Thursday, April 9, 2026
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ईरान से युद्धविराम, लेकिन लेबनान पर हमले क्यों नहीं रोक रहा इजराइल?

सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इजराइल अपने सबसे बड़े सहयोगी यानी अमेरिका द्वारा सहमत हुए युद्धविराम को खतरे में क्यों डाल रहा है। आखिर बेंजामिन नेतन्याहू लेबनान पर बमबारी करने पर क्यों अड़े हुए हैं?

अमेरिका और ईरान की ओर से युद्धविराम पर सहमति के बाद ऐसा लगा था कि एक बड़े संकट से दुनिया बाहर आ रही है। हालांकि युद्धविराम की घोषणा के कुछ ही घंटे बाद इजराइल के लेबनान पर किए गए बड़े हमले ने सीजफायर के बने या नहीं बने रहने को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। इजराइल की सेना ने लेबनान पर हमले को अब तक की उसकी सबसे बड़ी समन्वित कार्रवाई बताया है।

ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर इजराइल अपने सबसे बड़े सहयोगी द्वारा सहमत हुए युद्धविराम को खतरे में डालकर आखिरकार लेबनान पर बम बारी करने पर क्यों अड़ा हुआ हैं? बेंजामिन नेतन्याहू ऐसा क्यों कर रहे हैं? इसे समझते हैं।

इजराइल की ओर से बुधवार को लेबनान पर हमले में 10 मिनट के भीतर 100 से अधिक ठिकानों पर स्ट्राइक किए गए जिसमें लगभग 250 लोगों के मारे जाने की सूचना है। इजराइल के हमलों के चलते पहले से ही अस्थिर युद्धविराम अब लगभग टूट के कगार पर है। ईरान ने कथित तौर पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को फिर से बंद कर दिया है। दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी कहा कि लेबनान में इजराइल के सैन्य अभियान को रोकना ईरान से युद्धविराम पर हुए समझौते का हिस्सा नहीं था।

शहबाज शरीफ के ट्वीट का क्या हुआ?

ट्रंप का ये बयान इसलिए भी चौंकाने वाला है क्योंकि बुधवार को पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने अपने ट्वीट में कहा था कि अमेरिका अपने सहयोगियों (इजराइल) के साथ लेबनान सहित हर जगह सीजफायर के लिए तत्काल प्रभाव से तैयार हो गया है। हालांकि, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के ट्वीट के कुछ ही घंटे बाद इजराइली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू ने इससे इनकार करते हुए कहा था कि लेबनान पर हमले जारी रहेंगे।

इसके बाद ईरानी विदेशी मंत्री अब्बास अराघची ने एक्स पर लिखा, ‘गेंद अब अमेरिका के पाले में है और दुनिया देख रही है कि वो अपने वादे पर खड़ा उतरता है या नहीं।’

लेबनान पर हमला, घर में घिर गए हैं नेतन्याहू?

नेतन्याहू क्यों लेबनान पर हमला जारी रखे हुए हैं, इसे समझने के लिए ये भी देखना होगा कि बदल रहे हालात को इजराइल में कैसे देखा जा रहा है। इजराइल के विपक्षी नेता ईरान के साथ हुए युद्धविराम की आलोचना कर रहे हैं। उन्होंने नेतन्याहू पर युद्ध के उद्देश्यों को प्राप्त करने में विफल रहने का आरोप लगाया।

अमेरिका और ईरान के बीच उभरा समझौता एक तरह से इजराइली पीएम को साइडलाइन करके सामने आया। इजराइल में इसे लेकर भी बातें हो रही हैं। पाकिस्तान में होने वाली आगे की बातचीत में भी इजराइली प्रधानमंत्री की प्रत्यक्ष भूमिका नहीं के बराबर नजर आ रही है।

कई मीडिया रिपोर्ट के जरिए ये बात सामने आई है कि इजराइल इस युद्धविराम से बहुत खुश नहीं था, क्योंकि उसे शामिल किए बगैर इस पर बात हुई और फिर आखिरी लम्हों में उसे इसकी जानकारी अमेरिका की ओर से दी गई।

नेतन्याहू ने ईरान के खिलाफ अभियान को लेकर जो लक्ष्य बताए थे, उसमें उन्हें बहुत सफलता मिलती नहीं दिखी है। नेतन्याहू ने पिछले महीने कहा था कि इजराइल का उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना, और अधिक बैलिस्टिक मिसाइलें विकसित करने से रोकना और ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करना था जिससे ईरानी जनता ‘उस क्रूर, अत्याचारी शासन को हटा सके जिसने लगभग आधी सदी से उन पर अत्याचार किया है।’

हालाँकि, एक महीने से अधिक युद्ध चलने के बावजूद ईरान के पास अभी भी समृद्ध यूरेनियम का भंडार है, जिसका उपयोग वो चाहे परमाणु बम बनाने के लिए कर सकता है। हालाँकि तेहरान लगातार इस बात से इनकार करता रहा है कि उसका यही उद्देश्य है। इसके अलावा कई अनुमानों के अनुसार, ईरान के मिसाइल भंडार का लगभग एक तिहाई हिस्सा अभी भी सुरक्षित है।

अली खामेनेई जरूर मारे गए हैं लेकिन सत्ता वही है। इजराइल के विपक्षी नेता यायर लैपिड के शब्दों में अगल कहें तो, ‘ईरान पर 86 वर्षीय खामेनेई के शासन के बजाय, अब 56 वर्षीय खामेनेई का शासन होगा।’

नेतन्याहू की रणनीतियों को लेकर इजराइल में आरोप लग रहे हैं कि देश को एक रणनीतिक सहयोगी के तौर पर नहीं, बल्कि एक ‘विध्वंस करने वाले कॉन्ट्रैक्टर’ के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। इसलिए, युद्धविराम का लंबे समय तक टिके रहना नेतन्याहू के हित में नहीं है।

ईरान के खिलाफ कार्रवाई से पहले से इजराइल लेबनान में हिजबुल्लाह पर हमले कर रहा है। गाजा के खिलाफ जंग से ही ये जारी है। लेकिन अब ईरान के साथ-साथ लेबनान में भी हमले रोकना नेतन्याहू के लिए कठिन फैसला है। नेतन्याहू को इसी साल चुनाव का भी सामना करना है।

लेबनान, हिज्बुल्लाह के खिलाफ पुरानी है इजराइल की लड़ाई

इजराइल और हिज्बुल्ला के बीच का संघर्ष नया नहीं है। पूर्व में इजराइल और हिज्बुल्लाह कई बार आमने-सामने आ चुके हैं। आखिरी बार दोनों के बीच सीधी जंग 2006 में हुई थी। इजराइल बहुत लंबे समय से हिज्बुल्लाह को अपनी सीमाओं पर सबसे बड़े खतरे के रूप में देखता रहा है। हिज्बुल्लाह की स्थापना 1982 हुई थी।

1982 में इजराइल ने दक्षिणी लेबनान पर आक्रमण किया ताकि फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइज़शन को सैन्य रूप से कमजोर किया जा सके, जो इस क्षेत्र को इजराइल पर हमलों के लिए आधार के रूप में इस्तेमाल कर रहा था। इजराइल का यह हमला क्षेत्र पर 18 सालों तक उसके कब्जे में बदल गया। इसी दौरान हिज्बुल्लाह बना।

ईरान समर्थित इस समूह का गठन इजराइल को बाहर निकालने के लिए किया गया था। हिज्बुल्लाह के लड़ाके तब वर्षों तक गुरिल्ला युद्ध लड़ते रहे थे, जिसके कारण इजराइल को 2000 में दक्षिण लेबनान से पीछे हटना पड़ा था। इसके बाद से इन इलाकों में हिज्बुल्लाह की पकड़ है।

हिज्बुल्लाह इजराइल को बतौर राष्ट्र नहीं मानता है और कहता है कि फिलिस्तीनी भूमि पर इसे नाजायज तौर पर स्थापित किया गया है। कुल मिलाकर हिजबुल्लाह चाहता है कि इजराइल का अस्तित्व मिट जाए। हिज्बुल्लाह अमेरिका का भी घोर विरोधी है। हिज्बुल्लाह को दुनिया की सबसे भारी हथियारों से लैस गैर-सरकारी सैन्य ताकतों में से भी एक माना जाता है।

यह भी पढ़ें- खतरे में सीजफायर! ईरान ने बंद किया होर्मुज, इजराइल के लेबनान पर ताबड़तोड़ हमले से नाराज: रिपोर्ट

विनीत कुमार
विनीत कुमार
पूर्व में IANS, आज तक, न्यूज नेशन और लोकमत मीडिया जैसी मीडिया संस्थानों लिए काम कर चुके हैं। सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची से मास कम्यूनिकेशन एंड वीडियो प्रोडक्शन की डिग्री। मीडिया प्रबंधन का डिप्लोमा कोर्स। जिंदगी का साथ निभाते चले जाने और हर फिक्र को धुएं में उड़ाने वाली फिलॉसफी में गहरा भरोसा...
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