बरेली में नाटकों का सालाना जश्न ‘विंडरमेयर रंग उत्सव’ अभी हाल ही में पूरा हुआ। 9 से 15 फ़रवरी तक विंडरमेयर थिएटर में सात नाटकों का मंचन हुआ, जिनमें मुंबई, दिल्ली, कोलकाता और पटना के नाट्य दलों ने शिरकत की। उत्सव का यह 16वाँ संस्करण था।
अपने ध्येय वाक्य ‘स्माल टाउन बिग थिएटर’ के मुताबिक़ इस बार भी उत्सव में देश के अलग-अलग हिस्सों में आला दर्जे का नाटक कर रहे दलों को न्योता दिया गया—कोलकाता से पदातिक थिएटर का नाटक ‘रात काफ़ी हो चुकी’, मुंबई से डी फ़ॉर ड्रामा के दो नाटक ‘कौमुदी’ और ‘खिचिक’, मुंबई से ही अर्थ थिएटर का ‘बोरो होर मर चुका है’, नई दिल्ली से साइक्लोरामा का ‘ठेके पर मुशायरा’ और पटना के निर्माण कला मंच का ‘बिदेसिया’। मेज़बान रंग विनायक रंगमंडल के कलाकारों ने ‘ट्रेडमिल’ की प्रस्तुति दी। रंग कौशल और रंग भाषा के लिहाज़ से ये सारी प्रस्तुतियाँ अपने आप में अनूठी थीं, फिर भी हुस्न-ओ-हुनर के एतिबार से कुछ ने ज़्यादा गहरी छाप छोड़ी।
कौमुदीः दार्शनिक सवालों से मुठभेड़
अभिषेक मजूमदार का लिखा और निर्देशित ‘कौमुदी’ इस उत्सव में दूसरी बार शामिल हुआ। कुमुद मिश्रा, शुभ्रज्योति बराट, गोपाल दत्त और संदीप शिखर के शानदार अभिनय से सजा ‘कौमुदी’, बरेली के नाट्य प्रेमी 2019 में भी देख चुके है। फिर भी यह नया और ताज़ा महसूस हुआ, पिछली प्रस्तुति से एक क़दम आगे भी। किसी फ़िल्म को दोबारा देखने के मुक़ाबले किसी नाटक को दोबारा देखने का तजुर्बा ज़ाहिर है कि अलग होता है। इसके बांध लेने वाले कथानक और उसमें निहित फ़लसफ़े के सम्मोहन में दर्शक इस क़दर डूबे कि मध्यांतर में भी बहुतेरे लोग अपनी जगह से हिले नहीं।

साठ के दशक के पसमंज़र में बुना यह कथानक वैसे तो एकलव्य के भूत और चक्रव्यूह में फँसे अभिमन्यु के हवाले से अपनी दृष्टि खो रहे एक ख्यात बूढ़े रंगकर्मी और उसके नौजवान बेटे के द्वंद्व के इर्द-गिर्द घूमता है, मगर इसी के समांतर यह मनुष्य के जीवट, महानता और तुच्छता के बोध, लालसा, प्रतिशोध, कला और ज़िंदगी में उसकी अहमियत, नैतिकता और व्यावहारिकता के विमर्श में बदलता जाता है। अभिषेक के बारे में कहा जाता है कि बुनियादी तौर पर वह चरित्रों के नाटककार हैं और अपने चरित्रों को माँजने का उनका कौशल कथानक में अपेक्षित नाटकीयता और द्वंद्व पैदा करता है। जिन्न और भूत सरीखे ‘बाहरी चरित्र’ भी रहस्य न पैदा करते हुए नाटक को देखने-समझने में मदद करते हैं।

‘कौमुदी’ का कथानक, महाभारत के प्रसंगों पर केंद्रित सच्चिदानंद आनंद के मलयालम उपन्यास ‘व्यासम विग्नेश्वरम’ और जॉर्ज लुई बोर्जेस के निबंध ‘ब्लाइंडनेस’ से प्रेरित है। इस नाटक के बारे में बात करते हुए अभिषेक मजूमदार ने एक इंटरव्यू में कहा था, ‘यह नाटक दर्शनशास्त्र के तीन अहम सवालों के जवाब तलाश करने की कोशिश है। किसका जीवन ज़्यादा महत्वपूर्ण है, एक बुज़ुर्ग का या एक नौजवान का? दूसरा सवाल, व्यक्तिगत और सार्वजनिक नैतिकता की पड़ताल है। और तीसरा ख़ुद कला के बारे में है। क्या जीवन में इसकी कोई भूमिका है? क्या हम कला की निर्मिति करते हैं या कला हमें निर्मित करती है?’

यह नाटक 2014 में तैयार हुआ था, देश भर में इसे ख़ूब सराहना मिली। कई वर्षों के अंतराल पर इधर फिर से इसका मंचन शुरू हुआ। अब तक इसके सौ से ज्यादा शो हो चुके हैं। चारों अनुभवी रंगकर्मी शुरू से ही इसका हिस्सा रहे हैं। नाटक के केंद्रीय चरित्र सत्यशील की भूमिका करने वाले कुमुद मिश्रा अपनी भूमिका की प्रशंसा सुनकर अब भी संकोच से भर जाते हैं, कुछ-कुछ असहज भी। बक़ौल कुमुद, उनकी इस भूमिका में अभी वह तासीर पैदा होने की क़सर बाक़ी रह गई है कि मंच पर उनके आते ही दर्शकों को अंदाज़ हो जाए कि वे आँखों की रौशनी खो रहे एक बूढ़े को देख रहे हैं। उनकी सौम्यता से वाक़िफ़ लोग उनकी इस बात का मर्म आसानी से समझ सकते हैं, हालाँकि ‘कौमुदी’ के पुराने दर्शक मानते हैं कि इस भूमिका में उनका अभिनय और पुख़्ता, कहीं ज़्यादा सहज और परिपक्व हुआ है। मंच के एक कोने में फ़्रीज़ शुभ्रज्योति बराट के भावशून्य चेहरे पर आँखों की भंगिमा और मंच से परे होने पर हाथ-पाँव की हरकतें देखने वालों को उनके किरदार से जोड़े रखती हैं। गोपाल दत्त तिवारी और संदीप शिखर हमेशा की तरह प्रभावित करते हैं।
बोरो होर मर चुका हैः आदिवासी मुद्दों पर गंभीर विमर्श
मुंबई के अर्थ थिएटर की यह प्रस्तुति दक्षिण अफ़्रीकी नाटक ‘सिज़वे बान्ज़ी इज़ डेड’ का रूपांतर है, जिसे हिंदुस्तानी संदर्भ में ढाला गया है। एथॉल फुगार्ड ने 1972 में यह नाटक दो जाने-माने अभिनेताओं, जॉन कानी और विंस्टन एनत्सोना के साथ मिलकर लिखा था। युवा रंगकर्मी गगन श्रीवास्तव ने दक्षिण अफ़्रीका में रंगभेद के हालात और मनुष्यता की कराह को भारतीय समाज में आदिवासियों के साथ हो रहे भेदभाव से जोड़कर देखा है। 54 बरस गुज़र जाने के बाद भी इस कहानी की बेजोड़ प्रासंगिकता और सार्थकता हैरत में डालती है, मगर परेशान भी करती है। इसके साथ ही यह उन हालात और निज़ाम और क़ानूनों के बारे में सोचने को उकसाती भी है, जो इंसान और इंसानियत को दरकिनार करके ज़ुल्मतों को ज़िंदा रखने में मददगार हैं। नाटक के केंद्र में झारखंड और छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का जीवन है, मगर यह कहानी तो वंचित समुदाय के हर शख़्स की कहानी है, भले ही वे इस देश के हों या फिर दुनिया के किसी और हिस्से में बसर करते हों। गगन इस नाटक के निर्देशक हैं और एक किरदार भी।

दो घंटे का नाटक और दम साधकर बैठे दर्शक; उनके सामने मंच पर जो कुछ घट रहा था, यह उसका असर था। आदिवासी ज़िंदगी की चुनौतियों को रेखांकित करता, आबादी के एक बड़े तबक़े की लाचारी बयान करता और सूरत-ए-हाल की पड़ताल करता नाटक ‘बोरो होर मर चुका है’ मर्म छूता है, करुणा जगाता है, बेचैन और परेशान और उत्तेजित करता है, मारक तंज़ पेश करता है और दुनिया की सच्चाइयों की कितनी ही गाँठों को उलझाता-सुलझाता जाता है।
जातिगत अस्मिता, अभिमान और व्यक्तिगत पहचान, भूख और ज़िम्मेदारियों के द्वंद्व में फंसी ज़िंदगी, जो अपने पुरखों का दिया सब कुछ हार चुकी—विकास की झूठी शान के आगे—जीने की उम्मीद में हर बार एक और, नए क़िस्म का समझौता करती चली जाती है। जाने कब से यही सिलसिला चला आ रहा है। आदिवासियों की जंगल पर सदियों पुरानी मिल्कियत ख़ारिज। खदान के लिए खेतों से उनका हक़ ख़ारिज। स्कूलों में दाख़िले की उनकी ख़्वाहिश नामंज़ूर। अपनी जड़ों से जुड़े रहने और अपनी तहज़ीब बचाए रखने की उनकी हर कोशिश पर कुल्हाड़ी। उनका निष्कलुष मन शरीर से अलगा देने की बेहिसाब साजिशें।

क़ुदरती संसाधनों की लूट की ख़ातिर पूंजी के महाजाल में अकेली चीज़ जो उनके काम की बची, वह उनका शारीरिक श्रम है। बिना रुके मशीनों की तरह अनथक मेहनत। यों श्रम तो वे हमेशा से करते आए, पर तब वह किसी सेठ या सरकार की तिज़ोरी भरने का बहाना नहीं था, वह उनकी अपनी, उनके कुनबे और क़बीले की ख़ुशहाली की ख़ातिर था। अपनी ही ज़मीन-पहाड़-नदियों से बेदख़ल होकर, अपने ही देश में बेगाना मान लिए जाने के बाद भी उन्होंने क्या चाहा—बस, थोड़ी-सी बेहतर ज़िंदगी के ख़्वाब देखने का अधिकार और उन्हें पूरा करने के मौक़े। वह भी उन्हें कहाँ मयस्सर हुआ। पुरखों से उन्हें मिले संस्कार और क़बीले के रीति-रिवाज़ बाहर की दुनिया के लिए सजावटी सामान और मनोरंजन का बहाना बन गए। ऐसे में बोरो होर जैसों के पास कोई और रास्ता ही क्या रह जाता है।

हालात की मंज़रकशी के संवाद इतने चुटीले ज़रूर हैं कि बदन में झुरझुरी पैदा कर दें। ये संवाद दर्शकों को दौर-ए-हालिया की सोच और निज़ाम की कारगुजारी के ऐसे सूत्र भी सौंपते जाते हैं, जो बदहाली का बायस हैं। इन सूत्रों को खोलना, उन पर सोचना और सही-ग़लत का फ़ैसला ज़ाहिर है कि दर्शकों की ज़िम्मेदारी ठहरी।
गगन श्रीवास्तव, संजय के. साहु और जयहिंद कुमार ने अपने किरदारों को बहुत सधे हुए ढंग से बरता है। बोरो की भूमिका में जयहिंद कुमार गहरे तक मुतासिर करते हैं। सेट डिज़ाइन बहुत हद तक मूल नाटक के ब्योरे से प्रेरित है, मगर जिस तरह इसे देसी ज़रूरतों के मुताबिक़ ढाला गया है, वह असरदार है और जाने क्यों सुरेश पंजाबी की तस्वीरों की याद दिलाता है। वैसे ही जैसे कि हांसदा सोवेंद्र शेखर की कहानी ‘आदिवासी नहीं नाचेंगे’ बरबस याद आती है।
मुशायरे के बहाने मु’आशरे की ख़बर लेता ड्रामा
दिल्ली के नाट्य दल साइक्लोरामा की प्रस्तुति ‘ठेके पर मुशायरा’ मरहूम अदीब इरशाद ख़ान ‘सिकन्दर’ का लिखा नाटक है, जो नए ज़माने में पुरानी रवायतों पर टिके शायरों की ज़िद, और मुशायरों के मंच की बदली रंगत के हवाले से हमारे मु’आशरे की ख़बर लेता-देता है। अदब की दुनिया में दाख़िल सस्तेपन, झटपट मशहूर होने की महत्वाकांक्षा के चलते उस पर हावी होते बाज़ारूपन से तहज़ीब और समाजी ज़िंदगी में पड़े ख़लल पर रौशनी डालता है। हमारे दौर के ऐसी विसंगतियों की ओर इशारा करता है, जहाँ पूँजी और सियासत का गठजोड़ तहज़ीब-ओ-अदब की भी कसौटी बन गया है और बिना चूँ-चपड़ किए मु’आशरे ने इसे क़ुबूल भी कर लिया है। नाटक के निर्देशक दिलीप गुप्ता हैं।

नाटक शुरू होने से पहले ऑडिटोरियम जिस घन गंभीर आवाज़ से गूँज उठता है, वह इरशाद ख़ान ‘सिकन्दर’ की है। ड्रामे का त’आरुफ़ कराते हुए वह एक शे’र पढ़ते हैं—अब मेरे सर पर सबको हँसाने का काम है/ मैं चाहता हूँ काम ये संजीदगी से हो। इस शे’र की नौ’इय्यत दरअसल नाटक का सार ही है। यह काम सचमुच संजीदगी से हुआ है, नाटक देखने वाले जब-तब हँस पड़ते हैं, कभी ज़ोर से तो कभी खिलखिलाते हुए पर यह हँसी मन पर भारी थी, जो रह-रहकर कचोट से भर उठता था। गुदगुदाते हुए चिकोटी काटने की तरह। सच तो यही है कि ज़बान की, अदब की, शऊर और शाइस्तगी की ऊँचाइयों से हम अचानक भहराकर गिर नहीं पड़े, सीढ़ी-दर-सीढ़ी लुढ़कते आए हैं, बिना उफ़ किए हुए। और इसी ख़ामोशी का हासिल नीचे का वह पायदान है, जहाँ पड़े-पड़े हम इतराते हैं, चीयरलीडर्स हमें ख़ुश रखने में जुटे हैं, हौसला बंधाते हैं। यों, कोई उम्मीद बर नहीं आती।

नाटक का मूल स्वर व्यंग्य है। हास्य जहाँ-तहाँ परिस्थितिवश पैदा होता है, पर व्यंग्य की अंतर्निहित धारा बहती चलती है। क्रिकेट की लीग और खिलाड़ियों की नीलामी की तर्ज पर आईएमएल यानी इंडियन मुशायरा लीग बनाने का ख़्याल और इसकी व्याख्या को बानगी मान सकते हैं। गुज़रे ज़माने के अदीब तोहफ़े क़ुबूल करके किसी शायरा को ग़ज़ल लिखकर देते हैं और इत्तिफ़ाक़ से उसी की प्रति दूसरी शायरा को भी दे देते हैं। कल्पना कीजिए कि एक मंच पर दो अलग-अलग लोग एक ही ग़ज़ल को अपने नाम से पढ़ने पहुँच जाएं तो सूरत-ए-हाल क्या होगी। कुछ मंज़र हैं—शायर माइक पर अपना कलाम पढ़ रहा है, आयोजक बीच में ही उसे हटाकर किसी का पर्स या किसी बच्चे के खोने का ऐलान करने के लिए माइक ख़ुद ले लेता है। पैरोडी पर वैसी ही किलकारियाँ गूँजती हैं, जैसे कि सस्ते नाच-गाने पर। और ऐसे अशआर भी लिखे-सुनाए जाते हैं—किसी के इश्क के कांटों से उलझे/ उलझकर फट गया कुर्ता हमारा। अभी हाल ही गार्डियन में छपी एक रिपोर्ट का ध्यान आता है कि पढ़ने की अपनी रवायत हिंदुस्तानी जाने कब की पीछे छोड़ आए हैं तो सर्दियों में लगने वाले किताबों के तक़रीबन सौ मेलों में कौन-से लोग आते हैं। बरेली में ही चुंगी के एक मुशायरे में ‘कारवाँ गुज़र गया…’ सुनाते हुए हूट किए नीरज की याद आती है और उनके थोड़ी-ही देर बाद माइक पर आए एक हास्य कवि को इसी गीत की पैरोडी पर मिली दाद भी याद आती है। अदब की महफ़िलों पर अब कारोबारियों का क़ब्ज़ा है, और हल्कापन सुनने वालों का गहना।
बिदेसियाः रेलिया न बैरी, जहजिया न बैरी
भोजपुरी के ख्यात लोककलाकार, रंगकर्मी और नवजागरण के संदेशवाहक भिखारी ठाकुर का लिखा हुआ लोकनाट्य ‘बिदेसिया’ (1912) एक सदी से ज़्यादा पुराना हुआ, मगर इसकी कशिश बरक़रार है तो उसकी बहुतेरी वजहों में से एक रोज़ी-रोटी का सवाल भी है। भोजपुरी बोली में तमाशा और नौटंकी शैली के मेल वाला यह नाटक यों तो कमाने के लिए परदेस जाने वालों के पीछे छूट गए परिवार की स्त्रियों के अकेलेपन और उनकी पीड़ा को केंद्र में रखता है, मगर रोज़गार की ख़ातिर पलायन की मजबूरी को भी रेखांकित करता है। पिछले चार दशकों से यह नाटक खेलते आ रहे निर्माण कला मंच के कलाकारों ने बरेली में इस अनूठे संगीतमयी नाटक की 783वीं प्रस्तुति दी। नाटक का संगीत, परिकल्पना और निर्देशन संजय उपाध्याय ने किया है।

कहन की सहजता, विषयवस्तु की प्रासंगिकता, सरोकार, भावनात्मक संवेदनशीलता और कलाकारों की ऊर्जा ऐसे तत्व हैं, जो भोजपुरी न जानने-समझने वाले दर्शकों को न सिर्फ़ बाँधे रखते हैं, बल्कि मूल भाव सहज ही संप्रेषित भी करते हैं। रंग समीक्षक अमितेश कुमार मानते हैं कि ‘बिदेसिया’ भिखारी ठाकुर के नाट्य लेखन की दक्षता भी रेखांकित करता है, जिसमें वह पूरी कहानी पहले ही बता देते हैं। और फिर यह धीरे-धीरे मंच पर घटित होती है। कहानी जान लेने के बाद भी उसे देखने का सुख बना रहता है।

ट्रेडमिलः अख्खा दिन भागा-भागी रहता है
नए दौर की ज़िंदगी में होड़ और भागमभाग के फेर में हम कितनी ही तरह के नाज़ुक जज़्बात से दूर हो जाते हैं, किसी मद्धिम संगीत की तरह यह मन के किसी कोने में बचे रहते हैं तो भी उसे सुन पाने, उस पर ग़ौर करने की फ़ुर्सत किसे है। संदीप शिखर के लिखे इस नाटक में ‘ट्रेडमिल’ एक रूपक भी है, कि हम लगातार दौड़े जा रहे हैं, तेज़ और तेज़…पर पहुँचते कहीं नहीं हैं। समय, समाज, सद्भाव, सियासत और प्रेम के कितने ही प्रतीकों-प्रसंगों को मिलाकर बुना हुआ यह नाटक अपनी कहन में जितना असरदार है, रंगविनायक रंगमंडल की टोली ने उतनी ही असरदार गंभीरता से इसे तैयार किया है। दानिश ख़ान के निर्देशन में इस नाटक के अब तक कई शो हो चुके हैं।

गंभीर विषय पर बात करने के बावजूद ‘खिचिक’ में ‘एडल्ट ह्यूमर’ के मसाले की मिलावट बहुतेरे दर्शकों को असहज करने वाली थी। एक वजह शायद यह हो कि बरेली वाले मुंबई के दर्शकों के माफ़िक़ ‘परिपक्व और समझदार’ नहीं हो पाए हैं और ‘कमर्शियल ज़रूरतों’ से नावाक़िफ़ हों। इन्हीं दिनों ‘स्क्रीन’ में आए सुजॉय घोष के एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि जूही चावला के एतराज़ करने पर कैसे उन्हें ‘झंकार बीट्स’ का एक सीन हटाना पड़ा। जूही के मुताबिक वह घटिया था, यहाँ वही पुड़िया अपने बटुए में लेकर घूमता नायक मंच पर था। यह नाटक कुछ ज़्यादा लंबा और बोझिल भी निकला।
कहानियों के ड्रामाई रूपांतर के नए चलन के हिसाब से ‘रात काफ़ी हो चुकी’ तीन कहानियों का ऐसा पाठ था, जिसमें ड्रामा का शिल्प और बुनियादी तत्व नदारद रहे। मंच पर आने वाले किरदारों के हाथ में कहानी के पन्ने पूरे वक़्त बने रहे और कुछ प्रसंगों में अखरे भी।
उत्सव के आयोजन दयादृष्टि चैरिटेबिल ट्रस्ट के चेयरमैन डॉ. ब्रजेश्वर सिंह ने समापन के मौक़े पर विंडरमेयर स्कॉलरशिप की घोषणा करते हुए कहा कि इसकी मंशा होनहार रंगकर्मियों का सहयोग करने की है।

