इस बार राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा आयोजित विश्व पुस्तक मेला पुस्तक प्रेमियों की बढ़ती भागीदारी, बाज़ार और बिक्री के विस्तार, ब्रांडिंग–मार्केटिंग के बढ़ते इस्तेमाल, हिंदी में कई अच्छी पुस्तकों के प्रकाशन तथा जेन-ज़ी पीढ़ी की सक्रिय भागीदारी के लिए ही नहीं, बल्कि किताबों के मेले को सैन्य राष्ट्रवाद से जोड़ने के कारण भी याद किया जाएगा।
यह भी उल्लेखनीय है कि इस बार पहली बार मुफ्त प्रवेश दिया गया, जिसका नतीजा यह रहा कि गत वर्ष की तुलना में चार लाख से अधिक पुस्तक प्रेमी मेले में आए। जहाँ गत वर्ष 20 लाख से अधिक पाठकों की उपस्थिति दर्ज की गई थी, वहीं इस बार यह संख्या और बढ़ी। इतना ही नहीं, गत वर्ष की तुलना में इस बार न्यास की पुस्तकों की बिक्री भी अधिक रही।
मेले में नवाचार
दस जनवरी से शुरू हुए इस मेले में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास की पुस्तकों की बिक्री में 30 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई। मेले में 35 देशों के एक हज़ार से अधिक प्रकाशकों ने भाग लिया और 600 से अधिक कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें लगभग एक हज़ार वक्ताओं की सहभागिता रही। मेले का उद्घाटन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने किया। मेले में गृह मंत्री अमित शाह के अलावा राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश, संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत तथा कुछ राज्यों के राज्यपाल भी उपस्थित रहे। प्रसिद्ध अभिनेत्री हेमा मालिनी और पूर्व मंत्री स्मृति ईरानी तथा रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ ने भी मेले में आयोजित चर्चाओं में भाग लिया।
राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने क़तर संस्कृति मंत्रालय, नोशन प्रेस, राजकमल प्रकाशन, हार्पर कॉलिन्स सहित अन्य संस्थानों को सुंदर और नवाचारी स्टालों के लिए विशेष प्रमाण-पत्र प्रदान किए। लेकिन आम दर्शकों के बीच सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र हिंदी-युग्म प्रकाशन द्वारा विनोद कुमार शुक्ल की पुस्तक ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ की आकृति में बनाया गया सेल्फी पॉइंट रहा। यद्यपि वहाँ चार दीवारें शुक्ल जी की स्मृतियों को समर्पित थीं, फिर भी हाथी और खिड़की वाले ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ के इस कॉन्सेप्ट ने सबसे अधिक ध्यान खींचा। इसे एक प्रकाशक द्वारा अपने दिवंगत लेखक को दी गई एक संवेदनशील और सुंदर श्रद्धांजलि के रूप में देखा जा सकता है।

मेले में वीआईपी संस्कृति
मेले में राजनेताओं और सेलिब्रिटीज़ के आगमन के साथ एक तरह की वीआईपी संस्कृति भी तेज़ी से बढ़ती दिखाई दी। यह सवाल भी उठता है कि ऐसी जगहों पर देश के बुद्धिजीवियों और लेखकों को अपेक्षाकृत अधिक मंच और अवसर दिए जाने चाहिए।
इसके बावजूद, मेले में आने वाले विशिष्ट अतिथियों में सर्वश्री भगवंत मान (माननीय मुख्यमंत्री, पंजाब), गजेंद्र सिंह शेखावत (माननीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री), जनरल अनिल चौहान (चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ), जनरल उपेंद्र द्विवेदी (थल सेना प्रमुख), एडमिरल दिनेश के. त्रिपाठी (नौसेना प्रमुख), जनरल (से.नि.) वी. के. सिंह (माननीय राज्यपाल, मिज़ोरम), आर. एन. रवि (माननीय राज्यपाल, तमिलनाडु), श्री एन. इंद्रसेन रेड्डी (माननीय राज्यपाल, त्रिपुरा), मेजर जनरल (डॉ.) बिपिन बख्शी तथा श्री सुधांशु त्रिवेदी सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति शामिल रहे। वहीं मेले में शुभांशु शुक्ला, रिकी केज, स्मृति ईरानी, हेमा मालिनी, जया किशोरी, कैलाश सत्यार्थी सहित अनेक प्रतिष्ठित लेखक और सार्वजनिक व्यक्तित्वों ने भी भाग लिया।
अंतरराष्ट्रीय स्वरूप का विस्तार : आदान-प्रदान
इंटरनेशनल इवेंट्स कॉर्नर में साहित्यिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान से जुड़े व्यापक कार्यक्रम आयोजित किए गए। स्पेन, ऑस्ट्रिया, यूक्रेन, ईरान, इज़राइल, जापान, तुर्की और चिली सहित 35 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों तथा सांस्कृतिक विशेषज्ञों ने साहित्य, जीवनानुभव, प्रकृति और सह-अस्तित्व, स्मृति और विस्थापन, अनुवाद, बहुभाषी कविता, बाल साहित्य, रंगमंच तथा साहित्यिक अनुवाद में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की नैतिकता जैसे विषयों पर संवाद किया।
स्पेनिश साहित्यिक परंपराओं के संदर्भ में आधुनिकतावादी कविता और बहुसांस्कृतिक प्रभावों पर विशेष चर्चा हुई। स्पेनिश, बास्क, कैटलन, एस्टुरियन, बांग्ला और हिंदी में हुए बहुभाषी कविता-पाठ ने भाषाई विविधता को समकालीन साहित्य की एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में रेखांकित किया। क़तर के नेतृत्व में खाड़ी देशों के साथ हुए सांस्कृतिक संवाद में साझा कथा-परंपराओं तथा पश्चिम एशिया में भारतीय साहित्यिक और नाट्य रूपों की उपस्थिति और गूंज पर प्रकाश डाला गया। इन संवादों ने नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले को वैश्विक साहित्यिक विमर्श, सांस्कृतिक समझ और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के एक सशक्त मंच के रूप में स्थापित किया।
केंद्र में बच्चे
नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला 2026 में बच्चे और परिवार केंद्र में रहे। बच्चों के पवेलियन “किड्ज़ एक्सप्रेस” में स्टोरीटेलिंग, रंगमंच, कला एवं शिल्प कार्यशालाएँ, क्विज़, वैदिक गणित सत्र, बुक कवर डिज़ाइन कार्यशालाएँ तथा बाल लेखकों से संवाद जैसे विविध कार्यक्रम आयोजित किए गए। इसके साथ ही, विश्व पुस्तक मेला 2026 ने “सीईओ स्पीक” और “न्यू दिल्ली राइट्स टेबल” जैसी पहलों के माध्यम से 70 से अधिक भारतीय और अंतरराष्ट्रीय प्रकाशकों के बीच अधिकार-विनिमय को प्रोत्साहित करते हुए एक सशक्त बी2बी मंच के रूप में भी अपनी भूमिका को और मज़बूत किया।

सांस्कृतिक गतिविधियाँ
मेले की शामें सांस्कृतिक कार्यक्रमों से गुलज़ार रहीं। इनमें रिकी केज, मंगणियार कलाकार, रहस्य द प्रोजेक्ट तथा भारतीय थल सेना, नौसेना और वायुसेना के बैंड्स के साथ-साथ समकालीन संगीत की प्रस्तुतियाँ शामिल रहीं। इन कार्यक्रमों ने एम्फीथिएटर में बड़ी संख्या में दर्शकों को आकर्षित किया।
लेखिकाओं की बढ़ती भागीदारी
हिंदी की दुनिया में इस बार मेले में बड़ी संख्या में लेखिकाओं की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। उनके कविता-संग्रहों, उपन्यासों, कहानी-संग्रहों और आलोचना की पुस्तकों के अनेक लोकार्पण हुए। अनीता भारती की सावित्रीबाई फुले पर महत्वपूर्ण पुस्तक का विमोचन भी मेले में हुआ। स्वराज प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक में सावित्रीबाई फुले की कविताओं के साथ-साथ हिंदी की कवयित्रियों द्वारा उन पर लिखी गई कविताएँ तथा सावित्रीबाई के कुछ लेख भी संकलित हैं।

वरिष्ठ लेखिका मृदुला गर्ग और नासिरा शर्मा ने मेले में ‘लिखने की मेज’ नामक पुस्तक का लोकार्पण किया। सूरजप्रकाश द्वारा संपादित इस पुस्तक में 125 लेखकों के लेख शामिल हैं, जिनमें 57 लेखिकाएँ हैं। राजकमल के ‘लेखक से मिलिए’ कार्यक्रम में अनामिका, मनीषा कुलश्रेष्ठ, कविता, वंदना राग, सुजाता, बलवंत कौर, निधि अग्रवाल, नेहा नरुका, प्रज्ञा और संगीता मिश्र ने पाठकों से संवाद किया।

राजपाल से मनीषा कुलश्रेष्ठ का नया उपन्यास ‘किनाया’ प्रकाशित हुआ, जिसे लेखिका ने यात्रा-संस्मरण और उपन्यास की मिश्रित विधा में लिखा बताया। बलवंत कौर ने विभाजन पर आधारित अपनी नई पुस्तक ‘स्मृति और दंश’ पर राजकमल के स्टाल पर संवाद किया। कहानी-संग्रहों में वरिष्ठ कथाकार कविता का सातवाँ संग्रह ‘वो रेन लिली खिलने के दिन’ भी मेले में आया, जिसे राजकमल ने प्रकाशित किया है। संग्रह के संदर्भ में लेखिका से बातचीत हुई और वरिष्ठ लेखिका ममता कालिया ने इसका लोकार्पण किया। राजकमल से ही जसिंता करकेंटा की कहानियों की पहली पुस्तक भी प्रकाशित हुई। लोकभारती प्रकाशन से प्रकाशित उज्मा कलाम और लकी राजीव के प्रथम कहानी संग्रह- ‘काली बिल्लियों के साये में चटोरी चुड़ैल’ और ‘शर्बत’ हिंदी कहानी में एक नई और सशक्त आवाज़ के रूप में दर्ज हुए। पुस्तक मेले में ये दोनों लेखिकाएँ स्वयं उपस्थित नहीं थीं, फिर भी उनके संग्रहों पर पाठकों की नजरें लगातार बनी रहीं।
रूपा सिंह की आलोचना की पुस्तक आधार प्रकाशन से आई, जिसका लोकार्पण हरि भटनागर और लीलाधर मंडलोई ने किया। पत्रकार नरेश कौशिक का पहला कहानी-संग्रह ‘ज़िंदा रहने की ज़िद’ राजपाल से प्रकाशित हुआ, जिसका लोकार्पण वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता, लेखिका और विदुषी सईदा हमीद, वरिष्ठ टीवी पत्रकार कादम्बिनी शर्मा और जगमति सांगवान ने किया।

कविता की महत्वपूर्ण पुस्तकों में शोभा सिंह, रूपम मिश्र, प्रिया वर्मा और अनामिका चक्रवर्ती के संग्रहों का लोकार्पण हुआ। शोभा सिंह की पुस्तक गुलमोहर प्रकाशन से आई, जबकि अनामिका चक्रवर्ती का संग्रह भावना प्रकाशन से प्रकाशित हुआ, जिसका लोकार्पण राजेश कुमार और प्रियदर्शन ने किया।
रांची की सुषमा सिन्हा का कविता-संग्रह प्रकाशन संस्थान से आया, जिसका लोकार्पण अब्दुल बिस्मिल्लाह, लीलाधर मंडलोई और शंकर ने किया। प्रिया वर्मा की पुस्तक का लोकार्पण अशोक वाजपेयी, लीलाधर मंडलोई और सविता सिंह ने किया; इसे प्रलेक प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। रीता दास राम का नया काव्य-संग्रह ‘अर्थ-बोध के सान्निध्य में’ सेतु प्रकाशन से आया, जो मंगलेश डबराल को समर्पित है।
डॉ. सुनीता की आलोचना की दो पुस्तकें भी मेले में आईं—एक वनिका से और दूसरी सेतु प्रकाशन से। जिन लेखकों की एकाधिक पुस्तकें मेले में आईं, उनमें मनीषा कुलश्रेष्ठ, गीताश्री और प्रेमरंजन अनिमेष प्रमुख रहे। मनीषा कुलश्रेष्ठ और प्रेमरंजन अनिमेष की दो-दो पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जबकि गीताश्री की चार पुस्तकें मेले में आईं।

कथा जगत में जहाँ लोकभारती से दो बिल्कुल नए प्रकाशन आए, वहीं उर्दू शायरी में संजू शब्दिता का पहला ग़ज़ल-संग्रह ‘साये से मुख़ातिब’ राजपाल से प्रकाशित हुआ, जिसका लोकार्पण प्रभात रंजन और ओम निश्चल ने किया। स्वतंत्र प्रकाशन ने विभा रानी और स्वाति चौधरी की ‘लाइफ़ स्केच सीरीज़’ की दो अनूठी पुस्तकें प्रकाशित कीं, जो मेले में आकर्षण का केंद्र रहीं।
साहित्य अकादमी के समारोह में क्षमा शर्मा और अनामिका ने अपने अनुभव साझा किए। मेले में नासिरा शर्मा, ममता कालिया और चित्रा मुद्गल भी कार्यक्रमों में उपस्थित रहीं और पुस्तकों के लोकार्पण किए।
कथेतर पुस्तकों की आमद
इस विश्व पुस्तक मेले में हिंदी की कथेतर पुस्तकों की बढ़ती लोकप्रियता विशेष रूप से ध्यान खींचती है। इतिहास, समाज, भाषा, राजनीति, स्मृति और निजी अनुभवों से जुड़े लेखन को पाठकों ने गंभीर रुचि के साथ अपनाया। मेले में आई चर्चित कथेतर पुस्तकों में अनिमेष मुखर्जी की इतिहास की थाली (पेंग्विन स्वदेश), विनीत कुमार की बैचलर्स किचन (अनबाउंड स्क्रिप्ट), अरविंद मोहन की हमर चम्पारण और यह जो बिहार है (राजकमल प्रकाशन), योगेंद्र यादव की गणराज का स्वधर्म (सेतु प्रकाशन), पुष्यमित्र की गांधी का सैंतालीस (राजकमल प्रकाशन), प्रियदर्शन की हमारी भाषा, हमारा देश (बोधरस प्रकाशन) तथा फादर कामिल बुल्के के पारिवारिक पत्रों पर आधारित संन्यासी के नाम पत्र उल्लेखनीय रहीं।

इसके अलावा कबीर संजय की जंगल मन की डायरी और मृणाल पांडे की उड़ती स्त्री जैसी पुस्तकों ने भी पाठकों का ध्यान आकर्षित किया। इन पुस्तकों की लोकप्रियता इस बात का संकेत है कि हिंदी का पाठक अब केवल कथा और कल्पना तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि इतिहास, विचार, भाषा, स्मृति और रोज़मर्रा के जीवन से जुड़े यथार्थ को समझने और उससे संवाद करने की गहरी आकांक्षा रखता है।
विविध
हमेशा की तरह इस विश्व पुस्तक मेले में कविता की पुस्तकों की उपस्थिति भी जोरदार रही। मेले में अनुपम सिंह की साँवली इबारतें, राकेश रेणु का कवि का छाता, विजय राही की दूर से दिख जाती है बारिश, केतन यादव की एक चरवाहे का गीत आदि विशेष रूप से चर्चा में रहीं। इन प्रकाशनों ने यह दर्शाया कि हिंदी कविता आज भी पाठकों के बीच गहरी पकड़ रखती है और नई आवाज़ों के साथ-साथ अनुभवों की विविधता को प्रस्तुत करने सक्षम है।
प्रतिभाशाली युवा कवि, लेखक, संपादक चंडीदत्त शुक्ल का कुछ साल पहले असमय निधन हो गया था। श्वेतवर्णा प्रकाशन द्वारा उनके रचना-समग्र का प्रकाशन विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

प्रकाशनों में राजकमल, वाणी, नई किताब, हिंदी युग्म, सेतु प्रकाशन, राजपाल, आईसेक्ट, न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, प्रलेक, किताबघर, सामयिक प्रकाशन, प्रभात प्रकाशन, अनबाउंड स्क्रिप्ट और आधार प्रकाशन का विशेष बोलबाला रहा। साथ ही जन चेतना, गार्गी प्रकाशन, स्वराज प्रकाशन, वेरा प्रकाशन, स्वतंत्र प्रकाशन, इंक प्रकाशन, प्रतिश्रुति और श्वेतवर्णा प्रकाशन जैसे छोटे प्रकाशन भी तेज़ी से उभरते दिखाई दिए।
केंद्र में सेना
53वें विश्व पुस्तक मेले की थीम “भारतीय सेना” रही। इसी के अनुरूप मेला सेना के इतिहास और पराक्रम पर केंद्रित रहा, जहाँ कारगिल युद्ध तथा “ऑपरेशन सिंदूर” की सफलता और स्मृति को विशेष रूप से रेखांकित किया गया। चूँकि इस वर्ष मेले की थीम भारतीय सेना थी, इसलिए सेना से संबंधित लगभग 500 पुस्तकें यहाँ प्रदर्शित की गईं। मेले में 21 परमवीर चक्र विजेताओं के अवदान को भी प्रस्तुत किया गया। इसके अतिरिक्त सेना के प्रमुखों और वरिष्ठ अधिकारियों ने भी कार्यक्रमों में भाग लिया। थीम पवेलियन में 100 से अधिक विशेष सत्र आयोजित किए गए। विभिन्न विषयों पर आधारित इन सत्रों में प्राचीन भारतीय युद्ध-कौशल, कारगिल युद्ध के प्रत्यक्ष अनुभव, ‘सैम और सगत’, दो महान सैन्य नेताओं पर केंद्रित सत्र, भारतीय नौसेना की भूमिका, सशस्त्र बलों में महिलाओं की भागीदारी, ‘1971 : एक राष्ट्र के निर्माण की गाथा’ तथा परमवीर चक्र विजेता मेजर राम राघोबा राणे की विरासत पर समूह-चर्चाएँ शामिल रहीं। थलसेना, नौसेना और वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारियों तथा पूर्व सैनिकों ने नेतृत्व, राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रसेवा जैसे विषयों पर संवाद किया।
थलसेना प्रमुख और नौसेना प्रमुख ने भी थीम पवेलियन का दौरा किया। नौसेना प्रमुख ने नागरिकों से पठन-पाठन की आदत विकसित करने का आग्रह किया और “किंडल पीढ़ी” के युवाओं को पुस्तकों से जुड़ा देखकर प्रसन्नता व्यक्त की। वहीं थलसेना प्रमुख ने बाल पाठकों से संवाद करते हुए ज्ञान, अनुशासन और पुस्तक-पठन के महत्व को रेखांकित किया।
लेकिन सवाल यह भी है कि पुस्तक मेले में इस सबका औचित्य क्या है? अर्जुन टैंक, तेजस और आईएनएस विक्रांत की अनुकृतियों के प्रदर्शन की प्रासंगिकता क्या है, जबकि हर वर्ष 26 जनवरी की परेड में पूरा देश इन्हें देखता, जानता और समझता है। हिंदी के कई लेखकों ने इस तरह के प्रदर्शन को बेतुका भी बताया। उनका कहना है कि किताबें जिस संस्कृति और विवेक को गढ़ती हैं, उसमें युद्ध, नफ़रत और वर्चस्व की अनिवार्यता नहीं होती। राष्ट्रप्रेम की भावना जगाने के लिए सभी भाषाओं में पर्याप्त और समृद्ध साहित्य उपलब्ध है; उसकी प्रस्तुति और प्रदर्शनी अधिक सार्थक और अर्थपूर्ण होती।


पुस्तक मेला पर पूरी नजर. आपने बहुत बढ़िया लिखा. महत्वपूर्ण जानकारी मिली. मेरी किताब की खबर को भी जगह देने के लिये हार्दिक आभार.🙏