Friday, March 27, 2026
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विश्व रंगमंच दिवस: अदृश्य होती दुनिया में मनुष्य की तलाश

आज विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर हम पढेंगे दीपशिखा द्वारा किया गया विलेम डाफो के लेख का एक जरूरी अनुवाद। विश्व रंगमंच दिवस 2026 के अवसर पर विश्वप्रसिद्ध अभिनेता और रंगकर्मी विलेम डाफो का यह वक्तव्य रंगमंच की उस जीवंत परंपरा की ओर लौटने का आह्वान है, जिसकी जड़ें मानवीय संबंधों और सामूहिक अनुभव में निहित हैं। एक ऐसे समय में, जब तकनीक और आभासी संवाद हमारे जीवन को तेजी से संचालित कर रहे हैं, डाफो रंगमंच की उस अद्वितीय शक्ति को रेखांकित करते हैं जो मनुष्य को प्रत्यक्ष, संवेदनात्मक और साझा अनुभव के माध्यम से जोड़ती है।  यहां वे अपने व्यक्तिगत रंगमंचीय सफर और अनुभवों के सहारे वे यह स्थापित करते हैं कि रंगमंच कोई कलात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम भर नहीं,  वह सामाजिक चेतना और संवाद का एक आवश्यक माध्यम है, जो हमारे समय के प्रश्नों से मुठभेड़ करने की क्षमता रखता है।

मै एक अभिनेता हूँ जिसे दरअसल एक फिल्म अभिनेता के रूप में जाना जाता है। लेकिन मेरी जड़ें रंगमंच से गहराई से जुड़ी हैं। मै 1977 से 2003 तक वुस्टर समूह का सदस्य रहा, जहां हमने न्यूयॉर्क के परफार्मिंग गैराज में मौलिक रचनाएं तैयार की और प्रस्तुत किया और साथ ही दुनिया भर में सफर किया। मैंने रिचर्ड फोरमैन, रॉबर्ट विल्सन, और रोमियो कैस्टेलुची के साथ भी काम किया है। अब मै वेनिस थियेटर बिनेल का कला परिकल्पक हूं। इस नियुक्ति, दुनिया भर में कार्यक्रम, और रंगकर्म में वापस लौटने की मेरी इच्छा ने रंगमंच के अनोखे सकारात्मक शक्ति और उसकी अहमियत में मेरे भरोसे को अधिक मजबूत बनाया।

न्यूयॉर्क स्थित थियेटर कंपनी द वुस्टर ग्रुप में मेरे सामान्य शुरुआती दिनों में हमारे थियेटर में होने वाली कुछ प्रस्तुतियों में अक्सर बहुत कम दर्शक आते थे। आमतौर पर नियम यह था कि अगर कलाकार दर्शकों से ज़्यादा हो तो हम प्रस्तुति रद्द कर सकते थे। पर हमने ऐसा कभी नही किया। कंपनी के कई सदस्य रंगमंच में प्रशिक्षित नही थे बल्कि अलग अलग क्षेत्रों के लोग थे जो रंगकर्म के लिए एक साथ आए थे– इसीलिए “ शो जारी रहना चाहिए” दरअसल हमारा मंत्र नही था बल्कि दर्शकों के साथ अपनी मुलाकात जारी रखने को हमने  अपना दायित्व समझा था।

हम अक्सर दिन में रिहर्सल करते थे और शाम में उसी सामग्री को इस तरह दिखाते कि इस पर अभी काम चल रहा है. हम कभी-कभी एक प्रस्तुति पर सालों काम किया करते थें और उस दौरान अपना गुज़ारा पुराने प्रस्तुतियों का दौरा करके करते थे। किसी एक ही रचना पर सालों काम करना मेरे लिए अक्सर उबाऊ हो जाता था और रिहर्सल कुछ हद तक मुझे थका देने वाला लगता, लेकिन ये अर्धनिर्मित प्रस्तुतियां हमेशा रोमांचक होती थीं– भले ही  कम दर्शक हमारे काम में रुचि के स्तर का एक निराशाजनक मूल्यांकन हो। इससे मुझे यह बात समझ में आई कि चाहे कितने भी कम लोग हो, दर्शक ही रंगमंच को उसका अर्थ और जीवन देते हैं।

जैसे कि जुआघर का चिह्न कहता है,”जीतने के लिए आपको तत्पर रहना होगा”. सृजन की प्रक्रिया के दौरान वास्तविक समय में साझा किया गया अनुभव हमेशा अलग होता है चाहे वह लयबद्ध और सुनियोजित क्यों न हो; नि:संदेह प्रत्यक्ष रूप से रंगमंच की सबसे बड़ी ताकत है। सामाजिक और राजनीतिक तौर पर अपने को जानने और दुनिया की समझ बनाने के लिए रंगमंच कभी इतना अहम और जरूरी नहीं रहा।

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“कमरे में मौजूद हाथी” है नयी प्रोद्यौगिकी और सोशल नेटवर्किंग जो लोगों को जोड़ने का वादा करती है पर ऐसा लगता है कि इसने लोगों को एक दूसरे से अलग-थलग और अकेला कर दिया है। मै अपना कंप्यूटर रोज इस्तेमाल करता हूं जबकि मेरे पास कोई सोशल मीडिया नही है, यहां तक कि मैने खुद को भी बतौर अभिनेता गूगल पर खोजा है और जानकारी के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का भी सहारा लिया है। लेकिन अगर आप इस जोख़िम को नहीं पहचान पा रहे कि मानवीय संबंध उपकरण के साथ संबंधों में तब्दील होता जा रहा है तो आप ज़ाहिर तौर पर अंधे हैं। कुछ प्रोद्यौगिकियां हमारे लिए उपयोगी हो सकती हैं, लेकिन संचार के दायरे में दूसरे छोर पर कौन है, यह न जानने की समस्या बहुत गहरी है, और सच्चाई और वास्तविकता के संकट में योगदान देती है। इंटरनेट भले ही सवाल खड़े कर सकता है, लेकिन यह रंगमंच द्वारा पैदा  होने वाले अचरज के एहसास को बहुत कम ही दर्ज़ कर पाता है – एक ऐसा अचरज जो ध्यान, लगाव, और क्रिया एवं प्रतिक्रिया के दायरे में मौजूद लोगों के सहज समुदाय पर आधारित है।

एक अभिनेता और रंगकर्मी के रूप में मैं रंगमंच की शक्ति में दृढ़ विश्वास रखता हूं। एक ऐसी दुनिया में जो अधिक विभाजनकारी, नियंत्रणकारी और हिंसक होती जा रही है, रंगकर्मी के रूप में हमारी चुनौती यह है कि हम रंगमंच को केवल मनोरंजन के लिए समर्पित एक व्यावसायिक उद्यम या परंपराओं के शुष्क संस्थागत संरक्षक के रूप में भ्रष्ट होने से बचाएं, बल्कि, लोगों, समुदायों, संस्कृतियों को जोड़ने और सबसे बढ़कर, हम किस दिशा में जा रहे हैं, इस पर सवाल उठाने की  इसकी शक्ति को बढ़ावा दें……

 महान रंगमंच का मतलब होता है हमारे सोचने के तरीके को चुनौती देना और हमारी आकांक्षाओं की कल्पना करने में हमें प्रोत्साहित करना।

 हम सामाजिक प्राणी हैं और जैविक रूप से दुनिया से जुड़ने के लिए परिकल्पित हैं। हमारी हर एक ज्ञानेंद्रिय हमारे लिए संपर्क द्वार है और इस संपर्क के माध्यम से हम अपने अस्तित्व को और अधिक स्पष्ट रूप में परिभाषित कर पाते हैं। कहानी कहने, सौंदर्यशास्त्र, भाषा, चाल, दृश्य-निर्माण आदि के माध्यम से – रंगमंच एक संपूर्ण कला रूप के रूप में है यह दिखा सकता है कि हमारा संसार क्या था, क्या है और क्या हो सकता है।

(मूल लेख विलेम डाफो का है, जिसका अनुवाद दीपशिखा द्वारा किया गया है)

विलेम डेफो का परिचय- बिएनाले दी वेनेज़िया के थिएटर विभाग के कलात्मक निर्देशक, विलेम डेफ़ो, ‘द वूस्टर ग्रुप’ के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। न्यूयॉर्क में ‘द परफ़ॉर्मिंग गैराज’ (1977-2004) में रहते हुए, उन्होंने ‘अवां-गार्द’ थिएटर के लिए एक अनोखा नज़रिया विकसित किया। इसके बाद उन्होंने बॉब विल्सन, मरीना अब्रामोविक, रिचर्ड फोरमैन और रोमियो कैस्टेलुची के साथ मिलकर काम किया। 1980 के दशक की शुरुआत में, उन्होंने सिनेमा में भी काम करना शुरू किया और तब से स्वतंत्र और मुख्यधारा, दोनों तरह की फ़िल्मों में अपनी बहुमुखी प्रतिभा के लिए अंतरराष्ट्रीय ख्याति अर्जित की है। उन्हें चार एकेडमी अवार्ड नामांकन मिले हैं और 2018 में वेनिस फ़िल्म फ़ेस्टिवल में उन्हें ‘सर्वश्रेष्ठ अभिनेता’ के लिए ‘कोप्पा वोल्पी’ से सम्मानित किया गया था। थिएटर के प्रति उनकी लगन आज भी उनके कलात्मक दृष्टिकोण और अभिनय शैली को आकार दे रही है।

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दीपशिखा
दीपशिखा
दीपशिखा इलाहाबाद विश्वविद्यालयसे अंग्रेजी में परास्नातक कर रही हैं और सक्रिय रंगकर्मी हैं।
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