर्ष कुछ लेखकों ने बहिष्कार भी किया था पर इस साल नहीं हुआ। बनारस, गाजीपुर, देहरादून, भुवनेश्वर, इटानगर, जैसे अनेक शहरों में लिट् फेस्ट हुए।
साहित्य के लिए दूसरी चिंता यह देखी गयी कि अब बाजार औऱ मार्केटिंग ने साहित्य को इवेंट में बदल दिया है तथा प्रतिगामी ताकतें हमारे लेखकों को कब्जा कर रही हैं। विनोद कुमार शुक्ल के आयोजन में रमन सिंह की उपस्थिति औऱ प्रधानमंत्री द्वारा रायपुर जाकर फ़ोन से उनक़ा हालचाल पूछना इसकी ही कवायद है।
लेखक संगठन की भूमिका
लेखक संगठनों की दृष्टि से भी यह साल महत्वपूर्ण रहा। वरिष्ठ आलोचक चंचल चौहान जलेस के अध्यक्ष बने तो प्रसिद्ध आलोचक नलिन रंजन सिंह महासचिव हुए।
जन संस्कृति मंच भी इस साल सक्रिय रहा और मंनोज कुमार सिंह इसके नए महासचिव बने।
इस बीच मदन कश्यप ने लेखक संगठनों की प्रासंगिकता पर सवाल खड़ा कर एक बहस को शुरू करने की कोशिश की लेकिन यह बहस किन्हीं कारणों से आगे नहीं बढ़ी।
आयोजन
प्रख्यात कवि आलोचक संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी ने 9 दिसम्बर को पहला रामेश्वरी नेहरू व्याख्यान दिया। उन्होंने संगीत से स्त्री सशक्तीकरण विषय पर व्याख्यान दिया।
आयोजनों में कोलकत्ता में 31वाँ हिंदी मेला उल्लेखनीय घटना रही तो शेखर पाठक को अयोध्या प्रसाद खत्री पुरस्कार मिंलना भी उल्लेखनीय घटना रही।

भारतीय भाषा परिषद, डॉक्टर शंभूनाथ एवम संजय जायसवाल वर्षों से कोलकत्ता औऱ हावड़ा में साहित्य के लिए बढ़िया काम कर रहे। रजा फाउंडेशन ने भी कई आयोजन किये।
नलिन रंजन सिंह ने “कविता की जमीन” नाम से कई समारोह किये तो उन्हीं के निर्देशन में ‘जनवादी लेखक संघ, लखनऊ के द्वारा 11-12 अक्टूबर 2025 को कार्यक्रम ‘रच रही हैं वे’ भी सम्पन्न हुआ। यह कार्यक्रम सिर्फ स्त्रियों के सृजनशीलता पर केंद्रित नहीं था बल्कि इसका संचालन, संयोजन, व्यवस्था सभी कुछ स्त्रियों ने ही किया।
जसम ने वीरेनियत 7 का आयोजन किया। वीरेनियत अब युवा लोगों का प्रिय आयोजन हो चला है।
आरा में रज़ा फाउंडेशन की मदद से बिहार में नवजागरण पर सेमिनार आयोजित हुआ। इस साल आरा नागरी प्रचारिणी सभा के 125 साल पूरे हो रहे हैं। यह पहला अवसर है जब बिहार में नवजागरण पर चर्चा शुरू हुई है।यह आयोजन बिहार नवजागरण के अग्रदूत शिवपूजन सहाय की 132 वीं जयंती पर किया गया।

इस साल प्रेमचन्द के उपन्यास, ‘रंगभूमि’ के प्रकाशन के सौ साल हो गए। इसको लेकर बनारस में आयोजन हुए।
बनारस में गज़लों पर 5 दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी भी हुई।
इलाहाबाद में वहां के विश्स्त्रीवविद्यालय द्वारा स्त्री। विमर्श पर केंद्रित एक सार्थक दो दिवसीय आयोजन हुआ।
दिल्ली में हंस ने भी अपना सालाना जलसा किया।
पिछले दिनों ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता के. संतोष और वरिष्ठ लेखक रणेन्द्र ने मिलकर एक अलहदा कार्यक्रम की परिकल्पना की। जिसका प्रारूप था, दिल्ली में एक ऐसी दो दिवसीय कार्यशाला, जिसमें मुख्य वक्ता हों भिन्न क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिक, मजदूर कार्यकर्ता, घरेलू कामगार आदि और श्रोता हों हिंदी के लेखक। गत 27 और 28 दिसम्बर को यह कार्यक्रम दिल्ली के हरकिशन सिंह सुरजीत भवन में आयोजित की गई।
भारतीय भाषा परिषद, डॉक्टर शंभूनाथ एवम संजय जायसवाल वर्षों से कोलकत्ता औऱ हावड़ा में साहित्य के लिए बढ़िया काम कर रहे। रजा फाउंडेशन ने भी कई आयोजन किये। शांति निकेतन में संगमन और लखनऊ में कथाक्रम के आयोजन यादगार रहे।
वाद-विवाद
इस साल की एक उल्लेखनीय घटना यह रही कि यशस्वी लेखक ज्ञान रंजन 90 वर्ष के हुए तो विभूति नारायण राय 75 साल के हुए। मुम्बई में कथाकार धीरेंद्र अस्थाना ने अपना 70 वाँ जन्म दिन मनाया।
संगत के इन्टरव्यू की श्रृंखला सौ कडियों के बाद इस साल समाप्त हो गयी।अंतिम कड़ी में ज्ञान जी से बातचीत थी जिसमें ज्ञान जी के जबाबों के कारण हिंदी जगत में विवाद हो गया।

तद्भव पत्रिका में प्रकाशित ‘ दो कवियन की वार्ता को लेकर भी विवाद हुआ। अशौक वाजपेयी ने अरुणकमल से बातचीत के दौरान अधिकतर युवा लेखकों को अपढ़ बताया जिस पर युवा लेखकों में तीखी प्रतिक्रिया हुई।
इस साल एक विवाद आलोचना में हरदेवी पर छपे लेख से भी हुआ।चारु सिंह ने रमन सिन्हा और गरिमा श्रीवास्तव पर सामग्री चुराने के आरोप लगाए जिसका कड़ा जवाब इन दोनों ने दिया।
हिंदी साहित्य की दुनिया मे इस वर्ष यौन शोषण की दो घटनाएं भी सामने आयी औऱ विवाद गहराया। साहित्य अकादमी के सचिव अपने विभाग की एक महिला कर्मचारी के साथ यौन दुर्व्यवहार के मामले में फंसे।
इस घटना के खिलाफ सैकड़ों लेखकों ने हस्ताक्षर किए। बावजूद इस विरोध के अधिकतर लेखकों ने साहित्य अकादमी के समारोहों में हिस्सा लिया। यह विवाद महीनों तक सोशल मीडिया में छाया रहा।
दूसरी बड़ी घटना ‘नयी धारा रेसीडेंसी’ विवाद रही।
इंसमे वरिष्ठ कवि कृष्ण कल्पित का नाम सामने आया।। एक युवा कवयित्री के साथ उनके यौन दुर्व्यहार के कारण उनके बहिष्कार की भी बात हुई।उनके खिलाफ हस्ताक्षर अभियान भी हुए।
ये दोनों बहुत चिंताजनक घटनाएं हैं साहित्य की शुचिता और नैतिकता के मद्देनजर।
महत्वपूर्ण
इस वर्ष राजकमल प्रकाशन समूह के द्वारा 9 स्त्री लेखकों के उपन्यास का एक साथ प्रकाशन एक बहुत महत्वपूर्ण परिघटना है। जिसके मार्फत उसने इस वर्ष को उपन्यास वर्ष घोषित किया। इस शृंखला में अलका सरावगी, जया जादवानी, अनामिका, सविता भार्गव, प्रत्यक्षा, वंदना राग आदि के उपन्यास सामने आयें।

हिंदवी ने भी इस वर्ष कई महत्वपूर्ण आयोजन किये। युवा कवियों के लिए उसने पुरस्कार शुरू किए और कविता कैम्पस का आयोजन किया।
नयी धारा ने भी दिल्ली में सालाना जलसा किया और नए रचनाकारों के लिए काव्य प्रतियोगिता भी शुरू की।
निष्कर्ष स्वरूप यह कहा जा सकता है कि हिंदी की दुनिया का विस्तार तो हो रहा है पर साहित्य का स्वरूप भी बदल रहा है इसकी संस्कृति बदल रही है। ये घटनाएं औऱ गहमागहमी इस बात की ओर संकेत करती हैं।
बहरहाल हिंदी साहित्य में ताजगी बची हुई है और युवा पीढ़ी की सहभागिता बनी हुई है। यह एक अच्छा संकेत है हिंदी साहित्य के भविष्य के लिए।


विमलकुमार ने वर्ष भर की गतिविधियों का सारांश बहुत त्वरित गति से लिखा है।पढ़ने में रोचकता मिली।
हिंदी साहित्य से संबंधित साल भर की गतिविधियां एवं घटनाएं एक साथ एक जगह पढ़ने को मिली। बहुत अच्छा लगा। आपको बहुत बहुत धन्यवाद 🙏